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प्रश्नोत्तर — भाग 10

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 200 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

मुझे खुद को साधने पर दुख क्यों मिल रहा है?

आपको साधने पर दुख मिल रहा है क्योंकि आप बिगड़े हो।

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जानवर, जैसे कुत्ता आदि, हमेशा ईमानदार रहते हैं। वे बेईमानी नहीं जानते। क्या मैं सही समझ रहा हूं?

ऐसा नहीं है। मैं आपको बता दूं। आप देखते रहो। भोजन बना लिया, कोई जानवर है। आप देख रहे हो तो नहीं खाएगा। जैसे उसे पता चला आप चले गए, तुरंत खा लेगा। तो इतनी तो समझ उसके पास है। हां, यह है कि वह अपने पेट के लिए खाता है। संचय नहीं करता। तो ईमानदार नहीं होता, बेईमान नहीं होता। अपनी जरूरत में जीता है।

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मैं जितनी गहराई से अपने आप को देखती हूं, एंग्जायटी, बेचैनी, घबराहट हो जाती है। उसको कैसे समझें? प्रश्न आधा हिंदी और आधा अंग्रेजी में लिखा था।

घबराहट पढ़ने में ही हो जा रही है। जब आधा हिंदी, आधा अंग्रेजी से बोलोगे तो सामने वाला भी घबरा जाएगा। क्योंकि आधी बात समझ में आए, आधी न आए। अब हम पढ़ते हैं। मैं जितनी गहराई में अपने आप को देखती हूं, एंग्जायटी, बेचैनी, घबराहट हो जाती है। अब हम खुद घबरा गए कि क्या लिखा है। क्या तुम थोड़े न घबराओगे। आधा अंग्रेजी। या तो पूरा अंग्रेजी बोलो, कुछ न समझ में आए। या तो आप पूरा अंग्रेजी बोलिए। बेचारे को कुछ न समझ में आए, तब तक घबराएगा नहीं, क्योंकि समझ में ही नहीं आया। उसी से अनुवाद करवाएगा। अब अंग्रेजी समझ रहा है, लेकिन आपने क्या किया, हिंदी-अंग्रेजी मिला दिया। तो या तो हिंदी पूरा बोलो, या तो पूरा अंग्रेजी बोलो। अब आधा हिंदी या आधा अंग्रेजी, कोई मतलब नहीं है।

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एक दर्शन का विद्यार्थी लिखता है कि बिना शब्दों के आप कुछ बोलो तो बिना शब्दों के हम समझ लेंगे। क्या आपमें यह क्षमता होनी चाहिए कि किसी का पेट देखकर पता चल जाए कि वह गर्भवती है या नहीं? लक्षण देखना आना चाहिए क्या? और वह कहता है, मेरे प्रश्न हैं, अभी उत्तर दीजिए।

लक्षण आपको देखना आना चाहिए। तो बिना शब्दों के अगर समझ लो, तो आपको पूछने की जरूरत नहीं। बिना शब्दों के कुछ कहे, आपको देखकर ही समझ में आ जाएगा। तो लक्षण भी तो देखना आना चाहिए। अब लक्षण ही देखना नहीं आएगा तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। तो बिना शब्दों के समझने की आपकी क्षमता भी होनी चाहिए। वे क्या करते हैं, वे जानें। लेकिन वे कह रहे हैं, फिलॉसफी के स्टूडेंट हैं। देखिए, प्रश्न किसके हैं। प्रश्न आपके नहीं हैं। प्रश्न आपको समाज से मिले हैं। उत्तर आपको समाज से मिलेंगे। वे प्रश्न हट जाएंगे। आपके पास तो आपके अलावा कुछ नहीं है। अगर कुछ है तो किसी और का। चाहे प्रश्न हो, चाहे उत्तर हो। यह क्लियर हो गया। यह पूछते हैं, गुरु जी मेरे प्रश्न हैं, अभी उत्तर दीजिए। तो जब आप बिना शब्दों के समझना चाहते हो, प्रश्न कर ही क्यों रहे हो। जब आप कह रहे हो कि बिना शब्दों के कुछ कहें, तो बिना शब्दों के हम कुछ कह रहे हैं। अब आप समझ लो। समझने की क्षमता नहीं है। या तो आपकी समझने की क्षमता नहीं है। क्योंकि कुछ न कुछ तो सामने वाले को पढ़ने के लिए उसके पास है ही है। आप कहोगे, नहीं, इनके पास कुछ नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता। यहां के हर कण में कुछ है। क्या आपकी क्षमता है वह समझने की। आप एक कण उठाओ। आप कह नहीं सकते कि कुछ नहीं है। यह कहिए कि मैं इसे पढ़ नहीं पा रहा हूं। खाली में भी, मैंने कर दिया, तो इसमें भी कुछ है। हवा है न। कुछ तो है न इसमें भी। यहां कुछ खाली है ही नहीं। यह कहिए कि मेरी समझ नहीं काम कर रही है। बस। तो बिना शब्दों के यहां सब कह रहे हैं। पूरी प्रकृति बोल रही है तुमसे। पूरी प्रकृति कुछ कहना चाहती है, और तुम उसे कुछ कहना चाहते हो। शब्द की जरूरत ही नहीं है। अगर तुम्हारी समझने की क्षमता है तो शब्द की जरूरत नहीं है। अगर आपको भाव समझने की क्षमता है तो आप देखते नहीं। आप किसी के साथ रहते हो। कहते हो, आज क्यों उदास हो। क्या उसने कहा आपसे? आपने उसे पढ़ लिया। और यह बड़ा आसान है। वह कहता है, नहीं, कुछ नहीं हुआ। लेकिन जब आप पीछे पड़ जाते हो तो कहता है, उदासी का कारण यह है। पढ़ लिया कि नहीं पढ़ लिया। क्या उसने आपसे शब्दों में कहा? नहीं कहा। तो आप तभी पढ़ पाओगे जब उसके करीब में जिओगे। क्या आप एक अनजान आदमी को देखकर बोलोगे, उदास हो? क्योंकि आपने उसे कभी हंसते-रोते देखा ही नहीं, तो आप उसे कैसे पढ़ोगे। अब उसको पढ़ने वाला आपसे आगे होगा, वह पढ़ लेगा। शरीर को न देखे, उसे सीधा देखे, वह पढ़ पाएगा कि इसके अंदर क्या चल रहा है। तो बिना शब्दों के आराम से पढ़ सकते हो। तुम्हें कोई पढ़ रहा है, तुम किसी को पढ़ रहे हो। हर वक्त यही तो हो रहा है। हर वक्त आप पढ़ ही रहे हो। जरूरी नहीं कि आप स्कूल जाओ। जब से समझने लायक हुए, पढ़ ही रहे हो। क्योंकि आपका भाव ही है। आपका प्रश्न ही है, यह क्या है। और जब तक इसका जवाब पूरी तरह नहीं मिलेगा, जब तक इस क्या है से नहीं छूटोगे, तब तक आप पूछते ही रहोगे, क्या है यह। क्या है, मतलब पढ़ना तो चाह रहे हो। यही तो प्रश्न है, इसी का तो उत्तर चाहिए। भाई, कोई कहता है बाहर क्या है। कोई कहता है आत्मज्ञान क्या है, परमात्मा क्या है। वह बाहर का छोड़ के अंदर का पढ़ना चाहता है। कोई बाहर का पढ़ना चाहता है। लेकिन आप देखेंगे तो हर व्यक्ति हर क्षण पढ़ ही रहा है। और आप तब तक पढ़ोगे जब तक आपको उस परम सत्ता से मिलना न हो जाए। जिस दिन मिलना हो गया, उस दिन खत्म। क्योंकि क्या है, उसी के द्वारा है। और इसका जवाब कौन देगा? वही देगा। क्योंकि जिसके द्वारा जिसका निर्माण हुआ है, वही जवाब देगा। क्योंकि कोई भी जवाब देगा तो एक अनुमान लगाएगा। तो जब तक उससे मिलना नहीं होगा, तब तक यह प्रश्न खत्म भी नहीं होगा। तो यही है भैया। इन्होंने कहा, मेरे प्रश्न का उत्तर अभी दीजिए। अभी उत्तर दीजिए।

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जब नियमित रूप से हम अपने आपको साध कर जीने लगते हैं, तो आत्मचिंतन भी प्रत्येक क्षण होने लगता है। क्या यही आत्मचिंतन है? गुरु जी, कृपया मार्गदर्शन करें।

आत्मचिंतन मतलब हम फंसे हुए हैं। आत्मा मतलब खुद। मैं खुद कहां फंसा हूं, इसके लिए चिंतन करना है। और मैं किस तरीके से अपने आप को छुड़ा लूं, इसके लिए आत्मिक चिंतन करना है।

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साधक और जिज्ञासु एक बार में साधना में नहीं बैठते। जब बैठते हैं तो शरीर खुजलाने लगता है, रीढ़ और कमर दुखने लगती है, और कहते हैं कि मैं विचलित हो रहा हूं, घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। जब प्रपंच और रसपान में रहते हैं तब कोई दिक्कत नहीं होती। यह क्या हाल है?

यही हाल है। एक बार में ही बैठ सकता था, लेकिन एक बार में नहीं बैठा। कितनी बार बोलना पड़ा, तब जाकर बैठा। यही हाल जिज्ञासु का है, यही हाल साधक की होती है, कि उसके पीछे पड़ना होता है, तब जाकर वह साधना करता है। साधना में जब साधक और जिज्ञासु बैठता है, तो खजुआ आने लगता है। कभी पीठ खुजलाता है, कभी हाथ, मुंह। लेकिन खुजवाना नहीं चाहिए। जब तक घूम रहा था, खजुली नहीं हो रही थी। जैसे बैठा, खुजाने लगे। ऐसे ही साधक की स्थिति है। जब प्रपंच करता रहे, जब रसपान करता रहे, तब खजुली नहीं होती। और जब साधना में बैठेगा, तो कब से खुजली चल रही है, पता नहीं। गर्दन नहीं मुड़ती। कब से है, बता नहीं सकता। खड़ा हो तो नहीं खजुता। बैठे तो खजू आता है। जब साधना में बैठा है, तो कब रीढ़ की हड्डी पिराए, कब कमर पिराए, कब गर्दन खुजाए। यही हाल मैं दिखाना चाहता हूं। यही हाल साधकों का है, जिज्ञासुओं का है, कि जब साधना में बैठते हैं तो कहते हैं, मैं विचलित हो रहा हूं, मुझे घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। और जब तक रसपान करते रहे, तब तक कोई दिक्कत नहीं रही। मैं आप लोगों से यही कहूंगा, साधना करो, आगे बढ़ो।

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घर में दबाव रहता है। यह करना है, वह करना है। अपने जीवन का निर्णय खुद नहीं ले सकते। घुटन हो रही है, इसलिए मैं मौन हूं। क्या दबाव में हम कभी आगे नहीं बढ़ सकते? फिर क्या उन लोगों से लड़ना चाहिए, क्योंकि वे समझ नहीं सकते, तमोगुण ऊर्जा वाले हैं? मैंने उनसे मानसिक रूप से दूर बना लिया है, लेकिन उनकी गलत बात नहीं मानता।

घुटन क्यों हो रहा है? मौन नहीं हो। जबरदस्ती तुम दबाए जा रहे हो। तुम कमजोर हो। इसे मौन नहीं बोलते। करोगे क्या? तुम जवाब नहीं दे पा रहे हो, तो चुप हो। डर के नाते चुप हो। सामर्थ्यवान बनो। आगे बढ़ो। ऐसा नहीं कि मौन हो तो आप बहुत हो गए। अब आप जवाब ही नहीं दे सकते। जब जवाब दोगे तो लतियाए जाओगे, मारे जाओगे। आपकी हिम्मत नहीं है। तुम मौन नहीं होते, डर से चुप होते हो। अब ऐसे मत समझना। आपने प्रयास किया, यह कह नहीं रहे। अब कोई बात नहीं, मैं आप पर छोड़ देता हूं। प्रयास क्यों किया फिर? प्रयास किए। अब तुम हार गए हो। तो मजबूर हो गए हो। अपनी मजबूरी को महानता का नाम मत दो कि मैं मौन हो गया हूं। यह मौन नहीं है। पिटाई के डर से मौन हो। पहले सामर्थ्यवान बनो। दूर नहीं बना लिए हो। अगर आप ज्यादा बोलोगे तो पीटेंगे। पिटाई के डर से आप बोलते नहीं हो। सामर्थ्यवान बनो। जवाब देना है तो सामर्थ्यवान बन के दो। अब बोलोगे क्या? बोल दोगे तो पिटाओगे।

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अपनों की कुटिया में कब तक हो? मिलने आना है। दो साल से ऊपर हो गए, मिलना नहीं हो पाया। आप यहां हो या कहां हो?

अब तो यहीं हूं। अब कुछ दिन है। कब चला जाऊं, पता नहीं। जब मिलना है तो आ जाओ। पता नहीं कब हम इस शरीर के द्वारा कहीं चले जाएं, या यह शरीर छोड़ कर कहीं चले जाएं। मिलना है तो जहां हूं, वहां आ जाओ।

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गुरु जी, योग्यता बढ़ाने का प्रयास करना क्या कर्ता भाव है?

योग्यता बढ़ाने के लिए प्रयास करना कर्ता भाव नहीं है। योग्यता से ज्यादा पाना कर्ता भाव है।

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यम-नियम से ऊपर भी कुछ है? यम-नियम के ऊपर जाने का मार्ग बताएं।

है ना। यम-नियम के ऊपर आप हो। ऐसा यम-नियम अपनाओ कि यम-नियम छूट जाए। बच्चों, आप सबसे ऊपर आप हो, लेकिन अपने कर्मों से अपने आप को सबसे नीचे रख दिया है।

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गुरु जी, सामर्थ्यवान कैसे बना जा सकता है?

