मोह तो हो नहीं सकता, क्योंकि मेरे पास कुछ नहीं है। अभी गुजरात से पति-पत्नी आए थे; दोबारा पति आए और जाते समय कहा कि मेरी पत्नी नहीं आ पाई, उन्होंने कहा है कि आप अपने हाथों से कुछ दे दीजिए। मैंने देखा, क्या दूं, क्या दूं — आखिर में मैंने कहा, मेरे पास कुछ देने के लिए नहीं है, अपना ख्याल रखिए बस। तो मोह मुझसे नहीं हो सकता, क्योंकि मेरे पास कुछ है नहीं; अगर होगा तो मुझसे प्रेम होगा। मोह में तो आप मेरे पास रह भी नहीं सकते, मोह में तो आप मुझे सुन भी नहीं सकते। मेरे पास कुछ है ही नहीं, मैं आपको दूंगा क्या? बिस्किट दूंगा तो वो आपके शरीर को दूंगा। लेकिन आपको देने के लिए मेरे पास आपके अलावा कुछ नहीं है। तो मेरा भाव बस इतना है कि आपका आपसे मिलना हो जाए, क्योंकि जब तक ये नहीं होगा तब तक आप ऐसे ही अधूरे घूमते रह जाओगे। मैं किसी को वस्तुएं देकर खुश नहीं करना चाहता; वस्तुएं शरीर तक हैं। मैं चाहता हूं आपका आपसे मिलना हो जाए — आपको आप मिल जाओगे, बात खत्म हो जाएगी। जिस क्षण, जिस पल आपका आपसे मिलना होगा, उसी क्षण आप पूर्णता में हो जाएंगे। आपकी कमी आपके मिलने से ही जाएगी; ये कमी किसी वस्तु से नहीं जाएगी। आपको कुछ भी मिल जाए, कमी बनी रह जाएगी — देव दर्शन भी हो जाए तो भी वो कुछ क्षण के लिए है। जब आपका आपसे मिलना होगा, फिर वो कमी हट जाएगी।
भक्त दिखते हैं, होते नहीं हैं, क्योंकि लालची भक्त हो नहीं सकते। और भूत का पूरी तरह संशय है — कोई कहता है है, कोई कहता है नहीं है। एक बार जो इनके चक्कर में पड़ा, वो गया। इसलिए भक्त और भूत पे कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। है तो भी ठीक, नहीं है तो भी ठीक — अपने-अपने रास्ते निकल जाओ। भक्त कौन है? जिसे कुछ नहीं चाहिए, वो भक्त है। जिसे कुछ चाहिए, वो भक्त थोड़ी ना है — वो तो लुटेरा है।
कर सकते हैं, लेकिन आप बता दीजिएगा कि किसने बताया, नहीं तो अहम भाव खड़ा हो जाएगा। क्योंकि वो पूछेगा, इतनी गहरी बात कहां से बता रहे हो? अगर उसे नाम नहीं बताओगे, फिर आपका अहम भाव खड़ा हो जाएगा और आपको गिरा देगा। तो बोल देना कि इस शब्द को मैंने यहां से उठाया, बस बात खत्म — तब आपका अहम भाव नहीं उठेगा। नहीं तो वो सोचेगा कि आप तो बहुत गहराई में पहुंच गए, फिर आपसे मिलने का उसका तरीका बदल जाएगा, हावभाव बदल जाएगा, फिर बाद में वो आपको भटका देगा। आप बोलिए, लेकिन बोल दीजिए कि इस शब्द को हमने यहां से उठाया, आप भी ले सकते हो।
आत्मा तो ना ऊपर उठती है, ना नीचे जाती है। चेतना का मतलब, जहां तक मैंने समझा — चेतना मतलब समझ। कुछ लोग चेतना को कॉन्शियसनेस, कुछ भी बोल दें; अपने को तो निकलना है बस, उलझना नहीं है। बोलते हैं ना चेतना को बढ़ाओ — मतलब समझ को बढ़ाओ।
प्रवृत्ति से मुक्त हो जाना, निवृत्ति में आ जाना। अनित्य को छोड़कर नित्य में आ जाना। अनित्य मतलब जो बदल रहा है, डायनामिक — उसको छोड़कर नित्य में आ जाना, अपने आप में।
अगर अपने आप को समझना है, अपने आप में होना है, अपने वजूद, अपने अस्तित्व को समझना है, तो आपको तप करना पड़ेगा। आप भोजन और भोग में ही तो भागे हो। जब आप बिना पानी का एक दिन, दो दिन, तीन दिन व्रत रखोगे, तब आपको समझ में आएगा कि बंधन कितना है। खा-पी के बढ़िया मजे में रहते हैं और कहते हैं मैंने सब छोड़ दिया — छोड़ना इतना आसान नहीं है जितना आप समझते हो। जब आप तप करते हो तब पता चलता है कि मेरे कितने बंधन हैं, परिवार से कितना बंधन है, मेरी कितनी जिम्मेदारियां हैं, मेरा कितना कर्तव्य है। तब भूख समझ में आती है, प्यास समझ में आती है, भोजन के प्रति आस्था पैदा होती है कि मेरे जीवन में भोजन का, प्रकृति का, पानी का कितना महत्व है। तप नहीं करोगे तो ये बातें समझ में ही नहीं आएंगी, बस बातें रहेंगी। ज्यादातर लोग ध्यान कर रहे हैं, भक्ति कर रहे हैं, ज्ञान मार्ग पर चल रहे हैं, लेकिन तप नहीं कर रहे, इसलिए कुछ हो नहीं रहा। जो पहुंचे, उन्होंने अपने जीवन में तप किया। तप से पाप-पुण्य दोनों का नाश होता है, क्योंकि तप में आप होते हो। भक्ति करोगे तो कोई इष्ट है, ध्यान करोगे तो विचार हैं, योग मार्ग पर अनेक क्रियाएं हैं, ज्ञान मार्ग पर शब्द हैं — लेकिन तप में सिर्फ आप होते हो, कुछ नहीं रहता। इसलिए तप करना श्रेष्ठ है।
ये आपकी कुटिया नहीं है। आपको तप करना है। पहली बात, साधक को जब तक आत्मज्ञान ना हो, कुटिया बनाना ही नहीं चाहिए। यहां आपकी व्यक्तिगत व्यवस्था नहीं है, यहां का नियम आपके कहने से नहीं चलता। एक टाइम भोजन मिल रहा है — उतना मिल रहा है जितने में आप जी सको। किसी से व्यवहारिक बातें नहीं करनी हैं। भ्रमण तो आप कर ही रहे हो — कई सालों से घूम रहे हो, बहुत जांचने के बाद, लोगों को सुनने के बाद यहां पहुंचे हो। यहां आपका पैसा, आपका बैकग्राउंड काम नहीं आ रहा, सबके साथ एक जैसा बर्ताव है, और उस व्यवस्था में मैं भी जी रहा हूं। आपको फैसला लेना पड़ेगा कि कैसे भी मेरा आत्मिक कल्याण करना है। जहां लगे कि यहां व्यवहारिक बातें हो रही हैं, यहां मेरा काम नहीं होगा, वहां से निकल जाओ — मोह में मत आओ, जाल में मत फंसो। जहां लगे कि मेरा स्तर उठ रहा है, जिस लिए निकला हूं वह कार्य हो रहा है, तभी रुको। इसलिए तप जरूरी है, कहीं भी रहो। गृहस्थ जीवन में भी हो तो छुट्टी के दिन एक-दो दिन व्रत रख के देखो, समझ में आएगा कि हमारे अंदर कितना डर है।
अगर आप गृहस्थ छोड़ के निकले हो और आप पर कोई जवाबदारी नहीं, तो बचना क्यों? मिटाना है। बच के क्या करेंगे? कभी न कभी तो मिटेंगे। मृत्यु स्वीकार करनी पड़ेगी, सीधी बात है। अभी तो एकदम सुरक्षा में बैठे हो और कह रहे हो मैं मृत्यु को स्वीकार कर रहा हूं — पहले उस स्थिति में पहुंचो, मृत्यु सामने आए तब। वस्त्रों का सहारा, भौतिक चीजों का सहारा छोड़िए; तन पर बस इतना कपड़ा रहे कि तन ढका रहे। जितने भी लोग पहुंचे, सबने तप किया। जिसका श्लोक, जिसका दोहा आप सुनाते हो, वह बिना तप के नहीं पहुंचा — जिज्ञासा भी थी, प्रबल इच्छा भी थी, अपने आप को मिटाने के लिए तैयार भी थे। (जिस पर परिवार की जवाबदारी है, उसके लिए ये नहीं है; उसके लिए सबसे सरल मार्ग है — आंतरिक ईमानदारी, मेहनत, मेरे कर्म से किसी को तकलीफ ना हो, दरवाजे से कोई भूखा-प्यासा ना जाए, और ईमानदारी से कमाया धन परोपकार में लगाए।)
मायने ये है कि किस भाव से तपते हैं — उससे कुछ पाने के लिए। कुछ के लिए परमात्मा चाहिए। और कुछ नहीं चाहिए तो परमात्मा लेकर क्या करोगे? वो ना मुक्ति दे सकता है, ना मोक्ष; अगर वो देता तो पूरे समाज को, पूरे ब्रह्मांड को दे देता। हम परमात्मा नहीं ढूंढ रहे, परमात्मा से कुछ चाहिए। सारा झंझट, सारा खेल माल का है — घुमा-फिरा के नाम, शोहरत, पैसा। जो अस्तित्व खड़ा है वह कमजोर दिख रहा है; भौतिक के नाम से अस्तित्व नहीं बन पाया तो अब अध्यात्म के नाम से एक नया अस्तित्व तैयार करूंगा कि मैं भी कुछ हूं। और मेरा होना ही मेरा भटकाव है। मुझे मिटना पड़ेगा, तभी कुछ होगा। एक वस्तु मिटती है तभी दूसरी बन पाती है — गेहूं मिटा आटा बना, आटा मिटा रोटी बनी; बीज मिटा वृक्ष हुआ; दूध मिटा दही हुआ, मक्खन मिटा घी हुआ। आप मिटने के लिए तैयार नहीं, अपने आप को बचा भी रहे और साधना भी कर रहे — गेहूं को भी बचाओ और आटा भी बना दो, ऐसा नहीं हो सकता।
पहले मिटाओ तो। जो मिटने चला, वो तो मिटेगा। मिटाने लगोगे तो एक समय ऐसा आएगा कि कुछ नहीं हो जाएगा, मिटने के लिए कुछ रहेगा ही नहीं। वहां भी कुछ रहे तो उसको भी मिटाओ। परिवर्तन होते-होते एक समय ऐसा आएगा कि वह अपने परम अस्तित्व पर आ जाएगा, जहां मिटने-मिटाने के लिए कोई नहीं रहेगा। उसमें अहंकार नहीं होता कि मैंने खुद को मिटा दिया। कुछ पाने के लिए मिटा रहे हो तो अहम भाव तैयार होगा और एक नए अस्तित्व का निर्माण कर बैठोगे; अगर कुछ नहीं चाहिए और मिटा रहे हो तो वह समर्पण भाव है, उसमें अहम भाव काम नहीं करता। कई ऐसे हुए जो तप करके बहुत ऊंची स्थिति में गए, फिर प्राकृतिक संसाधनों में फंस के नीचे आ गए — लेकिन गिरने में ही उन्हें समझ में आया कि मैं क्या था, क्या हो गया, मेरा व्यक्तिगत अस्तित्व क्या है, मैं किस भाव से भोजन ग्रहण कर रहा हूं। ये करने से ही होगा, बातों से नहीं।
अगर तप लालच में नहीं कर रहे हो, तो गिर नहीं सकते। लालच में करोगे तो गिर जाओगे, कोई बचा ही नहीं सकता — लालच की पूर्ति होगी तो भी गिरोगे, नहीं होगी तो भी गिरोगे। अगर बिना इच्छा-अपेक्षा का तप करते हो, तो गिरोगे नहीं, उठोगे; वो एक नया अनुभव होगा आपके जीवन का। तप में आप होते हो — कुछ नहीं चाहिए, मैं अपने आप को समझने के लिए तप करूं — इसमें गिरना होता ही नहीं। गिरना तो दो में होता है: ये आगे निकल गया, मैं पीछे रह गया, तब अहम भाव खड़ा हो जाता है। एक में क्या गिरना, क्या उठना? यहां यात्रा अकेले ही करनी है, बस नया-नया अनुभव मिलेगा। अनुभव करते-करते जब अनुभव करने के लिए कुछ नहीं बचता, अनुभव करता बचता है — वही सत्य है। अभी तो अपने तक पहुंचो; 'मेरा' में ब्रह्म नहीं, भ्रम है। पहले मेरा से छुटकारा पाओ, सत्य तक आओ, सत्य ब्रह्म तक लेकर जाएगा।
तप तो मेन है ना। अगर तप कर रहे हो तो सेवा लायक कहां रहे — शरीर सेवा लायक काम ही नहीं करेगा; बस एक बार बैठ जाओ। तप नहीं करोगे तो धीरे-धीरे पहुंचोगे — फिर परोपकार में लगे रहो, जरूरतमंद की सेवा करो तन से, धन से, ज्ञान से, भाव शुद्ध, निर्मल, पवित्र हो। अपने हक के लिए जोर-जबरदस्ती गलत नहीं है — मेरा हक बनता है ना कि मैं अपने घर का पता लगाऊं, कब तक इस जाल में फंसा रहूंगा, कब तक जन्म-मृत्यु के चक्कर काटता रहूंगा।
परमात्मा का ध्यान कैसे करोगे? वो निराकार है, आप उसे जानते ही नहीं। ध्यान हो, योग मार्ग हो, भक्ति मार्ग हो, क्रिया मार्ग हो — अपने आप को निर्विकार कराने के लिए करना है। पहले आत्म तक तो पहुंचो; अपने आप को शुद्ध, पवित्र, निर्मल करने के लिए यात्रा करनी है। महापुरुष उपलब्धि के बाद बोले, और किसी ने सीधा परमात्मा की यात्रा नहीं बताई — सबने एक ही बात कही: अपने आप को निर्मल, पवित्र करो। ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन; बेईमानी का पूरी तरह त्याग करके ईमानदारी अपना के परोपकार में लग जाओ। मन एक ही है, दो जगह नहीं हो सकता — या तो माया में रहोगे या ब्रह्म में। वो शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है, तो कुछ करके कैसे मिलेगा? ध्यान करने से आप निर्विकार होगे, और निर्विकार होने से आप मिलोगे — ब्रह्म नहीं। आपके बाद यात्रा होगी ब्रह्म की। जैसे कोई मादा गर्भ धारण ना करे और कहे मैं मां बन जाऊंगी — ऐसा नहीं हो सकता। ये आवेश-जज्बात का मार्ग नहीं, समझ का मार्ग है।
