क्लाइंट से फीस लो, ईमानदारी से। और क्या, बिना फीस का काम करेंगे तो खाएंगे क्या? और हमें भी हमारे काम में सहयोग करें। आपको लाभ हो रहा है। फीस लेंगे तभी काम कर पाएंगे।
कमी का मतलब यह नहीं था कि अंदर कोई बेईमानी की कमी थी, कि मैं किसी बेईमानी में फंसा था, या मैं विकारों में लिप्त था। कमी तो इतनी थी ही कि अपनी उपलब्धि नहीं थी। लेकिन मैं विकारों में नहीं फंसा हुआ था। ऐसी कोई आदत नहीं थी जिसकी वजह से मैं परेशान था, ऐसा लगे कि मैं गलत कर रहा हूं। ऐसी हमारी कोई आदतें नहीं थीं। तो यह तो कमी थी ही कि मेरी उपलब्धि नहीं हुई थी, और मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता था। यह दोनों बात थी।
कमी का मतलब मैंने यह कहा कि मेरी ऐसी कोई आदत नहीं थी जो मेरे आत्मिक कल्याण में बाधा बन सकती थी। ऐसी कोई आदत नहीं थी मेरी। ऐसा कुछ मुझे छोड़ना नहीं था। चाहे वह मोह की बात हो, चाहे लालच की बात हो। ऐसा कुछ नहीं था मेरे अंदर कि मुझे छोड़ने के लिए कहीं जाना पड़ा। मैं अगर निकला, तो कुछ खोज में निकला। कभी भगवान की खोज में, कभी परमात्मा की खोज में, कभी आत्मज्ञान की खोज में, कभी लोगों के आत्मिक कल्याण के लिए, कि मुझे मार्ग मिल जाए, कि मैं लोगों को रास्ता बता पाऊं। उसकी खोज में तो खोज तो थी ही।
खोज कोई कमी नहीं होती है। आप यह मत समझिए कि खोज कोई कमी होती है। अगर कोई व्यक्ति खोज कर रहा है, एक वैज्ञानिक खोज करता है, तो आप यह मत समझिए कि उसके जीवन में उसकी कोई कमी है। उसने देखा कि नहीं, मुझे तो जीवन में कुछ करना ही है। तो मैंने समाज में यह कमी देखी कि लोगों को जरूरत है, और समाज को जरूरत है। मैं करने के लायक हूं, तो क्यों न मैं इनके लिए कर दूं। तो ऐसा नहीं कि कोई व्यक्ति खोज रहा है, तो उसके अंदर कोई कमी ही है। ऐसा नहीं है। व्यक्ति कभी अपनी जरूरत के लिए खोजता है, तो कभी लोगों की जरूरत उसे दिखती है, उसके लिए खोजता है। तो आप यह मत समझिए कि किसी कमी की वजह से ही आदमी चलता है, कि व्यक्तिगत उसकी कोई कमी है। नहीं, सामर्थ्यवान व्यक्ति भी खोज करता है, लोगों के लिए।
आत्मज्ञान की खोज की जरूरत इसलिए पड़ी कि जहां मैं था, वह मुझे नहीं चाहिए था। नाम, शोहरत, पैसे, वह सब मुझे नहीं चाहिए था। चाहे वह परिवार था, मोह था, मेरे लोग थे, वह मुझे नहीं चाहिए था। तो मुझे क्या चाहिए था? उसकी मैं खोज करूं, आखिर मुझे क्या चाहिए? सीधा मैं आत्मज्ञान की खोज में नहीं निकल गया।
एक परमात्मा-सत्ता के बारे में सुना था। भगवान के बारे में सुना था। देवी-देवताओं के बारे में सुना था। तो वहां से मेरी यात्रा शुरुआत हुई। ऐसा नहीं कि हम सीधा आत्मज्ञान की खोज में निकल गए। जब मैं खोज में निकला, चाहे वह तंत्र हो, चाहे मंत्र हो, मंत्रों का उच्चारण करना, उससे शक्तियां मिलेंगी, उससे समाज का उद्धार कर सकते हो, और उन मंत्रों के द्वारा भगवान से भी मिला जा सकता है। फिर ऐसे खोज करते-करते पता चला कि जीवन में सबसे जरूरी अगर कुछ है, तो आत्मज्ञान, आत्म का ज्ञान, स्वयं का ज्ञान। उसके लिए मुझे हर जगह से निकलना पड़ेगा, जहां-जहां, जिसके लिए मैं कुछ करना चाहता हूं। तो सीधा आत्मज्ञान की खोज नहीं हुई। धीरे-धीरे हुआ। पहले तो दो हजार ग्यारह में यह हुआ, कि अब क्या चाहिए मुझे?
क्योंकि नाम, शोहरत, पैसे, जितनी मेरी सामर्थ्य थी, जितने के लायक मैं था, जितना मुझे चाहिए था, मिल गया था। तो मुझे उसमें रस नहीं आ रहा था। तो मैंने देखा कि आगे क्या है, इसके आगे क्या है। यह कमाना-खाना, इसके आगे भी कुछ है। क्योंकि मुझे न प्रॉपर्टी बनानी थी, न मुझे परिवार बसाना था। मुझे ऐसा कुछ करना नहीं था। मुझे कुछ संचय नहीं करना था, अपने लिए कुछ बनाना नहीं था। तो मैंने कहा, इसके आगे क्या? क्योंकि मैंने धन कमा के देख लिया, मैं संसार में जी कर देख लिया, तो मुझे वहां रस नहीं आया। तो हमने कहा, इसके आगे क्या? इसके आगे परमात्मा है, देवी है, देवता है, अनंत शक्तियां हैं। तो क्यों नहीं इनकी खोज की जाए। तो मैं उस खोज में निकल गया, और वह खोजते-खोजते आज मैं यहां हूं।
क्योंकि वे एक दायरे में जीते हैं। और जो समझ को विकसित कर रहा है, वह सही और गलत से ऊपर उठना चाहता है, कि कहीं सही और गलत के ऊपर भी कुछ है, जहां मैं हूं। इसलिए वह अपनी समझ को विकसित कर रहा है।
बस आप ईमानदारी से जियो, और सत्कर्म में रहो, और देखो आपको जीवन में क्या चाहिए। आपको जीवन में क्या चाहिए, उस लायक आप हो जाओ, और जो चाहिए उसके लिए काम करो।
नहीं, बात बाप की नहीं है। आप जिसके साथ रह रहे हो। कुछ ऐसे कर्म होते हैं कि अगर वह कुछ करता है, तो प्रभाव आप पर भी आता है। कुछ ऐसे कर्म होते हैं जो अकेले भोगने पड़ते हैं। जैसे एक बीमारी है, तो बीमारी आपको अकेले भोगनी पड़ेगी। अब उसमें आर्थिक रूप से, जितने लोग आपसे जुड़े हैं, आर्थिक के लिए सब परेशान होंगे।
तो जिसके साथ आप रहते हो, अगर आपके जीवन में कुछ भी होता है, उतार-चढ़ाव, तो उसका असर आपके साथ वालों पर भी पड़ता है। चाहे वह मां-बाप हों, चाहे कोई भी हो, जहां भी आप रह रहे हो। कुछ भी आपके जीवन में होता है, या उनके जीवन में कुछ होता है, और आप एक-दूसरे के साथ रहते हो, तो उसका असर एक-दूसरे पर पड़ता ही है।