सामर्थ्यवान बनने के लिए मेहनत करो, उस दिशा में जिसके लिए सामर्थ्यवान बनना चाहते हो। हर फील्ड है। अब देखो, आप कहां पर सामर्थ्यवान बनना चाहते हो।

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साक्षी की स्थिति सदा नहीं रहती। कभी-कभी आती है, कभी नहीं। मन चाहता है सब ओर भागना। उसे बार-बार थामने से साधना में भी ऊब पैदा होती है। यह क्या है? कैसे छुटकारा हो? एक तरफ ध्यान नहीं हो पा रहा हूं। क्या करूं?

अपनों की कुटिया में आओ और कुछ दिन रहो। जब नहीं हो पा रहे हो, तब क्या करोगे? जहां हो, वहां पड़े रहो। जब नहीं हो पा रहे हो, तो बताओ भी क्या।

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दुनिया की भागदौड़ में लोग अपने आप को ही सही बोलते हैं। सरकारी नौकरी के लिए नाम मात्र के पद होते हैं और नौकरी की चाहत वाले लाखों में हैं। अब क्या करना चाहिए?

क्या करें? अपना कल्याण करो।

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सर, आपकी फीस कितनी है?

मैं आपको साफ-साफ बता दूं कि यहां मैंने निशुल्क व्यवस्था की है। भोजन और रहने की निशुल्क व्यवस्था है। यहां के नियम में आप आकर क्रिया करें, इसके लिए व्यवस्था कर रहा हूं, कि मैं अगर शरीर भी छोड़ दूं तो भी लोगों को कमी ना हो। अपनों की कुटिया में सत्य के खोजियों को कभी हाथ न फैलाना पड़े। यही भाव से मैं मेहनत कर रहा हूं। मेहनत पर लगा हूं कि कोई सत्य का खोजी हो, उसको किसी पर निर्भर ना होना पड़े। क्योंकि सत्य का खोजी अगर किसी पर निर्भर हो जाएगा, तो फिर वह भटक सकता है। क्योंकि देने वाला अपने तरीके से यूज करता है। मैं इसी में लगा हूं। पूरी तरह मेहनत कर रहा हूं। धन से, तन से, अपनी समझ से, ज्ञान से। और परिणाम दिखता है। जब मैं यहां आया था, मैंने जितना बोला था उतना हो रहा है। मैं लगा हूं। यहां के लोगों को मालूम है और आप लोगों को भी दिख रहा है। ये ऐसे ही थोड़ी ना तैयार हो गया।

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क्या ऐसा नहीं है कि मन का धागा ढीला है, और जब उसे सीधा करो, सुलझाओ, तो उसमें मौन उतरता है? वह मौन भीड़ में भी कैसे साधे?

जब कोई कामना नहीं होगी, तो भीड़ में भी मौन हो। और जब कोई कामना है, तो हिमालय में भी आप मौन नहीं हो। यह प्रत्यक्ष ज्ञान की तरफ से आपके लिए है। जब तक अपने तरीके से चाहिए, तो आप हिमालय पर भी मौन नहीं हो। और जब अपने तरीके का त्याग कर दिए, जरूरत में जीना चालू कर दिए, तो आप भीड़ में भी मौन हो। यही है मौन।

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कृष्ण अर्जुन को कहते हैं, तू मार, क्योंकि ये तो पहले ही मर चुके हैं, तुझे पाप नहीं लगेगा। तो हिटलर ने यहूदियों को जला दिया, वे भी तो पहले ही मर चुके थे, तो हिटलर को भी पाप नहीं लगेगा? लेकिन अर्जुन ने इतनी बात पर मारा नहीं।

अर्जुन ने इतनी बात पर मारा नहीं है। वे अर्जुन की परीक्षा ले रहे थे। क्या अर्जुन अंधविश्वासी है? क्या अर्जुन मेरी बात मान लेगा? फिर बाद में, जब उन्हें ज्ञान हुआ, जब वह समझ पाए पूरी तरह, तब उन्होंने मारना चालू किया। पहले पूरी तरीके से समझे।

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गुरु जी, कामना से कैसे मुक्त हुआ जाए?

बस अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग करो।

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सत्य को बाहर खोजा नहीं जा सकता। जहां शब्द खत्म हो जाता है, वहीं सत्य प्रकट हो जाता है। कैसे वहीं प्रकट होगा? वही का मतलब क्या है? अगर शब्द खत्म होने पर सत्य मिल जाता है, तो गूंगे को भी सत्य मिल जाना चाहिए, क्योंकि वह बोलता ही नहीं। भीतर कैसे?

जहां उम्मीद खत्म हो जाती है, पूरी तरह से जब हम उम्मीद से मुक्त हो जाते हैं, तब जाके हम अपने आप में हो पाते हैं। तब हमें सत्य का बोध होता है। सत्य का ज्ञान होता है। ऐसे मुंह से बक-बक बोलने से कुछ नहीं होगा। कुछ भी पढ़ के कंठ से बोल दें। मुंह से बक-बक कम करो और साधना करो। भीतर कहां से? मतलब तुम अलग हो और भीतर अलग है? वह तुम्हीं में से है। उसे भीतर भी नहीं बोला जा सकता। यहीं से हम कहे थे, बक-बक कम बोलो, साधना करो। अपनी स्थिति को प्राप्त करो। जिस स्थिति को तुमने खो दिया है, उसको प्राप्त करना पड़ेगा। पहले हम बक-बक सुनते रहे, लेकिन अब न सुनें। काहे इतना समय बिताते? पहले तो यहां आए होते। लाइव में भी हम दो-दो, चार-चार, पांच-पांच घंटा, सात-सात घंटा लाइव लेकर बक-बक सुनते रहे, लेकिन एक को मतलब हो।

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सर, क्या प्राप्त करें और क्या प्राप्त नहीं करें?

जितना प्राप्त किए हो, उसका त्याग करो।

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गुरु जी, आपने भी तो बहुत कुछ कर दिया। इतने कम समय में यह सब कैसे संभव हुआ? ऐसा क्या करें कि जीवन में इसी गति से आगे बढ़ सकें?

पूरी तरह छोड़ के निकला। पीछे देखा ही नहीं कि पीछे कुछ है। सिर्फ आगे जाता रहा। जाते-जाते सिर्फ मैं ही रहा। सब खत्म हो गया। तो यह देखो, यहां बैठ के साधक लोग अपने आप में होने के लिए साधना करते हैं। और कुछ समय बाद मैं फिर से कह रहा हूं, और मैं कहता रहता हूं, कि हजारों लोग आकर साधना करेंगे। आज यहां अपनों की कुटिया में आकर कोई भी साधक साधना कर सकता है। देखो, यह व्यवस्था है।

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मेरे पास कुछ नहीं है। बस वह प्रेम और शांति है जो भीतर है। इसे बताकर क्या मिलेगा?

आपके अंदर शांति है या अशांति है, मैं क्या करूंगा? इसे सिद्ध कैसे करोगे कि तुम्हारे अंदर शांति है कि अशांति है? तुम समाज के लिए क्या कर सकते हो? वो कुछ बताओ, तो मैं सुनूं भी। आपके अंदर शांति है, प्रेम है, दया है, करुणा है। ये सब बातों का कोई मतलब है क्या? आपने इस समाज में अपने शरीर के द्वारा किया क्या है? इसका कोई मतलब है? आपके अंदर शांति है, आपके अंदर क्या है? अब हम क्या करेंगे सुन के? हमने पूछा भी नहीं। तो इसका कोई मतलब नहीं है।

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सर, यह समझिए कि मैंने अपने मां-बाप की सेवा बिना स्वार्थ के की है।

मां-बाप की सेवा की, तो कौन सा एहसान किया? उन्होंने भी तो आपके लिए किया। तो आपने एहसान थोड़ी ना कर दिया। इसमें यह बताने की क्या जरूरत है? मैंने मां-बाप की सेवा की, मैंने भाई की सेवा की, बहन की सेवा की। ये कोई बात है? अगर बिना स्वार्थ के मां-बाप की सेवा की होती, तो भी बात यह है कि आपने किसी और के मां-बाप का किया क्या? किसी और समाज का किया क्या? अपने मां-बाप का तो सब कर रहे हैं। ये कौन सी बड़ी बात है? ये क्या सुना रहे हो, अपने मां-बाप का मैं कर रहा हूं? जानवर भी अपने बच्चों की करते हैं। वो कौन सी बड़ी बात है? कुछ ऐसा बताओ कि लगे तुमने कुछ किया। ये कौन सी नई बात बता रहे हो कि मैंने अपनी मां-बाप की सेवा निस्वार्थ की? हंसा रहे हो। मुझे आपकी बातों पर हंसी आ रही है। यह क्या बता रहे हो?

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योगी जी, वैवाहिक स्त्रियां चाहकर भी अपने लिए वक्त नहीं निकाल पातीं। उनके लिए इस मार्ग में टिके रहने के लिए क्या-क्या जरूरी है?

अपनों की कुटिया में एक महीने के लिए आप लोग आ सकते हो। आप लोगों के लिए यहां व्यवस्था है। एक-एक महीने की छुट्टी मांगो अपने परिवार से। आप ग्यारह महीने परिवार को दो। एक महीने अपने आप को दो।

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गुरुदेव, आपने जो किया वह अद्भुत है। आप मेरे प्रश्न का जवाब क्यों नहीं देते?

जवाब देता हूं। अगर आप किसी और के बारे में पूछोगे, तो कोई मतलब है क्या? आप उनके क्या लगते हो? और मैं उनसे थोड़ी मिला हूं? मैं उनके बारे में बताऊंगा? और मैंने पहले भी बोल दिया, जितने लोग इस समाज के लिए काम किए हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूं।

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समाज इंसान से बनता है। हर इंसान अपना-अपना कर्तव्य निभाए।

कर्तव्य तो जानवर भी निभा रहे हैं। अगर आपने अपने परिवार को देखा, तो जानवर भी बच्चे पैदा करके हर साल, वो भी तुमसे ज्यादा, अपने बच्चों की सेवा करके छोड़ देते हैं। तो जानवर में और तुम में क्या फर्क है? जानवर भी अपने बच्चों की सेवा करते हैं। ये कौन सी बड़ी बात है? उन्हें पालते हैं, पोसते हैं, बड़ा करते हैं, छोड़ देते हैं, घोंसला बनाते हैं, उनकी सुरक्षा करते हैं। ये कौन सा नया काम कर दिया आपने? तो फिर आप में और जानवर में क्या फर्क है? अगर आपने सिर्फ अपने परिवार के लिए किया, तो समाज के लिए क्या किया, वो बताओ। सत्कर्म क्या किया? जरूरतमंद की सेवा क्या की?

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गुरुदेव, चरण छूना स्वीकार करें। मैं अपने आप को पापी मानता हूं।

अपने आप को पापी मत बोलो। यह गलत बात है। अगर किसी को पापी बोलना गलत है, तो आप अपने आप को भी नहीं बोल सकते। अपना सुधार करिए। आगे बढ़िए। ऐसा नहीं है।

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गुरु जी, आपसे एक विनती है। आप कौन हैं?

मैं तो कुछ भी बोल दूंगा, उसका कोई मतलब है? मैं बोल दूं कि मैं यह हूं, तो उसे कैसे सिद्ध किया जाए? मैं कहूं कि यह हूं, उसे सिद्ध कैसे किया जाएगा? तो इसका जवाब मैं आपको दे ही नहीं सकता। और मैं जितना भी जवाब दूंगा, उसका आपके जीवन में कोई मतलब ही नहीं होगा। कौन सा नाप है? कैसे नापोगे कि मैं क्या हूं? तो ये कोई मतलब ही नहीं है।

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हर समय श्वास धारणा कैसे करें?

धारणा यही है। निर्विकार की धारणा बनाओ। आगे बढ़ो।

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मुझे आप जैसा मेहनती बनना है। ध्यान इधर-उधर जाएगा। क्या मन एक समय सिर्फ एक काम कर सकता है? मन पांच इंद्रियों से जुड़ा है, इसलिए क्या धारणा भी एक साथ कई हो सकती है?

मन तो एक ही है, दो तो है नहीं। आप क्षण-क्षण में, सेकंड से भी कम समय में, कई जगह ले जाते हो, तो आपको लगता है कि मैं कई जगह साथ में लगा हूं। जैसे पांच इंद्रियां हैं, तो आप देख भी रहे हो, सुन भी रहे हो। दोनों घटना एक साथ घट रही है। कोई छू रहा है, तो उसका एहसास कर रहे हो। मतलब आप दृश्य को देख भी रहे हो, सुन भी रहे हो। कोई छू रहा है, तो उसको फील भी कर रहे हो। आप खा भी रहे हो। सुगंध और दुर्गंध भी। पांच इंद्रियों द्वारा आप एक ही समय में महसूस कर सकते हो। आप समझ लीजिए। आप क्या समझते हो, आपने अपने से बता दिया।

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जब क्लेश वाले माहौल में बहस करना व्यर्थ दिखे और इंसान अपनी ऊर्जा बचाने के लिए चुप रहे, तो उस मौन और कायरता के बीच महीन रेखा क्या है? निर्भर होकर ठोस कदम उठाने का सही आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

जब क्लेश का माहौल हो और बहस करना व्यर्थ दिखे, तो आप सामर्थ्यवान बनिए। आप खुद अपने आपको सामर्थ्यवान बनाइए। उनको छोड़ दीजिए।

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ईश्वर को आप किस रूप में देखते हैं? क्या वह शुद्ध चेतन है, परमात्मा?