आप छोड़ना चाहो तो ना। आपने ज्यादा महत्व शरीर को दे दिया कि इसको सुरक्षित रखना है, इसको कुछ होने नहीं दूंगा। शरीर, संसार, अंदर बैठा मैं, मेरा परिवार — सारा छोड़ोगे कि नहीं? नहीं छोड़ोगे तो नहीं होगा, सीधा-सीधा सिद्धांत है। क, ख, आ, ई याद नहीं होगा तो मिलावट अक्षर कभी नहीं पढ़ सकते। मुंह में कौर नहीं जाएगा तो पेट नहीं भरेगा, भले कितना भोजन सामने पड़ा रह जाए।
करके देख लो। विकार ध्यान से हुआ है कि कर्म से? विकार तो कर्म से हुआ है, तो कर्म का परोपकार करना पड़ेगा; ध्यान करने से बस कुछ नहीं हो जाएगा। उन्होंने जो बताया है वह कर लेना, नहीं समझ में आए तो मेरा अपना लेना — मैं जो भी मार्ग बताता हूं उसमें मैं नहीं हूं, मुझे ढूंढना नहीं पड़ेगा; शब्दों को अपना के आगे बढ़ जाओ, क्योंकि ये पिंड नश्वर है। भोजन कम करने से निर्विकार होने में सहायता मिलती है, लेकिन उसके बाद आत्म-चिंतन करो, सेवा करो, परोपकार करो। तप करोगे तो इंद्रियां कमजोर होंगी, भौतिकता के बारे में सोचना कम होगा, अपने आप आत्म-चिंतन होगा। मूल है निर्विकार होना — कैसे भी अपने आप को निर्विकार करा लो। आप ही अपने आप को पहुंचा सकते हो, चाहे भटका सकते हो; अगर कोई दूसरा पहुंचा देता तो महापुरुष सबको पहुंचा देते। दुनिया का सौभाग्यशाली व्यक्ति है जो अध्यात्म को समझता है, और समझने के बाद जो नहीं चलता वह दुनिया का दुर्भाग्यशाली व्यक्ति है।
हां, बाहर के रूप से मुक्त होगे तो आत्मज्ञान होगा, और जब इस रूप से (अपने शरीर से) मुक्त हो जाओगे तब ब्रह्मज्ञान होगा — ये है यात्रा। नाश नहीं, ये जीते जी होगा, इसी पिंड में होगा। आसक्ति का मतलब — इस शरीर को बचाना चाहता हूं, एकदम हृष्ट-पुष्ट रखना चाहता हूं। जैसे मादा एक बार गर्भ धारण करती है तो मां बनने की स्थिति में आ जाती है, फिर बच्चे को जन्म देती है तो मां बन जाती है — वैसे ही परमात्मा तक पहुंचने के लिए पहले अपने आप में, अपने अंदर पहुंचना पड़ेगा। बाहर से छूटोगे तो अंदर की सफाई होने लगेगी, और शरीर से मोह-आसक्ति खत्म हो जाएगी तो ब्रह्मज्ञान हो जाएगा। अभी तो बाहर से ही नहीं छुड़ा पाए, अनेक पिंडों से लेन-देन बाकी है — और तप में ये सब सीधा-सीधा, स्पष्ट दिखता है।
निर्विचार कैसे हो सकते हो? विचार नहीं चलेंगे तब तो खत्म। जैसे बस में यात्रा करते हुए झपकी लग जाती है और बहुत सुकून मिलता है — वह ये आनंद है, ये आपसे नहीं है। आप निर्विचार क्यों होना चाहते हो? जितने महात्मा हुए, भूख लगी तो भोजन का विचार आया तभी मांगे। विचारों से तकलीफ नहीं है; विचारों में राग-द्वेष हो रहा है, उससे तकलीफ है। विचार प्राकृतिक प्रक्रिया है, अपने आप आता है। और उस झलक को बार-बार लाना चाहते हो कि फिर आए — तो वो लालच हो गया, फिर आनंद कहां है? जब घटेगा तो पूरी तरह घटेगा; जैसे आदमी परसेंटेज-परसेंटेज नहीं मरता, एक साथ मरता है — या तो आनंद में हो या भौतिकता में।
आपने किसी विधि, किसी ध्यान, योग या ज्ञान का सहारा लिया, तो वह अपने आप नहीं होती — फिर आप नकल कर रहे हो। शरीर की ताकत से ही विधि का उपयोग करते हैं, और हर पल ताकत कम हो रही है, इसलिए दोबारा नहीं जा पाते। जैसे रबड़ को खींचो, छोड़ोगे तो वहीं जाएगा। बाहर-अंदर के अनुभव में फंसो ही मत। आप फंस कहां रहे हो — दोबारा उसी को लाना चाहते हो, यह फंसना है। आपने निर्णय कर लिया कि वही आखिरी है — अहंकार निर्णय करता है; हो सकता है वह आपको भटकाने के लिए आ गया हो। निर्णय करने से हट जाओ। निर्णय करते-करते जब निर्णय करने के लिए कुछ नहीं बचेगा, निर्णय करता बचेगा — वही सत्य है। वो कभी-कभी होती है; हर पल चाहिए तो सीधा-सीधा निर्विकार हो जाओ, कभी-कभी चाहिए तो विधि द्वारा आओ-जाओ।
इसलिए कि मिलने में आप जी रहे हैं, इसलिए मिलने की इच्छा बनी है। सुबह से शाम तक मिलने में ही तो जा रहे हैं, सोने भी जा रहे तो अच्छी नींद के लिए जा रहे हैं। जब तक दूसरों से मिलने की इच्छा है, तब तक खुद से भी मिलने की इच्छा बनी रहेगी। दूसरों से मिलने की इच्छा छूट जाए, तो खुद से मिलने की भी इच्छा खत्म हो जाए, क्योंकि मिलना हो जाएगा। जब तक किसी से मिलने की उम्मीद है, तब तक खुद से मिलने की उम्मीद बनी रहेगी। इसीलिए तो कहते हैं — उम्मीद छोड़ दो, बस बात ही खत्म।
पहले समझो — अंदर भी मैं हूं, बाहर भी मैं हूं, मैं ही मैं हूं। बस 'तू' को छोड़ दो, जानने वाला बचेगा। 'तू' मतलब 'मेरा'। मेरा भी क्यों बना? उम्मीद के कारण मेरा बना हुआ है। उम्मीद छोड़ दो तो मेरा भी खत्म। जो आपने तरह-तरह की, हर लोगों से अलग-अलग उम्मीदें बना के रखी हैं, वह छोड़ दो।
पकड़ना उम्मीद है, छोड़ना उम्मीद नहीं है। अब तो मूल में आना चाहते हो, उम्मीद से मुक्त होना चाहते हो। एक संकल्प को तोड़ने के लिए एक संकल्प बनाना पड़ता है। पहले नशा नहीं करते थे, बाद में किए; अब छोड़ना है तो एक बार बोलना पड़ेगा — आज से मैं नशा छोड़ रहा हूं। तो निर्विकार होने की उम्मीद बना लीजिए, क्योंकि विकार आपने धारण किया है। संकल्प बनाइए कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से मुझे मुक्त होना है, और इसके लिए जो करना है करिए। यह संकल्प सारे संकल्पों को खत्म करेगा और आखिरी में खुद खत्म हो जाएगा। यह आपको बनाना पड़ेगा, क्योंकि आप संकल्प में जी रहे हो। जब तक अपने आप को अनेक पिंडों, अनेक वस्तुओं से नहीं छुड़ा लोगे, तब तक यात्रा जारी रहेगी।
जो जिसमें जी रहा है, उसे उसी में उद्देश्य लग रहा है। जब उसकी समझ किसी और के द्वारा बढ़ती है, अनेक ऑप्शन मिलते हैं, तब चुनाव करता है कि मेरे लिए क्या उचित है, और अपना उद्देश्य बदलता है। आज तक समाज से जितनी जानकारियां मिलीं, वही आपके पास हैं; अपना देखा जाए तो आपके पास कुछ नहीं है, आप खाली हो — बस एक तरीका है, और सब बाहर का हटा दिया जाए तो तरीका किस पे काम करेगा? समझते-समझते इतना समझना है कि कुछ नहीं है समझने के लिए — बस यही है समझ। शादी, बच्चे, भरण-पोषण, घोंसला — इतना तो पशु भी कर रहे हैं। हमारे पास भोग, भोजन और योग है — योग मतलब स्वयं को साधना, स्वयं को सुधारना। इतिहास में जितनी किताबें लिखी गईं, मानव को सुधारने के लिए लिखी गईं, क्योंकि पृथ्वी पर बिगड़ा हम ही हैं। इसलिए सुधर जाओ, और अपने लक्ष्य का पता खुद करो।
जंगल में जाओगे तो क्या छोड़ के जाओगे? एक परिवार छोड़ोगे, अनेक परिवार मिल जाएंगे; संसार तो कहीं भी नहीं छूटेगा। मैंने जीवन में यही समझा कि अगर छोड़ने के लिए आपके पास कुछ है तो बेईमानी — और क्या छोड़ोगे? जगह बदलोगे, कपड़े, भोजन का तरीका, बातचीत का तरीका, शरीर का नाम बदलोगे। हमने जरूरत कम की, लेकिन एक कपड़ा तो अभी भी है — हजार रखो, पहनोगे तो एक ही। आप चाहे गृहस्थी में रहो, चाहे संन्यासी होके, छोड़ना बस इतना है — बेईमानी। जहां रह रहे हो वहां ईमानदारी से आपकी आवक हो, और उस आवक से घर-गृहस्थ चलाते हुए सत्कर्म में लग जाओ — यही आपको मुक्ति से मोक्ष तक लेके जाएगा। मैंने विवाह नहीं किया, खोज करने निकला, जरूरत कम करते-करते ऐसी स्थिति आई कि प्रश्न हट गए; काम तो मैं अभी भी कर रहा हूं — आप एक दायरे में परिवार के लिए कर रहे हो, मैं दायरे को पार करके पूरे समाज के लिए। भाव अलग है बस।
व्यक्तिगत सर पीट रहे होंगे — यही तो गलती हो गई। व्यक्तिगत सर पीटोगे तो पछताओगे। आपका काम है काम करना। मैं पानी लेकर खड़ा हो गया, जिसको पीना है पिए, नहीं पीना मत पिए; मैं पानी लेकर वापस चल दूंगा, बात खत्म। ज्ञान जहां से आ रहा है वहीं जा रहा है, जैसे विद्युत। जिसको लेना होगा ले लेगा — महाभारत में एक ही ने लिया, अर्जुन; लेकिन आज तक गीता का लाभ लिया जा रहा है। आत्मज्ञानी के शब्द इधर-उधर नहीं होते, वह ऊर्जा ब्रह्मांड में घूमती रहती है। हम समझाने के लिए नहीं, समझने के लिए बोल रहे हैं; समझने की क्षमता दी नहीं जा सकती। कपार पटके, इसका मतलब उन्हें आत्मज्ञान नहीं हुआ था, आत्मज्ञान का भ्रम हो गया था। ये आप लोगों के लिए है — वर्तमान की पीढ़ी के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए; हो तो भी ठीक, नहीं हो तो भी ठीक।
ब्रह्मज्ञान का कोई रास्ता नहीं। वो कुछ करे या ना करे, उसके ऊपर है, क्योंकि वो करने से मुक्त हो गया; उसकी कोई उम्मीद नहीं, वो करने में है ही नहीं। और करने में है तो आत्मज्ञान नहीं है। वो प्रयास करना भी चाहे तो उसके अंदर से प्रयास उठेगा ही नहीं।
क्या अर्जुन ने युद्ध किया? आपको करते हुए दिखा। अगर अर्जुन करते तो शुरू में ही करते, पहले क्यों भागते? ज्ञान के बाद अर्जुन रह ही नहीं गए, युद्ध हुआ। कर आप भी नहीं रहे हो — अभी भी आप नहीं कर रहे हो; हो रहा है, लेकिन आपको लगता है आप कर रहे हो, यही भ्रम है। कामनाओं में आ-जा रहे हो, लेकिन आप अभी भी स्थिर हो। ना कोई आ रहा है, ना जा रहा है, बस हो रहा है; लोग कह रहे मैं कर रहा हूं, क्योंकि इच्छा और कामनाओं को मेरा मान रहे हैं। अकर्ता तो आप अभी भी हो, लेकिन कर्ता मान लिए हो। अपने तरीके से चाहिए, उसका त्याग कर दो। बस एक ही मूल मंत्र है — बेईमानी छोड़ना। दुनिया के किसी भी मार्ग से जाओ, इसे अपनाए बिना पहला कदम भी नहीं बढ़ेगा।
हुए हैं ना — जिनका नाम इतिहास में ले रहे हो, वो परमानंद को उपलब्ध हुए हैं; आप भी हो सकते हो। एक-एक छोड़ना चालू करो, आखिरी वाला भी छूट जाएगा, लेकिन कहीं से शुरुआत तो करो। परम सत्ता के नजदीक थे तो दूर क्यों हुए? बेईमानी से, और कोई बात नहीं। महात्मा, भगवान भी हुए तो उनके भी बच्चे हुए, खाए-पिए, घूमे, हर काम किए; बस बेईमानी की वजह से हम उनसे दूर हो गए। ईमानदारी अपना लो, बेईमानी छोड़ दो, बात ही खत्म — इतनी सीधी-साफ बात है, लेकिन घुमा-फिरा के, मसाला लगा के सुनने की आदत है।