हां, सामर्थ्यवान बनो, जिसके साथ हो। इतना सामर्थ्यवान बनो कि उसके अंदर जो डर है तुम्हें संभालने का, वह निकल जाए। इतना आश्रित मत रहो कि वह जीवन में कुछ कर न पाए। अगर वह चाहता है, तो आप इतने सामर्थ्यवान बनो कि उसका डर हट जाए। हमेशा सामर्थ्यवान बनने की कोशिश करो। किसी पर इतने निर्भर मत हो जाओ कि वह अगर आगे भी कुछ करना चाहे, तो जीवन में कुछ कर न पाए। हमें सामर्थ्यवान बनने की जरूरत है, और सामर्थ्यवान होने के लिए हमें मेहनत करना होगा, काम करना होगा। तो अपने आप को काबिल बनाने का प्रयास करो। आप जितनी मेहनत किसी पर आश्रित होने के लिए कर रहे हो, उतनी मेहनत अगर आप अपने आपको सामर्थ्यवान बनाने के लिए करते, तो हो जाते। गुलामी से मुक्त होने के लिए काम करो। गुलाम मत बनो।
इस संसार में एक सीखने वाला है, एक सिखाने वाला। आपको किसी न किसी पर निर्भर होना ही पड़ेगा। जिस पर आप निर्भर हो, वह भी कभी किसी पर निर्भर था। यह प्रकृति का नियम है कि यहां हम एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे को सहारा देकर ही हम एक-दूसरे को उठा सकते हैं। अब मुझे देखना है कि अगर मैं उठना चाहता हूं, और अगर मुझे कोई आश्वासन दे रहा है, तो क्या मैं उस लायक हूं? और जो आश्वासन दे रहा है, क्या वह उठाने वाला काम मुझसे करवा रहा है? यह देखना है। क्योंकि अगर आप परमात्मा से भी प्रार्थना करोगे, तो कोई मानव ही आएगा। सीधा परमात्मा, कोई सत्ता, आकर मदद नहीं करने वाला। किसी को निमित्त बनाएगा।
आप जब आश्वासन लेते हो, देते हो, तो देखो, जो आश्वासन आप ले रहे हो, क्या उसके लायक हो? वह जरूरत आपकी है। क्या उसके लिए काम कर सकते हो? यह देखो। क्योंकि यहां कुछ काम करके ही मिलेगा। फ्री में यहां कुछ नहीं मिलता। आपको कर्म करना ही पड़ेगा। यह दुनिया ही आश्वासन पर टिकी हुई है। जब आश्वासन ले रहे हो, दे रहे हो, तो आप अपनी योग्यता जांच लो उस समय। क्या मैं आश्वासन दे रहा हूं, तो मैं उस योग्य हूं? क्या मैं आश्वासन ले रहा हूं, तो मैं उस योग्य हूं कि मैं इस आश्वासन पर काम भी कर पाऊंगा? क्योंकि यहां हम एक-दूसरे के पूरक हैं।
आपको एक गिलास पानी भी चाहिए, तो कुछ देर के लिए, आपका परिवार हो, चाहे कोई भी हो, रिश्ते मत देखो। एक गिलास पानी भी अगर चाहिए, तो कुछ देर के लिए वह आश्वासन देगा कि मैं ले आ रहा हूं। अब वह आएगा या नहीं आएगा, वह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन कुछ देर के लिए आपको आश्वासन में रहना ही पड़ेगा। हमारी मृत्यु कब आ जाए, पता नहीं है, लेकिन कल का मैं प्लानिंग कर रहा हूं। मेरे जीवन का पता नहीं है कि मेरा अगले क्षण अंत हो जाए। लेकिन मैं उस आश्वासन में जी रहा हूं कि मुझे यह करना है। पक्का नहीं कि मैं कल रहूं या न रहूं। जिनसे मैं वादा कर रहा हूं, जरूरी नहीं। हो सकता है अगले क्षण मैंने प्लानिंग किया, और वह गया, और मैं मर गया। आश्वासन पर पूरी दुनिया टिकी हुई है।
लेकिन जब आप आश्वासन दो और लो, तो अपनी क्षमता जांच लो। मैं आश्वासन दे रहा हूं, तो क्या उसे पूरा करने की मेरी क्षमता है? अगर आपकी क्षमता नहीं है, और सामने वाले को आपने आश्वासन दे दिया, और आपकी क्षमता नहीं है, उसने मेहनत किया, तो आप गिर जाओगे। आश्वासन देने वाला गिर जाएगा। आश्वासन देने वाले की अगर पूरी क्षमता है, और वह अपनी पूरी ताकत लगा रहा है उस आश्वासन को पूरा करने में, और सामने वाला उस पर काम नहीं कर रहा है, तो वह गिर जाएगा, और यह उठ जाएगा।
देखो, एक है सीखने वाला, एक सिखाने वाला। सृष्टि यही है, दुनिया यही है। सिखाने वाला आश्वासन देता है सीखने वाले को। सिखाने वाला भी कभी उस जगह पर था। अब जिसको सीखना है, उसे देखना है कि क्या मैं उस योग्य हूं? क्या मैं सीख सकता हूं? क्या मैं कर सकता हूं? यह मेरे जीवन में जरूरत है। यह मेरे जीवन में आवश्यकता है। इसलिए कि आप अगर परमात्मा से भी प्रार्थना करो, कोई सत्ता भी है, तो वह किसी न किसी मानव रूप में ही आपके पास भेजने वाली है। तो आश्वासन देना और लेना तब तक चलेगा, जब तक आप मूल तक नहीं पहुंचोगे। आश्वासन देने और लेने में जीवन रहेगा आपका।
अब मुझे देखना है कि मैं आश्वासन दे रहा हूं, और मैं आश्वासन ले रहा हूं, तो मेरी सामर्थ्य क्या है? मुझे उस पर काम करना पड़ेगा। मुझे उस पर मेहनत करना पड़ेगा। अब पता चला, सामने वाले ने आश्वासन दे दिया, लेकिन काम ही नहीं मैं कर रहा हूं, तो थोड़ी न होगा। और वह काम नहीं करवा रहा है, बस आश्वासन दे दिया, तो फिर वह भी योग्य नहीं है। क्योंकि आश्वासन देने वाला व्यक्ति अगर सामर्थ्यवान है, तो वह आपसे काम करवाएगा। फिर कहेगा कि भैया, आश्वासन तो मैंने दिया है, लेकिन सीखने के लिए आपको काम करना पड़ेगा। बातों से बात बनने वाली नहीं है। आपको मेहनत करना पड़ेगा। उस आश्वासन पर काम करना पड़ेगा। दोनों को काम करना पड़ेगा। अकेले से भी नहीं होगा। एक सीखने के लिए तैयार है, लेकिन सिखाने वाला न मिला, तो वह सीख नहीं सकता। एक सिखाने वाला तैयार है, लेकिन सीखने वाला ही न मिला, तो भी कुछ नहीं हो सकता। यहां हम एक-दूसरे के पूरक हैं।
तो आश्वासन लेते और देते समय याद रखो कि मेरी सामर्थ्य क्या है। जब मैं आश्वासन दे रहा हूं, तो मैं किस लायक हूं, और मैं आश्वासन ले रहा हूं, तो मैं किस लायक हूं? क्या मैं उस पर काम कर सकता हूं?
