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प्रश्नोत्तर P14-0078 · भाग 14

गुरु जी, "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" — इसका थोड़ा विश्लेषण कीजिए।

छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — अगर यह हम करते हैं तो संसार में ग्रसित हो जाते हैं, इनसे हमें निकलना है। हम बुरा कर्म करके अपवित्र हुए, तो अब सत्कर्म करके, जिस लायक हैं धन से, तन से, ज्ञान से बिना इच्छा-अपेक्षा की निष्काम सेवा करके अपने आप को निर्मल, पवित्र कर सकते हैं। शुरुआत वर्तमान में यह करनी है कि कर्म करते हुए किसी भी प्रकार के लालच में, दबाव में, संकोच में, मान के चक्कर में, कुछ बनने के चक्कर में, अपने तरीके के चक्कर में आके मुझे छल-कपट आदि नहीं करना है। मान की इच्छा का, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का, अपने तरीके से कुछ चाहिए — इसका त्याग कर दें। आप संसार में नहीं फंसे, आपके द्वारा जिस संसार का निर्माण हुआ है उसमें फंसे हैं। जो बिना मतलब का कर रहे हो, जिससे अपवित्र हो रहे हो, वह बंद कर दीजिए, जरूरतमंदों की सेवा करिए; जब पूरी तरह निर्मल-पवित्र हो जाएंगे तो जीव का नाश होगा और आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा।

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वीडियो: ईश्वर सर्वव्यापी है इसका क्या मतलब है / #ईश्वर #सर्वव्यापी · 2024-04-10