बेईमानी अपने आप नहीं होती, बेईमानी करना पड़ता है, प्लानिंग से। बेईमानी स्वाभाविक नहीं होगी — बहुत बारीकी से इसे समझिए। देख के भी अनदेखा कर दिया, तो पता चल गया ना बेईमानी का। बेईमानी करना पड़ता है, ईमानदारी अपने आप होती है।
एक तो वो दायित्व है, कर्तव्य है, आप उसे अच्छे मार्ग पे ले जाना चाहते हो। लेकिन आपको उससे भी पूछना चाहिए कि तू क्या करना चाहता है, उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। ऐसा ना हो कि मैं डॉक्टर नहीं बन पाया तो उसके द्वारा अपनी इच्छा पूरी कर रहे हो — वो कह रहा है मैं इंजीनियर बनूंगा, और आप कह रहे मेरे लिए तुझे डॉक्टर बनना है — तो ये बेईमानी है। जब उनकी अवस्था 12 साल के ऊपर हो जाए तो उनसे बातचीत करनी चाहिए कि बेटा, तुम्हारी इच्छा क्या है; और इच्छा अगर गलत है तो समझाना चाहिए कि इस इच्छा का यह परिणाम है।
मुझे समझ में आ गया था कि यहां एक-दूसरे को जरूरत के लिए मानते हैं। बचपन से भाव था कि मुझे इस जगत में कुछ ऐसा करना है जिसका हर व्यक्ति उपयोग करे — काम क्या है पता नहीं था, लेकिन यह भाव प्रबल था। विवाह नहीं करना था, यह भी प्रबल था, क्योंकि जानता था कि पत्नी, बच्चे, घर, गाड़ी — उसी में जीवन खत्म हो जाएगा। ज्योतिष देखा, उसमें भी नाम-पैसा ही था। मैं प्रत्यक्ष के लिए निकला था, थोपने और थुपवाने के लिए नहीं, इसलिए जब तक प्रत्यक्ष नहीं होता था, स्वीकार नहीं करता था। प्रत्यक्ष ना स्वीकार से मिलता है, ना अस्वीकार से — दोनों के परे जाना पड़ता है। मैंने तीन दिन में आश्रम का फैसला कर दिया था — पहले दिन संन्यास लिया, दूसरे दिन रहा, तीसरे दिन निकल गया, बोला यहां तो वही चल रहा है जो छोड़ के आया था।
उस परम सत्यता से हम हैं, हमसे वह नहीं। वो तो था, है और रहेगा, तो पैदा होने का सवाल नहीं है। जब आप खत्म हुए, तब। आप कहीं और थे, वो पहले से था। लगाव तो सिर्फ कामनाओं का है — कामनाएं हटा दो, बात खत्म, दोनों एक हो गए। जैसे सामने पेड़ पर फल दिख रहे हैं — जब तक नहीं चाहिए था, सारे फल थे; जैसे ही लेने लगे — ये कच्चा, ये पक्का, ये सड़ा, ये छोटा, ये बड़ा — हो गया राग-द्वेष। जब तक नहीं चाहिए, अद्वैत; जब चाहिए, द्वैत। बूंद सागर नहीं बनी, सागर पहले से मौजूद था, बूंद सागर में समा गई — बूंद का अस्तित्व नहीं मिटा, दायरे का अस्तित्व मिटा। ये बूंद को पता है, सागर को पता है, तीसरे को नहीं पता। और जब तक कुछ भी चाहिए, तब तक तीसरे बने रहोगे।
उन्होंने दोनों दे दिए — राजपाट पत्नी को दे दिया, मन गुरु को दे दिया — तो राजा कहां रहे? तीसरे ही उन्हें राजा देख रहे थे। और उनकी ईमानदारी देखिए: गुरु ने कहा गुरु दक्षिणा में मन या पूरा राजपाट, दो में से एक देना पड़ेगा; कोई और होता तो कहता दे दिया राजपाट, वो बोले पत्नी से पूछ के आता हूं, क्योंकि वो उनकी पार्टनर थी, ये फैसला सिर्फ मेरे हाथ में नहीं। पत्नी ने कहा राज हमें चाहिए, मन दे दो — उन्होंने उनके फैसले को मान लिया और मन गुरु को दान कर दिया। घोड़े पर चढ़ते हुए गुरु ने कहा 'मेरा मन नहीं', तो तुरंत स्थिर हो गए, पलट के कुछ नहीं पूछा। आप होते तो कहते — बीच में ही रोक दिया, ये क्या मजाक है। आप पूरी तरह समर्पित नहीं हो पाते, देने के बाद भी उसमें रखते हो कि ये मेरा है। यह ताकत कर्मों का फल है — आपकी बुद्धि, समझ, विवेक, शरीर की ताकत, वैभव, परिवार — सब आपके कर्म से मिला है, आगे का भी कर्म से ही मिलेगा। बेईमानी कर रहे हो तो बंधन हो रहा है, नहीं कर रहे तो मुक्ति पा रहे हो।
तो मत करो ना बेईमानी, उसमें परमात्मा क्या करे? बेईमानी की रचना किसने की — आपने। आप रचना कर सकते हो तो रचना मिटा भी सकते हो, छोड़ दो। और परमात्मा के लिए इतने बेचैन हो — आ जाए तो क्या करोगे? या तो कोई काम करवाओगे, या मानोगे कुछ नहीं। अगर कुछ नहीं चाहिए तो परमात्मा लेके क्या करोगे? मतलब लालच में परमात्मा चाहिए। भैया, जिंदगी अच्छी जियो, जीवन मिला है तो समझदारी से जियो, बेईमानी छोड़ दो, बस जीवंत होके जियो।
हर कर्म से प्रारब्ध खड़ा हो रहा है — जब प्लानिंग से करोगे। प्लानिंग से सेवा करोगे तो उसमें भी प्लानिंग आ गई, पुण्य वाला खड़ा होगा। पुण्य प्लानिंग से बनता है, पाप प्लानिंग से बनता है; प्लानिंग नहीं तो कुछ नहीं बनता। बिना प्लानिंग के, बस ईमानदारी से कर्म करोगे तो प्रारब्ध नहीं बनता। इसीलिए तो मैं कहता हूं — बेईमानी छोड़ के ईमानदारी अपना लो, काम हो गया। ये सब ग्रंथों का सार है; इतना अगर आदमी समझ जाए तो मुक्ति से मोक्ष तक पहुंच जाएगा।
संकल्प किया है तो नाव में बैठोगे तो पतवार चलानी ही पड़ेगी, पार हो जाओगे। अब कुछ करना है तो नाव जिधर जा रही उधर थोड़ी जाने देगा। अगर उस पार कोई इंतजार कर रहा है, तो पतवार तो चलानी पड़ेगी। दायित्व भी निभाने हैं — दायित्व मिले हैं, कुछ कर्तव्यों का आपने चुनाव किया है, सब देखना है, बहुत समझ के चलना है। बस जहां भी रहिए, इतना ध्यान रखिए कि ईमानदारी अपना के जीवन जियो, और सत्कर्म। इतना ख्याल रख लिया तो मुक्ति से मोक्ष तक पहुंच जाओगे।
जब आपको बंधन दिखे, इसलिए मुक्ति है; बंधन नहीं तो मुक्ति की जरूरत नहीं। मरने के बाद मुक्त करवाना — वो अपनी-अपनी परंपराएं हैं। सबको पता है, जैसा जिसने कर्म किया था वो भोग लिया; जो मुक्त करवा रहा है उसके लिए वो मुक्त हो गया — कि मैंने तुम्हारे लिए इतना कर दिया, अब मैं तुमसे छूट गया। ये बंधनों वाली मुक्ति है, ये भी एक भ्रम है। विशेष कुछ नहीं है, विशेष आपने बना दिया; आपकी इच्छाएं, कल्पनाएं विशेष बनाती गईं। शुरुआत में भी कुछ नहीं, आखिरी में भी कुछ नहीं। मैंने यही समझा कि कुछ नहीं है, और इतना समझने में 2011 से 2020 लग गया।
बेईमानी तब होती है जब माल कुछ बताते और होता कुछ और — डुप्लीकेट, गुणवत्ता कुछ और। कोई पीतल लेने आया और आपने उसे सोना दे दिया, वो भी बेईमानी है, क्योंकि उसे पीतल की जरूरत थी। किसी को जहरीले जानवर ने काटा, वो विष लेने आया, आपने अमृत दे दिया — ये भी बेईमानी, क्योंकि उसका काम नहीं होगा, आपने उसे भटका दिया। डीजल की गाड़ी में पेट्रोल डाल दिया — बेईमानी है। कांटा निकालने के लिए सुई लेने आया, आपने कहा तलवार ले लो — आप पे भरोसा करके घाव और बढ़ गया। किसी की जरूरत को देखिए, क्या लेने आया है, समझ का उपयोग करो।
ये वो जानें। मैं भी हिमालय घूमा हूं, मुझे ऐसा कोई नहीं मिला। हड्डियां दिख रही हैं तो साधना कर रहे होंगे, किस लिए कर रहे हैं वो जानें — बता वही सकता है जो कर रहा है, बाकी सब अनुमान लगाएंगे। और वो सही बता रहा है, यह सिद्ध करने के लिए आपको वैसा करना पड़ेगा जो वो कर रहा है, फिर भी जरूरी नहीं कि आपको वही फीलिंग हो — वही चाय कोई कहता मीठी नहीं, कोई कहता बहुत मीठी। इसलिए देख लो आप कहां खड़े हो, अपनी स्थिति को जांचो, अपना काम करो; किसी के बारे में कुछ बोला नहीं जा सकता। मैं आपको बस सन्मार्ग बता सकता हूं। देखो कि मुझे क्या करना है, कहां जाना है, वह पता कहां मिलेगा — बस निकल लो।
बड़ा-छोटा नहीं। बस इतना समझ में आया कि यहां कुछ नहीं, तो कुछ को खोजने निकल गए; फिर वहां भी समझ में आया कि यहां भी कुछ नहीं — दोनों जगह से मुक्त हो गए। ये सिर्फ यात्रा है। जो गया था वो लौटा कहां? वो तो खोजते-खोजते खत्म हो गया। आत्मा को तो पहले से ज्ञान है; जो खोज रहा था उसने अज्ञानता धारण की थी कि कुछ है। जब कुछ नहीं का पता चल गया — वहां भी, यहां भी — तो वो अपने में स्थिर हो गया, और ज्ञान प्रकट हो गया, क्योंकि ज्ञान पहले से मौजूद था; 'कुछ है' की वजह से वो जागृत नहीं हो पा रहा था। जब तक खोज रहेगी कि कुछ है, तब तक बाहर भटकते रहोगे — कभी भौतिक के नाम से, कभी अध्यात्म के नाम से।
उसके पास एक रास्ता है — पुराने वीडियो देखे। अगर उसको इतना बताने जाएंगे तो जो लोग बैठे हैं, कुछ समझ के आगे हैं, वो इंतजार करते रह जाएंगे; इसलिए उसे सीधा-सीधा जवाब देना पड़ता है। और वो आगे पूछे ना कि जो प्राप्त है वो छूटे कैसे, क्या-क्या छोड़ना है — किस स्थिति में प्रश्न करता है उससे उसकी स्थिति का पता चलता है। जैसे कोई रास्ता पूछे और आप बताओ इधर से जाना उधर मुड़ जाना, वो कहे हां — तो आप क्या करोगे? अगर वो फिर पूछे कि समझ नहीं आया, तब आप और तरीके से समझाते। संशय हो तो पूछना चाहिए।
मुझे कोई समझाने नहीं आया। मैं उत्तर नहीं देता, आता है। जितनी बात हुई, हजारों वीडियो सुन लो, रिपीट नहीं होता; मैं चाहूं तो भी नहीं कर सकता, ये मेरे बस में नहीं है। आप वही प्रश्न फिर पूछिए, अलग तरीके से उत्तर मिलेगा। कहां से आ रहा है, यह पता ही नहीं करना है; अपने को क्या करना है। जैसे पानी नल से आ रहा है — नल निमित्त है, नल से एक बूंद भी नहीं आ रहा। टंकी के नल का दायरा है — उसे अध्ययन का ज्ञानी कहते हैं, किताबों से आ रहा है; लेकिन जो पृथ्वी से जुड़ गया, उसका कोई दायरा नहीं, निकालते रहो, आता रहेगा।
किसी मौज में नहीं। मैं बस अपना काम करता हूं — ज्ञान वाला, यही सब व्यवस्थाएं, यही काम हो रहा है। व्यवहार में कहना पड़ेगा तो कहूंगा हां कर रहा हूं, आप लोगों के लिए। मुझे पता है पहले ये नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। ध्यान जैसा कुछ मेरी जिंदगी में नहीं रहा, मुझे बस कुछ करना था। मुझे मौज-वौज कुछ नहीं चाहिए।
सब आपके ही कर्मों से है, और बदल सकता है। कर्ता का अधिकार इसीलिए तो दिया गया है कि आप बदल सकते हो। चोट लगी तो मलहम लगा के उसे ठीक कर सकते हो, मलहम नहीं लगाओगे तो और भोगोगे। परमात्मा की ओर जाना — परमात्मा का पता ही नहीं, तो जाओगे कैसे? इसलिए सत्कर्म करो, ईमानदारी से जीवन जियो — बस यही रास्ता है। पिछले कर्मों की पीड़ा भी उसी से दूर होगी; जब हम कुछ करते हैं तो एक आगे बनता है और एक खत्म होता है। सत्संग भी अपने आप को सुधारना है; अब किस भाव से कर रहे हो वो देखना है — कर्म के पहले, कर्म के बाद एक भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है।
आप भ्रम में फंस जाओगे, वो समझ ही नहीं पाओगे, और उसका प्रत्यक्ष आपको कराया नहीं जा सकता। सब छोड़ के उसी में लग जाओगे, यात्रा रुक जाएगी — इसलिए वो नहीं बताते। उतना बताते हैं जिससे आपकी यात्रा हो, नहीं तो आप उलझ जाओगे; आपको उलझाने के लिए थोड़ी ना आए हैं।