नहीं। देखो, हमारी बात इससे भी हुई, तुमसे भी हुई। मैंने बोला, बेटा ठीक-ठाक है। तू भी अपने आत्मिक कल्याण के लिए आ सकती है। अगर यह कुछ दिन के लिए आया है, आत्मिक कल्याण के लिए, तो रहने दे। तो बोली, ठीक है बाबा। हमने इससे कहा, तू बात कर ले। तो बात नहीं की।
अब देखिए, मेरा काम मैंने अपनी तरफ से कर दिया। जैसे मैंने बोला कि बात कर ले, बता दे उसे। अगर तू बता देता, तो तू ईमानदार रह जाता, कि मैं दो दिन और रुकूंगा। उसे भी पता चल जाता कि चलो, गए हैं इतने दूर, तो दो-तीन दिन और रुकेंगे, कोई बात नहीं है। अब नहीं बताया, तो तुम जानो। मैं तो इससे भी बात करके समझा दिया कि बेटा, कोई दिक्कत नहीं है। वह अपने आत्मिक कल्याण के लिए आया है, दो-चार दिन में क्या हो जाएगा। सब ठीक-ठाक है। मैंने पूछा, कोई तकलीफ तो नहीं है तुझे? तूने कहा, कोई तकलीफ नहीं है। तो मैंने तो अपना कर्म कर दिया। अगर तू बोलती कि तकलीफ है, तो मैं तुरंत इसको कहता कि तुम जाओ। लेकिन तुमने कहा कि नहीं बाबा, सब ठीक-ठाक है। तो मैंने कहा कि दो-चार दिन रहने दे इसे। इतनी दूर से आया है। कब आएगा, कब नहीं आएगा। फिर तुझसे बात करने के बाद मैंने इससे कहा कि तू एक बार अपने घर पर बात करके बता दे। मेरा काम खत्म।
मैंने कहा था कि जब बात हो गई, जहां पर यह गया है, बात हो गई, तो मैंने इसे कह दिया कि बात कर लो। तो आपको भी थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। क्योंकि बात तो हो गई। वह सुरक्षित है, ठीक-ठाक है, चला भी जाएगा। जिसके सानिध्य में वह गया, वह खुद कह रहा है कि बड़े आराम से है, अच्छे से है। तो थोड़ा हमें भी धैर्य रखना चाहिए। हमें भी समझना पड़ेगा। क्योंकि यह मौज करने के लिए तो निकला नहीं था। यह अपने आत्मिक कल्याण के लिए निकला है, और तुमने ही भेजा था। तुमने भरोसे के साथ भेजा था। ऐसा तो नहीं कि तुम्हें झटका देकर आया था, जबरदस्ती आया था। ऐसी बात तो नहीं थी।
मुझे देखिए, मुझे जितना बताओगे, उतना मैं जानूंगा। आप लोग नहीं बताओगे, तो मैं अंदर की बात थोड़ी न जानूंगा। मुझसे क्या मतलब? मुझे जितना बताया है, मैं उस पर बोल रहा हूं। तो मैंने तुझसे भी बात कर ली। मैंने इससे भी बोल दिया। तो मैं तो वहां से हट गया। अब यह जाने, तुम जानो। इसके कर्म का परिणाम इसे मिलेगा। तुम्हारे कर्मों का परिणाम तुम्हें मिलेगा। मैं अपनी तरफ से सही हो गया। तुम्हें भी संदेश दे दिया कि वह सुरक्षित है। और इससे भी कहा कि अपने घर पर बात करो। मैं तो वहां से हट गया।
जब आपके जीवन में कोई टारगेट होगा, और वह टारगेट उस लक्ष्य पर पहुंचने का होगा, तो वह लत अगर रुकावट बनेगी, और आपको उस लक्ष्य तक पहुंचना जरूरी है, तो आप वह लत छोड़ दोगे। और पता चला कि नहीं, टारगेट कोई है ही नहीं, तब आप उसी लत में जीते रहोगे, मर जाओगे। जिस व्यक्ति का टारगेट होता है, उसी की लत छूटती है, अगर वह लत उसमें बाधा है। क्योंकि उसे लक्ष्य पर पहुंचना है। सबसे जरूरी है उसे अपनी मंजिल पर पहुंचना।
और पता चला जिसका लक्ष्य ही नहीं है, बस जीना, खाना, कमाना, मर जाना, तो उसकी वह लत और बनेगी। क्योंकि जीने के लिए वह नई-नई चीजें पैदा करेगा। रोज नई चीज उग जाएगी। पुरानी लत से वह नई लत पैदा कर देगा। तो जीवन का कोई टारगेट बनाइए।
हां। आप आश्वासन दे रहे हो, तो कहते हो कि चलिए, कल मैं यह काम करूंगा। सामने वाला बोले पक्का, तो बोलो, भैया, जीवित रहूंगा तब। मैं स्वाभाविक कह रहा हूं कि मैं यह सुबह ही यह काम कर दूंगा। तब सामने वाला बोले, क्या पक्का करोगे? तो कहो, भैया, जीवित रहूंगा तो करूंगा, करने लायक रहूंगा तो करूंगा। पता चला कि मैं जीवित भी रहा। अगर वह पक्का का नाम लेता है, तो ऐसे बोलना नहीं है। अगर वह कहता है पक्का, तो बोल दो, भाई, मैं जीवित रहा, शरीर ने काम नहीं किया तो क्या करूंगा? जिस जगह पर काम कर रहा हूं, वहां भूकंप आ गया तो क्या करूंगा?
नहीं, मैं यह कह रहा हूं कि स्वाभाविक बोलो। कल मैं यह काम कर दूंगा। मैं रात तक कर दूंगा। कोई बात नहीं।
देखिए, परम सत्य के द्वारा ही सब तैयार हुआ है। तो संबंध आपने बनाया है। आपके संबंध से मैं खड़ा हो गया। मेरा के संबंध से मैं खड़ा हो गया। मेरा से ताकत खड़ी होती है, चाहे वह शरीर की ताकत हो, धन की ताकत हो, या समझ की ताकत हो। अगर आप किसी को नीचा दिखाने में, किसी को जलील करने में लगा रहे हो, तो वहां पर मैं अहंकार खड़ा हो गया। तो मेरा से मैं अहंकार खड़ा होता है।
लेकिन दो मैं हैं। एक अहम मैं, एक परम सत्य। उसका कोई नाम नहीं है। फिर भी व्यवहारिकता में बोलने के लिए उसे भी मैं का संबोधन दिया गया है। तो उसके द्वारा ही सब खड़ा है। आपके द्वारा ही सब खड़ा है।
क्योंकि अगर आप कह रहे हो कि कुछ नहीं होता है, तो इसका मतलब आपके लिए कुछ है। नहीं तो आपको यह कहने की भी जरूरत नहीं कि कुछ नहीं होता। तो आप कुछ में हो, इसीलिए आपको टारगेट बनाना पड़ेगा। एक संकल्प को तोड़ने के लिए एक ऐसा संकल्प बनाना पड़ेगा, कि वह संकल्प छूट जाए, और यह संकल्प अपने आप मिट जाए। और यह संकल्प है सिर्फ निर्विकार होना, अपने दुखों से मुक्त होना।
देखिए, मेरी जरूरत की पूर्ति करते हुए, मेरे सामने कोई जरूरतमंद आता है, तो मैं उसके लिए क्या कर सकता हूं, मेरे सामर्थ्य के अनुसार, कि उसकी भी जरूरत पूरी हो जाए। यही साधना है। यही तपस्या है। और कभी न कभी आप योग्य बनकर वही काम करोगे।
आश्वासन पर पूरी जिंदगी टिकी हुई है, लेकिन वही अपनी सामर्थ्य और सामने वाले की सामर्थ्य देखो। जब तक मूल तक नहीं पहुंचोगे, तब तक चाहिए का भाव बना रहेगा। और अगर मुझे कुछ चाहिए, और मुझे कोई आश्वासन दिया, तो कहीं न कहीं मुझे जाना ही पड़ेगा, अपनी कमी को दूर करने के लिए। अगर मैं काम भी करूंगा, तो किसी के साथ ही करूंगा। अगर लोगों को हटा दो, तो काम भी नहीं कर पाओगे।
तो जब मुझे कोई आश्वासन दे रहा है, तो देखना यह है कि क्या मैं उस आश्वासन पर काम भी कर सकता हूं? आपको देखना है, क्या मेरे करने की सामर्थ्य है? और अगर नहीं है, तो क्या मैं करने लायक बन सकता हूं? यह जांचो। नहीं तो सामने वाला भी क्या करेगा? अगर आप योग्य नहीं रहोगे, करने लायक नहीं रहोगे, तो सामने वाला भी कुछ नहीं कर सकता। लेकिन आप करने लायक भी हो, और कोई न मिले, तो भी आप कुछ नहीं कर सकते। दोनों का मिलना जरूरी है। एक सीखने वाला, एक सिखाने वाला।
