नहीं भाई, पांच इंद्रियों का प्रयोग नहीं करना है — आंख का, कान का, नाक का, जीभ-मुंह का और त्वचा का। अब यह देखना है कि आप अतीत की बातों को लेकर गलत सोच रहे हो, या अभी नया उठा रहे हो कहीं से — आंखों के द्वारा, नाक के द्वारा, मुंह के द्वारा या त्वचा के द्वारा। यह देखना है कि मैं पिछला सोच रहा हूं — उस पर आधार है, बेस है — या अभी नया-नया ले रहा हूं, किताबों से ले रहा हूं। वो आपको देखना है। अतीत में जो सीखा है, वह बसा है; अतीत वाला होने दो, आगे आप मत भरो। अतीत के ज्ञान को उठाकर सोच रहे हो तो अभी इंद्री उपयोग नहीं हो रही; पर आप बाहर से भरोगे, तो उस पर प्रतिक्रिया मत दो।
कुछ तो कमी है ना आपके अंदर, तो मैं इसीलिए कह रहा हूं, आप आ जाओ। अगर कोई बीमारी है तो हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ेगा। ऐसे कोई नॉर्मल बुखार वगैरह है तो टेबलेट ले लो, घर पे खा लो। लेकिन अब पता चला कि अंदर कोई फोड़ा है, ऑपरेशन हो रहा है, तो आईसीयू में एडमिट होना पड़ेगा। तो आप एक काम करो, अपनों की कुटिया में चले आओ, कुछ समय रहो।
मैं तो कहूंगा, अपनों की कुटिया मध्य प्रदेश में भी हो गई — अदलपुरा, खरगोन जिला, इंदौर के पास — और हरियाणा में भी हो गई, यमुनानगर के पास। तो आप 12 महीने में एक महीना अपने आप को दो। और फिर जब आप अपना दायित्व, कर्तव्य, जिम्मेदारी पूरी कर लो, तो आप पूरी तरह आ जाओ। यह मैं आप ही लोगों के लिए व्यवस्था कर रहा हूं।
कोई बात नहीं। मैं तो आपको कहूंगा, आप जीवन में बस ईमानदारी, सत्कर्म अपना लो, सत्संग अपना लो, जीवन में आगे बढ़ो। 12 महीने में एक महीना अपनों की कुटिया में आकर एकांतवास में रहो, आकर अपने आप को समझने का प्रयास करो। यह आप ही लोगों के लिए मैं इतनी मेहनत कर रहा हूं।
ऐसा नहीं है। मेरा बस चले ना, तो हर वक्त आप लोगों से बातें करूं। आपने देखा है, पिछले जब मैं एक साल तक सेवक रूप में रहा, तो मैं बता दूं — 16-16, 18 घंटे मैंने सत्संग किए हैं, और खुद बनाना, खुद खाना, बर्तन मांजना, कंस्ट्रक्शन का काम कराना, पूरे आश्रम की देखभाल करना, सारा काम करना। कभी-कभी आंसू भी आ जाते थे, कभी-कभी ऐसा होता कि शरीर गिर जाएगा, लेकिन बाहर कभी जाना नहीं था। तो अब इतना काम हो गया है — आप देख ही रहे हो, प्रत्यक्ष सब आपके सामने है। यहां जमीन खोजना, फिर जमीन लेना, फिर बाउंड्री करना, काम के बाद फिर पैसे की व्यवस्था — सब करना पड़ता है ना।
ध्यान से हर काम को करिए। जब आप कोई काम कर रहे हैं, तो इतना ध्यान रखिए कि बेईमानी न हो — आपका स्तर उठता ही जाएगा। कोई भी काम आप कर रहे हैं — देख भी रहे हैं, चल भी रहे हैं, उठ रहे हैं, बोल रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं — बस इतना हो कि ईमानदारी हो, बेईमानी न हो। इसका विशेष ध्यान रखें। यह जिंदगी मिली है, मानव तन पाए हो, कुछ करके निकल लो। जाते-जाते कुछ कर जाओ।
देखिए, वहां किसी के लिए व्यक्तिगत काम नहीं करना पड़ता है। अपनों की कुटिया में आने के बाद शुरू में एक दिन से सात दिन रहना अनिवार्य है; 7 दिन के ऊपर आप आजीवन भी रह सकते हैं। अपनों की कुटिया में पेड़-पौधे लगे हैं — इन पेड़-पौधों को पानी देना पड़ सकता है, घास निकालना पड़ सकता है। और जहां आप रहते हैं, उसकी साफ-सफाई आप ही को करनी है। बस यही काम है। खुद बनाकर खाना है — साधकों को मिलकर बनाना है।
निशुल्क है; पोस्ट में जाइए, सारी जानकारी मिलेगी। यह निशुल्क व्यवस्था है, और यह स्पेशल साधकों के लिए है — सत्य के खोजियों के लिए है। पूरी तरह नियम में रहना पड़ेगा, और नियम इतना ही है कि अपनों की कुटिया के दायरे में रहना है। मोबाइल स्विच ऑफ हो जाएगा; आप अपने घर पर बता दीजिए, फिर जितने दिन आप रहोगे, बातचीत नहीं हो सकती। और आपको आत्मिक चिंतन करना है।
देखिए, अब आप एक बात बताइए — अगर समझा नहीं होता, तो बोलते कैसे? किसी ने समझा, देखा, तभी तो उसके बारे में बोल रहे हैं। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है वह — इसका मतलब किसी ने उसके ऊपर उठकर देखा है। देखा है तभी तो बोला; मिला है तभी तो कह रहा है। नेति-नेति मतलब सब वही है, वही है — पर कहना बड़ा आसान है, उस तक पहुंचना आसान नहीं है।
ऊर्जा सिर्फ सात्विक है। अब वह तामसी-राजसी बन जाती है — आप जैसा कर्म करते हो, उसका जैसा उपयोग करते हो। जैसे दो आदमियों ने मेहनत की; एक ने उस पैसे से घर-परिवार के लिए राशन लिया, एक ने शराब पी — उसने नेगेटिव ऊर्जा बना दी। उसका परिणाम उसे तकलीफ देगा — दारू पीने वाले को, नशा करने वाले को; और जो राशन लेकर गया, उसके घर में पॉजिटिव ऊर्जा रहेगी। तो सात्विक ऊर्जा मेन है, और आप जिस तरीके से उपयोग करते हो, तामसी-राजसी बन जाती है। उपयोग के ऊपर है।
भूत-प्रेत होते हैं तो क्या होगा, नहीं होते हैं तो क्या होगा? मैं जंगल में पड़ा हूं — होते हैं तो क्या हो जाएगा, नहीं होते तो क्या हो जाएगा? अगर मैं ईमानदार हूं, सत्कर्मी हूं, तो भूत-प्रेत भी होते होंगे तो मेरे काम में सहायता करेंगे। सीधी सी बात है।
दो दिन के लिए नहीं, 7 दिन के लिए आना पड़ेगा, और आकर महसूस करो — क्या बोलूं? अगर मैं काम कर रहा हूं, तो कुछ विशेष है तभी लगा हूं। ऐसा होता कि बस आश्रम बनाना है — आश्रम तो लाखों हैं, तो फिर आश्रम की क्या जरूरत है? नहीं, अब आश्रम बना रहा हूं तो इसमें कुछ विशेष बात है, कोई मकसद है, कोई उद्देश्य है इसके पीछे। उस पर मैं काम कर रहा हूं।
वो आपके ऊपर है। आप एक सप्ताह में क्या करते हो, वो आपके ऊपर है। मैं आपको एकांतवास दे सकता हूं, सत्संग दे सकता हूं, आपके प्रश्नों के उत्तर दे सकता हूं, आपको व्यवस्था दे सकता हूं; अब आप क्या कर सकते हो, आपके ऊपर है।
पढ़ाई करने के बाद कभी तो काम करोगे — कोई बात नहीं है। मैं विद्यार्थियों को नहीं बोल रहा हूं; जितने लोग कामकाज करते हैं, जिनकी इनकम है, जिनका व्यापार है, उनको बोल रहा हूं। जैसे परिवार में बच्चे पढ़ रहे हैं, और पढ़ते हुए बच्चों से अगर बाप बोले कि अब मुझे दो, तो वह बाप गलत हो जाएगा। हां, बच्चे पढ़ाई करके काम पे लग गए, तब उन्हें पिता-माता को सपोर्ट करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने आपके लिए किया है। तो अभी आपको करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप पढ़ाई कर रहे हो, सत्संग सुन रहे हो, सत्संग से लाभ हो रहा है। आने वाले समय में यह शरीर रहे या न रहे, जब आप योग्य हो जाना, तो ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा और सत्संग अपनाकर अपना कल्याण करना। जहां भी रहना, जरूरतमंद की सेवा करना — तो समझ लीजिए कि आप प्रत्यक्ष ज्ञान की भरपाई कर रहे हो।
डांट लगाना मेरा काम है। आप जिसके लिए आए हो, अगर वह नहीं करोगे, तो आपको डांटेगा कौन? अगर आप कर सकते थे, तो घर पे ही कर लेते। या तो आप खुद पे अनुशासन करो, या आप पर अनुशासन करने वाला चाहिए। तो जो जिस लिए आता है, अगर वह नहीं करता, तो मुझे डांट लगानी पड़ेगी ना, नहीं तो मैं यहां क्या करूंगा? अगर आप यहां आकर प्रपंच करने लगे, तो उसका जिम्मेदार मैं होऊंगा, आप थोड़ी न होंगे। तो डांट तो लगाऊंगा।
लेनदेन पूरा करो, निकल लो। लेनदेन बिना किए मोक्ष नहीं होने वाला। अगर आप ईमानदारी से लेनदेन कर रहे हैं, तो लेनदेन पूरा हो रहा है; और अगर आपके लेनदेन में बेईमानी है, तो आप और बंधनों में फंस रहे हैं।
नहीं। अगर आप योग में हो — उठो या न उठो — तो अगला शरीर मानव का मिलेगा। जब तक जीवन में योग है, तब तक मानव शरीर मिलता रहेगा; और जीवन में सिर्फ भोग है, तो फिर भोग शरीर मिल जाएगा।
मैं आंख बंद करने के बाद यह देखता हूं कि मैं क्या कर रहा हूं और क्या बोल रहा हूं — मैं आत्मिकता से क्या करता हूं और आत्मिकता से क्या कह रहा हूं; क्या यह दोनों, बाहर का और अंदर का, एक जैसा है? जितना मैं लाइव में बोल रहा हूं, क्या मैं आप लोगों के लिए कर भी रहा हूं? जितना आश्वासन मैं आप लोगों को दे रहा हूं, क्या मैं उस लायक हूं, क्या मैं उसे पूरा करूंगा? ऐसा तो नहीं कि बस वीडियो बना दिया — मुंह से कुछ और, काम कुछ और? ऐसा तो नहीं कि आपकी भावनाओं के साथ मैं खिलवाड़ करूं? तो मैं आंख बंद करके यही सब सोचता हूं, कि मैं जितना अपने मुंह से कह रहा हूं, एक-एक शब्द का जिम्मेदार मैं हूं, और एक-एक शब्द की जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाऊंगा। यह वादा आप लोगों से नहीं, मेरा मुझसे है — कि मुझे जितना बोलना है, उतना करना है। अगर मुझसे नहीं होगा, तो मैं मना कर दूंगा कि मैं यह नहीं कर सकता।
देखिए, यहां एक कण भी है ना, तो वह परिवर्तनशील है, लेकिन वह है। अगर आप किसी को शरीर मानते हो, तो भी वह इस ब्रह्मांड में है; और अगर आप शरीर से परे भी किसी को मानते हो, तो वह भी है। यहां परिवर्तनशील संसार है, न कि नष्ट होता है — रूप का नाश होता है, तत्व का नहीं।
मेरा कहना है कि अंदर नहीं, बाहर देखो कि आप क्या कर रहे हो। अंदर क्या है, बताओ? आपका अतीत, और यह हाड़-मांस का पिंजड़ा। तो अंदर क्या देखोगे? आप बाहर देखो, आपके द्वारा हो क्या रहा है।
मुझे कभी दुख था ही नहीं — न घर का, न बाहर का। मुझे कुछ करना था। अगर आज मैं कुछ कर रहा हूं, तो यह मेरा शौक था कि मैं समाज के लिए कुछ कर पाऊं; मुझे लगा इसकी जरूरत है, तो यह मैं कर रहा हूं। यह मेरा शौक है।
यह तो जैसा-जैसा कर्म किया है जीवन में, वहां पहुंच जाएगी। अच्छे कर्म किए होंगे तो अच्छा मिलेगा; बुरे किए होंगे तो वो भोगने पड़ेंगे। कोई सीमा पार करनी है, तो गलत काम करके जाओगे तो सीमा पार नहीं करने दिया जाएगा, चाहे जिसका भी नाम लो। और तूने सही काम किया है, गलत काम नहीं किया है, तो सीमा पे तुझे कोई रोक ही नहीं सकता — नाम लेने की ज़रूरत ही नहीं है। खोटे काम करके सीमा पे जाकर राम का नाम बताएगी, तो थोड़ी न सीमा पार हो जाएगी? और तू सही काम की होगी तो किसी के नाम की जरूरत नहीं; तूने क्या किया है, उससे सीमा पार होगी। अब तूने परोपकार किया कि नहीं, सत्कर्म किया कि नहीं — अगर बेईमानी की होगी तो सीमा पार नहीं जाएगी, और ईमानदारी-सत्कर्म से जी होगी तो सीमा पार हो जाएगी। बेईमानी की होगी तो भुगतना पड़ेगा। बस, नाम का कोई मतलब नहीं है।
बस इतना कर कि तूने क्या किया है — सब तुझे दिख रहा है पीछे। अब तू अगर उद्धार वाला काम की है, तब तो कुछ करने की जरूरत नहीं है ना। और अगर लग रहा है कि मैंने जितना कर्म किया है उससे उद्धार नहीं होगा, तो यह भाव रख कि मैं अगला शरीर धारण करूंगी तो अपने उद्धार के लिए काम करूंगी। बस इसी पे चिंतन कर। परमात्मा से यह कह कि अब जो अगला शरीर मिले, उसमें मैं पार हो जाऊं। अगला शरीर सबको मिला है, तुझे भी मिलेगा। और इसमें अगर पार वाला काम कर दिया है, तो बोलने की भी जरूरत नहीं — जैसे कर्म किए हैं, उसी हिसाब से जगह मिल जाएगी, शरीर मिल जाएगा।
कृपा ही तो है — इतने नजदीक आ गए। अब इस कृपा को अपनाकर तुझे निकलना है ना। कृपा तो हो ही गई, तभी तो इतने नजदीक आ रहे हो; लेकिन तू दूर मत हो। सामने अब कुछ खड़ा न हो — न मान का चक्कर, न लोभ का चक्कर, न बड़ा बनने का चक्कर। बस अब निकल जा। जिस उद्देश्य को लेकर जन्म लिया है, उस पर काम कर ले। मार्ग भी मिल गया है, समझ भी काम कर रही है; अब तुझे पूरी तरह काम करना है। और काम तब कर लेगा, जब मान और लोभ के चक्कर में नहीं पड़ेगा। मान को खड़ा मत होने देना, लोभ को खड़ा मत होने देना। ऐसा नहीं है कि खड़े नहीं होंगे — खड़े होंगे, लेकिन इन्हें पहलू मत देना।