आप तो सुबह अपनी तरफ से निपटा दिए, लेकिन जिसके साथ किए, उसकी तरफ से निपटारा नहीं हुआ — वो तो अभी तक श्राप दे रहा होगा, उसे तो पता ही नहीं चला। आपका कोई लाख रुपया छीन के सुबह दो लाख दान कर दे, तो आप उसे माफ कर दोगे? जिंदगी भर, जब-जब याद आएगी, श्राप दोगे कि मुझे बर्बाद करके चला गया। हो सकता है वो आपको जांच रहा हो कि ईमानदार है या बेईमान, लालची है कि नहीं। इसलिए समझ के जियो।
आपके जीवन में, परिवार-रिश्तेदारों में कितने लोग मिले जो ज्ञान के लिए गुरु खोज रहे हैं, व्याकुल हैं? कोई नहीं — तो भीड़ कहां से रहेगी? जहां सत्य बंट रहा है, वहां भीड़ कहां से रहेगी; जहां ढोंग बंट रहा है, वहां लाखों लोग हैं, क्योंकि सबको जरूरत से ज्यादा, योग्यता से ज्यादा चाहिए, घुमा-फिरा के नाम, शोहरत, पैसा चाहिए। इस ज्ञान से जीवन समझ में आ जाता है, जीवन का उद्देश्य, जीवन का मतलब समझ में आ जाता है — बुराइयां छूट जाती हैं, बेईमानी छूट जाती है; छोड़ने से डर रहा है।
हां भाई, वो तो जाना ही पड़ेगा — शिक्षा लेने के लिए विद्यालय जाना पड़ता है। सत्संग सुनते रहो, आते-जाते रहो, धीरे-धीरे समझ में आएगा। सुनते हुए भी मन में कुछ आए कि यार ये कैसे होता है, तो अपनी डायरी में नोट कर लो, और जब जाओ तो पूछ लो। ज्ञान लेना है तो सत्संग में तो जाना ही पड़ेगा।
गुरु अपनी ऊर्जा के द्वारा आपको कुछ महसूस करवाता है। लेकिन किस स्थिति में? एक तो गुरु उस परम स्थिति पे हो, और शिष्य को कुछ भी नहीं चाहिए — मानसिक स्थिति ऐसी हो कि उसे पीछे जाना ही नहीं, तब उसके ऊपर किया जा सकता है। गुरु होगा तो जान लेगा; गुरु नहीं होगा तो नहीं जान पाएगा, तब शक्तिपात का नाटक चलता रहेगा — छू-छा के, फीस भर के शक्तिपात।
बचपन से आपको सिखाया जा रहा है — ध्यान से खेलना, ध्यान से बाजार जाना, ध्यान से पढ़ना। ध्यान से कर्म करना, बस यही ध्यान है। ध्यान विधियां ही तो भटका रही हैं। कर्म में ध्यान रखना कि कोई गलती ना हो जाए, इसी को ध्यान कहते हैं। बैठने से तो शरीर रिलैक्स होता है, बाकी कुछ नहीं होता। बस इतना पक्का कर लो कि अपने तरीके से मुझे करवाना नहीं है — संकल्प ले लो कि अपने तरीके से करवाने की इच्छा का त्याग करूंगा और बेईमानी नहीं करूंगा, फिर देखो कैसे आपका जीवन होता है।
बुद्ध हठ योग में चले गए, बोले तभी उठूंगा जब उपलब्धि होगी; रमण महर्षि ने भी ऐसे किया। करते-करते थक गए, करने के लिए कुछ नहीं बचा, तो ध्यान भी कहां बचा? निराश हो गए, हताश हो गए, कर करके थक के करने से मुक्त हो गए — वाल्मीकि, सबके साथ यही हुआ। खोजते-खोजते जब खोजने के लिए कुछ नहीं बचता, खोजी ही बचता है, उसी के बाद ज्ञान होता है। आना तो आपको कुछ ना करने में ही है — चाहे कर करके आओ, चाहे कुछ ना करके।
ईश्वर सर्वव्यापी है, इसका मतलब यह नहीं कि जहां आप बोल रहे हो वहां है, क्योंकि जहां आपने बोला 'यहां है', वह मेरा में हो गया, दायरा हो गया, और ईश्वर दायरे से परे है। जैसे बल्ब से उजाला है — उजाले में आप कुछ भी करिए, बल्ब को कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और उजाले को माध्यम बनाकर बल्ब तक पहुंचा जा सकता है। वैसे ही ईश्वर से संसार भी है, ईश्वर से अनंत आत्मा है। आत्मा पिंड में आया, इच्छा-अपेक्षा में जीवात्मा हो गया, जीव हो गया, और भोग भोगने के लिए कभी यह शरीर, कभी वह शरीर धारण कर रहा है। जैसे पानी फ्रिज में गया तो बर्फ बन गया, लेकिन पानी का नाश नहीं हुआ; टूटेगा तो बर्फ टूटेगा। वैसे ही आत्मा को कोई प्रभाव नहीं पड़ता; इच्छा-अपेक्षा में, मेरा में सुख-दुख है। हम संसार में नहीं, मेरा में फंसे हैं। मेरा और कर्ता के भाव से अपने को छुड़ा लें तो जीव का नाश हो जाएगा और आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा। आत्मा को परमात्मा चाहिए और जीव को भोग चाहिए। भाव में ईश्वर का वास है, इसलिए भाव को शुद्ध करना है — कर्म के द्वारा भाव गंदा हुआ है, तो कर्म के द्वारा ही शुद्ध करना है। कोई मजाक उड़ाता है कि क्या गटर में भी ईश्वर है — अरे भाई, उजाला गटर में है, बल्ब थोड़ी ना गटर में है।
छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — अगर यह हम करते हैं तो संसार में ग्रसित हो जाते हैं, इनसे हमें निकलना है। हम बुरा कर्म करके अपवित्र हुए, तो अब सत्कर्म करके, जिस लायक हैं धन से, तन से, ज्ञान से बिना इच्छा-अपेक्षा की निष्काम सेवा करके अपने आप को निर्मल, पवित्र कर सकते हैं। शुरुआत वर्तमान में यह करनी है कि कर्म करते हुए किसी भी प्रकार के लालच में, दबाव में, संकोच में, मान के चक्कर में, कुछ बनने के चक्कर में, अपने तरीके के चक्कर में आके मुझे छल-कपट आदि नहीं करना है। मान की इच्छा का, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का, अपने तरीके से कुछ चाहिए — इसका त्याग कर दें। आप संसार में नहीं फंसे, आपके द्वारा जिस संसार का निर्माण हुआ है उसमें फंसे हैं। जो बिना मतलब का कर रहे हो, जिससे अपवित्र हो रहे हो, वह बंद कर दीजिए, जरूरतमंदों की सेवा करिए; जब पूरी तरह निर्मल-पवित्र हो जाएंगे तो जीव का नाश होगा और आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा।
दो से परेशानी नहीं है, दो में जो राग-द्वेष है उससे परेशानी है। अनंत है। दो से तो हमारा जन्म है — पिता से जन्म हुआ, माता ने पाला। जिन्होंने अद्वैत का प्रचार किया, वो भी बीमार हुए, तकलीफ हुई तो परिवार से मिलने गए; जब एक ही होता तो लोगों को समझाते क्यों, कौन किसको बता रहा है? और जब एक ही होता तो भटकाव, भ्रांतियां, भ्रम कैसे पैदा होते? ब्रह्म अजन्मा है, ब्रह्म कभी भटक सकता है क्या? परमात्मा से आत्मा है, और आत्मा पिंड में आकर अपनी इच्छा-अपेक्षा में, राग-द्वेष में भटक गया। द्वैत क्या है — राग-द्वेष है। राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ा लो, खत्म। जब तक राग-द्वेष में हो, आप इस संसार में नहीं, अपने बनाए हुए संसार में फंसे हो, और पीड़ा इस संसार में नहीं, आपके बनाए हुए संसार में है। किसी भी मार्ग से जाइए, बस यह समझना है कि राग-द्वेष से कैसे अपने आप को छुड़ा लूं।
अगर चलते हुए गिर गए, तो मतलब उठने की क्षमता है, क्योंकि खड़े थे तभी गिरे। जब समझ में आ जाए कि ये गलत है, मैं फंस गया, तो वहां से निकल लीजिए — त्याग में परम सुख है। उस जगह, उस व्यक्ति का त्याग कर दीजिए जहां आप फंस गए हो, कैसे भी अपने आप को निकाल लो। लेकिन निकालने में ईमानदारी हो — ऐसा ना हो कि गिरने में बेईमानी हुई और निकलने में भी बेईमानी हुई, तो और फंस जाओगे।
तो ज्ञान नहीं हुआ। माया को समझने का प्रयास करिए — संसार माया नहीं है, शरीर की जरूरत है; शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — इस पिंड में रहना है तो किसी ना किसी तरीके से यह देना पड़ेगा। जब आप अपने तरीके से कुछ कर रहे हो, अपने तरीके में, बेईमानी में फंस गए हो, उसमें उलझन है — उस तरीके से अपने आप को निकाल लीजिए। अगर शब्दों का ज्ञान है और उस शब्द में जी नहीं रहे, तो कोई मतलब नहीं। आजकल वेद-वेदांत की पढ़ाई हो रही है; अगर पढ़ाई से ज्ञान हो जाता तो सम्राट भिक्षुक बनकर गली-गली पात्र लेकर भिक्षा मांग के, अल्पाहार करके साधना क्यों करते? वेदांत का आखिरी मतलब है आवरण से मुक्त हो जाना — अगर वेदांत पढ़ रहे हो और कह रहे हो ये छोटा, ये बड़ा, बड़े आदमी को अलग कुर्सी और वैभव से छोटे को दूर बिठाते हो, तो क्या वेदांत को समझा? ऐसा ज्ञान आपका पतन करेगा। जहां भी हो, अपना काम करते हुए एक-दो घंटा एकांत में जाकर चिंतन-मनन करो, सत्संग सुनो और उन शब्दों में जीना चालू करो, तब कुछ होगा। इसीलिए कहा गया है जीवंत गुरु खोजो, जो उसमें जी रहा हो। अध्यात्म खरीदा-बेचा नहीं जा सकता; आज ध्यान का, मेडिटेशन का धंधा हो गया है। ध्यान प्राकृतिक है — समझने में समर्पण होता है, करने में अहंकार।
राग क्या है — आपको जरूरत से ज्यादा, योग्यता से ज्यादा कुछ चाहिए, कोई दे दिया तो राग होगा; और राग होगा तो वह गलत करे चाहे सही करे, उसका दबाव हो जाएगा, फिर वही राग द्वेष में बदलेगा। और नहीं देगा तो द्वेष होगा। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग कर दीजिए, राग-द्वेष पैदा नहीं होगा। जो चाहिए उसके लिए खुद काम करिए और जीवन में आगे बढ़िए। बहुत सरल है, बहुत आसान है।
मेरा में फंसे हैं, तो मेरा का उपयोग करके मेरा से अपने आप को छुड़ा लेना है। हम मेरे लोगों में नहीं फंसे, मेरे तरीके से कुछ चाहिए — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श, यह पांच तरह से सुख चाहिए — अपने तरीके में फंस गए हैं। हम अपने तरीके से कुछ ढूंढ रहे थे, इस 'कुछ' में फंस गए; इस 'कुछ' का सदुपयोग करके इस कुछ से अपने आप को निकाल लो — यही ज्ञान है। उसमें जीना पड़ेगा; बस शब्दों का ज्ञान लेकर दौड़ोगे तो उस ज्ञान के नाम से अहंकारी हो जाओगे।
प्यास है तो रास्ता मिल जाता है। प्यास लगी है, रास्ता ढूंढ रहे हो, और ढूंढने में जिज्ञासा बढ़ रही है, तब तो सच में प्यास लगी है। और रास्ता ढूंढ नहीं रहे, कह रहे हो मुझे प्यास लगी है, तो प्यास नहीं लगी है। आंतरिक प्यास होगी तो रास्ता ढूंढ लोगे।
ज्ञानी का कोई दुख नहीं है, ज्ञानी सुख-दुख से परे हो जाता है। वह सार्वजनिक बोलता है — जिसको समझना है समझे, नहीं तो मत समझो। व्यक्तिगत किसी को जाकर नहीं कहता कि आपको समझना पड़ेगा, क्योंकि समझने की क्षमता नहीं दी जा सकती। जिसको जो समझ में आएगा, उठा के आगे बढ़ जाएगा।
पिछला पाप कैसे हुआ — आपके द्वारा कर्म हुआ, अनेक लोगों के साथ मिलकर आपने वह काम किया जो नहीं करना चाहिए था। अब सत्कर्म करिए। आपने बेईमानी करके कुछ लिया, अब ईमानदारी अपना के लोगों को देना चालू कर दीजिए — धन हो तो धन, तन हो तो तन, ज्ञान हो तो ज्ञान, चाहे आत्मिक कल्याण का मार्ग बताइए चाहे बाहरी जगत का। अपनी आत्मरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए कोई गिर गया तो उठा दीजिए, कोई बोझा उठा रहा है तो उसकी मदद कर दीजिए, बिना बोले सेवा करिए, तत्पर रहिए। धीरे-धीरे वह कम होता जाएगा, समझ में भी आने लगेगा — लेकिन करना पड़ेगा।