तो मुझे अपने आपको जांचना है कि जिसके लिए मैं गया हूं, उसके लिए काम करना पड़ेगा। क्या मैं कर सकता हूं? और जो व्यक्ति मुझे आश्वासन दे रहा है, वह क्या बता रहा है मुझे करने को, जिसे पाने मैं गया हूं, जो मुझे चाहिए। अगर मैं दुकान पर कोई सामान लेने गया हूं, तो मुझे सामान की जानकारी होनी चाहिए कि असली है या नकली। यह मुझे होना चाहिए। मुझे दुकानदार से मतलब नहीं, यह पहचान मुझे होनी चाहिए। अगर मुझे जानकारी है, तो मैं एकदम सही दुकान पर ही पहुंचूंगा, सही माल लेकर आ जाऊंगा। लेकिन अगर मुझे जानकारी नहीं है, तो मुझे कोई भी कुछ थमा देगा, और मैं लेकर चला आऊंगा।
आप सामर्थ्यवान बन जाओ पिता से। देखिए, आपको लग रहा है कि यह व्यक्ति पावर का गलत उपयोग कर रहा है, तो आप उससे पावर वाले बन जाओ। आप उससे पावर वाले बन जाओ। बात खत्म हो गई।
आपके कर्म से, जब आप बेईमानी करते हो, तो उस बेईमानी के द्वारा ही विकार आते हैं, और वे आपको सताते हैं, दुख देते हैं। करते हुए भले दुख न दें, लेकिन वह कभी न कभी, आपके किए गए कर्म, जैसा आपने किया है, जब आपके सामने आएगा, तो आप जैसा किए हो, वैसा आपको फीलिंग होगी, एहसास होगा।
इसमें यह है कि ज्यादा अगर आपने लिख दिया है, और कोई कम करवाता है, कम करके, तो आप उस लेवल पर आ जाते हो। अगर कोई कम नहीं कराता, और आपने उसी लेवल का दे दिया, कि भैया तुमने कम नहीं करवाया, लेकिन देना मुझे इसी रेट में है, तो क्या करूं। व्यापार का एक तरीका है। लोगों में भ्रम फैल गया है।
अगर सामर्थ्यवान हो, तो फिक्स रेट लगा दो। शुरू में प्रॉब्लम तो होगी, लेकिन बाद में सही हो जाएगा। फिक्स रेट, मैं इतना लेता हूं, फिक्स है मेरा। तो मैं तो कहूंगा, फिक्स रेट लगा दो।
और अगर अब ऐसा समाज है, जहां पर आप काम करते हो, और फिक्स रेट नहीं लगा सकते, तो आपको देना इतने में है, यह पक्का कर लो। और आपने जितना ज्यादा लिखा है, कम कराते-कराते वहीं आ जाओ। अगर कोई बीच में भी रुक जाए, तो उसे आखिरी में उतना ही दो। आखिरी में उतना ही ले आओ, बाकी लौटा दो। अगर वह बीच में भाव भी न करे, कोई भाव भी नहीं करेगा, तो उसको पूरा उतना लाकर दो, कि भैया, इतने में मैं आपको दूंगा। क्योंकि ऐसा समाज है, इसी वजह से ऐसा है। अगर भाव न किया, तो आप उस मूल्य पर दे दो। तो बोल दो, भैया, भाव करने वाले के लिए मैंने ऐसा रखा है, बाकी मैं इसी रेट में ही देता हूं।
इसलिए कि जो चाहिए, वह मिल नहीं रहा है। या तो जो चाहिए, मिल गया, और वह मुझे नहीं चाहिए। अथक प्रयास के बाद मैंने लाया, लेकिन लगा कि यह तो कुछ नहीं है, तो जिंदगी बोरिंग है। जब तक मूल तक नहीं पहुंचोगे, आप ऐसे ही जिंदगी उथल-पुथल करती रहेगी।
अलग मानता नहीं है। उसी से है। ऐसा नहीं है। आत्मज्ञान के बाद तो क्लियर हो गया, हम उसी से हैं। वही इंतजार करता है। लेकिन देखिए, उससे अलगाव तो हुआ है, तभी तो उसकी खोज है।
न तो शांति चाहिए, न ईश्वर चाहिए। ईश्वर भी इसलिए चाहिए कि मेरी कामनाएं पूरी हो जाएं। बहुत कम लोग ईश्वर के लायक बनने का प्रयास करते हैं। ईश्वर तुम क्या खोजोगे? कुछ ऐसा करो कि ईश्वर तुम्हें खोज ले। तुम उस लायक बनो। तुम उस लायक बन सकते हो। ईश्वर आप नहीं खोज सकते। उस लायक बनोगे, तो वह आपको खोज लेगा। उसे खोजने की जरूरत भी नहीं होगी।
यह तो आप पता करो। यह तो सारे प्रश्न आप पर ही लागू होते हैं। आपका जन्म क्यों हुआ है? किस लिए आए हो? सारे प्रश्न कब मिट जाएंगे? जब आत्मज्ञान हो जाएगा, जब कुछ नहीं चाहिए में आप स्थिर हो जाओगे। जिसे अवधूत स्थिति कहते हैं, वहां न प्रश्न होता है, न उत्तर होता है। दोनों नहीं होते अवधूत स्थिति में। अवधूत स्थिति में सारे प्रश्न और उत्तर, दोनों खत्म हो जाते हैं जीवन में। उसके बाद आत्मज्ञान होता है, जहां पर सिर्फ उत्तर होते हैं।
बोलने की हिम्मत बताकर ही लेनी चाहिए। उसमें क्या है? आपने उनका अधिकार छीनकर तो नहीं लिया है। ऐसा तो नहीं कि उनसे झूठ बोलकर पैसे ऐंठकर लिए हों। अपनी मेहनत से लिए हो। तो जाने दो, छोड़ो। इसमें क्या झूठ है?
जरूरत ही नहीं है। जब बवाल करेंगे, अगर आप उनसे छल करके, बेईमानी करके, उनसे कुछ धन ले लो, जैसे रोग का नाटक करके कि मुझे कुछ हो गया, मैं ले लिया, और उससे जमीन खरीदी, तो झूठ होता। आपने अपने बल से, अपनी सामर्थ्य से, अपनी मेहनत से जमीन खरीदी है, तो ठीक है, छोड़ो। इसमें झूठ की बात ही नहीं है।
झूठ तब होता है जब हम सामने वाले से कुछ झूठ बोलकर पैसा लेते हैं, और उससे खरीद लेते हैं, और हम बताते नहीं। मैं अपनी मेहनत से ले रहा हूं। मुझे जरूरी थोड़ी न है। जिसे-जिसे लगेगा बताना, मैं उसको बताऊंगा। ऐसे तो पूरी दुनिया को बताना पड़े। पूरी दुनिया को तो नहीं बताना। अब तू उनसे नहीं बताया, बहुत लोगों से नहीं बताया। हम अगर खुद सामर्थ्यवान होकर कार्य कर रहे हैं, अपनी मेहनत के द्वारा, तो मुझे जिसे लगेगा वह चीज बताऊंगा, नहीं बताऊंगा। बता दिया, तो यह झूठ नहीं है। क्लियर हुआ कि नहीं?
सड़क पर पैसा अगर दिखता है, तो आप उसे उठा लीजिए। प्रयास करिए कि आप उसे उसके मालिक तक पहुंचाएं।
मैं एक घटना बता रहा हूं। बहुत समय पहले की बात है, लगभग दो हजार सात के पहले की बात है। मुंबई में एक स्टेशन पर एक व्यक्ति ट्रेन पकड़ रहा था, लोकल, और उसका पर्स गिर गया। मैंने उसे उठाया। उसमें कई क्रेडिट कार्ड थे, और उसमें कुछ लाइसेंस वगैरह था। उस पर पता था, और उस पर फोन नंबर था। फिर मैंने उसे संपर्क किया। कैसे भी करके फोन लगाया, बात हुई, और फिर मैंने उसे उस जगह पर बुलाया, और फिर मैंने उसे दिया। वह बहुत खुश हुआ। अपनी दुकान का पता दिया, बोला कभी आइएगा। मैं नहीं गया।
फिर एक बार नाला सोपारा में ऐसे जा रहा था, एक मोबाइल मिल गया। तुरंत मैंने उसे उठाया। अब वह बंगाल का था। मैंने उसके नंबर पर फोन लगाया। कोई महिला उठी। अब वह बंगाली बोल रही है, और मैं कह रहा हूं कि मुझे यह मोबाइल मिला। अब मुझे तो बंगाली आती नहीं। मैंने कहा, मुझे मोबाइल मिला है, मैं इस स्टेशन पर हूं। लेकिन वह क्या बोल रही है, हमें पता ही नहीं चला। तो मैंने उस फोन को ऑन रखा। कुछ देर के बाद उसका ही फोन आया। तो मैंने बोला, आ जाओ, मैं उस स्टेशन पर बैठा हूं। उसी के लिए मैं बैठा रहा, ट्रेन भी नहीं पकड़ी। मैंने कहा, मैं उस स्टेशन पर बैठा हूं, आप आ जाओ। फिर वह दूसरी ट्रेन पकड़कर आया। मैंने उसको मोबाइल दे दिया।