क्या देखूं रूप में? मैं तो लोगों के लिए काम कर रहा हूं।

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निर्विकार होने के लिए भीतर के काम-विचार कैसे छोड़ें? मेरे भीतर काम-विचार आते हैं। कई बार विचार होते हैं और कई बार खुद सोच रहा होता हूं।

कोई बात नहीं। आप साधना करो और आगे बढ़ो। आ रहे हैं तो आने दो।

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मैं आपको काफी महीनों से सुनती हूं। आपके मार्ग पर चलती भी हूं। पर छोटी-छोटी बातों में बेईमानी हो जाती है। बातचीत में तब पकड़ नहीं पाते, बाद में विचार आता है कि गलत बोला। यह समझ कैसे बढ़ाएं?

बस बेईमानी मत करो।

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एक पड़ोसी की दूसरे पड़ोसी से नहीं बनती। आज तक देखा गया है कि नहीं बनता। ऐसा क्यों होता है? विस्तार से बताएं।

नहीं। मेरे साथ तो ऐसा नहीं हुआ है जिंदगी में। मेरी तो सबसे बनी है।

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कुछ छोटे-छोटे प्रयोग बता दीजिए, जिससे ध्यान प्रकट हो जाए।

बस आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सुनते रहिए। आपको समझ में आता रहेगा।

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आपसे आमने-सामने एकांत में बात करनी है। क्या आप उत्तर भारत में कभी आएंगे? कब आओगे?

आप बुला लो। बुलाओगे तो आएंगे। जब आप बुलाओ, तब आएंगे।

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मेरी जिज्ञासा बढ़ रही है। साधकों को देखना है कि वहां सब कैसे रहते हैं। खाना बनाते समय दिखाइए।

ठीक है, आज दिखा रहा हूं आपको। लो, आपको देखना था भोजन बनते वक्त, देख लीजिए। ये भोजन बनाया जा रहा है। साधक स्वयं अपने हाथों से भोजन बना के खाते हैं। लोगों को देखना था कि यहां भोजन कैसे बनता है, तो आज दिखा रहे हैं। ये साधक लोग बैठे हैं, साधना कर रहे हैं। इसी तरीके से यहां भोजन बनता है। आप लोग भी आएंगे तो आपको भोजन बना के खाना पड़ेगा। साधक लोग अपना भोजन स्वयं बना के खाते हैं।

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गुरु जी, भारत के जितने भी पड़ोसी देश सदा भारत के खिलाफ ही काम करते हैं।

कोई बात नहीं। अपने आप को मजबूत बनाओ। आप मजबूत तो भारत मजबूत।

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क्या श्रद्धावान होना सही मानते हैं या पुरुषार्थ?

पुरुषार्थ के साथ श्रद्धावान होना चाहिए। सिर्फ श्रद्धावान है और पुरुषार्थ नहीं है, तो कोई मतलब नहीं होगा। पुरुषार्थ है और श्रद्धावान नहीं है, तो भी कोई मतलब नहीं होगा। तो पुरुषार्थ के साथ श्रद्धावान रहो। श्रद्धा भी जरूरी है।

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साधना करते वक्त विचार आएंगे। विचारों को देखना है या जाने देना है?

नहीं। अगर विचार परेशान कर रहे हैं, राग-द्वेष हो रहा है, तो विचार कहां से आए, कैसे आए हैं, उसे जड़ तक जाना है। वो कैसे पैदा हुआ, कहां से पैदा हुआ। यह बताया अभी।

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आपके वहां बहुत प्राकृतिक है। क्या नदी के पास बैठकर साधना कर सकते हैं?

हां। अपनों की कुटिया का जहां बोर्ड है, यहां से आखिरी तक जितनी बाउंड्री है, वहां बैठकर साधना कर सकते हैं। यह अपनों की कुटिया है। यह नर्मदा तट है। बाउंड्री के अंदर बैठकर साधना करो।

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आपका वीडियो देखता हूं, सत्संग सुनता हूं, और ज्ञानियों की वाणी, संतों के वचन, इन सबसे मन अच्छा हो जाता है, शांत हो जाता है।

बस उसमें जीना चालू करो।

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आप किसका नाम जप करते हो, महाराज जी?

बस यही काम कर रहा हूं मेरे जीवन में। बस आप लोगों के लिए कार्य बचा है। बस खत्म।

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बात तो ठीक है, सर, लेकिन आपके खौफनाक कुत्तों से डर लगता है।

नहीं। ये कुत्ते ऐसे नहीं हैं। ये देखो, सब छुटे पड़े हैं। किसी साधक को बोलते नहीं हैं। इन्हें बस पता चल जाता है कि आप यहां साधना करने आए हो, जिज्ञासु हो या साधक हो। आप यहां साधना करोगे तो आपको कुछ नहीं बोलेंगे। देखो, सब छुटे पड़े हैं और साधक लोग आराम से भोजन बना रहे हैं। ऐसा नहीं है।

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आश्रम में रहने वाले के लिए क्या नियम है, महाराज जी?

नियम तो बता दिया है। आने वाले साधक और अभी के साधक सुन लें। यहां का नियम ही साधना है। नियम में रहना ही साधना है। सुबह 4 बजे या उसके बाद उठ जाना है। नित्य कर्म कर लेना है। शौच कर लेना है। स्नान कर लेना है। अपने आत्मिक चिंतन में बैठ जाना है। 8 बजे तक, आखिरी सुबह में, हॉल का गेट लगा दिया जाएगा। उसके बाद काढ़ा मिल जाएगा। नाश्ता करके सत्संग सुनना है। सत्संग में बैठना अनिवार्य होगा। फिर एकांत में जाकर बैठना है। सुबह 8 बजे हॉल बंद किया जाएगा, लॉक किया जाएगा, और शाम को 8 बजे ही खुलेगा। मैं व्यवस्था इसलिए कर रहा हूं कि लोग जाकर लेटे रहते हैं और उनका समय बर्बाद होता है। मैं किसी को बर्बाद होते हुए देख नहीं सकता। मैं जब तक अपनों की कुटिया में रहूंगा, मेरा शरीर रहेगा, तब तक मैं आप लोगों के लिए काम करूंगा। जिस तरीके से आप सध जाओ, जिस तरीके से आपकी साधना हो, उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े, मैं करने के लिए तैयार रहूंगा। कुटिया में लॉक है। 8 बजे सुबह लॉक हो जाता है और शाम को 8 बजे खुलेगा। आप बाहर रह के साधना करें। काढ़ा, नाश्ता, भोजन बाहर लें। साधना करें। फिर 8 बजे विश्राम कक्ष में आ जाएं। सुबह 4 बजे के बाद उठें, और 8 बजे बंद हो जाएगा। आपस में बातचीत नहीं कर सकते। मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। यह साधक आराम से बैठा हुआ है।

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खाना बनाकर या खाना खाने से पहले भोग लगाना, यह क्या विधि है? क्या जरूरी है? कृपया बताएं।

मैं तो कह रहा हूं, भोग मत लगाओ। किसी जरूरतमंद को खिलाओ। यही भोग है।

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सर, आप 4 बजे उठने पर इतना जोर क्यों देते हैं? क्योंकि मैं तो 4 बजे तक पढ़ता हूं।

4 बजे उठने का जोर नहीं दे रहा हूं। अगर आप 4 बजे सोएंगे, तो आराम से 6 घंटा तो नहीं चाहिए। जोर 4 बजे का नहीं दे रहा हूं। मेरा तो यही कहना है जीवन में, कि आप सोने के पहले और उठने के बाद करते क्या हो। चाहे जब उठो। अब यहां क्या है। जैसे आप 8 बजे सोने चले गए। मैं कह रहा हूं, 9 बजे नींद आए, 10 बजे आए। अब जब भी नींद आए 8 बजे के बाद, तो सुबह 8 बजे लॉक होगा। तो आप 4 बजे उठे, 5 बजे उठे, या 6 बजे उठे, तो 8 बजे बंद हो जाएगा। उसमें आपको नित्य की क्रिया करनी है। 8 बजे से 8 बजे, 12 घंटे हुए। तो कितना घंटा व्यक्ति सोएगा, 6 घंटे या 8 घंटे। यहां यह नहीं बोला जा रहा है कि आप 4 बजे उठो, 5 बजे उठो, 6 बजे उठो। यहां का नियम बताया जा रहा है कि 8 बजे सुबह हॉल बंद हो जाएगा और 8 बजे शाम को खुलेगा। उसके पहले आप सो लो, अपना नित्य काम कर लो। अब कोई 9 बजे सोएगा, तो यही कहा जाएगा कि 6 घंटा सोके 8 बजे उठो। कहने का मतलब 4 बजे या 3 बजे पर जोर नहीं दे रहे हैं। 5 बजे, 6 बजे, 7 बजे, 8 बजे पर भी जोर नहीं दे रहे हैं। यहां 8 बजे चले गए, कोई काम नहीं है, तो सो जाओ। उठ जाओ। अपना आत्मिक चिंतन करो। जिसके लिए आए हो, वो करो। मैं जोर थोड़ी देता हूं। मैं ना तो किसी और पर जोर देता हूं, ना मैंने अपने आप पर जोर दिया है।

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गुरु जी, मेरी उम्र 22 साल हो गई है। अभी तक शादी नहीं हो पाई है। जल्दी शादी के उपाय बताएं। हम बहुत परेशान हैं।

समर्थवान बनिए और शादी कर लीजिए। और क्या उपाय बताएं? हमें कौन उपाय बताए?

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क्या योग निद्रा में नींद पूरी हो जाती है?

हां, हो जाती है। लेकिन योग निद्रा तक पहुंचोगे, तो पहुंचो पहले।

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महाराज जी, प्रेम चाहिए। प्रेम सदा के लिए इस शरीर में नहीं मिलता। शरीर छोड़ने के बाद आदमी कहां जाता है?

यही तो पता लगाओ, कहां जाते हो। अब आप जा रहे हो। कहां जाओगे? देख लो।

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कथा रात में कितने बजे होगी? लाइव कब होता है? कब सुनें और कब सवाल पूछें?

अब हर रोज नहीं होता। 2024 में मैंने कुटिया बनाई थी, और 2025 में मई में, 16 मई को यहां आया था। 16 मई तक रोज होता था। धीरे-धीरे अब सप्ताह में एक दिन, रविवार को होता है। वह भी 1 बजे लाइव था। आप उसमें प्रश्न रख सकते हैं। वो भी अगर मेरा भाव हुआ तभी मैं करता हूं। अनिवार्य नहीं है। अगर होगा 1 बजे, तो आप सुन लीजिएगा। आगे-पीछे भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है।

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थोड़ा कठिन सवाल है, सर। वहां खाना कहां से आता है? क्योंकि खाना मुफ्त तो नहीं आता।

मैंने इसके लिए 12 साल तप किया है, और 12 साल तपस्या के बाद मैंने अपनों की कुटिया बनाई है। मैं इसके लिए पूरी तरह मेहनत करता हूं। जितने लोग मेरे सत्संग को सुनते हैं, समझते हैं, उन्हें लाभ होता है, वे लोग मेरे कार्य में सहयोग करते हैं। वे भी लाभ ले रहे हैं, तो वे देते हैं। और आराम से चलता है। मैं ऐसी व्यवस्था कर रहा हूं कि अगर मैं शरीर छोड़ के जाऊं, तो भी अपनों की कुटिया में कोई कमी ना हो, सत्य के खोजियों के लिए। मैं इसी काम में लगा हूं।

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सत्संग में साधु-संतों की वाणी से दिमाग ठीक रहता है, टेंशन नहीं होता। पर सांसारिक व्यवहार में जब लोगों के पास रहता हूं, तो दिमाग बहुत खराब रहता है। क्या करूं?

कोई बात नहीं। अपने आप को मजबूत बनाओ। सामर्थ्यवान बनो।

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गुरु जी, जब एकांत में बैठता हूं तो मन एक क्षण में अंधकार में चला जाता है, अंतःकरण में चला जाता है। क्या करें? कृपया मार्गदर्शन करें।

आप जितना किए हो, उसी में तो जाता है। आपने जितना किया है, उसी में जाता है।

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सर, आपका भविष्य क्या है? कृपया बताएं।

बस यही है कि मैं सत्य के खोजियों के लिए क्या कर दूं। कौन हूं मैं, कहां से आया हूं, उस परम आनंद में हो जाएं जो स्वयं का है। जहां से आए हैं, वहां का पता लगा लें। मूल सत्ता, परम सत्ता, उस परमात्मा से मिल लें। तो इसी में मैं लगा हूं। और यहां सत्य के खोजियों की कोई कमी ना हो, ऐसी व्यवस्था करना चाहता हूं, शरीर छोड़ने के पहले। अगर मैं शरीर छोड़ के जाऊं, तो यहां सत्य के खोजी आराम से रहें और भोजन ग्रहण करें। आराम से साधना करें। उन्हें किसी पर निर्भर ना रहना पड़े।

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गुरु जी, क्या हम बोल सकते हैं कि आर्मी वालों की कमाई ईमानदारी की होती है?

हां। अगर जिस पोस्ट पर हैं, उस पोस्ट का काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं, तो ईमानदारी की है। आप जिस पद पर हो, उस पद का काम ईमानदारी से कर रहे हो, तो ईमानदारी की कमाई है।

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क्या अपनों की कुटिया में सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक निरंतर आत्मचिंतन करना होता है?

एकदम निरंतर। उसमें काढ़ा भी पियोगे। उसमें सत्संग भी सुनोगे। उसमें भोजन भी करोगे, और आत्मिक चिंतन करोगे।

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बाबा जब बनते हैं तब लंबी दाढ़ी और भगवा वस्त्र धारण करते हैं। लेकिन आपका अलग है। मुझे समझ में आ गया कि गुरु ज्ञान का प्रतीक है। मैंने भी धारण किया था।

ऐसा नहीं है। मैं जहां धारण किया था, जिस काम के लिए गया था, वो काम नहीं हुआ। तो मैंने धीरे-धीरे वहां से हटा। फिर मैं खोज में निकला, तो धीरे-धीरे छूट गया। तो मुझे पता चला कि गुरु ज्ञान का प्रतीक है। और वस्त्र इसलिए धारण करते हैं कि समाज से हमें उचित व्यवस्था मिल सके। तो मैंने देखा कि नहीं, मैं अपनी व्यवस्था खुद कर सकता हूं। तो मैंने उस कपड़े को उतार दिया, प्रणाम करके।

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सुबह 5 बजे नर्मदा जी नहाया जा सकता है?