आ गई तो आने दीजिए। संकल्प नहीं लेना है कि मुझे यह करना है। संकल्प बस इतना लेना है कि मुझे कैसे भी निर्विकार हो जाना है, अपने अस्तित्व को पहचान लेना है, और बाहर की बनाई हुई पहचान मिटानी पड़े तो मिटा देंगे — जो था और रहेगा, उस स्थिति में पहुंच जाना है। जो हो जाए स्वाभाविक — इंद्रियों द्वारा जब भी कुछ होगा, किसी की सेवा होगी, निस्वार्थ, निष्काम, निष्कपट, बिना इच्छा-अपेक्षा, बिना लाभ-हानि, बिना पाप-पुण्य का, और बिना संकल्प का होगा। संकल्प लेना है तो बस निर्विकार हो जाने का, पूरी तरह बुराइयों को छोड़ देने का।
'चाहिए' में ध्यान घटित हो रहा है। प्यास लगी, पानी में गया; भूख लगी, भोजन में गया; कुछ सुनने की इच्छा हुई तो शब्दों में गया; छूने की इच्छा हुई तो स्पर्श में; शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — इसी में ध्यान भटक रहा है। अपने तरीके से चाहिए, तो क्षण-क्षण ध्यान घटित हो रहा है। ध्यान को समझना है — करने में अहम भाव है, समझने में समर्पण है। ध्यान को समझिए और समझ के बहिर्मुखी से, जहां राग-द्वेष पैदा हो रहा है, वहां से अपने आप को छुड़ा लीजिए।
उगाह रहे हैं तो देने वाले भी लोग हैं। जब तक संसार में किसी को फ्री में चाहिए, तब तक लोग भटकते रहेंगे — एक लूटेगा और एक लूटा जाएगा; सब एक-दूसरे को लूटने के चक्कर में हैं। अध्यात्म में भाव काम करता है, यहां पैसे-रुपए, वैभव, बैकग्राउंड काम नहीं करते; वो भौतिक जगत में संसाधनों के लिए काम करते हैं। अगर किसी को लग रहा है कि पैसा देके वेद-वेदांत समझ सकता है, तो वह बहुत बड़े भ्रम में फंस गया है। आप अपना आत्मिक कल्याण कैसे करें, उसके लिए काम करें तो ज्यादा अच्छा होगा।
अपने तरीके से चाहिए — वही तो मोह-माया है। पांच इंद्रियों से सुख मिलता है — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। पांचों सबसे ज्यादा कहां मिलते हैं — नर-मादा के मिलन में, भोग में; और चार भोजन में। तो भोग और भोजन में ज्यादातर लोग फंसे हुए हैं। जब तक अपने तरीके से भोग और भोजन चाहिए, तब तक माया में फंसे रहोगे। अपने तरीके का त्याग कर दो, धीरे-धीरे आकर्षण हटता जाएगा। एक तरफ अपने तरीके से चाहिए भी, और सीधा मोह-माया से छूटना भी चाहते हो — मन तो एक ही है, दो जगह कभी लग नहीं सकता। तरीके में फंस गए हो, तरीके का उपयोग करके अपने आप को निकालो।
आपके बारे में तो सबसे ज्यादा आप जानते हो। अच्छे-बुरे का, उचित-अनुचित का आपको जीवन में पता है — उचित अपना के जीवन में आगे बढ़ो। आपका जीवन कैसे अच्छा हो, उसके लिए काम करो।
परेशानी का कारण यह है कि हमें जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछ रहे हैं, जा कहीं और रहे हैं; चाहिए कुछ और, काम कहीं और कर रहे हैं। जो चाहिए उसके लिए काम करो। अपनी योग्यता और बैकग्राउंड को देखते हुए आगे बढ़ो। जो करना है उसके बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए; योग्यता है या नहीं — नहीं है तो योग्य बनो और उसके लिए काम करो। सिद्धांत को समझते हुए आगे बढ़ते जाओगे।
इसका जवाब तो जिसने सृष्टि का निर्माण किया वह देगा। मानव के अलावा जितने जीव हैं, वो कहां फंस रहे हैं — वो अपने स्वभाव में भोग भोग रहे हैं, भोजन कर रहे हैं। मानव को कर्ता का अधिकार दिया है, मानव ही फंसा है। आप समझ के फंसे हो, अस्तित्व ने आपको नहीं फंसाया; अगर अस्तित्व ने फंसाया होता तो वह कभी नहीं कहता कि अपने आप को छुड़ा लो। आपने अपने आप को फंसाया है और आप ही छुड़ा सकते हो। अगर अस्तित्व के चाहने से कोई छूटता, तो महापुरुषों को चिल्ला-चिल्ला के बोलने की क्या जरूरत थी कि यह मत करो, ऐसे चलो? आप फंसे हो, अपने आप को निकाल लो — यही बुद्धिमानी, यही ज्ञान है।
अगर आपके पास कोई शराबी आया, रोने लगा, पांव पकड़ लिया कि पीने के लिए पैसे दे दो, और आपने दया-करुणा कर दी — तो यह दया-करुणा ठीक नहीं, वह उस पैसे से अपनी बर्बादी करेगा। ऐसी करुणा मत करिए जो प्राकृतिक ना हो। दया-करुणा वहां करिए जिससे सामने वाले का ग्रोथ हो — बाहरी भी, आंतरिक भी। अगर बाहरी ग्रोथ हो रहा है और आंतरिक गिर रहा है, तो कोई मतलब नहीं; फिर आप भी किसी लालच में फंसे हो — या तो वैभव का, या मान का; बस दो ही लालच में लोग फंसते हैं। अगर करुणा बंधन बने तो ऐसी करुणा किस काम की — आप सामने वाले को भी बंधन में बांध रहे हो। जिससे उसका आत्मिक स्तर उठे, उसके लिए उसे मार्ग बताओ, तब बंधन नहीं होगा। और ये सिद्धियां नर्क के द्वार हैं — इनके चक्कर में लोग नाम, शोहरत, पैसे के लिए घूमते हैं।
जहां कुछ भी नहीं चाहिए। आप कुछ कर रहे हो और उसके बदले कुछ भी नहीं चाहिए — ना पाप, ना पुण्य, ना मान-सम्मान, ना इज्जत-प्रतिष्ठा, ना धन-वैभव, ना नाम-शोहरत — यही प्रेम, यही करुणा। आप बोल रहे हो तो सामने वाले के लिए बोल रहे हो, उसमें आपको कुछ नहीं चाहिए — यह प्रेम है, और यह प्रेम परम आनंद तक लेकर जाता है। सामने वाले की जरूरत है और मेरी सामर्थ्य है धन से, तन से, ज्ञान से — अपने स्वाभिमान और आत्मरक्षा का ध्यान रखते हुए उसके लिए कुछ कर रहे हैं, और कोई इच्छा नहीं — इसे प्रेम कहते हैं।
मैं अपना उद्देश्य किसी पर थोप नहीं सकता, सबका अपने-अपने जीवन का लक्ष्य है; मेरी समझ से — जीवन को समझ लेना। जितना मुझसे हो सका, मैंने पढ़ा, और अब मुझे कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं है। ऐसा नहीं कि मैंने शास्त्रों का, मूर्ति पूजा का सहारा नहीं लिया — लिया, लेकिन अब उसकी जरूरत नहीं है।
मैं सीधा ऐसे नहीं मिट जाएगा। वो 'मेरा' से खड़ा हुआ है — आप अपने तरीके से कुछ पाना चाहते हो, उससे मैं, अहंकार खड़ा हुआ है। जब आप अपने तरीके का नाश करोगे, तब कुछ हो सकता है। आप सीधा सोचो कि मैं को हटा दो — वो मेरा से आपने तैयार किया है, तो कैसे हट जाएगा? शब्दों में मत उलझो, जीना चालू करो। जीवन में क्या मैंने सीखा वह मायने रखता है, क्या मुझे मिला वह नहीं, क्योंकि जो मिला वह चला जाएगा।
इसलिए कि भक्ति मार्ग में आप समर्पण करते हो और ज्ञान में अपने आप को समझते हो। आत्मज्ञान स्वयं के अंदर है और हम बाहर भटक रहे हैं; उस भटकने से अपने आप को छुड़ा लिए तो आत्मज्ञान हो गया। आत्मा को पहले से ज्ञान मौजूद था, वह पूर्ण है; अपने आप को अपूर्ण से पूर्ण करना चाहता है, यही उसकी अपूर्णता है।
आपने कुछ कर्म किया था, आपका प्रारब्ध था, आपके किए गए कर्मों से आपको मिल रहा है। अब इसका सदुपयोग करके आत्मिक कल्याण करो। ऐसा नहीं कि यह मैं दे रहा हूं — आपका ही आपको मिल रहा है, इसमें मेरा कुछ भी नहीं; मैं बस निमित्त हो गया हूं। आप इसका कैसे उपयोग करते हो, आपके ऊपर है।
जैसे आप हर वस्तु को, हर लोगों को जानने का प्रयास कर रहे हैं, वहां से प्रयास छोड़ के — जितना जरूरत हो उतना जानें — और अपने आप को जानने का प्रयास करें। सीधा-सीधा सिद्धांत है।
बस राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ा लेना है। राग-द्वेष से छूट गए तो आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा; जो प्रारब्ध बाकी रहेगा उसे भोग लेगा। आत्मा को तो ना सुख है ना दुख, मेरा में सुख-दुख है। मेरा से अपने आप को छुड़ा लो; जब प्रारब्ध खत्म हो जाएगा, तो आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा।
जैसे आपने बेईमानी कर करके बंधन बांधा है, वैसे ही ईमानदारी करके बंधन को छुड़ाओ, और सत्कर्म में अपने आप को लगा दो। बिना इच्छा-अपेक्षा की निष्काम सेवा करो — जिस लायक आप हो, उस लायक सेवा करिए।
या तो आप उन्हें ढूंढो, या आप में ऐसी सामर्थ्य, ऐसी व्याकुलता, ऐसी जिज्ञासा हो जाए — जैसे रामकृष्ण परमहंस को तोतापुरी ने ढूंढ लिया, लेकिन उनका प्रयास भी देखिए। आपकी इतनी तड़प होनी चाहिए कि परम स्थिति के लिए सब कुछ छोड़ सकें, और कुछ नहीं चाहिए यह भाव हो। कैसे पता चलेगा — जब प्यास लगी, पानी मांगा, और सामने वाले ने पानी दिया तो समझ में आ जाता है; रस या दूध दे दे तो प्यास नहीं बुझी, यह भी समझ में आ जाता है। समझना उनको नहीं है, समझना यह है कि मुझे जो चाहिए था वह मिला कि नहीं। हम सामने वाले का बैकग्राउंड जांचने में लग जाते हैं — ब्रांडेड गुरु चाहिए, कई लाख शिष्य वाला। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है — तेरा-मेरा से जो अहंकार धारण किया, उससे मुक्त होने का मार्ग जो बताए वह गुरु है। पानी एक ही जगह से आता है, नल निमित्त अनेक होते हैं। जो आपके प्रश्न का उत्तर दे दे, वह उसकी सामर्थ्य है, बात खत्म।
ठीक है, लेकिन अभी तो कर्ता में हो ना। अकर्ता में कैसे आ जाओ, उसके लिए काम करो, समझो, आगे बढ़ो। गाली में जो शब्द प्रयोग होते हैं वही भजन में होते हैं, बस बोलने का तरीका अलग है। जो तरीका अहम भाव से धारण किए हो, उस तरीके से अपने आप को छुड़ा लो।
नहीं, दायित्व नहीं। हमने बेईमानी की — अपने सुख के लिए उन लोगों के साथ बेईमानी की जिनका अता-पता आपके जीवन में नहीं है; पूछा जाए किन-किन के साथ की, तो नाम-पता ढूंढ नहीं पाओगे। बेईमानी के द्वारा हमने विकार जमा किए हैं। अगर उससे निकलना है, तो जरूरतमंद की सेवा करोगे तो निर्विकार होने में सहायता मिलती है। निकलना है तो करो, नहीं निकलना है तो राम-राम, जैसी आपकी मर्जी।
सत्संग सुनिए, समझ लीजिए, फिर उस पर चिंतन करिए कि कहां-कहां फंसे हैं, मनन करिए, मंथन करिए, और कर्म करते हुए उससे अपने आप को निकालिए। पहले बाहर से, इंद्रियों द्वारा राग-द्वेष में जवाब मत दीजिए, फिर आंतरिक धीरे-धीरे समझते रहिए। जैसे दूध गर्म करके जामन डालते हैं, दही बनता है, फिर चिंतन रहता है कि कब मथना है — ज्यादा दिन रखेंगे तो खराब हो जाएगा — फिर मथ के उसका तत्व, मक्खन निकालते हैं, फिर उसको तपा के घी बनाते हैं। वैसे ही सत्संग सुनिए, देखिए कहां-कहां गलतियां हो रही हैं, चिंतन-मनन-मंथन करिए और अपने आप को वहां से निकाल लीजिए।
अपने में गुरु, सतगुरु ढूंढना है। गुरु शब्द है, शरीर नहीं। गुरु के द्वारा सतगुरु तक पहुंचना है — अपने स्वयं तक पहुंच गए, सत हो गए, गुरु छूट गया; और जब आप किसी के लिए बोलेंगे, तो यह हो गया सतगुरु। यही सतगुरु की परिभाषा है।