कहने का मतलब यह है कि प्रयास करिए। अगर आपको कुछ मिलता है, क्योंकि वह एक ताकत है। अगर ताकत गिरी हुई है, तो आप उसे उठाइए। प्रयास करिए, जिसकी ताकत है, वहां पहुंचाइए। और अगर आप वहां पहुंचाने में सक्षम नहीं हो, तो आप उस ताकत का कहीं सत्कर्म में उपयोग कर दीजिए। लेकिन ताकत को ऐसे जमीन पर न छोड़िए। वह ताकत है। धन एक ताकत है। भोजन एक ताकत है। हम जा रहे हैं, रास्ते में कांटा आया, तो हमारा कर्तव्य है, लोग आ-जा रहे हैं, कम से कम मैं तो उठा दूं। तो उठाकर उसे साइड में रख दीजिए। जहां उचित है, वहां पहुंचा दीजिए। यही तो मानवता है।
अब ऐसा नहीं कि रास्ते में जा रहा हूं, और पैसा गिर गया, तो उठाना नहीं। उठाना ही है उसे। पहले प्रयास करना है कि मैं सही आदमी तक पहुंचाऊं, उसके मालिक तक। प्रयास करूं कि मैं उसके मालिक तक उसे पहुंचा दूं। और मालिक, प्रयास करने के बाद भी, न मिल पाए, तो मेरा कर्तव्य है कि देखो, जरूरतमंद कौन है। कहीं मैं तो जरूरतमंद नहीं, कि दवा लेने जा रहा था, मेरे पास पैसे नहीं थे, मुझे दवा की जरूरत थी, पैसे मिल गए। लेकिन पैसे मिलने के बाद पहले मालिक तक पहुंचाओ। फिर सत्कर्म में लगाना है। सत्कर्म का मतलब क्या है? जरूरतमंद। तो अगर आपको भी जरूरत है, तो उसका उपयोग कर लो। दोष नहीं लगेगा। दोष तब लगेगा जब आप प्रयास नहीं करोगे मालिक तक पहुंचाने में, और आपने उपयोग कर लिया।
पहले प्रयास करिए, अपनी क्षमता के अनुसार, कि मैं इस ताकत को, जिसका है, वहां पहुंचा दूं। अगर नहीं पहुंचा सकते, तो किसी जरूरतमंद के उपयोग में ला दूं। अगर जरूरतमंद मैं ही हूं, तब कहीं और खोजने की जरूरत नहीं है। तब तो खुद उसका उपयोग कर लेना है। और पता चला कि नहीं, मैं जरूरतमंद नहीं हूं, मैं तो सामर्थ्यवान हूं, तो आप कहीं और उसका उपयोग कर लीजिए।
कहीं न कहीं तो होगा। आप किसी के पास आते-जाते हो, जरूर लेन-देन है। चाहे वह क्षण भर का हो, चाहे एक सेकंड का हो, चाहे एक साल का हो, चाहे जितने समय का हो। जब लेन-देन पूरा हो जाएगा, तो तुम कहीं और, वह कहीं और। और अगर मार्ग एक ही है, तो तुम दोनों एक ही जगह पहुंच जाओगे। अब मूल की यात्रा कर रहे हो, तो पता चला कि दोनों आगे-पीछे मूल में ही पहुंच जाओगे। एक ही जगह फिर मिलना होगा।
और विपरीत अगर यात्रा है, तो मिलन हो गया है। विपरीत यात्रा है, तो तुम कहीं और, हम कहीं और। मिलन है, तो बिछड़ना है। मिलन है, तो बिछड़ना है। अगर लक्ष्य एक ही है, तो आगे-पीछे हो सकते हो, लेकिन लक्ष्य पर दोनों फिर मिलोगे।
सामर्थ्यवान बनाने वाला कभी आपको गुलाम नहीं बनाएगा। आपकी गुलामी से मुक्त कराएगा। अगर आपको लग रहा है कि आपको कोई गुलाम बना रहा है, तो आप वहां से हट जाओ। क्योंकि सामर्थ्यवान अगर कोई आपको सिखा रहा है, तो सिखाने वाला हमेशा यही चाहता है कि मुझसे भी आगे जाए। एक सिखाने वाले का यही भाव होता है।
एक प्राइमरी का टीचर पढ़ाता है, तो यही उद्देश्य लेकर पढ़ाता है कि ये बच्चे आईएएस होंगे, डीएम होंगे, कलेक्टर होंगे। वह प्राइमरी का ही शिक्षक रह जाता है। लेकिन उसके पढ़ाए हुए प्रोफेसर हो जाते हैं, पीएचडी कर लेते हैं, इंजीनियर बन जाते हैं, डॉक्टर बन जाते हैं, प्रधानमंत्री बन जाते हैं, मुख्यमंत्री बन जाते हैं। लेकिन वह प्राइमरी का टीचर ही रहता है। तो मैं आपको बताऊं, सिखाने वाला हमेशा यही चाहता है कि जिसको मैं सिखा रहा हूं, वह मुझसे आगे जाए, और अच्छे तरीके से सीखे, और समाज में कुछ करे। इसी उम्मीद में वह मेहनत करता रहता है।
अच्छा शिक्षक, गुरु, कभी गुलाम नहीं बनाता। और अगर गुलाम बना रहा है, वह अपने से नीचे रखना चाहता है, और यह पता भी चल जाता है, तो वह फिर न सिखाने वाला है, न गुरु है। वह दोनों नहीं है। वह फ्रॉड है, सिखाने वाले के भेष में। ऐसे लोगों से तुरंत अपने आप को छुड़ाकर भाग जाओ। और यह आपको पता चल जाएगा, पक्का, कि सिखाने वाले का मेरे प्रति भाव क्या है। यह पता चल जाएगा।
भक्ति के द्वारा व्यक्ति आत्मज्ञान तक पहुंचता है। या तो शब्दों के द्वारा, कोई ज्ञान मार्ग से चल देता है, कोई भक्ति मार्ग से चल देता है। लेकिन मूल यह है कि आत्मज्ञान हो जाए।
हां। तरीका अलग होता है। समझाने का तरीका अलग होता है, लेकिन आखिरी में अनुभव एक ही जैसा होता है सबका। सब अलग-अलग मार्ग से जाते हैं, अलग-अलग भाव से जाते हैं, लेकिन मूल उनका एक ही है। आखिर में अनुभव एक ही जैसा रहता है।
घुमा-फिराकर, देखिए, हम प्रश्न से मुक्त होने के लिए चले थे, कि मुझे उत्तर मिल जाए। तो जब अवधूत स्थिति आती है, तो हमारे पास न प्रश्न रहता है, न उत्तर रहता है। सिर्फ मैं रहता हूं। कोई इच्छा, अपेक्षा, राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, कुछ नहीं। यहां तक कि आत्मज्ञान की भी कोई इच्छा नहीं रहती। कुछ दिन तक वह अवधूत स्थिति में रहता है। उसके बाद प्रश्न और उत्तर, दोनों नहीं रहते। फिर वह आत्म तत्व में स्थिर होते ही, उसके अंदर से उत्तर निकलने लगते हैं, समाज कल्याण के लिए। उस उत्तर का उसके जीवन में कोई महत्व नहीं है।
एकदम सही बात है। प्रयास मुझे इसलिए नहीं करना है कि आत्मा को ज्ञान हो जाए। मुझे प्रयास यह करना है कि मैं कैसे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, और मेरे कर्ता के भाव से छूट जाऊं। आत्म तत्व में तो ज्ञान है ही। छूटने के लिए मुझे प्रयास करना है। ज्ञान के लिए प्रयास नहीं करना है।
नहीं। अध्यात्म यह बताता है कि धर्म कैसे करूं। परोपकार धर्म है। जब आपके द्वारा परोपकार होता है, तो वहां धर्म घटित होता है। वह आपको धार्मिक बनाता है। जब आप किसी को सताते हो, तो वहां अधर्म घटित होता है। वह आपको अधार्मिक बनाता है। तो अध्यात्म यह बताता है कि धर्म कैसे करो।
कुछ नहीं चाहिए का भाव बनाओ। जरूरत में जीना चालू करो, और धीरे-धीरे ईमानदारी और सत्कर्म अपनाओ। सत्संग सुनते रहो। एक समय ऐसा आएगा कि कुछ नहीं चाहिए की स्थिति में आ जाओगे।
समर्पण तब होगा, जिसके लिए आप गए हो। अगर वह आपको मिलने लगेगा, तो समर्पण होने लगेगा। और जब पूरी तरह से आपको मिल जाएगा, जिसके लिए आप गए हो, और आपको मिल गया, आपको पता चल गया, तो समर्पण पूरी तरह से, पूर्णतः, उसके प्रति हो जाएगा।