जिस चीज के लिए लोभ पैदा हो, उस पर काम ही मत करो। लोभ पैदा होते ही मार दो, खत्म हो जाएगा — उसे प्रतिक्रिया मत दो। प्रतिक्रिया दोगे तो पछताओगे; फिर लोभ, फिर प्रतिक्रिया, फिर पछतावा — तो कुछ नहीं होगा। लोभ पैदा होगा, मान पैदा होगा, लेकिन मुझे उसे सहायता नहीं देनी है। जिसके लिए लोभ पैदा हो, वो मुझे अब नहीं चाहिए; जिसके लिए मान पैदा हो, वो मुझे नहीं चाहिए। कोई भी वस्तु आए, तो पहले मैं अपने लिए सोचता हूं — यह मुझे प्रैक्टिकल में नहीं लाना है। अपने लिए नहीं देखना, दूसरे के लिए पहले कर देना; जो मैं अपने लिए चाहता हूं, वो दूसरों के लिए करूं। और अगर मैं कुछ चाहता हूं, तो मैं उसका क्या उपयोग करूंगा, क्या मेरी योग्यता है, मैं उसे कैसे हासिल करूंगा — क्या पूरी ईमानदारी से हासिल होगा? तब तो सदुपयोग करूंगा; बेईमानी से हासिल करूंगा तो दुरुपयोग होगा और मेरा पतन हो जाएगा। भाव ही मेन है, भाव के पीछे तुम हो। अगर यह शरीर हटा दिया जाए, तो इस संसार के लिए मैं कुछ नहीं हूं। तो 'कुछ नहीं' में जीना है, और 'कुछ नहीं' में तभी जी पाओगे जब मान और लोभ को हटा दोगे — इसको वैल्यू ही मत दो। ये खड़े होंगे, क्योंकि मान-लोभ के चक्कर में तो मेरा जन्म हुआ है, लेकिन इनको सहारा नहीं देना है। जरूरत में जीते हुए, ईमानदारी से जीते हुए, अपनी योग्यता के अनुसार जीते हुए, कैसे भी अपने आप को निकाल लेना है।
बस — समय और ज्ञान बहुत कम लोगों को मिलता है; समय भी है, समझ भी है, ज्ञान भी मिल गया, अब कुछ बचा नहीं है। बस ज्ञान को धारण करना है। ज्ञान को धारण कर लिया, तो इसका मतलब गुरु को धारण किया। गुरु शरीर नहीं है, गुरु ज्ञान का प्रतीक है। पूरी पृथ्वी पर पानी एक ही जगह से आता है, दो जगह से नहीं — निमित्त अनेक होते हैं, लेकिन स्रोत एक ही है। वैसे ही भिन्न-भिन्न शरीरों से ज्ञान आता है, लेकिन उसके पीछे गुरु एक ही है; गुरु कभी दो नहीं होता। जिस शरीर से ज्ञान निकल रहा है, उसका मैं सम्मान करूंगा, लेकिन धारण गुरु को करूंगा। अगर मैंने ज्ञान को धारण कर लिया, तो गुरु को धारण कर लिया, और अब मैं निकल जाऊंगा — अब मुझे कोई रोक नहीं सकता। इसमें गुरु की कृपा भी होती है — गुरु ने ज्ञान दे दिया, यही कृपा है।
जो अच्छा लग रहा है, वही बाद में बुरा लगता है; उसी से तकलीफ है। रस लेने के बाद पीड़ा कितनी? तो रस किसने लिया? अगर सुख था तो दुख क्यों आया — सुख तो बढ़ना चाहिए ना? जो मुझसे दूर था, वो मेरे पास आ रहा था तो मैं सुखी महसूस कर रहा था; जब पूरी तरह पास आ गया, तो उसके बाद फिर दुखी क्यों? क्योंकि मुझे परम सत्ता चाहिए; ये तो शरीर तक थे, यहां का खेल शरीर तक है। हम तो धोखे में फंस गए। जिससे सुख है, उसी से दुख है; अगर सुख नहीं तो दुख नहीं — जिससे सुख लिया है, वही दुख का कारण बनेगा। सुख लेने की इच्छा छोड़ दो, बस एक ही इच्छा रखो कि मैं निकल जाऊं। मैं कुछ भी कर रहा हूं तो निकलने के लिए — उसमें सुख मिल रहा है, दुख मिल रहा है, मुझे मतलब नहीं; हर स्थिति-परिस्थिति में मुझे निकल जाना है। अगर मुझे लग रहा है कि यह करने से मैं निकल जाऊंगा, तो मैं निकल जाऊंगा, कोई रोक नहीं सकता; लेकिन अगर मुझे नहीं लगा, तो फिर कोई निकाल नहीं सकता। बात सिर्फ मेरी है — मुझे समझ में आना चाहिए। जितना गहरा सुख, उतना गहरा दुख। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से मैं परे हूं; मुझे इस रूप-रंग के चक्कर में नहीं पड़ना है, नहीं तो भिन्न-भिन्न रूपों में, भिन्न-भिन्न शरीरों में ऐसे ही भटकता रहूंगा।
जब समझ लेगा, तो कोशिश नहीं करनी है। कोशिश कर रहा है, इसका मतलब समझ में नहीं आया। जब हमारे पास ताकत है, तो मैं कोई वस्तु सीधा उठा दूंगा; कोशिश कर रहा हूं, ज्यादा बल लगा रहा हूं, तो इसका मतलब मेरी ताकत अभी उससे कम है। समझ गया, तो प्रयास खत्म। जैसे आंख पर कुछ भी आता है तो पलक अपने आप झपक जाती है, मुझे झपकाना नहीं पड़ता — ऐसे ज्ञान समझ में आ जाएगा, तो जैसे ही कुछ करने जाएगा, ज्ञान अपना काम कर देगा। अगर हम बंधनों से छूटने का प्रयास कर रहे हैं, बेईमानी छोड़कर ईमानदारी अपनाना चाहते हैं पर अपना नहीं पा रहे, तो इसका मतलब अभी पूरा समझ में नहीं आया। जिस दिन समझ में आ जाएगा, वो एकदम ईमानदार, सत्कर्मी बन जाएगा, क्योंकि इसी के लिए तेरा जन्म हुआ है।
हमें बस जरूरत में उपयोग करना है। अगर गाड़ी में कोई सिस्टम लगा है, चाहे हॉर्न हो, और मुझे लगता है कि अब आवश्यकता है, इसके बिना नहीं चलेगा, तो उस समय उपयोग करना चाहिए। लेकिन मैं गाड़ी में हूं और बेमतलब का बजा रहा हूं, तो इससे मेरे अहंकार को पोषण मिलेगा। हमें देखना है कि कोई भी संसाधन प्रबल जरूरत में ही उपयोग करना है।
गुरु तो ज्ञान का प्रतीक है। इस शरीर के लिए हमने कितने पात्रों में पानी पिया और कितने पात्रों में भोजन किया, याद है? अब अगर मैं संकल्प ले लूं कि एक ही पात्र में खाऊंगा, एक ही पात्र में जल पीऊंगा, तो कितनी तकलीफ होती। मुझे तो भोजन से, पानी से मतलब है, पात्र से क्या लेना-देना? मेरी प्यास पानी से बुझेगी, भूख भोजन से शांत होगी, पात्र कैसा भी हो। तो मुझे शरीर नहीं देखना है; जिस रूप-रंग का नाश होगा, उसे पकड़ लिया तो क्या? गुरु एक है, दो कभी हो ही नहीं सकता, और बिना गुरु सत्ता को धारण किए तुम्हारा कल्याण नहीं होगा। जैसे कोई पद पर था और रिटायर हो गया, उस पद पर कोई और बैठ गया, तो जो पद पर बैठा है उसकी साइन चलेगी — जो गया उसकी साइन लेकर बस पेपर लेकर घूमते रहो। इसलिए तो कहा गया, जीवंत गुरु खोजो, पहुंचा हुआ। जो पहुंचे, उन्होंने भी जीवंत गुरु को धारण किया, तभी पहुंच पाए; तो तुम्हें भी जीवंत गुरु को धारण करना पड़ेगा। हर काल, देश, परिस्थिति में गुरु मौजूद है — प्यासा मौजूद है तो पानी मौजूद है। तुम खोद नहीं पा रहे हो, वो तुम्हारी कमी है; 100 फीट पर नहीं, तो 1000 पर होगा, 2000 पर होगा। इसीलिए कहा गया, भ्रमण करो, तुम्हें गुरु मिल जाएगा, बस तुम उस लायक हो जाओ। जब मैं उसके शब्दों को धारण करूंगा, तब पहुंच जाऊंगा। एक ही व्यक्ति है जो आपको पहुंचा सकता है — वो आप; और एक ही व्यक्ति है जो आपको रोक सकता है — वो आप।
मेरे प्रत्यक्ष मार्ग पे वही चल रहा है, जिसने ईमानदारी को पूरी तरह धारण कर लिया। जब धारण नहीं किया, तो गुरु को अपनाया ही कहां? फिर गुरु तुम्हारे साथ कहां है? तब तो एक भ्रम है। जब तू पूरी तरह ईमानदारी अपना लेगा, तब वो तेरे साथ है; उसी में परीक्षा होगी, उसी में सब कुछ आ जाएगा। धीरे-धीरे क्यों? उस परम स्थिति में मैं इसी शरीर में रहूं ना। अगर कल होना है, तो आज क्यों न हो जाए — कम से कम मैं उस परम स्थिति में जिऊंगा। धीरे-धीरे नहीं, जितनी जल्दी हो सके; कैसे भी अपने आप को पार करा लो।
अपने ऊपर विश्वास का क्या? जैसा कर्म करोगे, वैसा परिणाम आएगा ना। अपने ऊपर विश्वास करने से क्या होगा, आप बताओ? तो मेन कर्म है। जैसा आप कर्म करते हो, वैसा आपको परिणाम मिलने वाला है। मैं तो ठीक ही रहूंगा, इसलिए कि मुझे कर्म पर बहुत भरोसा है — मैं कर्म के सिद्धांत को मानता हूं कि व्यक्ति जैसा करेगा, वैसा परिणाम उसे मिलेगा।
एकदम प्रत्यक्ष है। मैंने प्रत्यक्ष मार्ग ढूंढा, क्योंकि मार्ग तो बहुत सारे थे, लेकिन किसी मार्ग से किसी का पहुंचना मैं देख नहीं पा रहा था — यह मुझे समझ में आया, क्योंकि मेरी भी खोज थी। लोग बड़ी आसानी से कहते थे — मौन हो जाओ, कर्ता का भाव छोड़ दो, समर्पण कर दो, राग-द्वेष, इच्छा-अपेक्षा छोड़ दो। अरे भाई, ठीक है, पर व्यक्ति छोड़ना तो चाह रहा है, लेकिन छोड़े कैसे? करे कैसे? तो फिर मैंने कहा, प्रत्यक्ष मार्ग ढूंढो।
कर्म करते रहो ना। अगर घूमने की इच्छा है और आप सामर्थ्यवान हो, तो घूम भी लो। देखो कहां घूमने का मन कर रहा है, और क्यों घूमना चाहते हो, उससे होगा क्या? देख लो किस उद्देश्य से जा रहे हो। अगर भ्रमण की इच्छा है तो निकल लो, पर आपको यह देखना है कि आप किस उद्देश्य से निकले हो, क्या करना चाहते हो, क्या आपके जीवन का लक्ष्य है। यह आप देख लो।
ऐसा नहीं है। आप 24 घंटे बच्चों की सेवा में लिप्त रहती हो क्या? अरे भाई, कुछ समय तो मिलता है — 24 घंटे में कम से कम 2 घंटा तो मिलता होगा। 2 घंटा आत्मिक चिंतन करो, और साल में एक महीना छुट्टी लो कि एक महीना हम अपने आत्मिक कल्याण के लिए अपनों की कुटिया में जाएंगे। जब करना है ना, तो करना है; नहीं तो बहाने बहुत हैं। 24 घंटे में आप देखो कि आप कितने घंटे प्रपंच बतियाती हो — बहुत टाइम है, आप बहुत आराम से अपने लिए दो-चार घंटा निकाल सकती हो। 'मैं तो गृहस्थ में हूं' — गृहस्थ का बहाना लेकर ऐसे ही भोग में पड़े रहो, योग मत करो, तो फिर अगला शरीर ऐसा मिल जाता है कि लाखों बच्चों को जन्म दो, लाखों बच्चों के मां-बाप बनो। मैं घुमा-फिराकर बात नहीं करता — अगर आप करना चाहोगी, तो आपके पास समय ही समय है। स्त्री का बहाना लेकर, बच्चों की जिम्मेदारी का बहाना लेकर, आप अपने आप को बचाओ मत।
ठीक है, बस जीवन में कुछ करो — उस परम स्थिति को उपलब्ध हो, समाज के लिए कार्य करो। कर्म ही पूजा है, निष्काम कर्म। हम जिस उद्देश्य को लेकर आए हैं, पहले मैं वो पूरा करूं कि मेरी उपलब्धि हो जाए; फिर जीव आत्माओं के लिए, फंसे लोगों के लिए मैं क्या कर सकता हूं, वो करूं — क्योंकि इन्होंने भी, जब मैं निकल रहा था, तो मुझे बहुत सहयोग दिया।
दंड तो दंड होता है। बात यह है कि आप किस व्यक्ति के साथ क्या व्यवहार कर रहे हो — सामने वाला कौन है। आप जिसके साथ व्यवहार कर रहे हो, अगर वह बेईमान है, तो कम दंड है; ईमानदार है, तब तो दंड की नाप ही नहीं है — कोई नाप ही नहीं सकता कि कौन सा दंड दिया जाएगा। भावनाओं को तो ठेस पहुंचाना नहीं चाहिए। अगर व्यक्ति आपसे ईमानदारी कर रहा है, तो आप उसके साथ ईमानदार रहिए; और वो खुलकर बात कर रहा है, तो आप भी खुलकर अपनी बात रखिए। आप कुछ भी बोलोगे, कुछ भी करोगे, सब सामने आएगा — आज नहीं तो कल भेद खुलने वाला है।
संसार सच तो दिख ही रहा है ना; दिख रहा है तो सच तो मानोगे, झूठ भी तो नहीं मान सकते। अब संसार में यह पेड़ दिख रहा है — यह पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, लेकिन अभी तो है; झूठ भी तो नहीं कह सकते। इसलिए तो मैं कहता हूं ना — न झूठ, न सच। ईमानदारी, सत्कर्म अपनाओ, निकल लो।
बस इंतजार करो। धीरे-धीरे मृत्यु के करीब ही जा रहे हो, या तो शरीर से निकलने के करीब जा रहे हो — दो में से एक जगह जा रहे हो। तो जब निकलोगे, तो देख लेना कहां की यात्रा होगी। इच्छा-अपेक्षा है, तो शरीर को धारण करोगे; और इच्छा-अपेक्षा नहीं है, तो शरीर धारण न करके आप आगे जाओगे।
जब हरियाणा में पूरी तरह मुझे लगेगा कि अपनों की कुटिया सुरक्षित हो गई, यहां के साधक आएंगे, कोई तकलीफ नहीं होगी, कोई कमी नहीं होगी, तो मैं आ जाऊंगा। फिर यहां भी रहूंगा, वहां भी रहूंगा। इसलिए कि बनाने के बाद उसे चलाना भी तो है, उसकी देखरेख भी करनी है, व्यवस्था भी तो देखनी पड़ेगी; ऐसा तो नहीं कि बनाकर चले जाओ। आज मैं यहां भले हूं, लेकिन अपनों की कुटिया का हालचाल लेता रहता हूं, क्योंकि सारी व्यवस्थाएं घुमा-फिराकर पैसे से चलती हैं — बिजली का बिल है, सारी व्यवस्थाएं हैं — तो देखभाल तो करनी पड़ेगी।
और कर्ता का भाव तभी तक है, जब तक तुम कुछ बनना चाहते हो। तो बनने की इच्छा का त्याग करो — कर्ता का भाव हट जाएगा, फिर परमात्मा रहेगा। अगर आप कर्ता का भाव रखोगे, उस बनने की इच्छा रखोगे, तो फिर आप अपने आप में नहीं हो पाओगे। कुछ बनने की इच्छा का त्याग करो। जब तक तुम मालिक हो, उस मालिक से दूर हो — एक ही मालिक हो सकता है, या तो वो या फिर अपन; और अपन रहेंगे तो खेल खराब है। तो अब खेल से हट जाओ, मालिकपन को छोड़ दो, सेवकपन को अपना लो, ईमानदारी से कर्म पकड़ लो, और अपने आप को निकाल लो। कैसे भी अपने राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से अपने आप को छुड़ाओ; जहां भी कमियां हैं, उस कमी को निकालने के लिए काम करो।
आप जब एक फोटो लेकर किसी के घर तक पहुंच गए, और वो सामने मिल गया, तो फोटो देखने की आपको जरूरत है? कोई जरूरत नहीं है — उसको पहचान गए, बस बात खत्म। जब आप विद्यालय में पढ़ रहे थे, तब किताब ढो रहे थे, बस्ता ढो रहे थे; किताब, टीचर, सबका नाम जरूरी था, कौन सी क्लास में बैठना है, कहां जाना है। और डिग्री मिलने के बाद क्या वह किताबें ढोने की जरूरत है, वो बस्ता ढोने की जरूरत है, उस टीचर को ढोना, उस स्कूल को ढूंढना जरूरी है — कि अपना काम करना जरूरी है? अपना काम करना, बस खत्म। पहुंचने के बाद बात खत्म हो गई।
शादी तो सामने है, परमात्मा कहां सामने है? घर वालों की इच्छा है, तुम्हारी नहीं है? मानव जन्म लाखों योनियों के बाद मिलता है, और यही एक ऐसी योनि है धरती पर। देख लेना, इस नाटक में किसकी जरूरत है; अगर इस नाटक में खो गए, तो 84 लाख — अच्छे-अच्छे लोग फंस गए। मैं तो बोलता हूं, कहता नहीं। कैसे भी अपना आत्मिक कल्याण कर लो, निकल लो — चाहे शादी करके, चाहे शादी न करके; लेकिन निकल लो। निकलना है, बस यह ध्यान रखना।