नहीं। यहां नर्मदा जी के तट पर जाना सख्त मना है। बस अपनों की कुटिया की बाउंड्री में रहना है। इसलिए कि किसी को तैरना आता है, किसी को नहीं आता। कुछ भी हो सकता है। इसलिए हमने मना कर दिया है। पहले जाना होता था, बाद में मैंने बंद कर दिया।

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क्या संत भेषभूषा से जाने जाते हैं?

संत भेषभूषा से नहीं जाने जाते। संत एक चरित्र है, भेषभूषा नहीं। बुराइयों का त्याग करें, अपने स्व में पहुंच जाएं, और लोगों को ज्ञान दें, आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, वो संत है।

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मुझे मोक्ष पाने के लिए ब्रह्मचर्य के पालन की क्या जरूरत है?

ईमानदारी ब्रह्मचर्य है। आपको ब्रह्मचर्य रखना है। शरीर का ब्रह्मचर्य रखने से कुछ नहीं होगा। पता चले कि शरीर का ब्रह्मचर्य रखे हो और बेईमानी कर रहे हो, तो कोई मतलब नहीं है। ईमानदारी अपना लो। ईमानदारी आपका ब्रह्मचर्य है। सत्कर्म इसमें सहयोग करेगा।

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वहां कितने समय तक रहना है? क्या एक महीने के लिए कोई आए और फिर घर चले जाए?

आ सकते हो। यहां आप आओ तो कम से कम सात दिन रहना है, और ज्यादा से ज्यादा आजीवन भी रह सकते हो। एक महीना, एक साल, पूरी आजीवन रह सकते हो। सात दिन पक्का रहना ही पड़ेगा।

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क्या सत्य की खोज में सोशल मीडिया की मदद लेना जरूरी हो जाता है?

हां, क्या करोगे? पहले किताब मिलती थी। पहले क्या था? कंठस्थ कराते थे। लिपिबद्ध नहीं था। लिपि नहीं थी। गुरु शिष्य को कंठस्थ कराता था। लोग ज्ञान को उपलब्ध थे। ज्ञान बांटते थे। फिर किताब आई। अब सोशल मीडिया भी है, तो उसका उपयोग करो। उसमें क्या है?

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सर, वहां पर कोई लड़का-लड़की साधना करने आएं और उन दोनों को प्यार हो जाए, तो वे क्या करेंगे? हम क्या करेंगे?

आपको क्या करना है, वो आप देख लो। वहां कोई लड़का-लड़की आए साधना करने, उन दोनों को प्यार हो जाए, तो वे क्या करेंगे? हम क्या करेंगे? जो करना है, वह करें। हम क्या करेंगे? हम जितना करना था, कर दिया आप लोगों के लिए।

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अगर मन में परेशान ना हो, तो क्या करें?

कोई बात नहीं। परेशान नहीं हो तो क्या करोगे?

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गुरु जी, क्या मैं (कुटिया में) तीन दिन के लिए भी आ सकता हूं?

कितने दिन के लिए भी आओ। अभी यहां पर जब बाउंड्री वगैरह हो जाएगी, तब यहां 7 दिन का नियम अनिवार्य हो जाएगा। अभी एक-दो दिन के लिए, जितने दिन के लिए आना है, आ सकते हो। उसके बाद फिर आपको कम से कम सात दिन के लिए आना पड़ेगा, और फिर आजीवन भी रह सकते हो। यह आपके ऊपर है।

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मैं जब अपनी समझ से कुछ भी सेवा, दया आदि करता हूं तो बार-बार गिर जाता हूं। फिर वापस ईमानदारी को पकड़ लेता हूं और पीड़ा के बाद उठने लगता हूं। कब तक (गुरु की) समझ से चलना चाहिए और कब अपनी समझ से भी चल सकते हैं?

अपनी समझ से ही तो चल रहे हो ना। अगर किसी ने कुछ बताया, आपको समझ आया, तभी तो आगे बढ़ोगे। आप नहीं समझ पाए तो थोड़ी ना चल पाओगे। अपनी समझ से ही हर व्यक्ति चलता है।

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गुरुदेव, स्नान भी बहुत तरह का होता है। असली स्नान कैसा होता है?

पहले ये स्नान तो करो। बाहर से स्वच्छ हो जाओ। फिर आंतरिक भी आप स्वच्छ हो जाओगे।

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हम हर बार गिर जाते हैं। क्या ऐसी कोई स्थिति है या ऐसा ज्ञान होता है जिसके बाद हम चाहकर भी ना गिर सकें?

बस उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओ। और आप चाहोगे तो कभी भी गिर सकते हो ना। आप अगर गिरने वाला काम करोगे तो गिर जाओगे। क्योंकि आप उस परम स्थिति पर कभी न कभी तो थे, तो चाह के ही तो गिरे।

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गुरु जी, एक कुटिया नर्मदा किनारे बनी है और यह दूसरी कुटिया बन रही है। वह कौन सी जगह है? साधकों के लिए बताएं।

पहली कुटिया है अदलपुरा, अपनों की कुटिया, मध्य प्रदेश — खरगोन जिला, तहसील कसरावद, निबरानी फाटा, तिचली, अदलपुरा। एक ये हो गया, और एक हरियाणा की यह कुटिया है। मैप पे दोनों का लोकेशन है। आप आ सकते हो, पूरा पता है। आके अपने कल्याण के लिए साधना करो, अपना आत्मिक कल्याण करो।

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हमारे यहां नवरात्रि का समय चल रहा है। इस समय कोई साधना कर सकते हैं क्या? कृपया मार्गदर्शन करें।

नवरात्रि में संकल्प ले लीजिए कि ईमानदारी से जीवन जिऊंगा, सत्कर्म के साथ, सत्संग के साथ।

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कोई बड़ा कार्य करने में डर लगता है कि कहीं फेल ना हो जाएं, लोग क्या कहेंगे। ऐसे विचार से कैसे बचें?

जब तक आप कमजोर हो, तब तक ऐसे विचार आते रहेंगे।

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मेरा मन पढ़ाई में लगता था। अब कुछ दिन से इधर-उधर से डिस्टर्ब हो गया हूं और पढ़ाई से मन हट गया है। अब परेशान हो गया हूं। गुरु जी, कुछ करें।

पढ़ाई में फिर मन लगा लो। पढ़ाई करो और आगे बढ़ो। अपना आत्मिक कल्याण करो।

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गुरुवर, अगर (वह परम) स्थिति प्राप्त ना हो तो क्या भगवान तक पहुंचा ही नहीं जा सकता?

नहीं, भगवान आप तक पहुंच सकते हैं। आप कैसे पहुंचोगे, बताओ? परमिशन अगर आपको मिलेगा, तभी जा सकते हो ना।

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गुरुदेव, अभी कुछ दिन पहले जब आपने कुछ खरीदा था और उसने ज्यादा मूल्य लिया था, तो आपने उस घटना से स्वयं को कैसे निकाला? हमारे जीवन में रोज ऐसे लोग मिलते हैं और मुझे उन पर बहुत दुख होता है।

मुझे अगर करना होता तो मैं पहले बात करता। अगर मैं पहले बात कर लिया होता तो वापस करने की जरूरत नहीं थी। मुझे किसी ने कहा कि क्या आप पूरा दे देंगे? तो हमने कहा, चलो कुछ कम करा लेते हैं। कम कराया, लेकिन फिर मैंने कहा — नहीं, पहले तो बात हो गई है ना, अभी क्यों कम करा रहे हो? बात करने के बाद क्यों हट रहे हो?

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गुरु जी, क्या आप जैसे मुक्त पुरुषों को भी काम, क्रोध, लोभ सताते हैं?

नहीं, सताता तो कोई नहीं है। देखिए — काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह। मद, लोभ, मोह जब हटता है तो आत्मज्ञान होता है, और काम और क्रोध हटता है तो ब्रह्मज्ञान होता है। तो जब तक मुझे कुछ कार्य करना है, तब तक उस कार्य में क्रोध करना पड़ता है। अगर जीवन से कार्य हटा दो, तो फिर क्रोध करने की कोई आवश्यकता नहीं। अगर आपके जीवन से काम को, कर्म को हटा दिया जाए और फिर आपको कहा जाए कि क्रोध करो, तो आप हंस दोगे। हमें काम में ही करना पड़ता है। एक व्यक्ति किसी और के लिए, आपके कल्याण के लिए क्रोध करता है; एक व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए क्रोध करता है। एक क्रोध आपको ऊपर उठाएगा और एक क्रोध आपको नीचे गिराएगा। तो आप देखो, क्रोध किस स्थिति में करते हो।

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आपके सत्संग अनुसार व्यर्थ के सारे काम छोड़ते जाएं, जरूरत में जिएं, सत्कर्म करें, एकांत में रहें और फंसने वाले काम ना करें — क्या यह सही दिशा है? कृपया बताएं।

एकदम सही दिशा है। करो, निकलो।

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गुरु जी, किसी का आत्मिक भला करने में हम गिर जाते हैं। तो क्या ऐसी सेवा छोड़ देनी चाहिए, और अच्छे से सीखकर फिर करनी चाहिए?

नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी का भला करो और आप गिर जाओ। कहीं ना कहीं गड़बड़ है।

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गुरुवर, जो पैसे वाली घटना आपने बताई थी, वह मेरे साथ परसों हुई। मुझे लगा कि कम पैसे करने वाली बात गलत है और मैंने पूरे पैसे उसको दे दिए।

देखो, अभी ध्यान से समझना। जैसे मैं कोई वस्तु लेने गया, तो वस्तु का मोलभाव मैं कर सकता हूं। अब मोलभाव करने के बाद जब वह देने के लिए तैयार हो गया, अगर फिर मैं उसके बाद मोलभाव करता हूं तो गलत हूं। मैंने उस व्यक्ति को कहा, इतने में ले आओ, मैं लूंगा; बाद में मैंने उसे कम करवाए — वहां गलत है। अगर शुरू में ही कम करवाता तो मैं थोड़ी ना उसे भेजता। तो आप शुरू में मोलभाव कर सकते हो, लेकिन भाव फिक्स करने के बाद, अगर वह सामान ले आया आपको देने के लिए, तब वहां मोलभाव करो तो गलत है। अब ऐसा नहीं कि मोलभाव नहीं करोगे, क्योंकि गलत आदमी फिर क्या करेगा? डबल बोल के डबल पैसा ले लेगा। ऐसा भी होता है, तो मोलभाव आप कर सकते हो।

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गुरु जी, क्या नाम जप करते हुए कर्म करने से अपने आप मान की इच्छा नहीं आएगी?

नहीं नहीं, ऐसा नहीं है। आपको समझ के मान की इच्छा छोड़नी पड़ेगी।

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आप इतने बड़े काम बहुत सरलता से कर देते हैं। इसके पीछे क्या रहस्य है?

रहस्य एक ही है — 12 साल का तप, मेहनत। इसके पीछे मेहनत है, तप है।

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क्या प्रत्यक्ष ज्ञान विपश्यना जैसा ही है?

नहीं, उससे अलग है।

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क्या ईमानदारी और सत्कर्म से उसी (परम) स्थिति तक पहुंच सकते हैं?

एकदम, ईमानदारी सत्कर्म के साथ आप वहां तक पहुंच ही सकते हो।

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गुरुदेव, मैं लोगों के बीच बोलना चाहता हूं पर डर लगता है। मुझे हकलाहट होती है और डॉक्टर ने बोला है कि लोगों से बात करो। मैं 100 लोगों के बीच बोलना चाहता हूं। कैसे करूं?

कर सकते हो। अगर नहीं हो रहा है तो आप यहां (कुटिया में) आ जाओ। हम सिखा देंगे आपको।

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गुरु जी, क्या आत्मज्ञानी से भी गलती हो सकती है?

गलती और अपराध में फर्क है। अपराध नहीं हो सकता। गलती किसी से भी हो सकती है। कोई सामान ले जा रहा है, गिर गया, टूट गया, तो गलती तो है ही। अपराध नहीं हो सकता, बेईमानी नहीं हो सकती।

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परिस्थिति हमें क्यों परेशान करती है?

क्योंकि आप परिस्थिति के विपरीत जाना चाहते हो, इसलिए परेशान करती है।

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गुरु जी, हम आपकी तरह कैसे बनें? कोई बुक बताइए जो हम पढ़ सकें।

सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो, जितना बताया जा रहा है। और बुक तो समाज में उपलब्ध है; अगर आपको लग रहा है तो पढ़ो। कुछ भी करो, अपनी समझ से करो और आगे बढ़ो।

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गुरुदेव, डॉक्टर ने कहा कि हकलाहट कम करने के लिए बोलना शुरू करना होगा। क्या मैं लोगों के विचारों पर तर्क-वितर्क कर सकता हूं, ताकि वे मुझे गुस्से में हकला कहें और धीरे-धीरे मेरी हकलाहट खत्म हो जाए?

जरूर करो। लेकिन यह है कि आप किसी को मानसिक तकलीफ ना देना। अगर कोई कुछ गुस्सा कर रहा है, उसको पी जाना, क्योंकि आप कुछ काम कर रहे हो। उस मकसद को याद रखना। आपकी वजह से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसका विशेष ध्यान रखना।

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योगी जी, आत्म साक्षात्कार होने के बाद क्या परमात्मा के ज्ञान के लिए और भक्ति करनी होती है?