असर तब होगा, जब आप आदत छोड़ने के लिए सुनोगे। सुनने के लिए मत सुनो, सुधारने के लिए सुनो। आपको बहुत पकवान कोई दे दे, और आप खाएं ही नहीं, रख दें, तो उसकी ऊर्जा थोड़ी मिलेगी।
बस गुरु के शब्दों में जियो, और गुरु के सानिध्य में जाओ। अगर गुरु जीवित है, तो कुटिया में आओ। वहां राग-द्वेष से मुक्त हो जाते हैं। आकर देख लो। विदेश में थोड़ी न है।
नहीं। जब आपको समझ में आने लगेगा, तो समर्पण भी होगा। विश्वास प्रकृति की एक व्यवस्था है। विश्वास तो आपको करना ही पड़ेगा। लेकिन विश्वास के बाद काम है, फिर परिणाम है। तो आस्था और समर्पण अपने आप होता है, करने की जरूरत नहीं। आप जिसके लिए गए हो, उस पर काम करो। बस।
देखो, विदेश के लोग भी आकर यहां के संत-महापुरुषों के सानिध्य में जिए। यहां तक कि विदेश छोड़कर यहीं रहने लगे। तो ऐसा नहीं कि कुछ नहीं चाहिए, तो ग्रोथ नहीं होगा। क्योंकि जरूरत के लिए तो ग्रोथ करोगे। मान के चक्कर में न पड़ो। किसी को नीचा दिखाने के चक्कर में न पड़ो। बड़ा बनने के चक्कर में न पड़ो। किसी को दबाने के चक्कर में न पड़ो। आप जरूरत में जियोगे, तो उसमें भी उन्नति होगी, और उसमें किसी का नुकसान नहीं होगा।
नहीं। देखिए, फार्मूला तो अपनाना पड़ेगा। अगर आप कोई गणित का सवाल हल कर रहे हो, और बोलो कि मैं फार्मूला नहीं अपनाऊं, तो क्या उस सवाल को हल कर सकते हो? कभी नहीं कर सकते हो। आपको कोई परीक्षा पास करनी है। आप प्रश्न के उत्तर न लिखो, और बोलो कि नहीं, हम प्रश्न की जगह प्रश्न ही लिख दें, उत्तर नहीं लिखें। उत्तर हमें मालूम है। मैं बोलकर बता दूंगा, लेकिन लिखूंगा नहीं। लिखोगे नहीं, तो पास नहीं होगे।
कहने का मतलब है, जैसा फार्मूला है निकलने का, ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग, यह आपको अपनाना ही पड़ेगा। बिना अपनाए आप निकल ही नहीं सकते। सीधी सी बात है।
डरने की जरूरत नहीं है। आप आराम से आ सकते हो। इंदौर रेलवे स्टेशन है, और मैंने पता बता दिया है। अगर कुछ ऐसा हो, तो नंबर दिया गया है, उस नंबर पर मैसेज करके पूछ लेना। फिर आप लोग अपना ख्याल रखें। और अपने आत्मिक कल्याण के लिए लग जाओ, पूरी तरह, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ। समझकर जियो, सूझबूझ के साथ जियो, अपना कल्याण करो।
अपने आत्मिक कल्याण के लिए, अपने उद्धार के लिए, सबसे जरूरी यह है कि जो भी मैं कर्म कर रहा हूं, मुझे कर्म करने का मौका मिला है, और मेरे द्वारा कुछ भी हो रहा है, मुझे बस इतना देखना है कि मैं कर्म के प्रति ईमानदार रहूं। बस मुझे यही देखना है आत्मिक कल्याण में। और मेरी ईमानदारी का मुझे पता है। सामने वाले को नहीं पता चलता कि तुम ईमानदार हो कि बेईमान हो। क्योंकि सामने वाले को कभी-कभी कर्म दिखता है, लेकिन उसने किस भाव से किया है, कितनी मेहनत की है, वह नहीं देखता। सामने वाला सिर्फ परिणाम देखता है। कभी-कभी वह परिणाम नहीं आता, लेकिन वह परिणाम से ज्यादा मेहनत कर चुका होता है।
अब देखना यह है कि अगर मैंने कोई काम किया और परिणाम नहीं आया, तो मैं पूरी जानकारी लेकर देखूं कि क्या मेरी जानकारी में कमी थी, क्या था। और घुमा-फिरा के यह देखो, भाई, कि जब भी कुछ करो, बस ईमानदारी से करो, जरूरतमंद की सेवा करो, सत्संग सुनो, और अपना उद्धार करो। सीधी सी बात है। इतना समझ गए। आगे जैसे प्रश्न आएं, उनका उत्तर दें।
शरीर कुछ भी मिले। यह नहीं देखना है, छोड़ो इसे। कहने का मतलब यह है कि जिसके जीवन में योग नहीं है, तो उसको कौन सा शरीर मिलेगा। अब यह देखना है कि कोई भी शरीर मिले, उसके अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ेगा। इस बात का विशेष ध्यान दें कि उसे अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ेगा।
संकल्प हमने खुद लिया है। वह संकल्प कभी न कभी पूरा हो जाएगा। हम संकल्प में बंधे नहीं हैं। हमने अपने आप को बांधा है। अगर कोई किसी को बांधता है, तो वह दुखी है। आप विकल्प में हो, तो आप विकल्प में अपने स्वाभाविक नहीं हो। आप अपनी कामनाओं और वासनाओं के वशीभूत होकर विकल्प में लिप्त हो। कहने का मतलब, आप दुखी हो।
मैंने अपने आप को संकल्प में बांधा है। मैं बंधा नहीं हूं। मुझे कोई बांध नहीं रहा। अगर मैंने अपने आप को कहीं बांधा, तो मैं खुश हूं, क्योंकि मैंने सोच-समझ कर ही बांधा होगा। अगर कोई आपको बांधता है, तो आप दुखी होते हो। आप विकल्प में फंसे हुए हो। विकल्प में ऐसा नहीं है कि आप स्वयं गए हो। आप कामनाओं में गए हो, वासनाओं में गए हो, लालच में गए हो। तो अपने आपको जल्दी से जल्दी छुड़ाना जरूरी है।
और मेरा काम है कि मैं अपना संकल्प पूरा करूंगा। जितना मैंने संकल्प लिया है, चाहे जिस तरीके से पूरा करना पड़े, वह मुझे पूरा करके निकल जाना है। तो मेरे संकल्प में बंधन नहीं है, दुख नहीं है, अशांति नहीं है, पीड़ा नहीं है, क्योंकि मैं खुद अपने आप को बांधा हूं। पीड़ा तो तब होगी, जब आपको कोई बांधे और आप छुड़ाना चाहते हो, जबरदस्ती किसी ने बांध दिया हो। बहुत फर्क है, भैया। बहुत समझना है।
मैंने कोई भी कर्म किया, तो मैं बस इसलिए किया कि मैं समाज के लिए कुछ कर सकूं। अब मैं सीधे करने लायक था, तो कर दिया। करने लायक नहीं था, तो अगर मैंने कोई काम चुना, समाज में कोई कमी दिखी, और मुझे करने की जिज्ञासा हो गई, तो मैं उस काम के लायक बना।
अपना भी ख्याल रखो। अपने कल्याण के लिए पूरी मेहनत करो। साधना करो। अपने आप को समझो। उचित और अनुचित समझो। मोह के जाल से अपने आप को छुड़ाओ।
अगर मुझे सामने से कोई छोड़कर जा रहा है, तो मैं उसे क्यों पुकार रहा हूं? क्या मैं इतना कमजोर हूं? अगर वह मुझे छोड़कर खुश है, तो मुझे यह देखना चाहिए कि मैं भी अपनी खुशी ढूंढूं, कि मेरी खुशी किसमें है। क्योंकि वह छोड़कर गया है, कुछ समझने गया है, कुछ पाने गया है। आपने उसे छुड़ाया नहीं है। वह खुद छोड़ के गया है। और आप उसे अगर जबरदस्ती बुलाना चाहोगे, तो फिर वह दुखी होगा, निराश होगा, और आप भी परेशान हो जाओगे।
जीवन में अगर कोई मुझे छोड़कर जाता है, तो मेरा कार्य बस इतना है। अगर मैं उसका शुभचिंतक हूं, तो मुझे यह देखना है कि वह उचित जगह जा रहा है कि नहीं। अगर जा रहा है, तो जाने देना चाहिए। हां, यह देखना चाहिए कि वह बालक है या समझने लायक है। बालक है और जा रहा है, तो एक सुरक्षित जगह जा रहा है या नहीं। जहां तक हो सके, मैं यह ध्यान रखूं कि वह जा कहां रहा है, उसके लिए सुरक्षित जगह है, सुरक्षित मार्ग है, उसका कल्याण होगा। यह सब देखना चाहिए। और मुझे क्या चाहिए, वह तो मुझे छोड़कर चला गया।