ध्यान कहां घटित होता है, पहले यह समझना है। ध्यान 'चाहिए' में घटित होता है — भूख लगी तो भोजन में, प्यास लगी तो पानी में, नींद आई तो नींद में। हमारी जरूरतों में ध्यान घटित हो रहा है, और उन जरूरतों में हमने बेईमानी कर दी है, इसीलिए हम तकलीफ में आ गए। अब हम इससे निकलना चाहते हैं — ध्यान करके। लेकिन क्या ध्यान करके फंसे हैं? नहीं, कर्म करके। तो ध्यान में ध्यान कैसे करना है? कर्म करते हुए, हर काम करते हुए, सोते-जागते, उठते-बैठते यह देखना है कि क्या हो रहा है, क्या मैं कर रहा हूं। जैसे आंख बंद करके बैठ गए — दृश्य गया, शब्द नहीं सुनाई दे रहा, सुगंध नहीं, मुंह में कुछ नहीं, स्पर्श नहीं — तो पांचों इंद्रियों का बहिर्मुखी काम बंद हो गया, तो मन अचेतन मन में ले जाएगा, और अतीत में जितना भी कर्म किया है, उसे दिखाएगा। उसे देखते रहो। जहां भी राग-द्वेष उठ रहा है, उससे मैं कैसे निकलूं, उसके लिए भाव बनाओ। जैसे मशीन बिगड़ गई, तो खोजना पड़ेगा कि बिगड़ी कहां; बिगाड़ देख लोगे, तो समझ आ जाएगा कौन सा पार्ट लगाने से ठीक होगी। ध्यान सीधा मत करो, नहीं तो कर्ता का भाव आएगा; अपने आप को जांचो, अपनी कमियों को देखो — कमियों को देखने में समर्पण होता है, कर्ता का भाव प्रकट हो ही नहीं सकता। निर्णय मत करो कि यह अच्छा है, यह बुरा है, या 'यह मैं नहीं देखना चाहता' — अगर नहीं देखोगे, तो उससे निकल नहीं पाओगे; चाहे भयानक पीड़ा हो, बस देखते जाओ। पहले कमी देखोगे, तभी तो छुड़ा पाओगे। और जब किसी पॉइंट पर जाकर फंसोगे, तो जो योग्य गुरु है वह आपको मार्ग बताएगा; लेकिन पकड़ना तुम्हें पड़ेगा, क्योंकि यह आंतरिक यात्रा है — अंदर आपके कोई नहीं जा सकता, आप ही जा सकते हो। बातों से बात मत बनाइए, काम करिए; इसमें मेहनत लगेगी। आप आंख बंद करके बैठ जाते हो और ध्यान के बाद रिलैक्स उठते हो — काम करने के बाद आदमी थकता है कि रिलैक्स होता है? दो आदमी हों, एक बाहर काम कर रहा है, एक उसे देख रहा है — रिलैक्स तो देखने वाला होगा। मतलब आपने काम नहीं किया, बस चुपचाप बैठे रहे; शरीर का रिलैक्स तो सोने से भी हो जाता है। ध्यान में ध्यान करो — कहां-कहां फंसा हूं — तो अपने आप को थका हुआ पाओगे।
ये सब भटकाव है। वहीं से तो — आप लोग विधि का उपयोग करोगे, तो यही सब तो होगा। शुरू में अच्छा लगता है, बाद में तकलीफ होती है — जैसे शुरू में बच्चे की गाली मां को बहुत अच्छी लगती है, लेकिन जब जवान होता है तो डंडा लेकर लड़ाई होने लगती है। जिसकी विधि अपनाई, जिसने साधना दी, उसको जाकर पकड़ो। कई लोग मुझसे मिले — गड़गड़ाहट हो रही है, पहले बड़ा अच्छा लगा, लेकिन अब नींद नहीं आती। उस पीड़ा के लिए तो उन्होंने मेहनत किया है ना — तो वो तो भोगना पड़ेगा।
हां। साक्षी का मतलब — मैं देखने वाला हूं। मैं करने वाला हूं, उसका साक्षी भाव मैं स्वयं। करने वाला भी मैं हूं, देखने वाला भी मैं हूं, ध्यान लगाने वाला भी मैं हूं, कमी भी मेरी है — लेकिन मैं अपनी कमियों को निकाल रहा हूं; इसमें समर्पण का भाव होगा। जहां-जहां बंधन है, कैसे भी अपने आप को छुड़ा लो। ध्यान में बैठ गए — अगर गाने की आवाज आ रही है, तो मन अचेतन मन में नहीं, गाने में जाएगा; सुगंध आ रही है तो सुगंध में, स्वाद में, स्पर्श में अच्छा लग रहा है तो उसमें — मन एक ही है, दो नहीं। पांचों इंद्रियों को जब कुछ नहीं मिलेगा, तो मन हमेशा डायरेक्ट अचेतन मन में जाएगा, क्योंकि मन का काम है कुछ न कुछ करना, और यह तब तक करता रहेगा जब तक आपको अपने स्वयं तक पहुंचा नहीं देगा।
ध्यान करना नहीं है; ध्यान तो अपने आप लग रहा है — 'चाहिए' में। ध्यान घटित हो रहा है; चाहिए में ध्यान जा रहा है, राग में, द्वेष में, चाहे बहिर्मुखी, चाहे अचेतन मन में। पांच इंद्रियों द्वारा हम विचार इकट्ठा करते हैं — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। आंख बंद कर ली, तो हम अचेतन मन में जल्दी चले जाते हैं। फिर जो भी हो रहा है, उसे दृष्टा भाव से देखो। चाहे मान में जाए, चाहे अपमान में — किसी ने आपका अपमान किया है, तो वर्तमान में बैठे-बैठे अतीत की घटना याद करते हो और भविष्य का निर्माण करते हो कि मैं बदला लूंगा। तो ध्यान में ध्यान करो। ध्यान हमसे है, ध्यान से हम नहीं हैं; इसलिए मुझे ध्यान नहीं करना है, हमें तो ध्यान में ध्यान करना है — राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाना है। जो भी हो रहा है, उसे देखते-देखते उस गहराई में जाइए — क्यों हो रहा है, क्या कारण है, मैं तो इसे छोड़ना चाहता हूं, छूट क्यों नहीं रहा? तो पश्चाताप होगा — मेरे कर्म का भोग है; गलती का एहसास करो, फिर धीरे-धीरे उससे छूटने लगोगे। सिर्फ किसी बिंदु पर, किसी मंत्र पर, माला लेकर बैठ जाना ध्यान नहीं। आंख बंद करते ही पुरानी बातें याद आती हैं, और हम उन्हें रोकना चाहते हैं — रोकिए मत, वो अचेतन मन में जमा है, रोक नहीं सकते; दृष्टा भाव से देखते रहिए, देखते-देखते आखिरी तक जाओगे तो वह खत्म हो जाएगा। जैसे कई गांठें लगी हों, तो एक-दो खोलकर छोड़ दोगे तो नहीं खुलेगा; आखिरी गांठ खोलोगे तो सब गिर जाएगा। ज्यादातर हम श्वास पर या बिंदु पर ध्यान करते हैं — जैसे रबड़ को किसी विधि से, ताकत से खींचा, छोड़ोगे तो वहीं जाएगा ना; काश उस रबड़ से छुड़ा लेते, तो रबड़ ही गिर जाता। मूल राग-द्वेष है — जैसा मैंने चाहा हो गया तो राग, नहीं हुआ तो द्वेष। राग-द्वेष से छूटने के लिए अनुमान लगाना छोड़ दो, और कुछ भी खा-पी रहे हो तो 'ठीक' शब्द का प्रयोग करो — अच्छा बोलोगे तो राग होगा, बुरा बोलोगे तो द्वेष; ठीक में न अच्छा होता है, न बुरा। ध्यान में एक-दो घंटे जब भी बैठो, बस दृष्टा भाव से देखो, निर्णय नहीं करना है — निर्णय करता अहंकार है, अहम भाव को गिराना है। कोई काम कर रहे हो तो समय मत दो कि कब तक हो जाएगा — जैसे किसान ने फसल बोई और बोल दिया इतना क्विंटल होगा; हुआ तो अहम भाव में बताएगा, नहीं हुआ तो शर्माएगा, दोनों में फंस गया। काश बोल देता कि मैं मेहनत कर रहा हूं, जितना होगा होने के बाद बता दूंगा — तो अहम भाव काम ही नहीं करता। अनुमान लगाना छोड़ दोगे तो कर्ता का भाव प्रकट नहीं होगा, और ठीक शब्द का प्रयोग करोगे तो राग-द्वेष बनेंगे ही नहीं।
मौन का मतलब होता है — जब कुछ नहीं चाहिए, तब मौन हो। मुंह बंद हो गया, पर चार इंद्रियां काम कर रही हैं; जो इंद्री सही से काम कर सकती थी, अब लिख-लिखकर दे रहे हो — स्याही भी खत्म कर रहे हो, कॉपी भी, खर्च बढ़ा दिया। यह मौन नहीं है। मौन का मतलब होता है कि आप निष्काम हो जाओ — बिना इच्छा-अपेक्षा के अगर आप कुछ कर रहे हो, तो मौन है। बस चुप हो जाना मौन नहीं है।
निर्विचार तो हो ही नहीं सकते। जितने लोग परम स्थिति को उपलब्ध हुए, उनके भी विचार आए, तभी तो अपने लिए भोजन मांगा, पता पूछा। भूख लगी, विचार आया — कहां भोजन मिलेगा, गए ना? अगर निर्विचार हो जाओगे, तो कोई पता पूछेगा तो बता भी नहीं पाओगे, कोई सामान रखकर भूल जाओगे। विचार स्वाभाविक आ रहे हैं; विचारों से परेशानी थोड़ी न है — विचारों में राग-द्वेष न हो। हम विचारों में राग-द्वेष में चले जाते हैं; परेशानी मूल राग-द्वेष की है, सारा खेल राग-द्वेष का है। आज तक हमने किसी भी व्यक्ति के बारे में निर्णय लिया तो राग में या द्वेष में — उसे अच्छा बताया या बुरा; अपने बारे में फैसला कर ही नहीं पाए। और वो तभी होगा, जब मान की इच्छा का त्याग करोगे, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे, बड़ा बनने का भी त्याग, छोटा बनने का भी त्याग करोगे — बस मुझे जीना है, समाज में कुछ काम करना है; मेरा काम मुझे जो भी बना दे। अपने तरीके से जो उम्मीद बना रखी है, उसका त्याग करना है।
नहीं, इसी के अंदर भी निरपेक्ष हो जाओ — कुछ अपेक्षा मत रखो, कार्य करते चलो। पहले अपने तरीके वाली उम्मीद का त्याग कर देना, फिर आखिरी में उम्मीद से भी छुड़ा पाओगे। क्योंकि भूख लगेगी तो भोजन तो कहीं न कहीं से मांगोगे; शरीर की जरूरतें भी तो हैं, इसमें रहना है। सीधा तो नहीं हो सकते ना; अभ्यासरत रहेंगे, तो धीरे-धीरे हो जाएंगे।
अपने आप को साधो। उसके लिए व्याकुलता बढ़ाओ कि मैं कैसे अपने आप को समझ सकूं, कैसे अपना आत्मिक कल्याण कर सकूं — इसके लिए पूरी तरह लगना पड़ेगा, और बातों को छोड़ना पड़ेगा। मन एक ही है, दो नहीं; वो एक ही जगह काम करेगा। हमने उसे अनेक पिंडों में, अनेक वस्तुओं में बुरी तरह फंसा दिया है; वहां से अपने आप को निकालो। जब आप एकांत में जाते हो, तब पता चलता है कि मैं कहां-कहां फंसा हूं; इसलिए कहा जाता है भ्रमण करो — किसी वस्तु से दूर होने पर ही पता चलता है कि उसमें कितना मोह, कितनी आसक्ति थी। तो ध्यान में ध्यान करना है। सीधा ध्यान करने में लोग बिंदु पर, प्रतिमा पर, सांस पर ध्यान कर रहे हैं, कोई विधि अपना ले रहे हैं। ध्यान आपको यह करना है कि कैसे मैं अपने आप को छुड़ाऊं — क्योंकि जब छुड़ा लोगे, तो अपने में पहुंच ही गए। पहुंचने के लिए प्रयास नहीं करना है, छुड़ाने के लिए प्रयास करना है। रबड़ एक जगह से बंधा है और आपने खींचा, तो कितने भी वर्ष बाद छोड़ो, वहीं जाएगा; अगर वहां से छुड़ा लेते, तो वह गिर जाता। बंधन मानसिक है, शरीर का नहीं — शरीर लेकर कहीं भाग जाओगे, पर मानसिक का क्या करोगे? ध्यान मुझसे है, मैं ध्यान से नहीं हूं। जब तक मुझे कुछ चाहिए, तब तक मन काम करता रहता है — जैसे मोबाइल-कंप्यूटर में एरो; एक बार में एक ही सिस्टम खोलेगा। तो एक-एक जगह से अपने आप को छुड़ाने में लग जाओ। जबरदस्ती विचारों को रोकना, निर्विचार होने का प्रयास करना — जो कभी हो ही नहीं सकता; मन है भी और नहीं भी है, जो है भी और नहीं भी है, वो रुकेगा कैसे? उसका सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो। रस भरी बातें, रस भरा देखना, सुगंध, स्वाद, स्पर्श हमें बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन यह शरीर का स्वभाव है, क्योंकि शरीर भोग से आया है, योग से नहीं; आप योग की तरफ बढ़ना चाह रहे हो, शरीर भोग की तरफ जा रहा है। जरूरत में भोग — अब आपको देखना है कि मेरे लिए क्या उचित है, क्या अनुचित। अपना-अपना पढ़ो — जैसे स्कूल में जो दूसरे का सब्जेक्ट पढ़ने लगा, वो एग्जाम में फेल हो जाएगा; ज्यादातर हम दूसरों को पढ़ना चाहते हैं कि कौन अच्छा, कौन बुरा। कोई भी मार्ग बता सकता है, चलना आपको ही पड़ेगा। हम ऑप्शन में जिए चले जा रहे हैं — जगह बदल रहे हैं, लेकिन जगह बदलने से स्थिति नहीं बदलती; आवरण बदलने से स्थिति नहीं बदलेगी। अध्यात्म की यात्रा आवरण में नहीं होती, आवरण से मुक्त होने के लिए होती है। भौतिक जगत में सबको हराना है; यहां न जीतना है, न हारना है — अब तो मैं अपने आप को मिटाने आया हूं। जब तक आपके पास अनेक ऑप्शन हैं, तब तक भटकते रहोगे; मिलेगा आप में ही, और वो मिलेगा बस छुड़ाने से। जब बाहर कुछ रहेगा ही नहीं, तो बचेगा कौन? आप। किसी भी मार्ग से जाओ, समर्पण करना पड़ेगा; अहम भाव को गिरा दो — और जब तक तुम कुछ बनना चाहोगे, तब तक यह गिरेगा नहीं। रिश्तों में मत पड़ो, पर मानवता मत खोना — कोई गिर गया तो उठा दो, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, भटके को मार्ग, साधना छोड़कर भी। साधना ऐसी एकांत जगह करो जहां किसी को तकलीफ न हो। धीरे-धीरे फंसाए हैं, तो धीरे-धीरे निकालेंगे, लेकिन निकालने में लग जाओ। अपने बनाए अस्तित्व को मिटाओ — यह मिटेगा पक्का; आप मिटा दो तो मुक्ति से मोक्ष, और प्रकृति मिटाएगी तो वही जन्म-मरण का चक्र। ऐसा न हो कि काल आए और कहे, इतना समय मिला था, ऐसे ही गंवा दिया — तब एक सेकंड भी नहीं मिलेगा।