ऐसा कुछ नहीं है। आत्मज्ञान के बाद बात खत्म हो जाती है। आपके ऊपर है।

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गुरु जी, गहरी नींद में चिंता, बेचैनी, घुटन कुछ नहीं रहता, तो जागने के बाद यह सब क्यों शुरू हो जाता है?

जब तक इच्छा-कामना है, तब तक बेचैनी है, चिंता है।

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गुरु जी, मेरा भाव है कि दृश्यमान जगत मशीन की भांति काम करता है, हमारे कर्मों का फल हम तक पहुंचता है और मैं इसमें फंसा हुआ हूं। अब मैं यह समझना चाहता हूं कि जिनके साथ मैं कर्म कर रहा हूं, क्या वे भी फंसे हुए हैं?

आप देख लो कि आप फंसे हो या नहीं, वो देखना है। वो फंसे हैं या नहीं फंसे हैं, उससे मुझे क्या मतलब? मैं फंसा हूं या नहीं, मुझे यह देखना है। उनके बीच में मैं अकेला फंसा हूं, यह मुझे मतलब नहीं है। मैं फंसा हूं ना, बात खत्म।

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गुरु जी, आप आराम कब करते हो?

आराम ही है। काम है तो आराम है।

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कर्ता भाव कब आता है और इसको कैसे हटाया जा सकता है?

जब आप कोई काम के परिणाम के पहले अनुमान लगाते हो, तो कर्ता का भाव प्रकट होता है। तो आप अनुमान लगाना छोड़ दो, कर्ता का भाव प्रकट नहीं होगा। हटाने की जरूरत नहीं है, अनुमान लगाना छोड़ दो। कोई भी काम करो, परिणाम आए तो बताओ। और कोई पूछे तो — भाई, परिणाम के लिए मैं काम कर रहा हूं। परिणाम कब, कितना आएगा, मुझे पता नहीं। मैं मेहनत कर रहा हूं परिणाम के लिए।

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गुरु जी, इच्छा तो समझ में आती है, अपेक्षा क्या होती है?

अपेक्षा का मतलब — आपने किसी के लिए किया और बिना उससे पूछे अपेक्षा बांध के रख दी कि वह मेरे लिए भी करेगा। नहीं करता है तो दुख होता है। तो अपेक्षा मत करिए, सीधा बातचीत करिए।

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मानसिक बंधन से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिली है, लेकिन ऐसा लगता है कि 70% हट गया हूं। आपके सत्संग का असर है गुरु जी। बस अब संसार और उसके बंधनों से मुक्त होना है।

हो जाओगे। प्रयास करते रहो। धीरे-धीरे हो ही जाओगे।

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गुरु जी, क्या आत्मज्ञानी होने के बाद हर व्यक्ति सत्संग करता है या मौन हो जाता है?

कुछ भी कर सकता है। मेरा संकल्प था कि मैं जैसे भटक-भटक के पूछ रहा हूं, वैसे लोग ना भटकें; मुझे जिस दिन मिल जाएगा, मैं घर-घर जाके, गांव-गांव, जैसे हो सकेगा, सबको प्रत्यक्ष ज्ञान बांटूंगा। तो भाई, मौन भी हो सकते हैं, अब उनकी इच्छा के ऊपर है कि वह क्या करते हैं। लेकिन ज्यादातर मैं समझता हूं, किसी को आत्मज्ञान हो जाएगा तो चुप नहीं बैठेगा।

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गुरु जी, किसी जानवर को गलती से चोट लग जाए तो क्या करें?

इलाज करो। तुम्हें गलती से चोट लग जाए तो क्या करते हो? इलाज करते हो ना। किसी को अगर चोट लग जाती है तो इलाज करिए।

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गुरु जी, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने जीना चालू कर दिया है। लेकिन घर में रहते हुए बहुत बार लोग लालच देते हैं, या फिर संकोचवश हां करना पड़ता है।

तो मत करो ना।

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योगी जी, मैंने संत रामपाल जी महाराज से दीक्षा ली है। वे कहते हैं कि आत्म साक्षात्कार से बात नहीं बनती, परमात्मा का ज्ञान भी होना चाहिए।

मैं एक ही बात आपको कहूंगा — आपको अपनी समझ का उपयोग करना है। कौन क्या कह रहा है, यह छोड़ो; देखो कि मेरा कल्याण, मेरा उद्धार कैसे होगा। अगर किसी को बाप बनना है तो पहले किसी का बेटा बनना पड़ेगा। जब आत्मज्ञान ही नहीं होगा, तो ब्रह्मज्ञान की तो छोड़ दो। किताब पढ़ने के लिए पहले क-ख सीखना पड़ेगा; अगर आप क-ख, मिलावट अक्षर, शब्द का अर्थ नहीं सीख पाए तो किताब आपके लिए क्या रहेगी? जितनी लाइन कोई रटा देगा, उतनी रट लोगे। और अगर क-ख सीख लिए, शब्द का अर्थ सीख लिए, तो दुनिया की कोई भी किताब आ जाए, आप उसका मतलब समझ भी लोगे, समझा भी दोगे। तो परमात्मा के साक्षात्कार के लिए पहले आत्मज्ञान होना चाहिए। अगर आत्मज्ञान नहीं होगा तो ब्रह्मज्ञान हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं है। आप इतिहास देखो, जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने इसी पर जोर दिया है कि पहले उस परम आनंद को उपलब्ध हो जाओ, उस परम स्थिति को प्राप्त कर लो, अपने स्व में स्थिर हो जाओ।

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गुरु जी, पूरी तरह ईमानदार कैसे बना जा सकता है?

ईमानदारी के लिए काम करना पड़ेगा। ईमानदार मतलब आप कर्म में बेईमानी मत करो। जब आपको कर्म करने का मौका मिले, जब आपके द्वारा कर्म हो रहा है, तो उसमें बेईमानी मत करो। यही ईमानदारी है।

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गुरु जी, ऐसा कौन सा काम है जो करने योग्य है?

जरूरतमंद की सेवा, ईमानदारी के साथ।

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गुरु जी, आज एक वीडियो देखा। उसमें (एक व्यक्ति ने) कोमा में गई लड़की के सिर पर हाथ रखा और वह अचानक खड़ी हो गई। इसका क्या संदेश है?

देखो कौन कैसा वीडियो बना के क्या कर रहा है। हम किसी के बारे में बोल नहीं सकते। आप अपनी और मेरी बात करिए, बस।

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अपने स्व में स्थिर होने के लिए क्या समझना जरूरी है?

समझकर समझने से मुक्त होना है।

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गुरु जी, क्या आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान सात दिन में हो जाएगा?

सात दिन क्यों, सात पल में हो सकता है, एक पल में हो सकता है। प्रयास करो। यह तो आपकी योग्यता के ऊपर है, आपकी क्षमता के ऊपर है। सारा खेल आपके ऊपर है। कोई आपको बस मार्ग बता सकता है। जैसे शिक्षक आपको पढ़ना सिखा सकता है, लेकिन सीखने की क्षमता नहीं है तो फिर कुछ नहीं होगा; और सीखने की क्षमता है तो सीख लोगे। एक शिक्षक कई लोगों को पढ़ाता है — कई लोग पढ़ के निकल जाते हैं, कई फेल होकर फिर कुछ और करते हैं। तो देख लो तुम किसमें से हो। सात दिन तो बहुत दूर है; सात दिन क्यों गंवाना, सात क्षण क्यों नहीं, एक पल में क्यों नहीं?

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गुरु जी, बहुत से गुरु कहते हैं कि आत्मज्ञान एक पल में हो सकता है, पर कभी पल में होता क्यों नहीं?

देखो, जरा समझो। कोई भी काम आप करते हो, परिणाम तो एक ही पल में आता है ना, लेकिन उसकी मेहनत कई वर्ष तक करनी पड़ती है। आदमी मर गया या जिंदा है — यह एक ही पल में होता है, परसेंटेज में नहीं होता। आप पास हो गए या फेल हो गए, यह एक क्षण में मालूम पड़ता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाई तो एक साल करनी पड़ी ना। "हो रहा है" में प्रोसेस है, धीरे-धीरे; "हो गया" — वह एक ही क्षण में होता है, कई सालों की मेहनत के बाद।

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गुरु जी, समझना कब तक है और कब समझने से मुक्त होना है?

जब तक आत्मज्ञान ना हो जाए।

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क्या संसार में रहकर अपने कर्तव्यों को करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है?

अगर आप सुने हुए सत्संग पर चल रहे हो, ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग के साथ जीवन जी रहे हो, और इसके बाद अपने आप को एकांत में भी समय दे रहे हो, तो काम करोगे तो होगा।

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गुरु जी, मैं जब किसी की सेवा करने जाता हूं तो ज्यादातर थक जाता हूं। असल में जरूरतमंद कौन है, यह कैसे पहचानें?

पहले देख लो, सबसे जरूरतमंद तो तुम ही दिख रहे हो मुझे। जब थक ही जाते हो तो पहले प्रोटीन लो — दूध, काजू, किशमिश, बादाम, छुआरा, मुनक्का खाओ। पहले अपना इलाज सही से कराओ, खुद का पोषण करो। पहले अपनी सेवा करो।

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गुरु जी, मैं काम नहीं कर सकता। क्या मैं (अपनों की कुटिया में) आ सकता हूं?

काम तो करना पड़ेगा। यहां आओगे तो खुद बना के खाना पड़ेगा, बर्तन मांजने पड़ेंगे, झाड़ू लगानी पड़ेगी, और अपनों की कुटिया में पेड़-पौधों को पानी देना हो तो देना पड़ेगा। भोजन आप करोगे तो धोना भी आपको ही पड़ेगा। अपनों की कुटिया में वही आ सकता है जो अपना काम स्वयं करे, पेड़-पौधों को पानी दे, साफ-सफाई करे, अपनों की तरह रहे। कुछ भी लिखने से पहले सोचो कि मैं क्या लिख रहा हूं। जब सत्संग हो रहा है तो सत्संग की, मूल की बात करो।

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गुरु जी, दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका डर कैसे खत्म हो?

सामर्थ्यवान बनो। कहीं से कमजोर हो, इसलिए ऐसा लगता है।

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गुरु जी, ऐसा कौन सा काम है जो 24 घंटे किया जा सकता है और जो मुक्ति पक्की कर दे?

जरूरतमंद की सेवा में लगा दो अपने आप को।

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जब उस परम सत्य का कोई नाम नहीं, फिर यह नाम दान का ढोंग क्यों होता है? यह मेरा अनुभव है।

तो मत जाओ ना। अगर ऐसा हो रहा है तो मत जाओ। मैं तो खुद कहता हूं कि मुझ पर भरोसा मत करो, मुझ पर विश्वास ना करना। प्रत्यक्ष ज्ञान को समझो और निकल लो। आपके पास बुद्धि है, विवेक है; आपको समझ में आना चाहिए कि कौन मेरे साथ क्या कर रहा है।

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क्या जीवन में गुरु करना जरूरी है?

गुरु ज्ञान का प्रतीक है। जब से पैदा हुए हो, बिना गुरु के आप आगे चल ही नहीं पाओगे। जीवन में गुरु नहीं है तो आप पशु बन जाओगे, राक्षस बन जाओगे।

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गुरु जी, मैं जब भी कोई डिसीजन लेता हूं तो मन में हमेशा द्वंद्व चलता रहता है। आपकी तरह बिना द्वंद्व के हर डिसीजन फाइनल कैसे करूं?

देखो, ऐसा है — मान लो आप कपड़ा खरीदने जा रहे हो और जेब में एक लिमिट का पैसा है। तब दुकान में देखोगे कि भैया ऐसी क्वालिटी का दो, वैसी क्वालिटी का दो — समझौता करना पड़ेगा। और आपके पास अनलिमिटेड पैसा है, तो दुकान में जाते ही कहोगे सबसे बेस्ट क्वालिटी का आइटम दिखाओ; और यहां न हो तो कहोगे ऑर्डर देकर मंगा दो। तो भैया, सामर्थ्यवान बनो।

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आत्मिक चिंतन कैसे करें? मन में संसार घूमता रहता है।

संसार घूमता है, तो संसार को छोड़ने के लिए आत्मिक चिंतन करो कि मैं इस संसार से कैसे मुक्त हो जाऊं।

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गुरु जी, क्या चेतना को जानना आत्मज्ञान है?

चेतना मतलब समझ को भी बोला गया है। जानने से मुक्त होना है।

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आप कहते हैं कि सामर्थ्यवान बनो, पर क्या सामर्थ्यवान बनने से अहंकार नहीं बढ़ेगा?

सामर्थ्यवान बनने से अहंकार नहीं होता। अहंकार तब होता है जब आप सामर्थ्यवान नहीं हो। किसी काम में आप सामर्थ्यवान नहीं हो, और उसमें कोई आपके विरोध में खड़ा होता है कि आपको तो जानकारी नहीं, तो वहां पर आपका अहंकार खड़ा होता है। सामर्थ्यवान व्यक्ति को कभी अहंकार खड़ा नहीं होता। सामर्थ्यवान व्यक्ति अपने काम को परिणाम तक ले जाने के लिए गुस्सा कर देता है, लेकिन अहंकार कभी खड़ा नहीं होगा। अहंकार तो कमजोर व्यक्ति को खड़ा होता है।

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क्या समाज सेवा ही मोक्ष है?

जरूरतमंद की सेवा ही मुक्ति और मोक्ष का कारण बनती है।

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क्या उचित कर्म ही हमारा गुरु नहीं है?

नहीं। कर्म कैसे करना है, यह जो बताएगा, वह गुरु है। आपका जन्म हुआ, शरीर मिला, तो खाना आता है लेकिन धोना नहीं आता — वह मां सिखाती है। वहीं से गुरु शुरू होता है, इसलिए मां-बाप को प्रथम गुरु बोला गया है। अगर वे न सिखाएं तो आप कभी सीख भी नहीं पाओगे। तो वहीं से आपने गुरु धारण किया।

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आश्रम में पर्याप्त भोजन ना मिलने पर मंदिर से प्रसादी चुराकर खाना कितना सही है?