उसकी कमी छोड़ने वाले को नहीं होगी। और जो व्यक्ति तैयार नहीं था, वह तो तैयार हो रहा था, और एक समय ऐसा आया कि छोड़ के चला गया। उसकी तैयारी बहुत पहले से थी। तो मुझे यह देखना है कि अगर वह छोड़ के गया, और मैं उसे याद कर रहा हूं, मुझे पीड़ा हो रही है, तो इसका मतलब कुछ कमी है। कुछ वह मुझे दे रहा था, उससे मिल रहा था। मुझे देखना है कि मेरे जीवन में जब वह नहीं था, तब भी मैं एकदम बढ़िया से था। वह आया और गया, तो कुछ कमी लगने लगी। तो वह कमी मैं और कहीं से पूरी करूं। मेरी कमी कैसे पूरी होगी, जिससे मेरा आत्मिक कल्याण हो, और मैं मूल तक पहुंच पाऊं।
हद पार कर दे, जहां विचार न हो। इतना विचार कर कि विचार किए बिना कुछ रह जाए, और वही तो उपलब्धि होए। पीछे उपलब्धि न हो, तो आगे जाओ। दुनिया का सब छान मारो, और इतना छान मारो कि विचार करके सब देख लिया, सब समझ लिया, कुछ विचार ही करने लायक न रहे। तब आप विचारों से परे चले गए।
आप एक काम करें। इतना विचार करें। विचार का मतलब यह थोड़ी है कि आप किसी के बारे में सोच रहे हैं। विचार का मतलब यह होता है कि आप किसी वस्तु पर, किसी जीव पर विचार कर रहे हैं, कुछ समझना चाहते हैं, या कुछ समझाना चाहते हैं। तो इतना विचार करिए, इतना छान मारो, कि छानने के लिए कुछ न रह जाए। विचार से मुक्त हो गए, और उपलब्धि हुई।
क्या है, इससे मुक्त हो जाना। देखो, भैया। वह सब सरल, सहज, सुंदर, अति सुलभ, अति दुर्लभ, आनंद, परमानंद, वह वस्तु क्या है, हटा ही दो। बस, आप इससे मुक्त हो जाओ, इस क्या है से। जैसे आप क्या है से मुक्त होते हो, यह सब आनंदमय हो जाएगा, पूरा ब्रह्मांड। बस क्या हटाना है? क्या है। है भी, तो है।
क्या बोलोगे, तो सामने वाला देखेगा। अगर क्या ही क्या है, तो पागल हो जाइएगा। अगर आप जाकर किसी से पूछोगे क्या, क्या, तो दो-चार थप्पड़ मार देगा। क्या है, यह पूछना पड़ेगा क्या। अगर आप क्या-क्या भी पूछने लगो, तो लोग कहेंगे, तू क्या हटा। वह पूछ रहा है क्या है, मैं बोलूं क्या हटा। और जो है, वह सारे है ही वाले हैं। है तो पूछने में आएगा, उत्तर में तो नहीं आएगा। तो क्या है, और है, दोनों हटाने पड़ेंगे।
यह पहले बता दिया न, कि सहज है, आनंद है। बता देने से क्या उपलब्ध हो गया। बताने से स्थिति थोड़ी न हो जाती है। बोलने में क्या जाता है। राजा-राजा बोलने से राजा की स्थिति थोड़ी न हो जाएगी। राम-राम बोलने से राम थोड़ी न आ जाएंगे। अंधों के बीच काना राजा। तो क्या है, हटा दो। बाकी सब एकदम रह जाएगा।
गलत क्यों बता दिया बात को। क्यों कुछ भी कह दें, मान लेते हो। भोग करने का तरीका कैसा है? ईमानदारी से अगर कर रहे हो, तो मुक्ति। बेईमानी से कर रहे हो, तो बंधन। बात खत्म।
भोजन भी करना एक भोग है। भोग का मतलब क्या है? ग्रहण करना। अगर आप कुछ ग्रहण कर रहे हो, तो वह भोग है। चाहे वह दृश्य हो, चाहे रूप हो, चाहे रंग हो, चाहे शब्द हो, चाहे स्पर्श हो। पांच इंद्रियों द्वारा कुछ भी आप ग्रहण कर रहे हो, तो उसका नाम भोग है। तो बस ईमानदारी से करो, बात खत्म करो, और निकल लो।
हद पार कर दो। कुछ विचार के लायक ही न रहे। अनहद तक, सब पार कर दो, जहां विचार ही न हो। हद में विचार न करें। क्योंकि अगर हद में विचार करेंगे, तो आप दायरे में रहेंगे। दायरे को तोड़ना है, तो इतना विचार करो, इतना विचार करो। हां, इतना विचार करो, सब पार कर दो।
तू जो जित है, भाई, वही महाजीवन है। समझ ले। तू एक, सबका दृष्टा है, और सदा ही मुक्त है। तेरा बंधन यही है कि तू अपने को छोड़कर दूसरे को दृष्टा देखता है।
एक तू ही सबका दृष्टा है। कहने का मतलब, दुनिया तुझसे है। जितना तुझे पता है, उतनी तेरी दुनिया है। और तू सदा ही मुक्त है। मुक्त तो है, लेकिन कर्म के बंधन में तू अपने आप को समझकर बांध रहा है। अपने को छोड़कर दूसरे को दृष्टा देखता है, कि मेरे लिए कोई कुछ कर देगा।
नहीं। स्वभाव बनाया गया है न। न आपका स्वभाव ईमानदारी का है, न आपका स्वभाव बेईमानी का है। आप इससे भी परे हो। बेईमानी से मुक्त होने के लिए ईमानदारी अपनानी पड़ रही है। एक समय ऐसा आएगा कि ईमानदारी भी छूट जाएगी। तब जाके अवधूत स्थिति होगी, और तब जाके आत्मज्ञान होगा।
एक समय ऐसा आएगा आपके जीवन में। जैसे आत्मज्ञानी न तो ईमानदार है, न बेईमान है। वह दोनों नहीं है। जब आप बेईमानी कर रहे हो, तो ईमानदारी की जरूरत है। अगर आप बेईमानी से मुक्त हो गए, तो ईमानदारी स्वतः खत्म हो गई। फिर आपके द्वारा कुछ भी हो रहा है, वह सत्कर्म हो रहा है। बस, ईमानदारी से भी आप छूट गए।
हां, भैया। या तो दरिद्र की जबान पर पैसा रहता है, या तो बैंक में। तो हम असीमित बोलते हैं। नहीं तो वह हमारा स्वभाव थोड़ी हो गया। हम कम थोड़ी न बोलते। अपने-अपने अधिकार में थोड़ी न रहते हैं। हम हमेशा वह बातें करते हैं, जिस लायक हमारी पीढ़ियां भी नहीं हैं। बाबू-दादा भी न रहे हों, और हम बात कर रहे हैं अनलिमिटेड।
जैसे कुछ दोस्त रहे। कहानी सुनी हो, तो बहुत बड़ा-बड़ा कह के रहे। एक जन कहे कि हमारे पिताजी के पास ऐसी ऐंठ है कि आसमान में मकड़ी का जाला हटाते हैं। तो दूसरा कहे कि वह हमारे घर में रखा है। बाबू हो, तो तेरे बाबू के पास यह बात थोड़ी न। तुम्हारे पास जगह नहीं थी, लेकिन तेरे बाबू के पास जगह न रही रखने को, तो तू हमारे दलान में रखे का। समझे, भैया? असीमित हमारी सोच है। हम हमेशा अपने औकात से ज्यादा ही सोच के परेशान हैं, ग्रसित हैं।
ऐसे बहुत हां वाले हैं। और एक जन बैठा रहा, आगे भी कहानी बढ़ा दी। बोला, वह हमारा-तुम्हारा बाबू का घर हमारे बाबू ने बनाया है। और मिस्त्री नहीं मिल रहा, कि वैसा कारीगर ही दुनिया में नहीं था। घर बनाने वाला आखिरी ही था। तो बोला, वह घर मेरे पिताजी ने बनाया। तीनों के तीनों नहीं। तीनों में से पिताजी है ही नहीं। अब तुम देखो कि तुम कौन हो, तीनों में से। तुम इतना बड़ा काम वाले हो। इतना बड़ा काम जिसने किया, वह रुकेगा क्या? वह तो आसमान पार कर दिया। अपना सब दादा-बाबू।