छोड़ना है तो छोड़ दो — अभी, आज से त्याग करो; जेब में हो तो फेंक दो। कल करे सो आज कर। जीवन में थूकना हो तो चाटना मत, चाटना हो तो थूकना मत। एक तरफ हम सत्संग भी समझ रहे हैं, अध्यात्म को भी समझ रहे हैं, परिवार से प्रेम भी कर रहे हैं, और हम वो करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए, जो हम चाहते हैं हमारे बच्चे न करें। नासमझी में करो तो ठीक है, लेकिन समझने के बाद भी कर रहे हो, तो अपराध हो गया। त्यागम् परम सुखम् — त्याग ही परम सुख है। क्या त्याग करना है? जो भी हमारे जीवन को अशांत कर रहा है, जिस वजह से परिवार में कलह हो रहा है, जिससे जीवन में तकलीफ आ रही है, उसका त्याग कर देना; और त्याग करो तो फिर मत अपनाओ। गुटखा से एक भी लाभ बता दो — यह एक गंदी आदत है; वही हमारा बेटा, पत्नी, बेटी खाए तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे, तो जो आप दूसरों से अपेक्षा रखते हो, वो देना चालू करो। इसे आपको ही खत्म करना है, और आंतरिक खत्म करना है, बाहरी नहीं — आंतरिक खत्म करोगे तभी लाभ होगा। कोई कहे पानी छोड़ दो, भोजन छोड़ दो, तो बोल सकते हो कि इसके बिना कैसे रहूंगा, लेकिन इसकी तो जीवन में कोई आवश्यकता नहीं है। आपने गुटखा छोड़ा, खुश वो लोग हैं — इतनी खुशी आप उन्हें वस्तुओं से नहीं दे सकते। हम सोचते हैं प्रॉपर्टी, वैभव बनाने में खुशियां हैं; नहीं, आपस में प्रेम से रहो, वो खुशियां हैं — कम से कम एक साथ भोजन तो करें। बहुत भाग्य से, आपके कर्म से, आपको धन, तन और ज्ञान मिलता है; अगर कोई ताकत मिली है, तो उसका सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो। आने वाली पीढ़ी हमसे ही सीखेगी, तो वही काम करना चाहिए जिससे उसकी उन्नति हो, पतन न हो। सत्संग का मतलब है अपने आप को सुधारना — जैसे भोजन का मतलब है भूख मिटाना और शरीर को पोषण देना। सत्संग सुनो और अपने आप को सुधारो; जितनी भी बुरी आदतें हैं, उनका त्याग करो।
हम तो मानते हैं कि अगर मेरे सामने कुछ बिगड़ रहा है, तो मेरा काम है उसे बचाना; और अगर वह व्यक्ति नहीं मान रहा, तो व्यवस्थापक तक बात पहुंचा देना। आपको द्वेष नहीं हो रहा ना? जिसको हो, वह जाने। अगर आपको लेना-देना है, तो इसका मतलब आप उस तरफ बढ़ रहे हो। मेन बात — पहले आपको अपने आप को सुधारना है; बिना कमी के तो यहां आए नहीं। जैसे पांडवों में अर्जुन के प्रति दुर्योधन का द्वेष था, अर्जुन का नहीं था; अर्जुन अपने अधिकार के लिए लड़ा, द्वेष में नहीं, और उस अधिकार के लिए लड़ने में उसे ज्ञान हुआ — युद्ध के मैदान में ही उसकी समझ विकसित हुई। तो मैं अपना काम करता रहूं; जितना मुझे अधिकार मिला है, उचित तरीके से कार्य करना है — इसलिए कि कार्य बिगड़े ना, सामने वाले को दबाने के लिए नहीं। अगर उसका राग-द्वेष बनेगा, तो वह गिरेगा; मेरा स्तर तो उठ गया। अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, तो राग-द्वेष होगा ही नहीं; राग-द्वेष तो तब होता है, जब अधिकार पार करते हैं। आप आराम से रहकर अपनी साधना करिए, जिस उद्देश्य को लेकर आए हो उस पर पूरा काम करिए — मैं भी 12 साल घूमा हूं, आश्रमों में क्या हो रहा है, सब पता है; यहां उसके लिए सब उपलब्ध है।
देखिए, अभी तो हम आगे का राग-द्वेष नहीं बना रहे, लेकिन पिछला तो है ना। तो निरंतर इतना भाव बनाकर रखें कि मुझे आगे का नहीं बनाना है, लेकिन पिछला भोगने के लिए भी तैयार रहो। पिछला राग-द्वेष आपने बनाया है, उसकी वजह से जीवन में उतार-चढ़ाव आएगा — बेचैनी, घबराहट, उदासी, बहुत सारी बातें होंगी; उसका सामना करना पड़ेगा। पिछला जितना किया है, उसकी यादें हैं, यादों में घुटन है। मुझे ऐसा व्यवहार, ऐसी बातचीत, ऐसा उठना-बैठना नहीं करना है कि आगे का राग-द्वेष बने; मुझे सिर्फ जरूरत में जीना है। राग-द्वेष तभी बनता है, जब आप जरूरत से ज्यादा में जाते हो, अधिकार से ज्यादा में जाते हो। समझ के साथ — हमेशा समझ को याद रखना होगा कि मुझे राग-द्वेष वाला काम करना ही नहीं है, मुझे जरूरत में जीना है। जरूरत में जीने लगोगे, तो भाव निरंतर बना रहेगा; और जैसे ही जरूरत से आगे गए — चाहे रूप में, रंग में, शब्द में, सुगंध-दुर्गंध में, स्पर्श में, फालतू एक शब्द भी — भाव टूटा, ऊर्जा इधर-उधर लग जाएगी, और आपको पछतावा भी होगा। पिछले की बहुत याद आएगी — जैसे नशेड़ी नशा छोड़े, तो पिछला नशा याद आता है, बेचैन होता है, क्योंकि दिमाग ने उसका रस लिया है; लेकिन काफी समय छोड़कर रहे, तो कहता है अब याद आती है, सताती नहीं। एक समय ऐसा आएगा कि याद आएगी, लेकिन यादों में राग-द्वेष नहीं होगा। तो जरूरत में जियो — जरूरत में उठो, जरूरत में बोलो, जरूरत में काम करो।
कोई गिर गया, उसे उठा दो; कोई भूखा है, उसे भोजन करा दो; कोई ठंड में कांप रहा है, तो उसे कपड़े दे दो। जरूरतमंद दिखता है — इतनी समझ तो हममें है। कोई आलसी है, करना नहीं चाहता, मांगकर ही काम चला रहा है — तो एक टाइम अगर आपसे मांगा तो दे दो, दूसरे टाइम का मत देखो, फिक्स उसे मत दो। कभी-कभी व्यक्ति की परिस्थितियां मंगवाती हैं; आप कुछ डिसाइड मत करो, फैसला मत लो। किसी को भोजन दोगे, वो नहीं खाएगा तो किसी और को खिलाएगा, कहीं फेंक भी देगा तो जीव-जंतु खा लेंगे — जिसके लिए बना है, वही उपयोग होगा। हां, जरूरत की चीजें दो; कोई कुछ भी मांग ले, तो मत दो। और जिस लायक आप हो, जरूरतमंद मिल जाए तो बिना बोले सेवा करो — ऐसा नहीं कि आप इंतजार करो कि वो बोले तब करूंगा; तब तो अहम भाव खड़ा कर दिया, उसे नीचा समझा, और मान, इच्छा, अपेक्षा, राग-द्वेष सब घेर लेंगे। महानता तब थी, जब आपने देखा और बिना बोले कर दिया।
'आत्मा सो परमात्मा' मतलब आत्मा के द्वारा ही परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है। मैंने आधार बनाकर बाहर चला गया हूं; उस आधार को छोड़ना होगा। आत्म तत्व तक पहुंच गए, बाहरी आवरण छोड़कर, तो परमात्मा तक पहुंच जाओगे — आत्मा के द्वारा परमात्मा तक की यात्रा होगी, यही बोला गया है। जो कहते हैं कि तुम ही परमात्मा हो, आत्मा को ही परमात्मा बोलते हैं, यह उनका भ्रम है — अगर आत्मा ही परमात्मा होता, तो भटकता ही नहीं, भटकने की कोई संभावना ही नहीं होती। हम ही आत्मा हैं, आत्मा हमसे अलग नहीं; जैसे आप किसी के बाप हो, किसी के दादा हो, लेकिन एक ही हो, वैसे ही हम जीवात्मा हो गए हैं। हमें अभी आत्म तत्व में स्थिर होना है, फिर आत्मा सो परमात्मा की यात्रा करनी है। आप खुद चिंतन करें — अगर एक ही ब्रह्म है, उसके अलावा कुछ नहीं, तो भटकने के लिए दो चाहिए, और जिसके लिए भटका जाएगा, वह तीसरा चाहिए; भटकने के लिए कोई ऑप्शन चाहिए। आत्मा-परमात्मा में कोई भटकाव नहीं है; यह तीसरा कोई आया है, तब सारा सिलसिला गड़बड़ हो रहा है। जीवात्मा कब बने? जब आपने किसी तीसरे को पकड़ा और तीसरे से कोई इच्छा हुई। इसलिए आत्मज्ञान तक अपने आप को पहुंचा लो, सारी भ्रांतियों से मुक्त हो जाओगे। अपनी समझ से ही आगे की यात्रा करनी चाहिए, और अपना आत्मिक कल्याण करने में लग जाना चाहिए।
हमें अपनी योग्यता देखनी चाहिए, और सामने की जरूरत देखनी चाहिए कि हमारे सामने कितनी जरूरत है। क्या यह करना जरूरी है? करने से इसका होगा क्या, परिणाम क्या आएगा? ऐसा तो नहीं कि मैं कर रहा हूं और इसका कोई मतलब भी नहीं, ऐसे ही दिखावे के लिए कर रहा हूं? कर्म करते हुए हर वक्त इतना याद रखना है कि इस कर्म के द्वारा मेरा उद्धार होगा या नहीं। कोई भी काम करो, तो देखो — अगर उद्धार होगा, तो वो कर्म करो; अगर आपको लगे कि नहीं होगा, तो वो कर्म छोड़ दो।
आप कोई भी रोजमर्रा का कार्य कर रहे हो, तो इतना ध्यान देने की जरूरत है कि सात्विक भोजन करें, सात्विक कर्म करें, उस कर्म में किसी से राग-द्वेष न करें। भोजन कर रहे हो, तो पहले यह जांचना है कि जिस भोजन को मैं ग्रहण कर रही हूं, वो ईमानदारी का है कि नहीं; जिस व्यवस्था का उपयोग कर रही हूं, वो ईमानदारी की है कि नहीं। भोजन करते हुए इतना भाव रखना है कि भोजन मैं नहीं कर रहा, मैं शरीर को भोजन करा रहा हूं — यह शरीर साधन है, और मैं इसे उतना ही भोजन दूंगा, जितने में मैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए और काम कर सकूं। नहा रहे हो, तो मैं समाज में रहता हूं, तो अपने शरीर को शुद्ध कर रहा हूं — यह समाज की जरूरत है। परिवार के बीच बैठे हो, तो बैठे हो; जरूरत में हो तो बोलो, नहीं तो मत बोलो, शांति से बैठे रहो।
मेरे द्वारा कोई भी कर्म हो रहा है, तो उसमें राग और द्वेष नहीं होना चाहिए — बस यह ध्यान रखें। जैसे भोजन आपके तरीके का नहीं बना, तो गुस्सा आ गया — यह द्वेष; आपके तरीके का बन गया, तो कहा फिर से यही बनाओ — यह राग। राग-द्वेष नहीं करोगे, तो आप अपने आप में रहोगे ना; अब करने को बचा क्या? छूट गए ना। और टारगेट तो आत्मिक कल्याण का है ना — तभी तो मैं राग-द्वेष नहीं करना चाहता।
आप सीधा यह कहकर नहीं निकल सकते कि मुझे नहीं पता; आपने अपनी जरूरत के हिसाब से हर चीज पता की ना, वैसे आत्मिक कल्याण भी आपको पता करना पड़ेगा। आत्मिक कल्याण का मतलब — अगर मैं राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता में अशांत हूं, व्याकुल हूं, उदास हूं, बेचैन हूं, दुखी हूं, निराश हूं, तो उससे अपने आप को छुड़ा लेना आत्मिक कल्याण है। राग-द्वेष दरवाजे हैं; छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड करोगे, तभी राग-द्वेष होगा। जैसे किसी ने भोजन बनाकर दिया और भोजन वाहवाही के लायक नहीं, फिर भी आप वाहवाही कर दो, तो जैसा था वैसा नहीं बताया — पाखंड हो गया; और जैसा था वैसा बता दिया, तो राग-द्वेष दोनों नहीं होंगे। जब आप अपने शरीर के लिए खुद कर्म करते हो, और उसके निमित्त सिर्फ आप हो, तो उसमें राग-द्वेष नहीं होता। दोनों ही दुख का कारण हैं — राग से बाद में दुख होगा, द्वेष से तुरंत। अब समझने के बाद दोनों दरवाजों पर नहीं जाओगे, लेकिन बहुत जा चुके हो; तो पिछला — आप ईमानदारी के साथ सत्कर्म करोगे, और उससे कैसे छुटकारा पाना है, वो सत्संग द्वारा बताया जाएगा, तो आप मुक्त हो जाओगे। अलग से कोई विधि, कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
जैसे भोजन में स्वाद का नाम दिया गया, लेकिन स्वाद दिखता नहीं — दिखाना चाहो तो नहीं दिखेगा, लेकिन महसूस होता है — वैसे आपमें विकार हैं, और विकार आपको सताते हैं। आपमें नहीं हैं; आपने इन्हें धारण किया है — अपने मतलब के लिए, अपने रसास्वादन के चक्कर में, अपने मतलब की पूर्ति के लिए, कि अपने तरीके से मिल जाए।
ईमानदारी देखो, ईमानदारी करो। कोई ना कोई हर काम में निमित्त बनता है। कहीं भी जाओ, बस ईमानदार सत्कर्मी रहो और आगे बढ़ो — बस बात खत्म। ईमानदार रहना जरूरी है।
वादा करने से पहले जांच लो कि जो वादा करने जा रहे हो, उसे निभाने की क्षमता है या नहीं। जब आप वादा करते हो तो अनेक ऑप्शन बंद कर देते हो। अपनी क्षमता के अनुसार ही वादा करो; अनलिमिटेड वादा क्यों कर रहे हो? क्षमता बता दो — क्षमता कुछ और बता रहे हो और करने की बारी आए तो कहो मैं नहीं कर सकता, तो आपने उसका बहुत समय बर्बाद कर दिया। झूठा वादा मत करो। किसी के भावनाओं के साथ मत खेलो; अगर वादा कर रहे हो और नहीं कर रहे हो तो उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचेगा, और उसकी भरपाई कभी न कभी आपको करनी पड़ेगी। वादा करने से पहले अपनी सामर्थ्य जांच लो। सामने वाले का मजाक मत बनाओ — तुम्हारा भी कभी मजाक उड़ेगा।
किसी भी फील्ड में हो, कुछ भी कर रहे हो — जिस फील्ड में हो, जो सीखना चाहते हो, उसके अलावा कोई बात मत करो। अपना खान-पान अपने शरीर के हिसाब से करो; सबको सब सूट नहीं करता — आप देखो आपके शरीर के लिए क्या उपयोगी है। जिस फील्ड में हो उस फील्ड की बातें करो और सिखाने वाले से बात करो। साधना का मतलब सीधा है — कुछ सीखना, कुछ समझना; यही साधना है। सीखोगे तभी जब समझोगे। पहले पक्का कर लो क्या सीखना है; यही पक्का नहीं हो पाता — कभी ये कभी वो, इसी में घूमते रहते हैं।
हमारा भाव काम करता है। जैसे दो आदमी को एक कमरे में बंद कर दूं — एक ने फैसला कर लिया था कल मैं व्रत रखूंगा, दूसरे ने नहीं; भोजन दोनों को नहीं मिला, तड़पेगा कौन? जिसने फैसला नहीं किया था। जिसने कहा था मैं व्रत रखूंगा, वो कहेगा अच्छा हुआ मुझे एकांत मिल गया; एक कहेगा भूख लगी है। यहां भाव की बात है। जब आप संकल्प लेते हो कि जिसमें जी रहे हो उससे ज्यादा कुछ मिलने वाला है, तब व्रत-उपवास में पीड़ा नहीं होती — खुशी होती है। जरूरत में जब हम कुछ करते हैं तो पीड़ा नहीं लगती; जरूरत नहीं और कोई करवाए तो वही पीड़ा है। यहां भाव का खेल है — भाव विद्यते देवा, भाव में ईश्वर का वास है। अपने तरीके से चाहिए का त्याग कर दो तो समस्थिति में हो जाओगे।