जैसे आपको प्यास लगी, किसी ने बता दिया आगे पानी है; पात्र नहीं है तो हाथ की अंजुली से पानी पीकर प्यास बुझा लेती हो। शब्दों को समझिए और कर्म करते हुए ध्यान दीजिए क्या गलत हो रहा है, क्या सही। गलत करना नहीं है, सही करते हुए आगे जाना है; बाद में सही भी छूट जाएगा। गलत में फंसे हो तो सही का उपयोग करना पड़ेगा — आखिरी में ना सही है ना गलत। अनुचित का त्याग करो, उचित अपनाओ, जीवन में आगे बढ़ो।
वो बताते हैं, बताने दीजिए। आपके भाव उनके प्रति क्या हैं, वह देख लीजिए। उन्होंने जीवन भर, जब तक थे, सेवा की। अब किसको क्या कहना है, सब अपने-अपने तरीके से। समाज के लिए जिन्होंने कुछ प्रयास किया, उनको धन्यवाद।
नियम में मत जाइए। भूख लगी है तो भोजन करना पड़ेगा — यह क्या कोई नियम है? अगर सात्विक जीवन जी रहे हो तो किसी को तकलीफ नहीं होगी; तो सात्विक जीवन जीते हुए आगे बढ़िए, अपने आप को समझिए।
कोई बात नहीं। पहले जितना भी गलत है, सबका त्याग कर दीजिए, फिर अपने आप सब समझ में आने लगेगा। जो कुछ ऐसा हो रहा है जिसका आत्मिक लाभ नहीं है, वह सब करना छोड़ दीजिए, और मानसिक यात्रा करिए — अध्यात्म मानसिक यात्रा है।
उन्होंने कहा पहले मैं इनसे जुड़ा था, अब आपसे जुड़ गया। मैंने कहा क्या फर्क पड़ा — पहले उन पर भरोसा किया, अब मुझ पर। आपको अपने आप से जुड़ना है, तभी आत्मिक कल्याण होगा। मुझसे जुड़ोगे तो यह शरीर नश्वर है, इसका नाश हो जाएगा, तो मुझे कहां खोजोगे? मैं तो कुछ भी नहीं हूं, और कुछ नहीं को कैसे समझोगे? अपने आप से जुड़ो — यही ज्ञान है।
मान की इच्छा छोड़ दो। मान की इच्छा है, तभी तो वह अपमान कर पा रहा है। वह कर रहा है तो करने दो, आप अपनी आत्मरक्षा करते हुए अपना काम करो, टाइम पास मत करो। ना अपमान करिए, ना अपमान सहिए — अगर लग रहा है कि यह व्यक्ति बिना मतलब मेरा अपमान कर रहा है, तो उस जगह, उस व्यक्ति का त्याग कर दीजिए, बात खत्म।
उस समय देश, काल, परिस्थिति सब अलग थी; आज का समय अलग है। उनके आत्मिक कल्याण से आपका आत्मिक कल्याण नहीं होगा। यह सब चक्कर छोड़ दीजिए, अपने चक्कर में पड़िए कि आपका आत्मिक कल्याण कैसे हो, उसके लिए काम करिए।
सच में खोजी बनो, सच में जिज्ञासु बनो। इतना खोज करो कि खोजने के लिए कुछ ना बचे, तुम बचो। या तो खोज के मरो, या खोज लिए तो जन्म-मरण से मुक्त — वीरगति को प्राप्त हो। खोज में मरे तो अगला शरीर खोज में मिलेगा, लेकिन भटकते हुए मत मरो। अनुभव करते-करते जब अनुभव करता बचता है, वह सत्य है; खोजने के लिए कुछ है तो संसार है, कुछ नहीं बचा तो सत्य बचा — वही तुम हो, और सत्य ब्रह्म तक लेकर जाएगा। लोग मुझसे पूछते थे — आपको विश्वास है ज्ञान होगा? मैंने कहा मैं किसी से पूछ के नहीं निकला, खोजने का फैसला मेरा है; मेरे विश्वास में इतना विश्वास है कि वो नहीं है तो भी मेरे लिए होकर आना पड़ेगा, क्योंकि मुझे उसके अलावा कुछ चाहिए ही नहीं, सारे ऑप्शन खत्म हो गए।
कोई जन्म से संन्यासी नहीं होता। कोई बालक या बालिका संपन्न होते हुए भी देखता है कि लोग दुखी हैं, इच्छा-अपेक्षा में घूम रहे हैं, संसार में कुछ नहीं है; तो लोगों के दुख कैसे दूर करूं, इस खोज में निकलता है — उसमें दया, करुणा, प्रेम रहता है, भाव होता है कि ज्ञान को खोजूं और लोगों को भी मुक्ति-मोक्ष का मार्ग बताऊं। तब वह समाज से भोजन लेता है, और जब ज्ञान को उपलब्ध होता है, तो समाज के भोजन की भरपाई ज्ञान देकर करता है — यह संन्यासी का भाव है। गृहस्थ का भाव है — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। जब गृहस्थ बिना इच्छा-अपेक्षा जरूरतमंद की सेवा करता रहता है, तो उसके दरवाजे पर कोई ना कोई संन्यासी पहुंच के उसे मार्ग बताता है।
मन मेरे द्वारा है — जो मुझे चाहिए, मन उसमें घूमता रहता है। उचित-अनुचित देख के उचित अपनाइए, अनुचित का त्याग करके जीवन में आगे बढ़िए। मन स्थिर है, मन नहीं भटकता; बस आपको क्या चाहिए, वह मन इंगित करता है। मन को समझने का प्रयास करिए।
कोई बात नहीं। अपने दायित्व, कर्तव्य को निभाते हुए बस उस कर्तव्य में ईमानदारी हो, और भूखे को भोजन, प्यासे को पानी — एक वक्त का करते हुए, और एक-दो घंटा अपने आप को समझने के लिए दो। सत्संग तो मिल रहा है; ये करते हुए सरल तरीके से समझते-समझते आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो।
मूल सत्कर्म है। किसी को पूजना है तो पूजो, या मत पूजो। जो पूजनीय है वह ब्रह्म है, जो पूजा नहीं जा सकता। अगर हम किसी की पूजा करते हैं, तो इच्छा रखते हैं कि वहां से ऊर्जा मिलेगी और निर्विकार होने में सहायता मिलेगी। सत्कर्म करना पड़ेगा — उन जरूरतमंदों की सेवा करिए, क्योंकि आपने अनेकों को लूटा है; उन्हें देंगे तो विकारों से मुक्ति पाने में सहायता मिलेगी।
अभिमान का मतलब होता है — मैं कुछ हूं, कुछ बड़ा हूं, अनेक लोग छोटे हैं। अभिमान हुआ तो अहम अपने आप आ जाता है, और उस अहम भाव की वजह से हम अनेकों का अपमान करते रहते हैं। अभिमान नहीं होना चाहिए, स्वाभिमान होना चाहिए — अपनी आत्मरक्षा करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।
बदले में क्या दोगे — धन, कपड़ा, पैसा? वो मैं खा-पी के खत्म कर दूंगा। उतनी तो मेरी व्यवस्था हो जाती है; अपना कपड़ा स्वयं धो लेता हूं, एक कपड़ा कई सालों तक पहनता हूं, मेरे जीवन में कोई कमी नहीं है। ऐसी कौन सी वस्तु दोगे जो सदैव रहेगी? हर वस्तु का नाश हो जाएगा। अगर बदले में कुछ देना है, तो इस ज्ञान को लेके अपना आत्मिक कल्याण कर लो, आत्मज्ञान तक पहुंचो — तब देना हुआ। प्रेम से बातचीत कर रहे हो, प्रेम दे रहे हो — इतना कम है क्या? प्रेम कभी खत्म नहीं होता। मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए, यह मेरा फैसला है, किसी ने थोपा नहीं; जब भी डगमगाया, मैंने अपने आप को समझाया कि तूने अव्यवस्था को स्वीकार किया है, ईमानदारी से काम करने का चुनाव किया है। मुझे कुछ बनना नहीं था — ना गृहस्थ, ना साधु, ना संत — बस करना था।
कर्ता को तो जानना है, अकर्ता को हम जानते नहीं। कर्ता से मुक्त होने के लिए सीधा-सीधा समझो तो अनुमान लगाना छोड़ दो। कर्ता होने के बाद भी कभी-कभी अकर्ता का भाव हो जाता है। जैसे किसी ने आपसे रास्ता पूछा और आपने बताया, उस समय कर्ता का भाव कहाँ रहता है? कोई अचानक गिर गया और आपने जाकर उठाया, उस समय अहम भाव काम नहीं करता। जब आप प्लानिंग से कोई काम करते हो और उसमें अनुमान लगाते हो, जैसे ही आपने समय निश्चित किया कि इतने समय में हो जाएगा, कर्ता का भाव प्रकट हो जाता है। कोई भी काम करो, परिणाम का और समय का अनुमान मत लगाओ, क्योंकि ना आपको परिणाम का पता है, ना समय का। जैसे किसान ने फसल बोई, गाँव वाले पूछते हैं कितना क्विंटल होगा। मात्रा बता दी और उतना हुआ तो कॉलर टाइट करके घूमेगा, कम हुआ तो छिपता फिरेगा। जो कहता है परिणाम आएगा तो देख लेंगे, उसे ना सुख होता ना दुख। अपने मैं को बनाए रखने के लिए लोग अनुमान लगाते हैं, इसे कहते हैं तुक्का मारना। पता है तो बताओ, नहीं तो बोल दो परिणाम आएगा तो बता दूँगा।
प्लानिंग सब बनाते हैं। जब कोई गिरता है और आप उठाते हो, उस प्लानिंग में कर्ता का भाव नहीं रहता। कृष्ण संकल्प-विकल्प से परे थे; प्लानिंग में होके भी वो प्लानिंग में नहीं थे, जैसे गिरे हुए को उठाते समय आप उसमें होके भी नहीं हो। अर्जुन अज्ञानता को धारण किए थे, तो अर्जुन ने प्रश्न पूछे, उत्तर मिलते गए और आखिर में अर्जुन उस स्थिति में पहुँच गए। तो आप भी अपने प्रश्न निकालिए। कब पहुँचोगे, वो आप देख लो, यात्रा आपकी है। किसी का एक रोटी में पेट भर जाता है, किसी का दो में; सब अलग-अलग समय में खाते हैं।
कौन बोला कि वो कर रहा है? ये जिसने बोला, आप उससे प्रश्न करिए। मैंने कभी नहीं बोला वो कर रहा है। हो नहीं रहा है, आप कर रहे हो; आप जहाँ खड़े हो वहाँ से कर रहे हो। अगर "हो रहा है" में होते तो कोई तकलीफ ही नहीं थी। करने में ही तकलीफ है। "हो रहा है" में होके देखिए एक बार, आपके जीवन पे आपका अधिकार है। और कोई संशय हो तो उसी समय पूछो, क्योंकि देश, काल, स्थिति, परिस्थिति बदलती रहती है; कुछ मिनट बाद आपकी स्थिति बदल जाएगी।
उस प्रारब्ध के लिए काम किसने किया? अगर आपको एक महीने में पेमेंट मिला है तो एक महीने का काम आपने ही किया है, कम किया है तो कट के मिल रहा है। प्रारब्ध उसी को कहते हैं जो आपने पीछे किया है। देखो, जितने भी बच्चों का जन्म होता है, वो अबोध हैं, उन्हें अच्छे-बुरे का पता नहीं, फिर भी कोई राजा के यहाँ, कोई रंक के यहाँ, कोई अपाहिज, कोई स्वस्थ, कोई रोगी। पिछला लेके आ रहा है ना; अगर पिछला-अगला नहीं होता तो सब एक जैसे पैदा होते। जो चार साल की बच्ची के साथ बुरा करता है, करने वाला दोषी है क्योंकि वो अबोध नहीं था, उसे सजा मिलनी चाहिए। शुरुआत में भी कुछ नहीं है और आखिरी में भी कुछ नहीं; "कुछ है" में आप क्या सीख लेते हो, वो मायने रखता है। जैसे दो घंटे का पेपर — उस समय आप पूरी तरह स्वतंत्र हो, चाहे लिखो चाहे ना लिखो, समय पूरा होते ही पेपर छीन लिया जाएगा। ऐसे ही जीवन आपके हाथ में है; "कुछ है" में क्या सीखते हो उसी से तय होता है कि आपकी यात्रा आगे कहाँ की होगी।
तो मत जाओ ना वहाँ। आप वहाँ मत फँसो। अगर आप सच्चे खोजी हो तो नहीं फँसोगे; आप भी कामनाओं में गए हो तो उनके जाल में फँस जाओगे। जब कोई हमसे मिले तो देख लो कि मैं किस लाइन में खड़ा हूँ, सीखने वालों में या सिखाने वालों में। ज्यादातर गलती यह होती है कि जाते हैं सीखने और सिखाने की बात करने लगते हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि सच में मुझे जाना कहाँ है, सच में मुझे क्या चाहिए।
परिस्थितियाँ जो भी मिल रही हैं उसमें आपका ही योगदान है। बगल में कोई टावर में रह रहा है, कोई झोपड़ी में। परिस्थितियाँ भी आपके कर्म से मिलती हैं, मिलाजुला के मूल आपका कर्म ही है। एक कंपनी में किसी को एक लाख मिल रहा है, किसी को दो हज़ार; वो चेहरा देख के नहीं देते, जैसा जो काम करता है उसे वैसा पगार मिलता है।