आप जरूरत में जियो ना। मेहनत करो। क्यों चुरा के खा रहे हो?

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गुरु जी, श्रद्धा क्या है और श्रद्धा कैसे जन्मती है?

श्रद्धा-विश्वास — जब आपके जीवन में (कुछ) प्रत्यक्ष होता है, तो उस व्यक्ति के लिए श्रद्धा अपने आप पैदा हो जाती है। (उसके पीछे) कुछ नहीं चाहिए वाला भाव है।

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मुझे आत्मज्ञान हुआ है। लोगों को कैसे ज्ञान बांटूं? लोगों को सत्य बताने जाओ तो पागल समझते हैं।

तो पागल तो समझेंगे ना, और क्या समझेंगे?

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गुरु जी, मैं फंसी हुई हूं। मेरे मां-बाप बच्चों में भेदभाव करते हैं और मुझे बलि का बकरा बना के रखते हैं।

तो आप सामर्थ्यवान बनो। अगर वे और बच्चों को महत्व देते हैं, आपको नहीं, तो जरूर आप उस काबिल नहीं होगे। पैदा होते हुए थोड़ी ना ठप्पा लगा था कि इसको महत्व देना, इसको नहीं। बकरा मत बनो।

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गुरु जी, मैंने जिनका फायदा उठाया है, वे लोग मुझसे यह अपेक्षा रखते हैं कि पैसे कमाओ, चाहे बेईमानी करके। तो मैं जरूरत में कैसे जिऊं?

अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को निभाते हुए अपनी क्षमता अनुसार कार्य करिए। बात खत्म। लोग क्या कहते हैं, उससे मुझे क्या मतलब? मुझे ईमानदारी से जीना है, लोगों को कहने दो। मुझे किस तरीके से जीना है, कैसे मेरा कल्याण करना है, मुझे मालूम है, और मैं उसके लिए बेईमानी नहीं करूंगा। ईमानदारी से जितना आएगा — यह लो भैया। अपने को सुरक्षित रखते हुए जीवन में आगे बढ़ो।

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गुरु जी, कभी-कभी जीते-जीते थक जाते हैं। लगता है कि हमसे ना हो पाएगा, मैं इस भव बंधन से मुक्त नहीं हो पाऊंगा।

नहीं, मेहनत करना पड़ेगा। मेहनत करो और आगे बढ़ो।

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निर्विकार होने पर जीव वापस क्यों गिर जाता है?

अब ये तो गिरने वाले से पूछा जा सकता है।

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क्या अपने जीवन को एक कुटिया या आश्रम में नष्ट कर देना समझदारी है? क्या 24 वर्ष की अवस्था में संन्यासी होना चाहिए, या दुनिया को और समझना और जानना चाहिए?

यह अपना-अपना भाव है। मैं अपने जीवन का बताऊं — ना तो मुझे बाबा बनना था, ना साधु, ना संन्यासी। मुझे सिर्फ काम करना था, कि मैं इस समाज में कुछ कर सकूं, अपने आप को उस लायक बनाऊं; और वह मैं कर रहा हूं। संन्यासी का मतलब यह थोड़ी ना कि आश्रम में बैठ जाना; समाज के लिए कुछ करना। अपनों की कुटिया अदलपुरा में मैंने कई सौ पौधे लगाए, जो अब वृक्ष की तरफ बढ़ रहे हैं, और वहां साधक रह के साधना करते हैं — तो पर्यावरण को भी सहयोग दिया। मैं जीवन में ईमानदारी सिखाता हूं, ईमानदारी से जीता हूं, तो देश सेवा भी हुई। एक गृहस्थ दो-चार लोगों के लिए कुछ घंटे काम करता है; जिस संन्यासी ने समाज उद्धार के लिए काम किया, वह 24 घंटे काम करता है। संन्यासी को भगोड़ा मत समझिए। जो खाने को नहीं था, या कुभाव में पत्नी-बच्चों या मां-बाप को छोड़कर भाग गया, वह संन्यासी नहीं, वह भगोड़ा है, कायर है। संन्यासी का मतलब — सामर्थ्यवान होकर घर से निकला, पूरी समझ से; वह दो-चार लोगों में जिंदगी कीड़े-मकोड़े की तरह खत्म नहीं करना चाहता, उसमें वह क्षमता है कि वह विश्व के लिए कुछ कर सके। वह संन्यासी है।

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गुरु जी, अगर मेरे साथ कोई बेईमानी करता है, तो क्या मैं भी उससे बेईमानी कर सकता हूं?

मैं तो कहूंगा कि आप ईमानदारी से उससे हट जाइए।

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गुरु जी, क्या आपको कभी अपने वचनों पर संदेह या पछतावा होता है, कि मैंने ऐसा क्यों कहा? मुझे तो हर पल लगता है कि ऐसा नहीं करना चाहिए था।

नहीं, ऐसा कुछ नहीं। मैंने जो कुछ कहा या किया, सामने वाले के लिए किया, इसलिए कभी अफसोस नहीं होता। अफसोस तब होता जब मेरी कोई कामना होती, कोई मेरी इच्छा होती, और मैं इच्छा के लिए उसे कुछ गलत-सही बोल देता; तब मुझे लगता कि मैंने गलत किया।

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क्या 100% मोह से मुक्त होने पर ही आत्मज्ञान होता है?

पहले नहीं। 101 (प्रतिशत), एक मेरी तरफ से जोड़ लेना।

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गुरु जी, साधक को क्या साधना है? कृपया बताएं।

अपने चरित्र को सुधारना है। ईमानदार बनना है। सत्कर्म करना है। जरूरतमंद की सेवा करनी है और निकल लेना है।

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लोग बहुत घमंडी हैं। ऊंची आवाज में बात ना करो तो दबाने की कोशिश करते हैं।

तो ऊंची आवाज में बात करो।

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बिना साधना के भव (सागर) से क्यों नहीं तर पाएंगे?

अगर बिना साधना के हो जाए तो कर लो, उसमें क्या है? कौन रोक रहा है? अगर बिना साधना के हो जाए तो बड़ी अच्छी बात है, कर लो।

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क्या सब में समान क्षमता होती है? क्या हर कोई सब कुछ कर सकता है?

नहीं। सबकी क्षमता अलग-अलग होती है और सब अपनी क्षमता के अनुसार ही कार्य कर सकते हैं। हां, क्षमता को कार्य करके बढ़ाया जा सकता है।

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गुरु जी, दिमाग या काम ऊर्जा को मुक्ति की तरफ ले जाने के लिए कैसे उपयोग करें?

बस मुक्ति वाला काम करो।

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गुरुवर, मैंने एक-दो साल पहले शिव नाम जप शुरू किया था, और आगे बढ़ते-बढ़ते मुझे अपने स्वभाव की असलियत पता चली और मैं डर गया। तब से भाग रहा हूं। अब मैं उलझ चुका हूं। क्या फिर से शुरू करूं?

अब हो सके तो यहां (अपनों की कुटिया में) आओ और यहां कुछ समय रहो।

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गुरु जी, एक सच्चा खोजी कब तक खोज करता है?

जब तक मिल नहीं जाता।

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गुरु जी, क्या नाम दीक्षा के बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता?

हो सकता है ना। दत्तात्रेय भगवान ने इसी बात को तो सिद्ध किया था — उन्होंने 24 गुरु माने थे, बनाए नहीं थे। तो गुरु ज्ञान का प्रतीक है; ज्ञान लो और आगे बढ़ो।

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गुरुदेव, आपने संन्यास की बहुत सुंदर परिभाषा दी। संन्यास और संन्यासी में क्या अंतर है?

संन्यास का मतलब होता है अपनी बुराइयों का नाश कर देना। बुराई क्या है जो हमने कर्म में धारण की है — छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — इसको छोड़ देना, बुरे काम को छोड़ देना और अपना कल्याण करना, इसी को संन्यास कहते हैं। संन्यासी इससे आगे है। संन्यासी का मतलब होता है — वह समाज उद्धार के लिए निकला है, दो-चार लोगों में जिंदगी खत्म नहीं करना चाहता। उसके पास वह बल है, वह ऊर्जा है; वह समझ चुका है कि मेरे पास अथाह बल है और यह बल दो-चार लोग नहीं झेल पाएंगे। तो वह समाज के लिए निकल जाता है और अपनी ऊर्जा को समाज कल्याण के लिए लगा देता है। वह संन्यासी है।

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क्या अपने कर्तव्यों को छोड़कर आश्रम में जाकर आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है?

कर्तव्य को कभी छोड़ना ही नहीं चाहिए। अगर कुछ छोड़कर भाग रहे हो, तो भागते ही रहोगे।

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विद्यार्थी होते हुए कभी-कभी मार्ग से बहुत विचलित हो जाता हूं। क्या करूं?

कुछ करो। अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाओ। कुछ समाज के लिए करो। आपको शरीर मिला है, आपके पास बल है — धन बल, तन बल, समझ का बल। तो समाज के लिए खर्च करो, और करके बताओ। फिर बताना नहीं पड़ेगा।

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गुरु जी, आपको पास्ट (अतीत) छूता क्यों नहीं?

क्योंकि पास्ट में मैंने जिया। मैं जी के निकला हूं, तो छुएगा कैसे? आधा-अधूरा छोड़ के निकलता, तो फिर छूता, मुझे पकड़ता। मैं जहां भी था, पूरी तरह जिया, और जी के निकला हूं, तो वापस जाने की बात ही नहीं है। किताब के अगर पूरे पन्ने पढ़ लिए तो किताब दोबारा उठाने की जरूरत नहीं है; लेकिन एक पन्ना भी छूट गया तो हो सकता है 20 साल बाद भी वह किताब पढ़नी पड़े। मेरे लिए ना कुछ अच्छा था, ना बुरा; मैं जहां भी था, पूरी तरह जिया। इसलिए मुझे अतीत कभी खींचता नहीं। और भविष्य की मुझे चिंता नहीं, क्योंकि मैं जहां होता हूं, पूरी तरह जीता हूं; मेरे जीने में ही तो सब कुछ है।

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गुरु जी, आप में डर, डाउट या चिंता नहीं है — क्या यह आत्मज्ञान की वजह से है, या आप पहले भी ऐसे ही थे?

नहीं, मैं पहले भी ऐसा था।

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गुरु जी, क्या आप भी अपने विचारों को पिरोने के लिए कोई किताब लिखेंगे?

विचार तो है लिखने का। अभी तो वीडियो बनाते हैं, आप लोगों तक पहुंचाते हैं। कभी किताब भी लिखा जाएगा।

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गुरु जी, मुझे डर लग रहा है कि आप जैसे महापुरुष के होते हुए भी मैं पूरा लाभ नहीं ले पा रहा हूं। फिर कब और कितने सालों बाद मुझे मौका मिलेगा?

मौका मिला है तो ले लो ना, भैया।

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गुरु जी, तुलना करना ठीक है या गलत?

एकदम गलत है। तुलना कभी करनी ही नहीं चाहिए।

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मैं (कुटिया में) आने का इच्छुक हूं, पर मुझे घुटने की दिक्कत है, शुगर-बीपी है। क्या आ जाऊं?

अगर आप सारे काम अपने स्वयं कर सकते हैं तो आ सकते हैं। यह आपके ऊपर है।

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(मन के) बेकार खर-पतवार को कैसे काट के निकालें?

बेकार खर-पतवार निकालने के बाद ईमानदारी, सत्कर्म अपनाओ और निकलो। जितना सत्संग में सुनते हो, उतना जियो तो निकल जाओगे।

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गुरु जी, आप जब दिल्ली आए थे तब मैं आ सकता था, पर पता नहीं क्यों नहीं आया। बहुत डर लग रहा था कि कहीं आप सच में कुछ बदल ना दें, फिर आम जिंदगी में जीना मुश्किल हो जाएगा।

ऐसा नहीं। आम जिंदगी और अच्छे से जी सकते हो।

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घर के जंजाल से कैसे निकलें? सब के सब अपनी मनमानी में लगे हैं।

मनमानी में लगे हैं तो आप दृष्टा होकर देखा करो। मनमानी करने वाले एक दिन बर्बाद हो जाएंगे, बचोगे आप।

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गुरु जी, क्या हर किसी की (वह परम) स्थिति आती है?

जरूर, आती ही आती है।

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गुरु जी, ऐसा क्या करूं कि मैं 24 घंटे (साधना) करूं?

जरूरतमंद की सेवा करो, और भाव रखो कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए।

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कल्याण में लगभग कितने जन्म लग जाते हैं?

इसी जन्म में। कोई जन्म तो आखिरी होगा। इसी जन्म को आखिरी बना लो और अपना कल्याण कर लो।

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गुरु जी, एक साधक को असली एक्सपीरियंस कब होना शुरू होता है?

जब वह पूरी तरह लग जाता है। जब वह पूरी तरह लग जाएगा तो होने लगेगा।

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गुरु जी, क्या स्वार्थ ही पूरी दुनिया को खा रहा है?

नहीं, बेईमानी खा रहा है। बेईमानी मत करो। (बेईमानी करके) अपने को बर्बाद कर रहे हो, दुनिया का क्या करोगे?

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गुरु जी, लोग नशा क्यों करते हैं?

नशा तब करते हैं जब उनके जीवन में अध्यात्म नहीं होता। वे जीवन के लक्ष्य को समझ नहीं पाते कि मानव तन क्यों मिला है। यह सब नहीं समझ पाते, इसलिए उस तरफ चले जाते हैं।

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मेरा समाज से, रिश्तेदारों से मोह कम हो रहा है। क्या यह आत्मज्ञान की तरफ बढ़ने का लक्षण है?