ईमानदारी ही सत्य तक लेके जाएगी; बेईमानी संसार में घुमा रही है। बोलने से नहीं होगा, करने से होगा — भोजन बोलने से पेट नहीं भर जाएगा, ला के पका के खाना पड़ेगा। ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन; बेईमानी करके हम फंस गए, ईमानदारी करके वापस आ सकते हैं। लेकिन एक अकेली ईमानदारी से काम नहीं चलेगा — तप भी साथ में होगा, परोपकार भी करना पड़ेगा, सेवा भी करनी पड़ेगी; सब करो।
परमार्थ मतलब दूसरों के लिए जीना। परोपकार का मतलब — हम जा रहे हैं, कोई रास्ता पूछा बता दिया, कोई गिरा उठा दिया; निष्काम किसी की सेवा-मदद — ये परोपकार है। एक स्वार्थ है, एक परोपकार है, एक परमार्थ। स्वार्थ मतलब हमारे लिए किसी ने किया, समय आने पे मैंने उसके लिए नहीं किया — योग्य होने के बाद भी यह स्वार्थ है।
आप देख लो। जब आपको पता है तो मैं क्या बताऊं; नहीं पता होता तो मैं बताता। फैसला आपके; मैं कुछ बोल भी नहीं सकता कि किस स्थिति-परिस्थिति में आप ऐसा करते हो। आप देख लो कि आपकी अंतरात्मा क्या कहती है। ऐसा ना हो कि आपके पास पैसा-रुपया-सोने का झूला हो लेकिन आप घुटन में हो; जमीन पर भी सोए हो लेकिन आप अपने आप में हो — तब कोई मतलब नहीं। अभी जब तक मशीन काम कर रहा है तभी तक देख लेना; एक दिन मशीन काम करना बंद कर देगा, फिर वही घुटन में खाट पे जिओगे। अभी पश्चाताप का भी समय है, भरपाई का भी समय है, सत्कर्म भी कर सकते हो। बंदूक की गोली खत्म होने के बाद समर्पण का कोई मतलब नहीं — गोली है तब तक समर्पण कर दो। बाकी जीवन आपका है; जैसा करोगे वैसा पाओगे। मैं फैसला दे नहीं सकता — छोड़ना है कि पकड़ना है, वो आप देख लो।
गलती नहीं हुई, ये अपराध है। गलती तो तब होती जब मैं आपको बताया ही नहीं होता। जब हमने आपको बता दिया है तो गलती कैसी? अब रखो दो दिन का — अच्छा है, तपस्या हो रहा है। गलती का दंड होना बहुत जरूरी है; बड़ा दंड होता है तो गलती रिपीट नहीं होती।
ये आप ही को देखना है — क्या उम्मीद बना के बैठी हो। उम्मीद ही दुख है; उम्मीद ही सुख है — कब? जब उम्मीद हमारे तरीके से पूरा हो जाता है तो सुख, नहीं होता है तो दुख। उम्मीद छोड़।
वो बातें अलग हो गईं। निंदक नियरे राखिए — अब निंदा वाला काम ही नहीं करेंगे। अगर कोई निंदा करेगा तो पूछेंगे भाई क्या बात है, आप सिद्ध करिए कि मैं निंदा वाला काम कर रहा हूं। हम निंदक को अपने पास क्यों रखें — हम निंदा वाला काम ही नहीं करेंगे। दोष देखने वाला दोषी; दोष निकालने वाला महान। अब देखो आप किस में जीते हो — यह आपको जांचना है।
देव प्रवृत्ति भी छोड़ना है, राक्षस प्रवृत्ति भी छोड़ना है — अपनी मूल प्रवृत्ति में आना है। सात्विक प्रवृत्ति अपना कर आ सकते हो। वो कौन सी स्थिति होगी? भगवान की स्थिति। बात समझ रहे हो — वो भगवान की स्थिति है।
हो गया तो हो गया, लेकिन अब आगे से नहीं करना है। एक बार हो गया, दो बार, तीसरे बार अगर हो गया और चौथे बार — तो आप एक लापरवाह इंसान हो। तीन तक डाक सकते हो; तीसरा डाक लिए तो समझ लो लापरवाह। अगर समझ के किया है तब तो ये गलती भी नहीं — ये तो अपराध है। सेकंड टाइम होना तो पहली बार में पता लग जाता है कहीं न कहीं गलती हुई; फिर दोबारा हुआ तो अपराध। अपराध भी एक्सेप्ट करना पड़ता है। जैसा कर्म करेंगे वैसा।
यहां तो छोड़ने के लिए छोड़ना है। यहां पाना कहां है — उम्मीद छोड़ना है; यहां पाना नहीं, पाने से मुक्त होना है। कुछ चाहिए ही नहीं — खत्म ही है, बस यही फाइनल। कुछ नहीं चाहिए स्थिति में आ जाना है। कुछ नहीं चाहिए का भाव मैंने बनाया था 2011 में; 19 में सब खत्म हो गया और 20 में कुछ नहीं चाहिए में आ गया।
उसी से आपका स्तर गिरेगा और उठेगा। कर्म मायने नहीं है — कर्म के पहले, कर्म के बाद एक भाव बनता है; उससे फल का निर्णय होता है। हर वक्त भाव बदलता है। आपको देखना है कि इस कर्म को करने जा रहा हूं तो इसमें मेरा भाव क्या है — उसमें निस्वार्थ होना चाहिए। जरूरत है कि मुझे इससे ज्यादा चाहिए? सामने वाले की जरूरत के लिए कर रहा हूं, अपने या परिवार की जरूरत के लिए? किसी का हानि होगा कि लाभ? सब जांच कर और फिर आगे करिए।
अष्टावक्र ने सिद्ध कर दिया — ये भी जो हम बात कर रहे हैं ये भी स्वप्न; सो गए वो भी स्वप्न, उठे वो भी स्वप्न — ना ये सच है ना वो सच। लेकिन तुलसीदास की वाणी मुक्ति तक पहुंचने के बाद की है। अगर हम पहुंचने के पहले उस वाणी का उपयोग कर लिए कि सब स्वप्न है, तब फंस जाएंगे। स्वप्न है तो फिर लड़ाई क्यों कर रहे हो? कोई गाली दिया तो कह दो ये तो स्वप्न है, कोई मार दिया तो कहो ये तो स्वप्न है — तब सारा स्वप्न निकल जाएगा। थ्योरी और प्रैक्टिकल में बहुत फर्क है। अनुभव करके आत्म-अनुभूति तक पहुंचना है; फिर कुछ भी नहीं। लेकिन अभी तो कुछ है। मुक्ति चाहिए लेकिन मुक्त होना नहीं — पिंजरा नहीं छोड़ेंगे। ये संसार पिंजरा है; अनेक पिंजरों में फंसे हो। पहले इन पिंजरों से छूटो।
विश्वास एक सिस्टम की व्यवस्था है — आपकी व्यवस्था नहीं, सिस्टम की। हर काम स्वयं नहीं कर सकते; एक दूसरे का सहारा लेना पड़ता है। जैसे किसी से गिलास पानी मांगा तो विश्वास करना पड़ेगा कि वो लाएगा — लाया न लाया बात अलग। लेकिन विश्वास का एक दायरा है; उस दायरे से ज्यादा अगर करते हो तो अब आपकी मजबूरी है, कमजोरी है। अपनी कमजोरी को विश्वास का नाम मत दो — कमजोरी दूर करो। एक गिलास पानी के लिए कई घंटों किसी का इंतजार कर रहे हो तो या तो अपाहिज होगे या ऑप्शन नहीं। विश्वास प्रथम सीढ़ी है, लेन-देन में भरोसा करना ही पड़ेगा — लेकिन दायरे से आगे मत जाओ। करने वाले व्यक्ति बनो, मेहनती बनो, खुद करो। पहुंचा हुआ व्यक्ति यही कहेगा — मैं पता बताता हूं, पते पे तुझे यात्रा करनी पड़ेगी; नहीं पहुंचा हुआ कहेगा मैं पहुंचा दूंगा और जीवन भर उपयोग करेगा। विश्वास को बदनाम मत करो — प्राकृतिक व्यवस्था है; दायरे से आगे गए तो गलती आपकी है।
बिना समझे अगर बढ़ेंगे तो कोई मतलब नहीं — बाद में पछताना पड़ता है कि कुछ पाने गया था, यहां तो कुछ भी नहीं मिला। अध्यात्म का मतलब सीधा है — जहां अपने आप को समझना है। अपने आप को समझने में कुछ नहीं मिलेगा; बाहर समझ रहे हो तो रस मिलेगा, लेकिन मैं में कुछ भी नहीं है। आध्यात्म में आने के बाद लोग निराश हैं कि कुछ हो नहीं रहा — होना ही तो बंद होगा; होने में ही तो आप परेशान थे, होने से मुक्ति चाहिए था। इस संसार से कैसे भी अपने आप को छुड़ाओ — सीधा सरल रास्ता है तप और परोपकार; राग-द्वेष-मोह-आसक्ति-इच्छा-अपेक्षा-मेरा-कर्ता के भाव से कैसे भी अपने आप को छुड़ाओ। अध्यात्म का सीधा मतलब है उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा लेना। अध्यात्म कुछ नहीं चाहिए का मार्ग है; अपने आप में हो जाना अध्यात्म है। अगर आप किसी और में हो रहे हो तो अध्यात्म कहां से है? मान की इच्छा सबसे खतरनाक है। अच्छे लोगों के साथ उठो-बैठो जिनका कर्म अच्छा है; दुष्ट का साथ मत करो। साथ सोच-समझ के करो। मर्यादा में जियो — सामने कौन है ये देख के बात करो।
यह बात सही है कि हम मुक्त तो आप क्यों नहीं? इसलिए अगर मुक्त नहीं हो तो इसका मतलब आप 'मेरा' के लिए जी रहे हो, 'मेरा' में ग्रसित हो। मैं 'मेरा' से मुक्त हूं। 'मेरा' से मुक्त होने वाला मुक्त है। अब देखो आपका कहां-कहां भाव 'मेरा' में है।
ऐसा नहीं है। मैंने घर नहीं छोड़ा। जिम्मेदारी को निभाते हुए मैं आगे बढ़ा हूं। मैं कुछ छोड़ा नहीं हूं, ना कुछ पकड़ा हूं। मुझे काम करना था, मैं बस काम कर रहा हूं। जैसे लोग अपने घर से जाकर विदेश में काम कर रहे हैं, अपने घर से जाके शहरों में काम कर रहे हैं, तो वैसे मैं काम कर रहा हूं। मैंने कुछ छोड़ा नहीं है, कुछ पकड़ा नहीं है। मेरा शौक था कि समाज के लिए कुछ करूं। मैं अपना काम कर रहा हूं।
डर का तो सवाल ही नहीं है, मैं कभी सोचता भी नहीं। मेरे जीवन में डर की बात नहीं है, बस मैं काम करता हूं। डर क्यों लगेगा? जब काम कर रहे हैं तो डरना क्यों? जंगल में मंगल हो चुका है। अब तो साधक लोग भी आके रह रहे हैं, उन्हें भी कहां डर है? डरना है तो अपने बुरे कर्मों से डरो, बेईमानी से डरो — वो मत करो। डरना ही है तो बुरे कर्मों से डरो।
प्रोफेसर को लेके क्या करोगे? जितना मतलब रखो, मुझसे रखो। यहां लोग आते हैं, चले जाते हैं; आना-जाना लगा रहता है। मैं हूं ना, काम तो मुझसे है। आज तुम हो, कल मैं हूं; कल मैं हूं, कल तुम हो — ऐसे ही लगा रहता है। तो बोलो मुझसे क्या काम है? यही तो बात है — कभी प्रोफेसर के चक्कर में तो कभी किसी के चक्कर में ऐसे ही पड़े रहते हो। काश अपने चक्कर में पड़ते! काश मुझसे मतलब रखते कि गुरु जी से कोई सवाल करूं। कोई हमारे सेवक लोगों को नहीं पूछ रहा कि अपनी मुक्ति-मोक्ष कैसे हो।
जिसका चरित्र अपनाए हो, उसका तस्वीर भी काम करेगा। और पता चला कि तस्वीर लगा लिया लेकिन चरित्र नहीं है तो फिर कोई मतलब नहीं है। जिसका भी आप तस्वीर लगाओ — क्या उसका चरित्र अपना रहे हो? तब उस तस्वीर का कोई मतलब है।
अब देखो, अगर वह मेहनत करेंगे आत्म-साक्षात्कार के लिए, आत्मज्ञान के लिए, तो अच्छी बात है ना। अपने आत्मिक कल्याण के लिए, अपने आत्मिक उद्धार के लिए अच्छी बात है। चाहे पापा हो, चाहे आप हो — उसके लिए काम भी तो करना पड़ेगा।
नहीं, उधार लेना गलत नहीं है, लेकिन बात यह है कि आप उधार करना सीखो, और जब जरूरत पड़े तो उसे भी सहयोग दो। कई बार पैसा दे नहीं पाते — तो लो ही मत, जब दे नहीं पाते। कई बार उधार लिया पैसा दे नहीं पाए, फिर दिक्कत होती है — तो मत लो ना उधार।
बहुत सीधी सी बात है। जब भी आप कोई कर्म कर रहे हो तो ऐसा मत करो कि आपके द्वारा किसी को तकलीफ हो, और कर्म करते हुए ईमानदारी सबसे जरूरी है — ईमानदारी और सत्कर्म। मैं तो यही सिखाता हूं — सेवा। अदलपुरा में भी, यहां भी मैंने यही सिखाया है कि भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। कोई भी अगर आए, दूर भी दिखे, तो उसे बुला के बिस्किट दो, पानी पिलाओ, बैठाओ। आपके पास जो भी है — बिस्किट है, मीठा है — एक गिलास पानी लेके खड़े हो जाओ: ये लो, खा लो और पानी पी लो। रास्ते में कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है तो आप पानी की व्यवस्था कर दो। पता चला एक नल गड़ा है तो उसके बगल में दूसरा नल मत गड़वाओ — अहम भाव के कारण नहीं। जहां जरूरत हो, आवश्यकता हो, वह देखो।
इस पैसे को खर्च करना सीखें। अब नहीं करते हो तो आपकी गलती है। मुंह से बोलना अलग बात है, करना अलग बात है। हम सक्षम होने के बाद भी, जहां से हम लाभ लेते हैं, बस वाह-वाह करते हैं कि आपके द्वारा मेरी जिंदगी बदल गई, जब से आपका सत्संग सुना मेरी लाइफ बदल गई; लेकिन जब करने की बारी आती है, सक्षम होने के बाद भी पीछा छुड़ा आते हैं। तो मैं आप लोगों को यही कहना चाहता हूं कि सेवा करो, और जहां से भी आपका जीवन बदल रहा है, जहां से आपको सपोर्ट मिले, उसे और मजबूत बनाने का प्रयास करो। जब आप कुछ नहीं दिए, तब भी उसके द्वारा आपका जीवन बदल गया। आपके पास सब कुछ था — धन था, वैभव था — लेकिन आप सुखी नहीं थे; व्याकुलता थी, घुटन थी, बेचैनी थी, दुख था। जैसे ही उसके ज्ञान को सुना, आपका जीवन बदल गया, आप जीवन के रहस्य को समझने लगे, मुक्ति-मोक्ष के लिए काम करने लगे। तो अब देखो कि मैं उसके लिए क्या कर सकता हूं। वो मजबूत होगा तो आपके लिए और काम कर सकता है।
यह ठीक है — अपने अधिकार में। ऐसा नहीं कि दूसरे का काम करके दूसरे को आप कमजोर बनाओ। आप देखो कि वह काम अगर कोई नहीं कर रहा है और आपके द्वारा हो जा रहा है, तो कर दो। आप पहले तो अपना काम करिए। ऐसा भी नहीं कि अपना काम छोड़ के आप किसी और का काम करने लगें।
सत्कर्म क्यों छोड़ रहे हो? जरूरतमंद की सेवा क्यों छोड़ रहे हो? यह ना छोड़ो। ईमानदारी, सत्कर्म — कंजूस ईमानदार भी मत बन जाओ, कोई मतलब नहीं होगा। पीछे का कटेगा कैसे, जब आप कुछ करोगे नहीं?
