प्रश्नोत्तर P14-0034 · भाग 14
गुरु जी, कुछ साधु खड़े-खड़े तपते हैं, उनके शरीर में कीड़े पड़ जाते हैं — वो किस भाव से तपते हैं?
मायने ये है कि किस भाव से तपते हैं — उससे कुछ पाने के लिए। कुछ के लिए परमात्मा चाहिए। और कुछ नहीं चाहिए तो परमात्मा लेकर क्या करोगे? वो ना मुक्ति दे सकता है, ना मोक्ष; अगर वो देता तो पूरे समाज को, पूरे ब्रह्मांड को दे देता। हम परमात्मा नहीं ढूंढ रहे, परमात्मा से कुछ चाहिए। सारा झंझट, सारा खेल माल का है — घुमा-फिरा के नाम, शोहरत, पैसा। जो अस्तित्व खड़ा है वह कमजोर दिख रहा है; भौतिक के नाम से अस्तित्व नहीं बन पाया तो अब अध्यात्म के नाम से एक नया अस्तित्व तैयार करूंगा कि मैं भी कुछ हूं। और मेरा होना ही मेरा भटकाव है। मुझे मिटना पड़ेगा, तभी कुछ होगा। एक वस्तु मिटती है तभी दूसरी बन पाती है — गेहूं मिटा आटा बना, आटा मिटा रोटी बनी; बीज मिटा वृक्ष हुआ; दूध मिटा दही हुआ, मक्खन मिटा घी हुआ। आप मिटने के लिए तैयार नहीं, अपने आप को बचा भी रहे और साधना भी कर रहे — गेहूं को भी बचाओ और आटा भी बना दो, ऐसा नहीं हो सकता।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: जीवन में तप का महत्व / #योगीजी_का_सत्संग #जीवन #तप #महत्व #satsang · 2024-08-05