अब मोह क्यों कम हो रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे आपकी जरूरत पूरी नहीं कर रहे, इसलिए आप उनके विरोध में खड़े हो रहे हो? (पहले) यह देखो।

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गुरु जी, हम सामान्य व्यक्ति हैं, हमें कुछ ना कुछ लालसा होती है। आपको भी लगता है कि आपकी बढ़िया कुटिया हो। तो हमारी और आपकी लालसा में क्या अंतर है?

अंतर यह है कि हम चाहते हैं कि अपनों की कुटिया अच्छी तरीके से बन जाए और यहां आप लोग आकर रहो अपने आत्मिक कल्याण के लिए — और जिन्हें मैं जानता भी नहीं। अभी दो साधक यहां रह रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए। और आप अपने लिए चाहते हो, और अपनी मोह-माया में जितने लोग "मेरा" हैं उनके लिए चाहते हो। यही फर्क है। मैं समाज के लिए अच्छा करना चाहता हूं, आप अपने परिवार के लिए। मेहनत तुम भी कर रहे हो, मेहनत मैं भी कर रहा हूं; तुम्हारी मेहनत तुम्हें अन्य शरीरों में लेकर जाएगी और मेरी मेहनत मुझे उस परमात्मा तक ले जाएगी। अगर यह आपने अपना लिया तो आप भी उस परम सत्ता तक, आत्मज्ञान तक, उस परम आनंद तक पहुंचोगे।

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जब आपको सब कुछ नहीं पता, तो जन्म-मृत्यु से आप मोक्ष कैसे करवा रहे हैं?

हम तो जीना सिखा रहे हैं — कैसे जियो कि आत्मज्ञान तक पहुंच जाओ।

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क्या आपके भरण-पोषण का ध्यान भगवान रखते हैं?

भगवान को क्या जरूरत है? जब हम खुद कर लेंगे तो भगवान की क्या जरूरत है कि भगवान रखे?

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क्या आप राम के भरोसे जीते हैं या कर्म के भरोसे?

काम के भरोसे। मेरे कर्म से मुझे ताकत मिली है; इसमें राम का कोई लेना-देना नहीं है। जैसा मैं करूंगा, मेरे सामने परिणाम वैसा आएगा। इसमें राम क्या कर लेंगे?

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गुरु जी, राजस्थान में हमारे मंदिर की छोटी जमीन है। वहां भी आप अपनी कुटिया बना सकते हैं।

पहले इसको पूरा करें, इसमें काम करें। आगे का ऐसा कोई विचार नहीं है, क्योंकि एक आश्रम मध्य प्रदेश में हो गया, एक यहां हो गया। आश्रम बनाते रहना मकसद नहीं है; जिस उपदेश से हमने बनाया, उस मकसद पर पूरी तरह काम होना चाहिए।

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गुरु जी, जैसे मैं भगवान की तरफ चलना चाहता हूं, क्या वे भी मेरा इंतजार कर रहे होंगे?

अब देखो, कर्म ऐसा होगा तो कर रहे होंगे।

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गुरु जी, आप कितने प्यारे इंसान हैं। ऐसे लोग मुझे आम जिंदगी में क्यों नहीं मिले?

अभी तो मिल गए ना। अभी लाभ ले लो। ऐसा ना हो कि यह प्यारा इंसान एक दिन शरीर छोड़ के निकल जाए। नहीं मिला, बात अलग है; अगर मिल गया तो लाभ ले लो।

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क्या बचपन के गलत कर्म का प्रभाव पड़ता है?

कौन सा बचपन? मतलब आपने अपराध किया है, या गलती? गलती बचपन में हो गई, तो बात खत्म।

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गुरुदेव, अगर कोई छल-कपट से मुक्ति के लिए प्रयास कर रहा है, तो क्या उसे सांसारिक चीजें छोड़नी हैं? मेरा लाइफ स्टाइल बिल्कुल अलग है — मैं दोस्तों के साथ भी रहता हूं, सिनेमा भी देखता हूं। क्या यह गलत है?

आप किसी के साथ रहो, चाहे सिनेमा देखो, पिक्चर देखो, किताबें पढ़ो, भ्रमण करो — आप कुछ भी देख रहे हो तो उससे कुछ सीख सकते हो। फिल्मों में भी चरित्र दिखाया जाता है, एक अच्छे का, एक बुरे का; आप उससे भी बहुत कुछ सीख सकते हो। एक ही घटना में दो बात घटती है, अच्छा और बुरा; आप क्या सीखते हो, वह देखो। बस ईमानदारी अपना लो, सत्कर्म अपना लो, बेईमानी का त्याग करो। आप कहीं भी घूम सकते हो, किसी के साथ जा सकते हो; बस उसमें ईमानदार रहो, किसी का साथ बेईमानी से मत करो। आप जैसे हो, उसे बता दो; अगर वह स्वीकार करता है तो उसका साथ ठीक है, नहीं तो बोल दो — मैं ऐसा हूं, और हूं तो हूं। क्योंकि मेरी समझ, मेरा कर्म ही मुझे लेके जाएगा; एक दिन यह साथ छोड़ के ही जाना पड़ेगा।

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गुरु जी, आपका सत्संग सुनती हूं, बहुत अच्छा भी लगता है, लेकिन जीवन में उदासी है। क्या करूं?

जीवन में उदासी है, तो वो क्यों है? उदासी के लिए आपने काम किया है। या तो पिछले कर्म याद आ रहे हैं, इसलिए उदास हो; या कुछ आपको बेईमानी से मिल रहा था, आपने बेईमानी छोड़ दी, ईमानदारी अपना ली और मिलना बंद हुआ, इसलिए उदास हो। उदासी का कारण जानो।

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(एक साधक की ओर से) सत्संग समझ में आ जाने के बाद अब घर पर मन नहीं लगता। क्या करें?

अगर घर पे मन नहीं लगता, तो देखिए आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, आपका परिवार है। क्या कोई आप पे निर्भर है? कल वे लोग मेरी जरूरत पर मेरे साथ थे। अगर उनको मेरी जरूरत है, तो उनका साथ सीधा नहीं छोड़ना चाहिए; धीरे-धीरे अपने कर्तव्य-दायित्व को निभाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि बात हमें समझ में आई है, उन्हें नहीं। देखो, क्या उनके जीवन में आपकी जरूरत है? ऐसा तो नहीं कि आपके जाने से उनका जीवन डांवाडोल हो जाएगा? तो उन्हें मजबूत बना के आओ — ऐसा मजबूत कि आपके आने के बाद वे अपनी जरूरत के लिए किसी के सामने हाथ ना फैलाएं।

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योगी जी, घर में बहुत जंजाल है। कृपया समाधान करें।

जंजाल नहीं है। उस जंजाल का निर्माण तो हमारे द्वारा ही हुआ है। आप उसे जंजाल मत कहिए, क्योंकि उसको बनाने के लिए आपने कितनी मेहनत की है। बस ईमानदारी, सत्कर्म अपना लीजिए।

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गुरु जी, आप "भाव" शब्द पर काफी जोर देते हैं। हम सांसारिक लोग भाव का अर्थ लगाते हैं कि कार्य करने का कारण क्या है। क्या भाव का यही अर्थ है?

हां, मतलब हम यह कार्य कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं? इस कार्य से सामने वाले का क्या होगा और मुझे क्या होगा? दोनों को देखना है, और दोनों को देखते हुए कार्य करना है।

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गुरुदेव, आत्मा को तत्व क्यों कहा गया है?

तत्व मतलब जिसका नाश नहीं होता। रूप का नाश होता है; रूप के पीछे तत्व है। तत्व का नाश नहीं होता, उसे तत्व कहते हैं।

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योगी जी, मैंने तीन दिन बाद की टिकट करवाई है। मुझे नहीं पता था कि कुटिया में 7 दिन रहना जरूरी है। क्या मैं तीन दिन के लिए आ सकती हूं?

नहीं। आप 7 दिन के लिए आइए। टिकट कैंसिल करा दीजिए और आराम से 7 दिन के लिए आइए, और पूरी तरह यहां के नियम का पालन करिए। (रहने वालों से) कोई नियम तोड़ता है तो उसे तुरंत भेज दो; समझौता मत करो। जब हमें पता है कि मुझे ऐसे करना है और फिर भी कहूं कि गलती हो गई, तो वह गलत बात है। कहा गया है — दया बिना संत कसाई, दया करी तो आफत आई; अपराध पर दया मत करो, नहीं तो उसके जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हो। यहां आने वाला अपना आधार कार्ड और पासपोर्ट फोटो लाए, पूरी तरह नियम में रह सके और उसे इस जगह की जरूरत हो, तो आए; अन्यथा मत आए। अगर लगे कि मेरे आत्मिक कल्याण में यह जगह, यह सत्संग सहायक है, तब आइए।

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गुरुदेव, मैं भारी परिस्थितियों से अपने आसपास के लोगों की अपेक्षा अधिक प्रभावित होती हूं। कई बार लगता है कि किसी दूर एकांत स्थान पर जाकर बस जाऊं, जहां मेरी पहचान किसी से ना हो। कृपया मार्गदर्शन करें।

बस के देखो ना। अगर ऐसा हो रहा है, तो एक बार जाओ।

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गुरुदेव, जो चीज जैसी है, उसको वैसी ही कैसे देखूं? मार्गदर्शन करें।

जब कुछ नहीं चाहिए, तो जैसा है वैसा देख पाओगे। जैसे आप दूर से एक दुकान पर फल देख रहे हो; किसी ने पूछा क्या है, तो आप कहोगे फल की दुकान है — अभी आपको फल ही दिख रहा है। जैसे ही लगेगा कि चलो ले लेते हैं, और दुकान के नजदीक पहुंचकर लेने लगोगे, तो कहोगे — यह कच्चा है, यह पक्का है, यह अच्छा है, यह सड़ा है; अनेक तरह की चीजें आ जाएंगी। तो "चाहिए" में जैसा है वैसा ना दिख के, आपकी जानकारी के अनुसार कुछ और दिखने लगता है। जैसा है वैसा तभी दिखेगा जब आपको कुछ नहीं चाहिए। और जब आप सत्कर्म करते हो, तब भी आप वर्तमान में, अपने आप में होते हो, क्योंकि सत्कर्म में इच्छा-अपेक्षा काम नहीं करती; इसलिए सत्कर्म के बाद इतनी तृप्ति और आनंद मिलता है। कोई गिरा और आपने उठा दिया — उतनी देर, जितनी देर आपने उसकी जरूरत में सहायता की, आप आनंद में थे। इसलिए अपने जीवन में ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो — सारे काम छोड़कर भोजन, और भोजन भी छोड़कर सत्कर्म, अगर इस भवसागर से निकलना है।

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गुरु जी, माता, बहन, पत्नी, पराई स्त्री, पिता और दोस्त के साथ कैसा व्यवहार करें और कैसा भाव होना चाहिए?

बस जरूरत में व्यवहार करो। जरूरत में बोलो, जरूरत में खाओ, जरूरत में पियो, जरूरत में साथ में रहो। फिर आप छूट जाओगे।

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गुरुदेव, एक आदमी मेरे 25 लाख रुपये लेकर भाग गया और मैं बहुत ज्यादा व्यथित हूं। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।

व्यथित होने से अच्छा है कि उस आदमी को खोज सकते हो तो खोजो, नहीं तो छोड़ दो। अगर 25 लाख ले भागा, तो जरूर आपको भी कोई गहरा आश्वासन मिला होगा, क्योंकि ऐसे कोई किसी को कुछ नहीं देता। जीव का स्वभाव है कि अगर वह किसी को कुछ दे रहा है, तो कहीं ना कहीं उससे ज्यादा मिलने की उम्मीद है। तो अब या तो उसकी खोज हो सके तो खोज करो, और नहीं तो भूल जाओ, बात खत्म करो।

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(कुटिया में नए साधक) मैं अभी नया आया हूं, मुझे यहां के बारे में कुछ पता नहीं। काम के लिए पूछना हो तो क्या मैं किसी एक व्यक्ति से बात कर सकता हूं?

हां, जो पहले से रह रहा है उसको पता है, उससे पूछ सकते हो; उसे नहीं पता होगा तो इतना तो बता देगा कि उनसे पूछ लो। काम को लेकर बात करो। लेकिन बात तब बढ़ती है जब पूछते हो — तुम कहां से आए? जैसे ही कहा कि तुम्हारे जिले से आया, उसे देख के खुशी होगी और बाकी लोगों को देख के घृणा आएगी। दूर प्रांत में आपके गांव का जानवर या आपके इलाके की नंबर प्लेट वाली गाड़ी भी दिख जाए तो गदगद हो जाते हो, बाकी इतनी गाड़ियां देख के नहीं — यह राग है, कितना अटैचमेंट है। उसके प्रति राग हो जाएगा और दूर वालों से द्वेष। तो आप कतई ऐसा मत पूछिए कि आप कहां से आए हो। गलती उसे कहते हैं जब आपको पता नहीं; पता होने के बाद नियम तोड़ा तो अपराध है।

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योगी जी, हम "अचाह" (कुछ ना चाहना) की भी तैयारी कर रहे हैं कि अपने आप में हो जाएं — मतलब यह इच्छा कर रहे हैं कि मैं अपने आप में हो जाऊं। क्या यह सही है?

तैयारी क्या? अपने आप में होने के लिए काम करो। ऐसा ना हो कि तैयारी में ही जिंदगी चली जाए। आप उसके लिए शुरुआत कर दो।

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गुरु जी, मैं तीन साल से ध्यान करती हूं, परंतु फिर भी दुखी हूं। घर से निकल नहीं पाती। मैं इस दलदल से निकलना चाहती हूं। कृपया मार्गदर्शन करें।

तो निकलिए ना। आपको निकलना होगा। इसमें मार्गदर्शन क्या? आप निकलिए।

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गुरु जी, अगर शिष्य पूर्ण रूप से गुरु की आज्ञा में हो, तो कब तक शिष्य आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है?