ईमानदारी अपनाओ। जरूरत में जियो। जरूरत में जीना ही मौन है। प्रयास तो करना पड़ेगा — कोई भी काम करोगे, प्रयास तो करना ही पड़ेगा। बस उस प्रयास में दबाव ना हो, संकोच ना हो। इसका विशेष ध्यान रखो।
अगर बहुत लोग थे और हेल्प कर रहे थे, तो जरूरत नहीं थी। और पता चला बहुत लोग दर्शक की तरह देख रहे थे, तो आपको हेल्प करनी चाहिए थी। माहौल को देखना चाहिए था।
कुछ देर के लिए आराम करो, तब समझ में आ जाएगा। क्या जरूरत है — जरूरतें खुद करवा देंगी। और सर्वप्रथम पहले जरूरत बनाओ अपना आत्मिक कल्याण। आत्मिक कल्याण को अपनी जरूरत बनाना बहुत जरूरी है।
आसक्ति मतलब जिससे मोह है, जब आप उससे दूर जाते हो तो उसकी तरफ खिंचाव होता है — उसे आसक्ति कहते हैं। आसक्ति मतलब पीछे बंधन है। आसक्ति मतलब आपको उससे कुछ मिल रहा है, इसलिए उससे आसक्ति हो गई है।
देखो, मैं यही कहूंगा कि अगर कोई मां बन गई, तो बच्चे का रंग अलग है, उसकी गढ़न अलग है, लेकिन मां बन गई — बात खत्म। अब किसी से पूछोगे क्या? वैसी ही मां तुम हो। ज्ञान देने का तरीका अलग होता है, मूल वही होता है; लेकिन तरीका बदल जाता है। जैसे हर कोई मां-बाप बनता है, लेकिन सबके बच्चे का हावभाव, गढ़न, बोलचाल सब अलग होता है; वैसे ही जिसको भी ज्ञान होता है, उसका ज्ञान देने का तरीका अलग होता है।
देखो, एक बात बताएं — या तो आपको गुजरना था या पिताजी को गुजरना था। पिताजी गुजरे तो आप रो रहे हो। जाना तो पक्का है। यह देखो कि आपके रहते पिताजी के साथ आपने क्या किया था। ऐसा तो नहीं कि पछतावा इसलिए हो रहा है कि आपने उनके साथ गलत व्यवहार किया था, गलत आचरण किया था? अगर आपने पिताजी के साथ बेटे का भाव निभाया, उनसे प्रेम किया, उन्हें खुश रखा, उनका ध्यान रखा, तो फिर पछतावा नहीं होना चाहिए। जाना तो पक्का है ना। क्या करके जाते हो, किसके साथ मैं क्या व्यवहार करता हूं — वह मायने रखता है।
देखो, नियम कैसा है, आप समझो जरा। यहां क्या नियम है? क्या यह कोई आपको अलग से कुछ दिया जा रहा है? नहीं — मोबाइल स्विच ऑफ, किसी से व्यवहारिक बातें नहीं करना है और अपनों की कुटिया में रहना है, क्योंकि अपनों की कुटिया में आप सुरक्षित हो; बाहर गए तो वही प्रपंच चालू। तो नियम होकर भी नियम नहीं है। यह नियम आपको सबसे छुड़ा देगा। यह ऐसा नियम है।
रेस्ट करना होता तो अपनों की कुटिया बनाने हरियाणा में नहीं आता। अदलपुरा अपनों की कुटिया में सारी व्यवस्था हो गई थी, तो वहीं रेस्ट करता। जब तक व्यवस्था नहीं हुई थी तब तक उस व्यवस्था में लगे थे, और जैसे ही व्यवस्था हो गई, देखो आ गए यहां। यह मुझ पर कोई थोपा थोड़ी ना था। मुझे रेस्ट नहीं करना है। मेरा रेस्ट काम में है।
उसके लिए काम करो। शांति वाला काम करो। जब आपने अशांति फैलाई है तो शांत कैसे रहोगे? जब आप अशांत हो, इसका मतलब अशांति के लिए आपने काम किया। शांति चाहिए तो शांति वाला काम करो। बात खत्म। बहुत आसान है, बस समझना है।
देखिए, किसी का चरित्र अपनाओ। कुछ जपने से कुछ नहीं होगा। कहा गया है — मन में राम, बगल में छुरी। पता चला कि दिन भर राम-राम कर रहे हो और दूसरे को लूटने के लिए तैयार हो — ऐसे राम बोल के क्या मतलब है? आप करते क्या हो, उससे परिणाम आएगा; क्या बोलते हो, उससे परिणाम नहीं आएगा। हां, यह है कि कुछ ऊर्जा बोलने से मिलता है। अब उस ऊर्जा का तो आपके कर्म में ही उपयोग होगा ना। ईमानदारी-सत्कर्म करोगे और उस ऊर्जा का उपयोग करोगे तो और ऊपर उठोगे; बेईमानी करोगे और उस ऊर्जा का उपयोग करोगे तो आपका और पतन होगा। समझो जरा।
ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता कहा गया है, मतलब जन्म देने वाला। विष्णु को पालनकर्ता बोला गया है। महेश्वर को संहारकर्ता बोला गया है। जो व्यक्ति जन्म-मरण से और अपने पालन से — इन तीनों से — मुक्त हो गया हो, ऐसा व्यक्ति साक्षात परब्रह्म है: पार मतलब पार कराने वाला, परम ब्रह्म का स्वरूप। 'तस्मै श्री गुरवे नमः' — ऐसे व्यक्ति को प्रणाम है। अगर यह तीनों से मुक्त हो गया, उसे बारंबार प्रणाम है।
जब आप सारे बंधनों से मुक्त हो जाते हो — राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा के भाव से मुक्त होकर उम्मीद से भी मुक्त हो जाते हो — तब जाकर संभावना घटती है।
पानी आने से कुछ नहीं होगा। आप उनके लिए करते क्या हो — बात यह है। हमारे अंदर बहुत दया है, करुणा है, प्रेम है, लेकिन मैं उसके लिए करता क्या हूं — बात यह है। क्योंकि करने से बदलाव होगा, आंसू आने से थोड़ी ना बदलाव होने वाला है।
कभी नहीं। अगर आप सत्कर्म कर रहे हो, जरूरतमंद की सेवा कर रहे हो, तो कभी बद्दुआ लग ही नहीं सकती — चाहे कोई कितना भी दे, कोई फर्क नहीं पड़ता। और बद्दुआ वाला काम करोगे और वो बद्दुआ नहीं भी देगा, तो भी कहीं ना कहीं आपको भुगतान तो करना पड़ेगा, क्योंकि उसकी अंतरात्मा से बद्दुआ निकलेगी। तो आप कर्म पे ध्यान दीजिए; कौन क्या कह रहा है, उसे छोड़ दीजिए।
हां, नुकसान ही होता है, लाभ तो नहीं है। क्योंकि आपने नेचुरल खो दिया। आप अंदर से तो रो भी रहे हो, मुस्कुरा भी रहे हो, लेकिन शरीर ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया। अब वो भड़ास निकल नहीं रही है। तुमने एक रबड़ को किसी ताकत से खींच के रखा है; यहां से छूटेगा तो अपनी जगह ही जाएगा, और एक दिन छूटेगा। तो अंदर से तो क्रिया होती रही, प्रतिक्रिया होती रही; बाहर से आप शरीर के द्वारा निकाल नहीं पाए, तो वो आपकी घुटन का कारण बन गया। अपने दर्द को, दुख को, हंसी को निकाल नहीं पाए, तो अब वो आपको तकलीफ देगा। नेचुरल फीलिंग को आपने रोक दिया; अब वो अंदर ही अंदर हो रहा है, शरीर से निकल नहीं पा रहा है। आंसू तो अंदर से उतना निकल ही चुका है, बस आंखों से नहीं निकल पाया, तो वो सड़ेगा — आपको घुटन देगा। वो घटना थोड़ी ना भुला दोगे; यादों में रहेगी। काश अगर वहीं निकाल देते तो एक सुकून मिलता। जब-जब उस घटना की याद आएगी, तब-तब आपको दुख होगा, घुटन होगी, बेचैनी होगी, क्योंकि निकाल नहीं पाए। तो ये अब मत करना।
लेकिन तुम तो गिरते जाओगे, घुटन में चले जाओगे। तो अब ऐसा ना करना। धीरे-धीरे जैसे-जैसे समझ विकसित होगी, वैसे-वैसे फिर आप नेचुरल में आ जाएंगे। आप दूसरे की नजर में मजबूत हो — तो क्या आप मजबूत हो? क्या हम दूसरों के लिए जी रहे हैं? दूसरा तय करेगा कि मैं कमजोर हूं कि मजबूत हूं? ये तो मैं तय करूंगा ना। जहां भी रहूंगा, अपने आप को पाऊंगा; जगह बदलने से स्थिति तो नहीं बदल जाएगी। जब आपने अपनी कमजोरी को छुपाया, मजबूत बनने का प्रयास नहीं किया, तो आप जहां भी रहोगे, कमजोर ही पाओगे। अपने आप को लोगों से छुपा लिया, उससे क्या हुआ? अब आपको मजबूत दिखने के लिए और नाटक करना पड़ेगा — झूठ पे झूठ, बेईमानी पे बेईमानी — जिंदगी भर एक झूठा नाटक।
आप कुछ भी देखते हो, सुनते हो, सूंघते हो, स्पर्श करते हो, स्वाद लेते हो — सबका असर पड़ता है, चाहे जिस तरीके से लो। हर जगह अच्छा भी है, बुरा भी है। आपके शरीर में भी अच्छी जगह है, बुरी जगह भी है। नौ द्वार हमारे हैं; कुछ द्वार गंदगी के हैं, तो हम समाज के सामने नहीं खोल सकते, लेकिन उनका उपयोग हम तो करते हैं। तो लोगों के लिए बुरा है, मेरे लिए थोड़ी ना है। यहां कुछ अच्छा-बुरा होता ही नहीं; अच्छा-बुरा हमने अपनी समझ से पैदा कर दिया। यूज़ करो और आगे बढ़ो — सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो, बस खत्म बात। और इस अच्छे-बुरे से हमें परे उठना है।
कभी ना कभी तो समझोगे। अगर मैंने कुछ भीड़ में बोला और आपके लिए बोला, तो आप जहां भी रहो, कभी ना कभी तो समझ विकसित होगी और समझोगे। और समझ कैसे विकसित होगी, वो रास्ता भी तो मैं बता रहा हूं; और तुम कहां खड़े हो, वो भी तो मैं बताऊंगा — तभी तो तुम निकल पाओगे। अगर तुम्हें नहीं बताऊंगा कि तुम कहां हो, तो तुम निकल थोड़ी ना पाओगे। हमें आगे जाने के लिए पहले यह पता करना पड़ेगा कि मैं हूं कहां।
देखो, एक बार प्यार से पालना चाहे और फिर चिढ़ने लगे — मतलब तुम्हें घुटन हो रही थी। तुम उसके द्वारा अपनी घुटन को हटाए, लेकिन वो ज्यादा देर तक अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि तुम्हारी घुटन कहां से है? तुम कभी किसी में थे, वही घुटन का कारण बना; ये भी घुटन का कारण बनेगा। इसलिए अपनी समझ को विकसित करो और जरूरत में जीना चालू करो। अपनी समझ को विकसित करो कि मैं अगर यह चाहता हूं तो क्यों चाहता हूं, उसके पीछे कारण क्या है। अगर मैं अपनी जरूरत पूरी करने के लिए इसको चाहता हूं, तो कभी वो मुझ पर बोझ बन जाएगा। अगर मैं उसके लिए उसको चाहता हूं, तब तो वो कभी बोझ नहीं बनेगा। लेकिन मैं अपनी पूर्ति के लिए उसको चाहता हूं, तो एक दिन मेरी पूर्ति हो जाएगी और वो मुझे घुटन देगा।
कुछ क्षण के लिए। देखो, मैं वही कह रहा हूं — मुझे ये देखना है कि क्या मैं उसके लिए उसको खिला रहा हूं, या अपने शौक को पूरा कर रहा हूं। मैं अगर किसी को लाया हूं तो क्यों लाया हूं? किसी को कुछ खिला रहा हूं तो क्यों खिला रहा हूं — उसकी जरूरत में, या मेरा शौक है, मेरी मन की इच्छा है, मैं अपना दिल बहला रहा हूं? लेकिन कब तक बहलाओगे? एक दिन ऊब जाओगे। अगर उसकी जरूरत के लिए उसको खिला रहे हो, तब तो कभी नहीं ऊबोगे। लेकिन अपना शौक पूरा कर रहे हो, अपनी इच्छाएं पूरी कर रहे हो, तो एक दिन वही घुटन का कारण बनेगा। मुझे यह देखना है कि मैं किसके लिए किसके पास जा रहा हूं — उसकी जरूरत के लिए या मेरी जरूरत के लिए। जैसे आप लोग यहां हो, तो मैं आपके लिए यहां हूं, अपने लिए यहां नहीं हूं। मुझे जब जरूरत थी तो मैंने 12 साल भ्रमण किया। मैं आपके लिए यहां हूं, तो चाहे जितने लोग आ जाएं, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा; लेकिन अगर मैं अपने लिए यहां होता, तो कभी ना कभी मुझे आप लोगों से घुटन होने लगती। मैं कुछ कर रहा हूं तो किसके लिए कर रहा हूं — उनके लिए कि अपने लिए? अगर उनके लिए कर रहे हो तब तो आपका स्तर उठता जाएगा; अगर अपने लिए कर रहे हो तो आपका स्तर गिरता जाएगा, और कभी वही घुटन देगा। गृहस्थ जीवन में यही तो होता है — जीते हैं अपने लिए, बताते हैं उसके लिए; और बाद में सवाल उठता है कि तुमने मेरे लिए क्या किया। सब एक दूसरे को नोच रहे हैं और बता रहे हैं कि हम तुम्हारे लिए जी रहे हैं। एक ही जगह घुटन नहीं है — गुरु के पास, क्योंकि वो तुम्हारे लिए है और मुक्त है।
घुटन समाप्त होती है ना, जब तुम दूसरों के लिए जीना चालू करोगे। अगर मैं तुम्हारी जरूरत पूरी कर रहा हूं, तो जब तक तुम्हारी जरूरत पूरी होगी तब तक तुम मेरे पास रहोगे, नहीं तो तुम चले जाओगे — तो घुटन तो दे ही नहीं सकता। अगर मैं दूसरों के लिए जिऊंगा तो दूसरा मुझे कभी घुटन देगा ही नहीं।