इसमें समझदारी की बात करो, भावनाओं में मत बहो। उनकी पगार कितनी है? पाँच सौ रुपये रोज़। पाँच सौ में आदमी अच्छे से खा के, जी के, सो के सेविंग कर सकता है। लेकिन जब आदमी पाँच सौ कमा के चार सौ की दारू पिएगा या दो सौ का गुटखा खा के थूक देगा, तो घर क्या जाएगा? जितनी आपकी कैपेसिटी है, जितना कमाते हो, उस हिसाब से खर्च करो और उतने ही लोगों को जोड़ो; बाकी सब भी काम करें। सरकारी में आठवीं तक शिक्षा फ्री है, बच्चे पढ़ने वाले होने चाहिए। जब सोसाइटी मेंटेन करोगे तो परेशान ही रहोगे। बड़ा घर पड़ोसी को नीचा दिखाने के लिए चाहिए, दो पेटी साड़ी चाहिए, बीस जोड़ी कपड़े — जबकि दो-तीन जोड़ी बहुत हैं। गहने बाहर पहन के जाते हैं लोगों को आकर्षित करने के लिए कि मैं कुछ हूँ। जब जिंदगी को सच में जियोगे तो कोई तकलीफ नहीं, जब मान के लिए जियोगे तो तकलीफ ही तकलीफ पैदा होगी। दिखावा करोगे तो एक से बढ़कर एक है, आपसे बड़ा आ गया तो तुरंत राग-द्वेष और दुख आ जाएगा।
मूल्य मतलब वाजिब, सबके लिए एक समान, चाहे कोई भी आ जाए; उसमें अहम भाव नहीं है, वो स्वाभाविक है। कहते हैं ना यह मूल्यवान है, इसकी कोई कीमत नहीं, क्योंकि वो आपकी क्षमता के दायरे से बाहर है। और दाम बनाया हुआ होता है, उसमें बेईमानी होती है; बढ़ा-चढ़ा के बोल दिया कि यह दाम है, जैसा ग्राहक मिल जाए वैसा निकाल दो, हर आदमी के सामने अलग-अलग दाम। दाम आपने अहम भाव में निश्चित किया है। जैसे ही अहम भाव आता है, मूल्य दाम बन जाता है। सोच-समझ के, समझदारी से जीवन जियो, आवेश और जज़्बात में नहीं। अपने निकलने के लिए बातचीत करो — मैं इस भवसागर से कैसे निकलूँ। भव का मतलब जिसका आदि-अंत नहीं, आप उस जगह फँसे हो।
उसका कहना था कि मैं भोजन नहीं बनाऊँगी, बालक या उसका पति बना देगा, मैं इतने दिन बाद बनाऊँगी। तो मैं समझ गया। हमने कह दिया कि तेरी अशुद्धि में अगर इतनी ताकत है कि मेरी साधना भंग हो जाए, तो मुझे ऐसी साधना चाहिए भी नहीं; तब तो तेरी अशुद्धि ज्यादा ताकतवर है। साधना में इतनी ताकत होनी चाहिए कि तेरी अशुद्धि को भी शुद्ध कर दे। फिर मैंने कहा कि तू मेरे लिए शुद्ध थी, शुद्ध है, शुद्ध रहेगी, भोजन बना। मुझे इन सबसे कोई फर्क नहीं है। मैं अपना काम कर रहा हूँ; उस काम में कोई भी आ जाए, राजा हो या फकीर, मैं उसे सन्मार्ग बताऊँगा, क्योंकि सब यहाँ कर्म से है, कर्म हटा दो तो कोई कुछ भी नहीं है।
हाँ, स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं कि नियम में ना जीना। स्वतंत्रता का मतलब है खुद पर अनुशासन करना और मर्यादा में जिंदगी जीना, अपनी हद को पहचानना। स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं कि नंगा नाचो, इसे बेवकूफी कहते हैं, आदमी आवारा हो जाता है। जहाँ गए हो उसके नियम में जियो, नहीं तो मत रहो। कोई कमी है तो मानवता के नाते बताओ कि यह नियम ऐसे कर दिया जाए तो और लोगों को फायदा होगा। जो-जो आपको बंधन लगे छोड़ दो, लेकिन समाज में देश, काल, स्थिति, परिस्थिति को समझ के जीना है। मैं एक कपड़ा दो-तीन साल तक पहनता हूँ, कपड़े खूब फटे, लेकिन कभी ऐसी जगह नहीं फटा कि किसी को नज़र हटानी पड़े।
है ना, तभी तो उँगलियों पे लोग गिने जाते हैं। चलने वालों की गिनती आज भी नहीं हो सकती, लेकिन पहुँचने वाले उँगलियों पर गिने जाते हैं। जैसे फोन करके पूछो चाँद दिख रहा है, तो हाँ बोलेंगे क्योंकि वो एक ही है; तारे का पूछोगे तो कहेंगे कौन सा तारा। जब किसी को उपलब्धि होती है तो वो छिपाई नहीं जा सकती, जैसे चाँद आसमान में छिपाया नहीं जा सकता। तो सोच-समझ के यात्रा करो।
जब पक्का पता हो गया कि स्वप्न है, तो फिर आपका राग-द्वेष होना ही नहीं चाहिए; स्वप्न में क्या राग-द्वेष? राग-द्वेष है, इसका मतलब अभी ये सब शब्द से है, ज्ञान में नहीं हुआ है। ये कह देना बड़ा आसान है कि सब स्वप्न है। समझने के लिए यात्रा करनी पड़ेगी। कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी "कुछ है" में यात्रा करके "कुछ नहीं" पहुँचना पड़ेगा, और यात्रा बुद्धिमानी से करनी पड़ेगी। धीरे-धीरे अपने आप को साधो, समझो, सँवारो और निकालो।
कोई साधना नहीं। सत्संग मैं बोल देता हूँ, फिर साधक अपने आप में रहे। यहाँ के सिस्टम में कुछ दिन रहोगे तो खुद समझ में आ जाएगा कि यहाँ रहना ही साधना है। व्यावहारिक बातें कर नहीं सकते, मोबाइल स्विच ऑफ, इधर-उधर जा नहीं सकते, मँगा के कुछ खा नहीं सकते, किताब पढ़ नहीं सकते, और कोई आपसे कोई सेवा नहीं करवाएगा। तो करोगे क्या? जब कुछ करोगे ही नहीं तो साधना ही होगी, आत्मिक चिंतन अपने आप होगा। कुछ नहीं करना ही करना है; करना आसान है, कुछ ना करना बहुत कठिन है। यहाँ रहोगे तो सधोगे, नहीं तो भागोगे। यहाँ कोई भी नियम मेरे द्वारा व्यक्तिगत नहीं बना, सब मिला है, और इस सिस्टम में मैं भी जीता हूँ; भोजन बनाने से लेकर बर्तन माँजने, कचरा बीनने तक मैं अपना काम खुद करता हूँ। यहाँ ना कोई पुराना है ना नया, ना जूनियर ना सीनियर; सब साधक एक समान हैं। किसी को कुछ करने को कहने का अधिकार किसने दिया? आपको लगता है गिलास उठाना चाहिए तो खुद उठा दो। हम हर जगह अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं कि मैं कुछ हूँ — यही गड़बड़ है।
समझ से छूट जाना चाहिए। लेकिन चाहे जैसे भी छोड़ो, छोड़ तो दो। गंदा गंदा ही होता है, बुरा काम बुरा ही होता है। चाहे खुद छोड़ो, चाहे कोई छुड़ा दे, काम तो अच्छा हुआ ना, आपके जीवन के लिए उचित हुआ; तब मिलाजुला के सब ठीक है।
आत्मा कोई अलग थोड़ी ना है। जैसे पानी से बर्फ हो गया। पहले आपने पानी देखा, फिर फ्रिज में रख दिया तो बर्फ हो गया; अब पूछा जाएगा क्या है तो बर्फ बोलोगे। रूप बदल गया, लेकिन पीछे पानी ही है। जिसने पानी देखा ही नहीं, सीधा बर्फ देखा, उसे कितना भी समझाओ कि इसके पीछे पानी है, वो कहेगा ऐसा हो नहीं सकता। फिर नॉर्मल जगह रख दो तो धीरे-धीरे बर्फ चला जाएगा; अब पूछो बर्फ कहाँ गया, तो वो था ही कहाँ, फ्रिज की वजह से बना था। ऐसे ही जीव भ्रम है; जीव बना अपने तरीके से कुछ करवाने में, कामनाओं और बेईमानी की वजह से। तरीका छोड़ दो तो धीरे-धीरे जीव का नाश हो जाएगा और आत्म में स्थिर हो जाओगे।
मृत्यु जब होगी तब देखा जाएगा; ये अनुभव मृत्यु के बाद ही होगा, उसके पहले नहीं। इस बात का जवाब इंतजार करो, कुछ दिन बाद प्रत्यक्ष हो जाएगा। लोगों ने बताया है कि जीवात्मा यह शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। कामनाओं में रहोगे, भोग-भोजन में रहोगे तो दूसरा शरीर पकड़ोगे, और भोग-भोजन से मुक्त हो गए तो निकल लोगे। अब देख लो क्या करोगे।
ये भी कहा जाता है कि आप एक बार साँस लेते हो तो लाखों जीव मर जाते हैं; एक मिट्टी के ढेले में करोड़ों जीव होते हैं। अगर एक मुट्ठी मिट्टी के जीव मर जाएँ तो जनसंख्या कितनी अरब बढ़ जाएगी? आप गिन सकते हो? धरती जैसे कितने प्लैनेट हैं, गिनती नहीं; बनाने वाले ने अगर जीव बनाए हैं तो उसके लिए जगह भी बहुत बनाई है। विचित्र संसार है और उसमें हम एक विचित्र, विचित्र को समझना चाहते हैं। समझने का प्रयास मत करो, दुनिया का बस उपयोग करो और निकल लो; दुरुपयोग करोगे फँस जाओगे, सदुपयोग करोगे निकल जाओगे। जैसे थाली में भोजन आया और आप कहो मैं तब खाऊँगा जब पता चल जाए कि चावल, आटा, मसाला, मिर्च का बीज कहाँ से आया — पूरी जिंदगी बीत जाएगी। बुद्धिमान परोसने वाला थाली खींच लेगा कि तुम्हें भूख नहीं है। किसी भी वस्तु का आखिरी पता आप नहीं लगा सकते कि आई कहाँ से; उपयोग करो और निकल लो।
स्थिति-परिस्थिति पर निर्भर है। अगर पेड़ आपका है, खुद से लगाया है और खराब हो रहा है तो बचाओगे ना; अपनी आत्मरक्षा भी तो करनी है। प्राकृतिक हो तो छोड़ दो। गृहस्थ जीवन में हो तो बचाना पड़ेगा; खेती करते समय केंचुए रहते हैं, क्या करोगे — जीवन जीने के लिए सब करना पड़ता है।
बनाया क्या है, एक व्याकुलता, एक तड़प। जब किसी माँ का बालक गुम हो जाए तो वो ठंड देखेगी कि भागेगी? उसे ठंड-गर्मी कुछ नहीं लगेगी। कुत्ते के मुँह पर घाव हो जाता है तो वो भोजन वगैरह कुछ नहीं देखता। तो अगर कोई खोजी है तो उसे क्या ठंड क्या गर्मी, उसकी खोज के अलावा उसे कुछ दिखता नहीं; फिर शरीर ने भी पहचान लिया है। अब जैसे दो कपड़े रखूँ, तो उन्हें सँभालने के लिए भी समय चाहिए; उसको समय क्यों दूँ? लोग कपड़ा बाहर सुखाते हैं, हम शरीर पे सुखाते हैं। जीवन में अगर कुछ करना है तो स्वयं की जरूरतें पहले कम करनी पड़ेंगी, जितने में आप जी सको; तभी आप समाज के लिए कुछ कर सकते हो। सेवा के नाम पे मेवा खाना आसान है, सेवा के नाम पे मिटना आसान नहीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी जरूरत एकदम कम कर दी; जितने में शरीर चल जाए उतना लेता हूँ और काम करता हूँ।
"कुछ नहीं चाहिए" में आकर्षण की भी आवश्यकता नहीं है, वहाँ आकर्षण काम ही नहीं करता, प्रभाव काम नहीं करता — ना मेरा ना आपका। प्रभाव कब लड़ता है? जब दोनों कुछ बनना चाहें। लेकिन एक "कुछ नहीं" है, तो दूसरे को भी जब तक वहाँ रहेगा "कुछ नहीं" में ही रहना पड़ेगा; कुछ होना चाहा तो अपने ही प्रभाव से विचलित होकर निकल लेगा, क्योंकि उसके प्रभाव को कोई सम्मान नहीं मिलेगा। आप यही जानने तो आए हो कि तुम आखिर हो कौन; आपका बनाया हुआ अस्तित्व यहाँ काम नहीं करेगा, क्योंकि उसी से आप ग्रसित हो। मुझे मतलब नहीं कि आपका बैकग्राउंड क्या है; आप ज्ञान के लिए आए हो, प्रश्न पूछो मैं उत्तर दूँगा। एक दिन से लेकर आजीवन रहना आपके ऊपर है। जाते वक्त मेरा कर्तव्य इतना है कि पूछ लेता हूँ किराया है या नहीं, ताकि आप सुरक्षित घर पहुँच जाओ।
बुरी आदतें एकदम सीधा-सीधा छोड़ी जा सकती हैं — करो ही मत। छोड़ने की भी जरूरत नहीं, बस करना बंद कर दो; और करो तो उसका परिणाम भोगो। सत्कर्म का मतलब जरूरतमंद की सेवा। जैसी आपकी क्षमता हो, घर पे कई लोगों का भोजन बना लिया और निकल गए कि जो भूखा मिलेगा उसे खिला देंगे — यही सत्कर्म करने का एकदम सही तरीका है, क्योंकि कौन मिलेगा आपको पता नहीं। ठंड में एक कंबल लेके निकल गए, जरूरी नहीं कि एक ट्रक लो; जितनी सामर्थ्य परमात्मा ने दी है। निष्काम शुरुआत में नहीं बनेगा, भले पुण्य का भाव बने, बनने दो; ना करने से करना ठीक है। ये प्लानिंग ठीक है, किसी का पेट भर रहा है, किसी का छीन तो नहीं रहे। जरूरतमंद के लिए भाव है, मान के लिए नहीं निकले हो; भाव में ईश्वर का वास है। जरूरतमंद को भोजन करा दोगे तो उसके रोम-रोम से आशीर्वाद निकलेगा।