जब उसका राग और द्वेष पूरी तरह छूट जाएगा। गुरु की आज्ञा में रहने का मतलब है कि आगे का राग-द्वेष ना बने। अब पीछे उसने कितने लोगों से राग-द्वेष बनाया है — जब उससे पूरी तरह छूट जाएगा, तब उसे उपलब्धि हो जाएगी। यहां जितना भी नियम बनाया गया है, आपके लाभ के लिए है; नियम बिना कल्याण नहीं होगा, नियम में सधना ही पड़ेगा।

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योगी जी, आपका ज्ञान समझती हूं और उस पर चलने की कोशिश भी करती हूं, पर जो संकल्प करती हूं उस पर टिके रहना मुश्किल होता है। कभी-कभी परिस्थिति ऐसी बनती है कि गृहस्थी के हिसाब से रहना पड़ता है। ऐसे में क्या करें?

किसी भी हिसाब से रहिए। संकल्प करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि संकल्प आप करते हो तो विकल्प आ जाता है। तो आप सीधा ईमानदारी, सत्कर्म अपना लीजिए, सत्संग सुनिए। बस, बात खत्म; इसमें संकल्प की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

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गुरुदेव, आपने कहा कि संसार में रस अनंत है, खुद ही छोड़ना होगा। इसे समझाएं।

रस तो अपने तरीके में है। जैसे दो व्यक्ति बैठे हैं और एक व्यक्ति जा रहा है। एक ने शर्त लगाई कि वह गिर जाएगा, दूसरे ने कि नहीं गिरेगा। वह गिर गया तो जिसने कहा था गिर जाएगा वह खुश होगा, दूसरे को दुख होगा; नहीं गिरा तो उल्टा। तो रस अपने तरीके में है। ऐसा नहीं कि तुम प्राकृतिक स्वाद में फंसे हो — अपने तरीके के स्वाद में फंसे हुए हो। तो अपना तरीका छोड़ो और जरूरत में जियो। स्वाद के लिए भोजन ना करके शरीर के पोषण के लिए भोजन करो, कपड़ा तन ढकने के लिए पहनो, जरूरत में घर पर सामान लाओ। अपने मान के लिए सामान इकट्ठा मत करो; घर में 80% से ज्यादा चीजें ऐसे ही पड़ी रहती हैं। अपनी क्षमता और जरूरत से ज्यादा वस्तु रखोगे तो उसकी रखवाली करनी पड़ेगी, समय देना पड़ेगा — टेंशन ही टेंशन है, रात को नींद नहीं आएगी। तो जरूरत में जियो, अपनी क्षमता के अनुसार, बोझा मत रखो।

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गुरुदेव, माया के जगत में रहकर, माया से संयुक्त होकर मुक्ति कैसे संभव है? तीन लोक में जो भी दृश्यमान है, वह सब माया है। तो क्या आत्मसंयम, ईमानदारी — ये सब भी सांसारिक वस्तुएं हैं?

माया में रह के ही माया को छोड़ना है। अगर आप संसार को माया मान रहे हो, तो इसी माया में लोग आनंद में भी रहे। बस तुम अपने तरीके का त्याग कर दो। बात खत्म।

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गुरु जी, मैं आत्म कल्याण के लिए घर से निकल नहीं पा रहा हूं। मुझे अपने मन से डर लग रहा है कि मुझसे कोई गलत काम ना हो जाए। मार्गदर्शन करिए।

नहीं नहीं, गलत करो ही मत ना। (गलत) काम कैसे हो जाएगा? करो ही मत।

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गुरु जी, क्या हमें भी चार धाम, 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन जरूरी हैं?

अगर आपको मार्ग मिल गया और आपके पास समय है, तो भ्रमण भी करना चाहिए। भ्रमण करने से अपनी समझ विकसित होती है, क्योंकि हर जगह लोग अलग-अलग तरीके से जीते हैं; कभी भूख का सामना करना पड़ेगा, कभी रास्ता नहीं मिलेगा — तो हमारे अंदर मानवता जगती है। लेकिन भ्रमण समझने के लिए करें, बस व्यवस्थाओं का उपयोग करने के लिए नहीं कि दो महीना यहां रहे, एक महीना वहां। किसी से बात करें तो सीखने के लिए, समझने के लिए। जैसे यह नदी है — एक व्यक्ति इसमें स्नान करके प्रणाम करता है, एक इसका जल पीकर प्यास बुझाता है, एक इसमें कचरा फेंकता है, एक इसमें से मछली मारकर खा रहा है, और एक उसी जीव को खिलाकर अपना आत्मिक कल्याण चाहता है। नदी एक ही है; आपको क्या सीखना है, वह देख लीजिए। एक ही स्कूल से कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई कलेक्टर बनता है, कोई आवारा हो जाता है। दत्तात्रेय भगवान ने 24 गुरु माने, बनाए नहीं — घटना को देखते हुए ज्ञान लिया। आप में सीखने की क्षमता होनी चाहिए।

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(भ्रमण में) साथ में किसी को लेकर जाएं या अकेले जाएं?

अब वो आपके ऊपर है। अगर वह आपके मार्ग का मार्गी है, मिटने के लिए तैयार है, तब लेके जाना; नहीं तो बीच रास्ते में झगड़ा कर लेगा। मैं जूनागढ़ गया था; एक जंगल में ऊपर कोई महात्मा रहते थे, लोगों ने कहा मत जाइए, वहां तेंदुआ है। मैंने कहा मुझे भय ही तो खत्म करना है, मैं जाऊंगा। मेरे साथ मेरे गांव का एक व्यक्ति था। मैंने सोचा — मुझे कुछ हो जाए तो कोई फर्क नहीं, पर अगर इसे कुछ हो गया और मैं बच गया तो मैं जवाब क्या दूंगा? वह साधक भी नहीं था। तो मुझे वापस आना पड़ा। डर मेरे अंदर भी था, लेकिन उस डर में भी मैं आगे बढ़ रहा था; वापस आने का कारण वह व्यक्ति बन गया। भ्रमण का मतलब है — लौटूंगा कि नहीं, पता नहीं; यह भाव लेकर जाओगे तब भ्रमण का मतलब होगा। एकदम सुरक्षित, सारी व्यवस्था में चलोगे तो भ्रमण नहीं, पिकनिक हो जाएगा। भ्रमण अव्यवस्था में होता है।

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(कुटिया में साधक) कल मेरे मन में भाव आ रहा था कि मैं (नर्मदा) परिक्रमा कर लूं। पर लगता है यह जगह, आपका सान्निध्य छूट जाएगा।

अब देखो आपको लाभ किसमें होगा। अगर आपको लग रहा है कि इससे ज्यादा लाभ भ्रमण में होगा, तभी इसको छोड़ो। आप अपना लाभ देखो कि मेरा कल्याण किसमें है। जीव-जंतु सबको अपना हित पता है — चूहा उतना ही बिल बनाता है जितने में बिल्ली ना जाए। जब एक जगह को छोड़ो तो कभी भी ज्यादा के लिए ही छोड़ना, और बहुत सोच-समझ के छोड़ना, कम के लिए कभी मत छोड़ना। भ्रमण इंद्रियों के सुख के लिए — अलग-अलग भोजन, अलग-अलग लोग, गप्पें — नहीं; जिस उद्देश्य से भाव हुआ, उसी उद्देश्य से करो, उसके अलावा और कोई बात ना करना। अपने मान के लिए, अपना बैकग्राउंड बताने के लिए भ्रमण मत करना; सीखने के लिए करना। यह जगह तो रहेगी, भ्रमण करके आओगे तो भी रह सकते हो। अगर लग रहा है, तो कर लेना चाहिए, ऐसा ना हो कि इच्छा ही रह जाए।

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गुरु जी, अपराध हो जाने के बाद हमें क्या करना चाहिए?

अब अपराध के बाद (फिर) मत करो। दोबारा मत करिए, बस। और क्या?

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गुरु जी, मेरा बेटा 12वीं में है। मैं उसकी पढ़ाई के लिए पिछले 5 साल से कहीं नहीं गई। क्या अब बाहर की दुनिया समझने के लिए निकल जाऊं? बेटा अभी 17 साल का है।

कोई बात नहीं, उसकी व्यवस्था करके एक हफ्ते के लिए शुरुआत करिए। एक हफ्ते के लिए निकलो। एक हफ्ता तो कोई भी देख लेगा, और घर में (लोग) होंगे।

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गुरुदेव, मैं एक महीने से नियमित साधना और ध्यान कर रहा हूं। इस दौरान मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली जैसी गर्माहट और शरीर में चींटियां चलने का निरंतर अनुभव हो रहा है। कृपया मार्गदर्शन करें।

होने दो। आप अपना काम करते रहिए।

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गुरु जी, आज्ञा चक्र जागृत होने की स्थिति में मुझे क्या सावधानी बरतनी चाहिए और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

ईमानदारी मत छोड़ना।

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गुरु जी, आत्मा जीव भाव में आ गई है; जैसे-जैसे बाहर से छूटेंगे, अपनी तरफ आ रहे हैं। तो ये कल्पनाएं हमको कौन ले जा रहा है? जीव ले जा रहा है?

जीव के पीछे तुम ही हो। सबके पीछे तुम ही हो। हाथ के पीछे तुम हो तो उंगली के पीछे भी तुम ही हो; ऐसा नहीं कि हाथ के पीछे कोई और है और पैर के पीछे कोई और। सबके पीछे तुम हो, और तुम ही आखिरी फैसला करते हो कि मुझे क्या चाहिए। तो देख लो कि मुझे क्या चाहिए, और उसके लिए काम करो। कुछ भी होता है तो "मैं" ही चाहता है, "मैं" की ही आज्ञा है।

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गुरु जी, क्या यह "मैं" भ्रमित कर रहा है?

नहीं, भ्रमित कोई नहीं कर रहा है। भ्रमित होने में ही बड़ा मजा आता है — तुम्हें ही भ्रमित होने में बड़ा मजा आता है।

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गुरु जी, आत्मा की झलक हमको कब मिलेगी?

जब "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओगे, अपने आप में स्थिर हो जाओगे।

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(कुटिया में साधक) घर पर जो पुरानी आदत थी, उसके विचार यहां तीन-चार दिन से नहीं आ रहे, बस सपने में आते हैं; घर पर वह विचार खींच लेता था। ऐसा क्यों? और वहां जाकर कैसे बचूं?

कोई बात नहीं। यह यहां की ऊर्जा, यहां के सत्संग का प्रभाव है। तो आप वहां भी जाना तो वैसे ही रहना। अगर आपको लग गया कि यह चीज मुझे नुकसान दे रही है, तो मत करना; कुछ भी आए — नहीं करूंगा। करना या ना करना, सब तुम्हारे ऊपर है। अगर तुम मेरे शब्दों में जी रहे हो, तो मैं तुम्हारे साथ हूं; तो तुम गंदी आदत में जाना ही मत। अगर तुमने अपने जीवन में मेरे शब्द अपनाए हैं और तुम उस तरफ नहीं जाना चाहोगे, तो तुम्हें कोई नहीं ले जा सकता, क्योंकि उन शब्दों के पीछे मैं भी हूं। आप अगर इन शब्दों में जिओगे, तो मुझे पाओगे। वह (आदत) कोशिश करेगी, तुम करना ही मत; उसकी कोशिश से थोड़ी ना हुआ था, तुमने भी कोशिश की थी तभी हुआ।

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गुरु जी, ऐसा कौन सा कर्म करें जिसमें आत्मा स्थिर हो जाए?

बस ईमानदारी से कर्म करो, और सत्संग रोज सुनना — जैसे रोज भोजन करते हो, वैसे ही रोज सत्संग सुनना।

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मेरी उम्र 32 साल है और मुझे साधना के अलावा किसी और चीज में रुचि नहीं दिखती। मेरी फीलिंग जीरो हो गई है, किसी बात की फीलिंग नहीं आती। कभी-कभी लगता है कि मैं जिंदा हूं या नहीं। मुझे क्या करना होगा?

बस जरूरत में जियो, और कुछ नहीं। और सामने वाले की भी जरूरत समझो, ऐसा नहीं कि सिर्फ अपनी जरूरत। आप जहां हो, जिसके साथ हो, उसकी भी जरूरतें हैं; अपनी योग्यता अनुसार उसकी भी सहायता करिए।

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गुरु जी, मेरी पढ़ाई व शारीरिक समस्या को लेकर तंत्र-क्रिया, हवन आदि करने-कराने वाले बताते हैं। कई बार उनकी मानने पर कुछ आराम भी लगता है, फिर समस्या दोबारा घेर लेती है। पूर्ण समाधान बताइए।

बस ईमानदारी, सत्कर्म अपनाकर सत्संग सुनो। आपका कल्याण हो जाएगा। आपको कोई तकलीफ नहीं होगी।

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गुरुदेव, क्या मैं अपने कल्याण के लिए बूढ़े मां-बाप को त्याग दूं? मैंने शादी भी नहीं की। आप मेरा मार्गदर्शन करें।

नहीं, आप उन्हें नहीं त्यागिए। अगर उनका कोई सेवा करने वाला है तो ठीक है; नहीं तो आप वहां पे रहकर उनकी सेवा करते हुए अपना आत्मिक कल्याण करो। आप 11 महीने उनको समय दो, एक महीने के लिए यहां आओ। अगर (उन्हें आपकी) जरूरत है तो एकदम मत आओ; सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो।

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गुरुदेव, अपने अंदर की सफाई कैसे करें?

गंदगी कैसे की है, आपको यह समझना पड़ेगा। बेईमानी, दुष्कर्म करके गंदगी की है, तो ईमानदारी, सत्कर्म अपना कर सफाई करो।

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