वही तो मैं कह रहा हूं कि मैंने तो कुछ चाहा ही नहीं। उसे भूख लगी, उसने कहा मुझे भूख लगी, मैंने कहा खा लो। उसने कहा अब भूख नहीं है, तो मेरी तो चाहत कुछ थी ही नहीं — ना तो खिलाने की थी, ना ना खिलाने की। मेरी तो कोई चाहत ही नहीं थी; चाहत तो उसकी थी। उसने जैसा चाहा वैसा हुआ। मेरी उससे कोई इच्छा ही नहीं थी।
वो नहीं दे सकता तो मत करो ना। वो कीमत देने लायक बनेगा। लेकिन आपने उसे बिना कीमत दिए कर दिया, तो आप उसे अपाहिज बना रहे हैं, क्योंकि आपने उसे योग्यता से ज्यादा दे दिया। आप वो कीमत लो और सत्कर्म में लगाओ। ऊर्जा दो, ऊर्जा लो — क्योंकि अगर ऊर्जा दोगे और लोगे नहीं तो तुम एक दिन खत्म हो जाओगे, और जिसको आप ऊर्जा दे रहे हो उसकी योग्यता नहीं है तो वो ऊर्जा का दुरुपयोग करेगा। अगर वो काम चाहता है तो काम की कीमत क्यों नहीं दे सकता? झुक कर ऐसी मदद ना करो कि वो अपाहिज हो जाए। इसलिए ऊर्जा दो, ऊर्जा लो, और जितनी ऊर्जा दो उससे ज्यादा लो — तभी आप सत्कर्म में लगा पाओगे। और एक दिन इसी तरीके से आप मुक्ति से मोक्ष तक जा सकते हो। ऊर्जा चाहिए — चाहे वो धन की हो, चाहे तन की।
धीरे-धीरे आएगा। एक परीक्षा ही तुम्हें निकालेगी। एक जगह से हटने के लिए दूसरा संकल्प, उससे ऊंचा, लेना पड़ेगा; तब जाके वह जगह भी छूटेगी और जहां संकल्प लो, वह भी छूट जाएगा। एक संकल्प तोड़ने के लिए दूसरा संकल्प लेना पड़ता है। लेकिन आप संकल्प लेते हो बंधन वाला। गुरु संकल्प ऐसा दिलाता है कि आपका वो संकल्प छूट जाए और इससे भी आप मुक्त हो जाओ।
बस समझते रहो कि मैं जहां हूं वहां क्यों हूं; और अगर वहां रहना चाहता हूं तो क्यों रहना चाहता हूं, उससे मुझे क्या मिलेगा जीवन में; और मैं वहां से हटना चाहता हूं तो क्यों हटना चाहता हूं।
यहां का नियम है ना — कम से कम सात दिन रहना है। हम अगर कहीं से जाते हैं तो ऐसा करके जाएं कि मैं फिर वहां आ सकूं — जगह आने लायक छोड़ के जाऊं। तो धीरे-धीरे समझो, समझ में आ जाएगा। और एक समय ऐसा आएगा कि समझ के पार चले जाओगे — वही तुम हो। अभी जब तक समझ है, तब तक तुम उसमें लिप्त हो। एक दिन ऐसा आएगा कि समझ के पार चले जाओगे, वहां तुम हो, वहां तुम अपने आप को पाओगे। लेकिन ये समझते-समझते होगा। समझ से भी छूटना है, लेकिन समझ के समझ से छूटना है — आप सीधा नहीं छूट सकते। और समझ से जब छूट जाओगे, तो वही तुम हो। उसके बाद ही आत्मज्ञान होता है।
बता ही तो रहे हैं। बाकी समय पे बताया जाएगा — देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में बताया जाता है। आपने कह दिया कि मैं तैयार हूं, लेकिन तैयार हो या नहीं, ये तो युद्ध के मैदान में पता चलेगा — जब गले पे तलवार लटकेगी तब पता चलेगा कि तैयारी कितनी है। युद्ध में जाने से पहले तो सब वीर ही हैं। जब युद्ध के मैदान में उतारा जाएगा, सामने योद्धा होगा, तेरे हाथ में तलवार, उसके हाथ में तलवार — तब समझ में आएगा कि तेरा बलिदान कितना है। जब करने की बात आती है, तब पता चलता है कि आपकी ताकत क्या है। बस बोल देने से तुम सिद्ध भी नहीं कर सकते; सिद्ध तो तब होगा जब आपके द्वारा कुछ करवाया जाएगा। औकात तो जब परीक्षा होती है, तब पता चलता है।
ईश्वर-ईश्वर कहते हैं — ईश्वर है क्या, कहां है? वो ईश्वर कहां नहीं है, पहले तो ये पता करना पड़ेगा। ये पता कर लेंगे कि कहां नहीं है, तो जहां है वो मिल जाएगा। पहले ये पता करो कि कहां नहीं है — यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं। जिस दिन आपने फाइनल पता कर लिया कि यहां नहीं, फिर जहां है पता चल जाएगा। और क्यों जरूरत पड़ी उसको ढूंढने की? ढूंढना क्यों पड़ा? क्या ईश्वर चाहिए, कि ईश्वर से कुछ चाहिए? कुछ के लिए ईश्वर चाहिए? और कुछ नहीं चाहिए तो ईश्वर लेके क्या करोगे? और कुछ के लिए ईश्वर चाहिए, तो फिर आप सोचो आपकी स्थिति क्या है। ईश्वर को ढूंढने की जरूरत नहीं है। जहां तक हो सकता है, आप अपने कर्म को ईमानदारी से करिए — जैसा आपको कर्म मिला है। ये देख लीजिए कि कर्म से समाज का हित होना चाहिए, बस बात खत्म। उसी में आपका कल्याण छिपा हुआ है। अगर आपके कर्म के द्वारा लोगों का कल्याण होगा तो आपका भी होगा; लोगों का अगर अहित होगा तो आपका भी अहित होगा। सीधा सिद्धांत है, इस सिद्धांत को समझ लो। आपके द्वारा क्या हो रहा है वो देख लो — उसी से आपका उद्धार होगा, उसी से बंधन होगा। आज जितने भी इस संसार में पूजनीय हैं, वो अपने कर्म से पूजनीय हैं। अगर कर्म हटा दो तो उन्हें कोई नहीं पूछेगा। तो ऐसा कर्म करो कि पूजनीय बन जाओ — पूजनीय मतलब सम्मान के योग्य, और सम्मान के योग्य तभी बनोगे जब समाज हित के लिए कार्य करोगे। और वही कार्य आपको इस भवसागर से निकाल देगा। इतनी सी बात है, सीधी-सीधी बात है।
ढूंढने से मुक्त होगा। परमात्मा अगर बाहर नहीं तो अंदर भी नहीं — अंदर-बाहर से परे है। क्योंकि अंदर भी एक दायरा है; अंदर-बाहर है तो दायरा है — ना अंदर, ना बाहर। मैं तो कह रहा हूं, देखिए, कुछ ढूंढने की जरूरत नहीं है। आपको जीवन मिला है; जीवन जीने के लिए इस संसार में दो रास्ते हैं — एक ईमानदारी-सत्कर्म, जिससे सबका हित होगा: आपका भी, समाज का भी, परिवार का भी; और दूसरा बेईमानी-दुष्कर्म, जिससे सबका अहित होगा। यही दो रास्ते हैं, चुनाव कर लो। ये फैसला आपके हाथ में है। यही मेन है — दो रास्ते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा अगर आपको समझ में आएगा तो पकड़ लो, लगन से उसमें काम करते रहो। समझ के निकलो, सीधी सी बात है। मैंने खोजने में जितनी मेहनत की, उतनी बांटने में कर रहा हूं। मैं अपना काम कर रहा हूं — जिसको समझना है समझ ले; ना समझे तो समझने की क्षमता मैं नहीं दे सकता। मेरा काम है बस बोलना।
कर्ता का अधिकार है हाथ में। कौन कहता है हाथ में नहीं है? हाथ में नहीं होता तो इतना प्रयास क्यों किया जाता? हाथ में है। देखिए, किसी भी जीव का जन्म हो रहा है — धन-ज्ञान लेके पैदा हो रहा है या कर्ज लेके पैदा हो रहा है — हो तो रहा है; हाथ में है तभी तो हो रहा है ना। एक आदमी पैदा होते ही राजा बन गया, एक झोपड़ी वाला कर्ज में — उसके बाप ने अनेक कर्ज लिए हैं, उसको मिटाना पड़ता है। पैदा होते ही कर्ज में है, पैदा होते ही राजा है। तो हाथ में लेके तो आया — या प्लस में या माइनस में। आता ही आता है।
कोई बात नहीं है। कांटा चुभने के लिए ही पैदा हुआ है। कितनी भी सेवा करोगे, चुभेगा। तो आप सेवा करिए; अगर चुभे तो बचा लीजिए, बस चुभने मत दीजिए। उसका स्वभाव है चुभना — उससे दूर रहना। बस।
दोनों को नहीं होता है। जैसे एक पागल है, मंदबुद्धि है, तो भोग से उसे मतलब ही नहीं है। भोग तो कृष्ण भगवान ने भी किया, राम ने भी किया — तो बच्चे कैसे पैदा हो गए? गुरु नानक के दो बच्चे थे; कई ऐसे महात्मा हो गए। ईमानदारी ब्रह्मचर्य है। शरीर का ब्रह्मचर्य रखने से क्या होगा? चले जाओ पागलखाने में — बचपन से पागल है, मंदबुद्धि है, पूरा ब्रह्मचर्य है — क्या हो गया? उससे कुछ नहीं होगा। एक और नया अहंकार कि देखो मैं ब्रह्मचारी हूं। राग-द्वेष पैदा हो जाएगा, दूसरों को आप तुच्छ समझेंगे। ईमानदारी ब्रह्मचर्य है — ईमानदार रहो बचपन से, वो ब्रह्मचर्य है, उस ब्रह्मचर्य को रखो। शरीर का ब्रह्मचर्य रखोगे तो अहंकार हो ही जाएगा।
बुद्धि से जानकारी का आदान-प्रदान होता है। मन शरीर के लिए काम करता है। अब देखिए, ये वस्तु हमें दिख रही है — तो क्या ये सीधा दिख रही है? उजाले की वजह से दिख रही है। अभी अंधेरा हो जाए तो क्या हम इसे देख पाएंगे? इसको देखने में उजाला निमित्त है, तो परमात्मा को देखने में परमात्मा ही निमित्त बनेगा, तभी देख सकते हो, नहीं तो नहीं देख सकते। इस वस्तु को देखने के लिए उजाला निमित्त, हमारी आंख निमित्त — एक वस्तु को देखने के लिए कितने का सहारा लेना पड़ा। उजाला हटा दो तो आंख भी वही, वस्तु भी वही रहेगी, पर दिखेगी नहीं। तो परमात्मा को देखने के लिए सत्संग, समाज — बहुत सारी चीजें निमित्त बनेंगी, ऐसे नहीं दिखेगा। संसार की कोई चीज पाने के लिए बहुत चीजें सहायक होती हैं, वैसे ही परमात्मा को देखने के लिए भी बहुत सहायक होते हैं।
राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए जब भाव जगता है, तो उसे वैराग्य कहते हैं। वैराग्य मतलब इस संसार से अलग होना। संसार मतलब — लालच, मान की इच्छा, दिखावा, ज्यादा पाने की इच्छा — ये है संसार। परमात्मा की सृष्टि में तो आनंद है; तुम्हारी सृष्टि में गड़बड़ है। तुम्हारी सृष्टि का निर्माण हुआ है मान से, दिखावा से, योग्यता से ज्यादा पाने के चक्कर में, बड़ा बनने के चक्कर में — बस इतनी सी बात है। इतने में आपकी सृष्टि का निर्माण हुआ है, और उस सृष्टि में दुख ही दुख है।
निकलने का ज्ञान प्राप्त करो। मैं कोई वस्तु कैसे देखूं? उजाला हो और आंख ना हो तो भी नहीं दिखेगा; आंख है, उजाला नहीं, तो भी नहीं दिखेगा — दोनों चाहिए। ज्ञान भी चाहिए, समझ भी चाहिए, आत्मज्ञान चाहिए — उसके बाद दिखेगा, ऐसे नहीं।
शुरुआत में तो बोल दिया गया कि "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ, लेकिन थोड़ा इसे पलटते हैं। जब आप किसी के लिए कुछ करते हो और आपको उसके बदले में कुछ नहीं चाहिए, तो आप प्रेम में उतर जाते हो, और जब प्रेम में उतर जाते हो तो आप आनंद में उतर जाते हो। जब आप किसी के लिए कुछ करते हो और आपको कुछ नहीं चाहिए, उस समय आप होते हो — उस समय आप प्रेम में होते हो, और जब आप होते हो तो वहां आनंद होता है, क्योंकि आप में आनंद है। लोग क्या कहते हैं वो छोड़ दीजिए; आप कैसे जीते हो, किस भाव से जीते हो, आप किस स्थिति में खड़े हो, वो देख लीजिए। प्रेम दर्शाने के लिए कोई चाहिए — प्रेम अकेले में पैदा नहीं होगा; आनंद आप में पैदा होगा, लेकिन जब आप प्रेम में उतरोगे तभी आनंद पैदा होगा। प्रेम में जब आप उतरेंगे, तब आप होंगे, और आपको सामने वाले से कुछ नहीं चाहिए — आप सामने वाले के लिए कुछ कर रहे हैं और आपको कुछ नहीं चाहिए। दो हो गए, पर जब कुछ नहीं चाहिए तो दो होते हुए भी दो नहीं हैं। जब कुछ नहीं चाहिए तो द्वैत कहां हुआ? एक खड़ा है, लेकिन एक को कुछ नहीं चाहिए, तो एक ही है। कुछ बातें बस समझी जा सकती हैं, समझाई नहीं जा सकतीं, क्योंकि शब्दों के साथ भावनाएं भी होती हैं। अगर आप शब्द को पकड़े और भावनाओं को नहीं पकड़े, तो आप नहीं समझ पाओगे।