कोई तो है, जहाँ से आप हो। हर चीज़ यहाँ किसी न किसी से पैदा हो रही है, अपने आप तो नहीं है; तो तुम भी कहीं से हो ना। वो है। और ऊपर कहा तो ऊपर इतना भी हो सकता है (हाथ भर) — वो हमारे साथ ही है, आप फासला देख रहे हो।
प्रत्यक्ष है ना। बचपन से सुन रहे थे कि अर्जुन की तरह ध्यान हो, समर्पण हो, राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त हो जाओ — ये कहना बड़ा आसान है, लेकिन छूटे कैसे? प्रत्यक्ष ज्ञान में यह बताया जाता है कि छूट कैसे जाए। जैसे आपने कहा कर्ता का भाव कैसे छूटे, तो हमने कहा अनुमान लगाना छोड़ दो — ये आपके बस में है; कर्ता का भाव बनेगा ही नहीं, छोड़ना भी नहीं पड़ेगा। गीता में भी कहा कर्ता का भाव छोड़ दो, लेकिन छोड़ें कैसे, ये समझा नहीं पाया किसी ने। मैंने देखा लोगों ने घुमा-फिरा के बताया है, इसलिए मैंने सीधा-सीधा खोजा, और उस ज्ञान में मैं भी ना रहूँ — ऐसा ज्ञान।
उन्होंने कर्म किए, कर्ता का भाव नहीं था। आपके घर में चार-पाँच साल की बालिका है, आप कहते हो बेटा वो सामान लाओ, तो तुरंत लाके देती है; उसको भाव ही नहीं कि मैं कर रही हूँ। आपको दिख रहा है कि वो कर रही है, लेकिन वो कर नहीं रही, आपके द्वारा कर रही है, उसका कर्ता आप हो। अगर सामान फूट जाए और आप उसे डाँटो तो लोग आपको डाँटेंगे कि उस बालिका को क्या पता। कृष्ण कहते हैं मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और यमुना माँ प्रमाण देती हैं; गोपियाँ कर्ता का भाव देख रही थीं, यमुना माँ प्रमाण दे रही हैं कि ये अकर्ता है, इसने कुछ नहीं किया। वो तो लीला करके निकल गए; तुम उसमें फँसे हो। सही प्रश्न ये पूछो कि जब मैं पूर्ण हूँ तो मैंने अपूर्णता को कैसे अपनाया, हमारी बुद्धि कब सही रहेगी। प्रश्नकर्ता के प्रश्न से उसकी बुद्धि का पता चल जाता है।
हाँ, अगर यह स्थिति है तो बात अलग है। लेकिन शरीर का उपयोग कर रहे हो तो गंदगी तो हो रही है; उपयोग नहीं कर रहे, लेनदेन नहीं कर रहे, तो बात अलग है। अगर ऐसा आपको लगता है तो गटर का पानी पी के देखो, समझ लो तुम गंदगी और शुद्ध जल से निकल गए। कहना बड़ा आसान है।
कर सकता है। मेरी समझ से आत्मज्ञानी होगा तो ज्ञान बाँटेगा, क्योंकि इस संसार में धन-सेवा, तन-सेवा करने वाले बहुत हैं, लेकिन आत्मज्ञान से सेवा करने वालों की संख्या बहुत कम है। तो किसी को आत्मज्ञान हो जाएगा तो वो अपना पूरा समय समाज को ज्ञान देने में ही लगा देगा।
छुड़ा नहीं रहे। जिन साधकों को रहने में, भोजन में परेशानी हो रही है, जो साधना करना चाहते हैं, एकांत ढूँढ रहे हैं और नहीं मिल रहा, उनके सहयोग के लिए यह व्यवस्था है। अगर किसी के पास घर पे साधना करने की व्यवस्था है तो यहाँ आओ ही मत। जैसे मैंने झेला है — हमको एकांत नहीं मिल रहा था, एक-दो वक्त के भोजन के लिए बहुत सुनना पड़ता था — तो जब योग्य हुए तो ऐसी व्यवस्था की। जो भोजन, बिस्तर, कुटिया और इस व्यवस्था का सम्मान कर सके और सदुपयोग कर सके, उनके लिए है। चाहे ज्ञान, भक्ति, योग या ध्यान मार्ग से जाए, किस गुरु का चेला है, मुझसे मतलब नहीं; मेरा भाव है कि आपका आत्मिक स्तर कैसे बढ़े, उसमें सहयोग करना है।
कुछ नहीं होता। प्रश्न हट जाते हैं, उत्तर हो जाता है। मैं अपने अनुभव से बता रहा हूँ; अगर किसी को कुछ होता हो तो वो बात अलग है, मैं किसी के बारे में कुछ बोल नहीं सकता।
माया बेईमानी है। आप जरूरत को माया क्यों समझते हो? आप प्रभु की माया में परेशान नहीं हो, अपनी माया में परेशान हो। माया के कई रूप होते हैं, जैसे गेहूँ का रूप आटा, आटे का रूप रोटी, पर सबके पीछे गेहूँ है; वैसे हर रूप के पीछे बेईमानी है। प्रभु की माया में तो लोग आनंद में रहे; अपनी बनाई हुई माया में आप ग्रसित हो। इस संसार में आपने बेईमानी द्वारा अपने संसार का निर्माण किया है, इसलिए आपके संसार में अशांति है। ईमानदारी से होता तो आपके संसार का निर्माण ही नहीं हो पाता, आप मुक्त होते।
जैसे आपको पता नहीं है और आप बताते हो कि इस समय तक हो जाएगा। हो गया तो अहंकार बढ़ जाता है कि देखो मुझे पता था, और नहीं हुआ तो कहते हो क्या करें, सब उसके हाथ में है — अपना पीछा छुड़ा लेते हो। इसी में लगे हो, जिंदगी भर तुक्का मारते रहते हो। जीवन भर दूसरों को धोखा देते रहते हैं, और आखिर में जिंदगी कहाँ धोखा देके ले जाएगी, पता नहीं।
जो कह रहा है भगवान कर रहे हैं, उसे एक चपत लगा के पूछो ये किसने किया — तुरंत बता देगा। ये सब फालतू बातें हैं। भगवान करता तो दुनिया इतनी गंदी होती? उसकी दुनिया में भेदभाव नहीं है। अगर इतने छोटे बच्चों पर अत्याचार उसके करने से हो रहा है, तो फिर वो भगवान नहीं राक्षस है। हम लोग कर रहे हैं, नासमझी के कारण; बस हम बचना चाहते हैं, दूसरे के ऊपर ठोकना चाहते हैं। सत्ता उसी से है, पर करने वाला वो नहीं; उसकी सत्ता आपकी मदद के लिए है, और आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है। जानवरों में कभी सुना कि इस जानवर ने उसे छेड़ा? वो प्राकृतिक जीते हैं, समय पर भोग, समय पर भोजन। मानव ही सबसे समझदार बनता है और अपने कर्मों से सबसे निकृष्ट हो गया है, उसमें हम-आप भी आते हैं; बस किसी का पकड़ा गया, किसी का नहीं। मजा खुद मारते हो, दोष भगवान का देते हो। अगर सब वो करता है, तो तुम काहे को अशांत हो, दुखी क्यों हो? ये सब अपने आप को बचाने की बातें हैं। फिर मन और इंद्रियों को भी दोष देते हैं।
जब कुछ चाहिए ही नहीं तो वो एक प्रकार की चाहत कैसे हो सकती है? अगर आप किसी के पास गए और पूछा क्या चाहिए, उसने कहा कुछ नहीं — तो आप उसे कुछ दे पाओगे? बस।
यही हाल तो है। भगवान की मर्जी से नहीं, भगवान के विधान से हो रहा है, सिस्टम से हो रहा है; उस विधान में जैसा आप काम करते हो वैसा होता है। जैसे आपने मोबाइल लिया, सिम कार्ड दे दिया गया, कोई कंपनी चला रही है; अब जैसा उपयोग करोगे वैसा परिणाम मिलेगा, उसकी जिम्मेदार कंपनी नहीं, उपभोक्ता है। फोन पर किसी को धमकी दोगे तो उठा लिए जाओगे; आप ये नहीं कह सकते कि मोबाइल के मालिक को पकड़ो। उस नंबर के पीछे आपकी आईडी है। इसलिए सदुपयोग करो। उसने संसार में एक सिस्टम बना दिया, इसमें जैसा कर्म करते हो वैसा परिणाम मिलता है।
आगे-पीछे भी कुछ लिखा होगा; हम एक लाइन उठा लेते हैं और पूरा छोड़ देते हैं, इसी से गड़बड़ होती है। परमात्मा पाप नाश करेगा, लेकिन परमात्मा तक पहुँचेगा तब ना; बिना पहुँचे नहीं। और पहुँचते-पहुँचते भोग लेगा, तभी पहुँचेगा — तो पाप बचा कहाँ? जैसे बुद्ध के पास अंगुलिमाल डाकू पहुँचा, शस्त्र छोड़ दिए, भिक्षु बन गया; पर जब गाँव में भिक्षा माँगने गया तो सबने पत्थर मारे, उसने किसी पत्थर का जवाब नहीं दिया। उसने पश्चाताप की आग में, लोगों की मार खा के अपने कर्म का परिणाम भोगा और फिर आगे बढ़ा। मिलेगा जरूर, लेकिन भोगना पड़ेगा। जैसे कई डाकुओं की सजा संविधान ने माफ की, क्योंकि देखा गया कि वो बनाए गए थे; किस स्थिति-परिस्थिति में अपराध किया, वो देखा जाता है। गीता में भी भगवान कहते हैं कि अपने कृत का फल भोगना पड़ेगा। माफी किसी कर्म की नहीं है; हाँ, सच्चे सतगुरु की शरण में आ गए तो जहाँ मुंडी कटनी होगी वहाँ सुई लग के रह जाएगी।
अनुभव उसको बताओ जो आपके मार्ग का मार्गी हो; उसको ना बताओ जो आपका मज़ाक उड़ाए, नहीं तो वो आपको तोड़ देगा। उससे बात करिए जो आपके मार्ग का हो, वो आपको और सहयोग देगा। सबसे पहले उसे बताना चाहिए जिसने आपको मार्ग बताया है।
जिसको आप देखे नहीं, उसकी याद कैसे बनी रहती है? कोई रूप बना लिया होगा, कोई रूप पकड़ लिया होगा। तो उस रूप के पीछे जो कर्म है, वैसे कर्म करो, उनके चरित्र को अपनाओ, फिर आगे बढ़ जाओ। राम जैसे मर्यादा में जिए, लोगों से जैसा व्यवहार किया, वो मूल चरित्र पकड़ लो जिससे आपका जीवन बेहतर हो। समुंदर के सामने धनुष-बाण वाला चरित्र आपके काम नहीं आएगा।
निरा-आकार — जहाँ से सारे आकार निकल रहे हैं, वो निराकार है। आपने देखा नहीं है इसलिए आपके लिए निराकार है; देख लोगे तो वो भी दिखता है, बस स्थूल में नहीं है। अर्जुन को विराट रूप दिखा ना — सहस्रबाहु, सहस्र आँखें। आप भी वहाँ तक पहुँचो, सूक्ष्म की ओर अंदर चले जाओ, आप भी देख लोगे।
अध्यात्म में जो भी अनुभव मिलता है, समझ के निकलना है; पकड़ना कुछ नहीं, और छोड़ना भी नहीं — उपयोग करना है और निकल लेना है। आखिर में तो शरीर छोड़ के जाना ही है। चाहे भोग के जाओ, चाहे खोज के जाओ, जाना तो हर स्थिति में है। भोग वाला परिणाम तो पता है, बार-बार देख लिया; तो एक बार रिस्क ले लो, खोज के जाओ।
तो छोड़ दो ना, छोड़ना तो आपके हाथ में है। पकड़ा किसने है? पकड़ा भी तो आपने ही है। कामनाएँ छोड़ दो, अपने तरीके से करवाने की इच्छा का त्याग कर दो, बात खत्म। सबकी घुमा-फिरा के हालत वही है, लेकिन निकलने वाले निकल भी गए। प्रयास करते रहिए, प्रयास करते-करते छूट जाएगा।
दे दिए तो फिर माँगने की क्या जरूरत है? भूल जाओ। इतनी दया क्यों कर दी? अधिकार से ज्यादा कभी मत करिए, अधिकार से ज्यादा करोगे तो परेशान हो जाओगे। दो तो लेने के लिए नहीं; इतना दो कि ना लौटाए तो आप पे कोई फर्क ना पड़े।
प्रश्न हट गए। मुझे पता था, ज्ञान होने का लगभग समय भी पता था; धीरे-धीरे वो यात्रा के साथ चला आ रहा था। मालूम होने के बाद भी मैं ऐसे प्रयास करता था जैसे मालूम नहीं है, कि और जल्दी मिल जाए; मेरे पास समय नहीं था। प्यास इतनी गहरी थी कि जिंदगी से ज्यादा अगर मुझे कुछ चाहिए था तो बस वो; उसे मैंने सबसे पहले रखा, बाद में कुछ और था भी नहीं मेरे पास। अब मेरी तरफ से प्रयास खत्म हो गया, क्योंकि पता चल गया कि अब मेरे बस में कुछ भी नहीं, जितना मुझे करना था मैंने कर लिया। अब हो तो ठीक, ना हो तो ठीक। आत्मज्ञान के बाद ही असली यात्रा शुरू होती है, लेकिन वो अपने आप होती है, वहाँ कुछ कर नहीं सकते — जैसे गर्भ धारण के बाद सुरक्षित खानपान रखते हुए बस इंतजार किया जा सकता है।
वो तो शुरुआत में आ ही जाती है, धीरे-धीरे वो आपको आत्मज्ञान तक पहुँचा देगी। अगर बहुत तेज रफ्तार से सत्कर्म करने लगे तो ये बहुत तेज होता है — तन से, धन से, ज्ञान से। और ध्यान में कुछ मिलने लगे तो मिलने में कभी मत जाना, नहीं तो वहीं फँस जाओगे।