प्रेम जहां कुछ नहीं चाहिए वहां होता है। प्रेम जब होता है तो एक से नहीं होता — जब प्रेम होता है ना, तो सबसे होता है। एक से जो होता है, वो तो आकर्षण है हार्मोन का। आजकल उसको प्रेम समझ लिया है, तो आपकी गलती है। यही तो प्रेम को विकृत कर दिया है। ये तो एक आकर्षण है नर-मादा का। जानवर को देख रहे हो — एक कुतिया के लिए सब कुत्ते लड़ जाते हैं, और जो कुत्ता जीतता है उसके साथ हो जाती है; और संबंध होने के बाद वो कुत्ता जाके कहीं छांव में सो जाता है, उसे उस कुतिया से कोई मतलब नहीं। ऐसी ही हमारी भी जिंदगी है। हम एक दूसरे को नोच रहे हैं — जब तक मिलता रहेगा तब तक हम आपके पास हैं; मिलना बंद हो जाएगा तो आप जैसा बुरा कोई नहीं। कल तक उसकी उम्र बढ़ाने, नौकरी-व्यापार बढ़ाने की प्रार्थना करते थे, और आज कहते हैं इसका नाश हो जाए — क्यों? क्योंकि आपके तरीके से अब नहीं हो रहा है, अब आप नोच नहीं पा रहे हो। नोचने-नुचवाने को आपने प्रेम समझ लिया। उस नोचने को प्रेम का नाम दे दिया, बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं। वो प्रेम नहीं, आकर्षण मात्र है — वो भी विपरीत लिंग का। बारह साल के बाद लगभग उत्तेजना आती है, फिर अपने आप विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण हो जाता है — वो नेचुरल है, आपके शरीर में है।
एकदम। अगर कुछ नहीं चाहिए, तो पक्का वो तो अथाह प्रेम है। प्रेम तो प्रेम होता है। अगर कुछ नहीं चाहिए और आपने उस पर क्रोध किया — ये साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता। अगर कुछ नहीं चाहिए, तो पक्का वो व्यक्ति साधारण नहीं होगा।
आप अपना काम करिए — जिस तरीके से आप काम कर सकते हैं, उस पद वाला काम करो। आपको गुस्सा करने की जरूरत नहीं है। एक बार उन्हें सचेत करिए; अगर दोबारा नहीं मानते हैं, तो आपसे जो सीनियर हैं वहां शिकायत भेज दीजिए — ऐसा-ऐसा बात है — इंक्वायरी होगी, बात खत्म। आपको बोलने की भी जरूरत नहीं है, सीधी सी बात है। इंक्वायरी में पक्षपात हो रहा है, कोई बात नहीं। अगर वो झूठ को सच सिद्ध कर सकता है और आप सच को सच सिद्ध नहीं कर सकते, तो फिर आप वहां ना रहें, ज्यादा अच्छा है। खुद का काम करो ना — ऐसा कि कोई निकाल ही ना पाए।
वो निष्काम सेवा हुआ, सत्कर्म हो गया — उससे भी आनंद की स्थिति आती है, ये भी वहीं तक पहुंचाता है। अब आप जिसे जानते हैं, जिसके साथ रहते हैं, उठते-बैठते हैं, उनके लिए कुछ करिए और कुछ नहीं चाहिए — एक बार नहीं, दो बार, तीन बार — फिर आप देखिए आप में कैसे चेंज आता है। देखो ना, अपने घर पे एक दिन मेहमान आता है, अच्छा लगता है; हाथ में मीठा लेके आए तो अच्छा लगता है। दूसरे दिन होता है कब जाएगा, तीसरे दिन लगता है ये तो एकदम पका रहा है। क्यों बदल गया भाव? अगर वो पहले दिन ही कहता जाऊंगा, तो दूसरे-तीसरे दिन वाला भाव नहीं आता। तारीफ भी दो दिन अच्छी लगती है। प्रेम कभी बदलता नहीं है — आप उसके साथ चाहे जितना भी रहो, वो बदलता नहीं। आप किसी के साथ दो-चार दिन रहिए, पता चल जाएगा वो प्रेम है या नहीं। प्रेम में आप चाहे जितने दिन उसके साथ रहिए, उसका वैसा ही बर्ताव रहेगा, कभी बदलेगा नहीं।
"करो" शब्द नहीं जमता है। करो में एक प्रयास है। प्रेम होता है, करना नहीं पड़ता है। कुछ नहीं चाहिए और आप किसी के लिए कुछ कर रही हैं, तो वो स्थिति होती है। मैं तो कह रहा हूं, कुछ ना बोलो, बस समझ लो उसको। मैं इसलिए कुछ बोल नहीं रहा हूं, क्योंकि उसके लिए कोई दूसरा रूप है ही नहीं। आप उसके साथ जी रहे हो और आपको कुछ नहीं चाहिए — प्रेम है।
गुरु-शिष्य का रिश्ता देखिए — अगर पॉइंट को पकड़ेंगे तो गुरु को भी कुछ नहीं चाहिए, शिष्य को भी कुछ नहीं चाहिए; उसे "कुछ नहीं चाहिए" में आना है। तभी गुरु-शिष्य है, नहीं तो नहीं। एक "कुछ नहीं चाहिए" की स्थिति में है, और एक "कुछ नहीं चाहिए" में आना चाहता है — दोनों को एक दूसरे से कुछ नहीं चाहिए, तभी तो वहां आनंद रहता है। बाकी जितने भी रिश्ते हैं, सबमें हमें कुछ ना कुछ चाहिए — पिता हो, माता हो, भाई हो, बहन हो, कोई भी हो। और गुरु ऐसा है कि अब जा सकते हो, रह सकते हो; बाकी रिश्तों में नहीं छोड़ेंगे तुम्हें। गुरु के पास चाहे जब आओ, चाहे जब जाओ — बस वो इतना कहता है, अपना ख्याल रखना। हां, खंभे के अंदर रहे तो जैसा मैं कहूंगा वैसा जीना पड़ेगा, सिस्टम में। और एक बात — अगर आप जा रहे हो तो आने लायक छोड़ना।
वो मोह है, प्रेम नहीं — मेरी बेटी, मेरा बेटा। अपने बच्चों से ज्यादा लगाव रहता है, दूसरे बच्चों से कम — वही तो मोह है। बच्चों से मुक्त होने के लिए कुछ नहीं — "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ। फिर उनसे भी, फिर सबसे होगा — आप प्रेम में ही जिएंगे, सबसे ही प्रेम रखेंगे।
वो तो फिर आगे की यात्रा है — प्रेम, आनंद, फिर परमानंद, बस बात खत्म। यहां तक मैं बता सकता हूं। आगे देखो — परमानंद के बाद और कुछ रहा तो मिल लेंगे उनसे भी। अभी तो हम ये समझ रहे हैं कि परमानंद की यात्रा आखिरी होगी; अब वहां जाके पता चला कि नहीं, इसके आगे भी कोई है, तो कहूंगा चलो मिलते हैं — क्योंकि कुछ नहीं चाहिए हमें। लेकिन जहां तक मुझे मालूम है, मैं जिससे हूं, अगर मेरा उससे मिलना हो गया, तो मेरा तो काम खत्म हो गया।
जैसी आपकी सामर्थ्य, योग्यता। ज्ञान मार्ग में अकेले चलना होगा, और भक्ति मार्ग में इष्ट का सहारा है — तो आप देख लो कैसे आपको चलना है। भक्ति मार्ग में आप किसी पर निर्भर हो, और ज्ञान मार्ग में आपको अपने आप पर निर्भर होना पड़ेगा।
हां, कुछ तो होता है। अभी एक जन सीधा आ रहे थे, मुझे उनको मना करना पड़ा। कोई छू दे तो उसका मतलब ये नहीं कि कूदते रहो — हमें हर बार धोना पड़ता है, मैं थक जाता हूं। कहने का मतलब है, एक मर्यादा होनी चाहिए। मैं भी किसी को नहीं छूता हूं। मेरा भी भाव यही है कि प्रणाम दूर से होना चाहिए। गले लगाने का मतलब ये नहीं कि आप अपनी मर्यादा खो दो — आप अपनी जगह, हम अपनी जगह। उनकी ऊर्जा को छूना तो आसान है, लेकिन उसको संभालना आसान नहीं है — इसलिए वो छूने नहीं देते। मैं भी नहीं छूने देता।
जब व्यक्ति के शरीर में बुखार रहेगा, आप कुछ समय के लिए छू दीजिए, उतने अंग में आपके बुखार आ जाएगा — आता है कि नहीं? आप आजमा सकते हो। बर्फ को हाथ में ले लो, फिर छोड़ दो — उतना हाथ ठंडा हो जाएगा। लोहा जलता हुआ लाल हो और हाथ में ले लो, फिर क्या होगा? वही बात है — एनर्जी। जिनका अपने प्रति भाव शुद्ध हो, उनका ही पैर छूना चाहिए। और अगर आप एक गुरु का पांव छू रहे हैं — क्या सच में आपको कुछ नहीं चाहिए? क्या सच में कुछ नहीं चाहिए में गले मिल रहे हैं? तब तो ठीक है। कुछ नहीं चाहिए में छू रहे हो तब तो बहुत अच्छा है, तब तो आपका स्तर उठ जाएगा। लेकिन अगर आप "कुछ चाहिए" में छू रहे हो, फिर आप गिर जाओगे।
चरणों की तो महिमा है। पर जहां हम खड़े हैं, वहां तो "चाहिए" में ही पैर छुए जाएंगे। अगर वो उस स्थिति में हो जाएगा, तो पैर क्यों छुएगा? आत्मिक भाव में, बस उसी में पैर छूना चाहिए — कुछ नहीं चाहिए में। अंदर से भले मुश्किल हो, उस चरण को पकड़कर भाव बनाइए कि कुछ नहीं चाहिए। क्योंकि अगर आपने "चाहिए" का भाव बनाके उसके चरण को छुआ, तो ऊर्जा तो है ही, आपको मिलेगी — और आप गिर जाओगे, उसमें वो भी कुछ नहीं कर सकता। जो भाव आपने बनाया, वही रिसीव होगा। और अगर आपने "कुछ नहीं चाहिए" में पांव छुआ, तो ये आपके स्तर को उठा देगा। ये भाव बनाना होगा, ये भाव आपको पैदा करना होगा।
ट्रांसफर तो उससे भी होगा — पॉजिटिव, नेगेटिव। गुरु के पास सात्विक ऊर्जा है। जो "चाहिए" में लोग जी रहे हैं, उनसे तामसिक ऊर्जा भी ले सकते हैं। अगर वैसे व्यक्ति को छू रहे हो — भाई, आपने हाथ डाला गटर में तो साथ में क्या आएगा? और शुद्ध जल में डाला तो शुद्ध जल। बस इतनी सी बात है। तो ये भी समझदारी का विषय है कि किसका पांव छू रहे हैं — कहीं भी माथा मत पटक दो। देखा-देखी भेड़ जैसे नहीं करना चाहिए। आप कुछ भी स्पर्श करते हैं, तो वहां से ऊर्जा आती है और जाती भी है — आदान-प्रदान दोनों होता है। ये ना समझना कि बस आप ही ले रहे हो। किसी का पांव छुएं, तो सोच-समझ के छुएं।
चरित्र अपनाने से होगा, सिर्फ अगरबत्ती दिखाने से नहीं। आपको लगता है तो आप रख सकते हो, कि जिसकी तस्वीर देखते हो उससे आपको प्रेरणा मिलती है — लेकिन चरित्र रखना ही सब कुछ होगा। सिर्फ तस्वीर रखने से कुछ नहीं होगा। तस्वीर देखने से बस कुछ नहीं होगा; उसका चरित्र अपनाने के लिए तस्वीर रखो — गुरु का चरित्र।
क्योंकि आप एक सामाजिक प्राणी हो, और आप अपने हाथ से सम्मान का आदान-प्रदान करते हो। इससे एकाग्रता बढ़ती है आपकी। हम लोगों की अक्सर आदत होती है आंखों में हाथ लगाने की — नहीं होनी चाहिए। इससे सहनशीलता भी बढ़ती है, सहन शक्ति भी बढ़ती है। अगर आप हर समय कहीं ना कहीं हाथ लगा रहे हो, तो आपकी उतनी एकाग्रता नहीं रहती, ध्यानपूर्वक आप फिर काम नहीं कर पाते। ये भी सीखनी चाहिए। मैं तो टोक देता हूं — नौ दरवाजों में जब भी हाथ लगाओ तो हाथ धो लो। हर समय लगाने की क्या जरूरत है? नौ दरवाजों से गंदगी निकल रही है; जब साफ करना हो, जाके धो लो। हाथ में रुमाल क्यों होता है? कि आप छींक रहे हैं तो रुमाल लगा लें, नहीं तो हाथ लगा लें और जाके हाथ धो लें। शुद्धता होनी चाहिए। बाहरी शुद्धता से आंतरिक शुद्धता होती है। बाहरी शुद्धता जरूरी है। अपने आप स्वच्छता करके देखिए।
हां, रखना ही चाहिए। पर बाहर का क्यों नहीं खाओगे? बाहर निकल जाओगे तो बाहर का खाना ही पड़ेगा। अब ट्रेन में दो दिन का सफर है — ट्रेन का नहीं खाओगे तो कहां-कहां खाओगे? ट्रेन में तो चूल्हा नहीं जलाओगे। दो-तीन दिन तक का तो ले जाओ। अपनी तरफ से शुद्धता रखो।
इस जन्म का भी अगर हम — मैं आपको बताता हूं मेरा अनुभव, पता नहीं आप लोगों का क्या है — इस जन्म का भी अगर हम अपना हिसाब-किताब करें, तो हम बोलेंगे कि इतना कम है, सजा के उधर उल्टा लटका दो और नीचे आग लगा दो, और तुम लोग चले जाओ, मुझे तड़पने दो। अगला छोड़ दीजिए — इसी जन्म का अगर आपको ही आपका हिसाब-किताब करना हो, तो कहोगे कि मुझे एक पेड़ पे उल्टा लटका दो, बस आंच लगनी चाहिए, आग लगा दो और मुझे छोड़ के आप लोग चले जाओ। हमें तो ऐसा लगता है; आपको भले ना लगे।
देखो, अब आगे क्लास में चले गए आप। अब आगे क्या दिख रहा है, वो देखिए। अभी तो आपको देखना है माता जी — किससे मालूम पड़ेगा? आप ही को मालूम पड़ेगा, और किससे मालूम पड़ेगा? या तो आप वापस जाइए कीर्तन वाले में।
नहीं, ऐसा नहीं। उसके लिए आपको काम भी करना पड़ेगा। अपने गुरुदेव का चिंतन किया तो उसके लिए काम करना पड़ेगा। चिंतन करने से थोड़ी ना हो जाएगा — चिंतन करने से कोई राजा बन जाएगा? उसके लिए कर्म भी होना चाहिए ना; चिंतन के बाद कर्म भी तो होना चाहिए। भृंगी नाम का कीड़ा होता है — वो एक बिल बनाता है, उसमें कीड़े को लाके रखता है, ध्वनि करता रहता है, करता रहता है; बाद में वो कीड़ा उसके जैसा हो जाता है। हर कीड़े को नहीं लाता — जो उसकी तरफ सीधा हो जाता है, उसी को लाता है। इसमें गुरु-शिष्य का उदाहरण दिया गया है कि गुरु फूंक मार-मार के अपने जैसा बना देता है। गुरु भी उसी शिष्य को पकड़ता है जो गुरु के मत को ग्रहण करता है — गुरु भी उसी को डंक मारता है। इसलिए तो मैं कह रहा हूं, गुरु डंक मारता रहता है।