ऐसे कुछ लड़कियां नदी किनारे बैठी रहीं। जो हमारा बाबू पानी में गए, तो एक मिनट, दो मिनट, ऐसे सब बढ़ावा चल गया। एक मिला, हमारा बाबू गए, आज तक नहीं लौटे। डूब गए? मतलब आज तक लौटे नहीं। अभी तक वही हैं, पानी में। इतनी सांस रोकने की क्षमता है। रुके बैठे हैं, आज तक आए ही नहीं, लौटे ही नहीं। उसी में रह गए। मर लिए? तो कहां मर लिया। लाश मिले तब न, मर गए। प्रमाण क्या है मरने का? बाबू गए, डूबे, और निकले नहीं, तो प्रमाण तो नहीं है न। अब तक वही हैं।
बचपन में ऐसा ही होता था। हम लोग ऐसे हैं। दुनिया में कभी भी अपनी क्षमता के अनुसार ही बात करनी चाहिए।
भाई, क्या करें। हम तो आत्मज्ञान तक हैं। ब्रह्म ज्ञान की हमारी यात्रा चलती रहे। तू ब्रह्मज्ञानी होए, तो क्या करोगे कुटिया में। उतापात मच ही जाएगा।
सामर्थ्यवान आदमी, मान लीजिए यह टेबल है, इससे ज्यादा सामर्थ्यवान आदमी बैठेगा, तो क्या होगा? टूट जाएगी। यहां तो एक आत्मज्ञानी है, और आत्मज्ञान तक पहुंचने वाले लोग हैं। अब ब्रह्म ज्ञान आ जाएगा, तो सब तहस-नहस हो जाएगा। ज्यादा पावरफुल है न। यह कुटिया तो आत्मज्ञानी ने बनाई है, और जिज्ञासु के लिए। ब्रह्मज्ञानी यहां कहां टिकेगा। ब्रह्मज्ञानी यहां थोड़ी टिकेंगे। यहां तो निर्वाण मेरे द्वारा हुआ है। हम आत्मज्ञानी हैं। तो आप आत्मज्ञान के लिए आए हो। यह ब्रह्मज्ञानी क्या करे यहां।
जैसे रास्ते पर एक मार के लोग चल रहे हैं, और उसमें एकदम हाई आ जाए। उसका शिक्षक है, उससे भी ऊपर का आ जाए, तो परेशानी का कारण बन जाएगा। बच्चों की क्षमता से ऊपर चली जाएगी बात। कोई मान लीजिए प्राइमरी और हाई स्कूल पढ़ा रहा है। अब उसमें पीएचडी का शिक्षक आ जाए। क्या आपको लगता है उन बच्चों का विकास कर पाएगा? नहीं कर पाएगा। विनाश कर देगा। और शिक्षक के प्रति बच्चों की जो आस्था थी, वह भी तोड़ देगा। उसके लिए वही टीचर सहायक है। जब वह कॉलेज वगैरह करके जाएगा, तब पीएचडी का शिक्षक काम आएगा।
रोज नहीं। सिर्फ रविवार को मिलता है। कुछ लोग बैठते हैं। जिसको मैं देखता हूं कि बैठने लायक है, उसके कोई प्रश्न हैं, कोई जिज्ञासा है, वह बैठता है। बाकी लोग साधना करते हैं। और रविवार को उनको मौका दिया जाता है कि आप कोई भी आध्यात्मिक प्रश्न कर सकते हैं। यहां वही बैठता है, जिसके प्रश्न आध्यात्मिक होते हैं, जो बैठने लायक होता है।
बाकी एक साल तक सब बैठते रहे। एक साल तक राजा से लेकर रंक तक, कचरे से लेकर शुद्ध तक, अपवित्र से लेकर पवित्र तक, सब बैठते रहे। अब धीरे-धीरे सब बदलता है। काहे के बैठ के दिमाग खराब करते हैं।
जैसे ब्याह हो जाए, तो सबकी लड़कियां एक ही रास्ते से होती हैं, दूसरे रास्ते से नहीं। कोई बाप बना, मां बना, तो उससे पूछा जाए कि क्या जब मां-बाप बन जाता है, तो सबको एक ही तरीके से बच्चे पैदा होते हैं। हां। अब उसने तो दुनिया में सबको जाकर देखा नहीं। लेकिन उसे इतना अनुभव हो गया कि पिता से शरीर निकला, मां के घर में गया, पला, और उसी तरीके से निकल जाएगा। तरीका तो एक ही होगा। अलग तो नहीं होगा। एक-एक जाकर देख थोड़ी न बांटता है।
चोट लगी, पीड़ा हुई। तो हम कहते हैं न, कि चोट लगी, पीड़ा हुई। अगर एक बार मुझे यह चोट लग गई, पीड़ा हुई, जब दूसरे को लगेगी तो मैं समझ जाऊंगा न कि मेरे जैसी ही पीड़ा हो रही है। बस, कोई सहन कर लेता है। कोई चिल्ला देता है। कोई कम चिल्लाता है। कोई नहीं चिल्लाता। लेकिन दर्द तो हो रहा है न। अब क्या, हमें अंदर घुस के देखना है? हर चीज में घुसा मत करो। नहीं तो घुस जाओगे, तो सामने वाला निकाले न दे। ऐसे चौरासी लाख योनि में भटकते रहोगे। ज्यादा घुसा मत। दिमाग को ऐसे अपने कल्याण में लगाओ, ज्यादा अच्छा होगा। एक बार अंदर घुस गए, न निकले, तो क्या करते रह जाओगे।
कर सकते हैं। देखिए, तपस्या हो सकता है कोई करके बैठा हो। हमसे नहीं मिला। वह बाहर नहीं आ रहे हैं। एक-एक से तप कर रहे हैं। अब तप के पीछे भाव क्या है? लोग कुंभ के मेले में चले जाओ, वृंदावन वगैरह में कांटों पर सोए हैं। लेकिन कांटों पर सोए हैं, तो क्या चाहते हैं? नाम सहित पैसा। अगर उन्हें कांटे पर सोकर भक्ति करना होता, तो या तो बीहड़ जंगल में जाते, या किसी कमरे में होते। वह समाज को प्रभावित नहीं करते।
हो सकता है कठोर तप इसलिए, कि मैंने जितनी भी भक्ति की, गुप्त की। यहां तक मेरी बहन भी नहीं देख पाती थी। और जब एक ही रूम था, तो मैं बोलता था, तू आंख बंद कर लेना। अगर तेरी नींद खुल जाए, और मैं भक्ति कर रहा हूं, तो तू आंख बंद कर लेना। मैं नहीं चाहता कि मेरे इष्ट और मेरे बीच में कोई तीसरा आ जाए। यह मैं नहीं चाहता। तो वह नहीं देखती थी। लेकिन बाद में कभी-कभी बताती थी, थोड़ा-थोड़ा आंख खोल के देख ली। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि हमारे और उसके बीच में कोई तीसरा आए। और तीसरा तभी आता है, भक्ति तभी दिखती है, जब नाम सहित पैसा चाहिए। तब वह आदमी तप लोगों को दिखाकर करता है। जैसे धूनी जलाने वाले, कंडा जलाने वाले। अब इनको क्या चाहिए? नाम सहित पैसा। इन्हें आत्मिक कल्याण नहीं करना है, न अपना, न लोगों का। अगर अपना आत्मिक कल्याण करता होता, तो गुप्त रूप से भक्ति करता। भक्ति दिखाता ही नहीं। जितने लोग अपनी भक्ति को दिखा रहे हैं, वह भक्ति है ही नहीं। भक्ति का परिणाम दिखता है।
भक्ति का परिणाम क्या है? जिसके लिए भक्ति कर रहे थे, वह उपलब्धि हो गई। अब आप किसके लिए भक्ति कर रहे थे? नाम, शोहरत, पैसे के लिए, या अपने आत्मिक कल्याण के लिए? जैसे रामकृष्ण परमहंस अपने आत्मिक कल्याण के लिए भक्ति कर रहे थे। तो आखिर में उनका उद्धार हो गया। भक्ति किसी को दिखाते थोड़ी न थे। जिद में दरवाजा बंद करके भाग जाते थे। लोग डांटते थे, कुछ नहीं बोलते थे। कहने का मतलब यह है कि तपस्वी आदमी कभी अपनी तपस्या को दिखाता नहीं। हां, वह क्या करता है? जब उस तपस्या का उसे परिणाम मिलता है, तो वह परिणाम देने में, साधक लोग, जिज्ञासु लोग, जितने लोग बैठे रहते हैं, उन्हें प्रेरणा देता है कि भैया, जब मैं साधना कर रहा था, ऐसी-ऐसी घटनाएं हुईं। तुम डगमगाना मत। तुम विचलित न होना। ऐसी परिस्थितियां बनेंगी, तुम्हें मजबूत बनाने के लिए। अपनी घटनाएं सुनाता है, कि मैं भक्ति में चल रहा था, तो मुझे गाली मिली, बेमतलब का, लोगों ने भोजन नहीं दिया, लोगों ने भगा दिया। वह इसलिए बता रहा है कि तुम्हारे साथ भी होगा। और जब तुम सोचोगे, यार, गुरु जी के साथ भी हुआ है, तो कोई बात नहीं। कोई धक्का मार दे, तो गुरु जी ने कैसे सह लिया, तो मैं भी सह लूंगा। भक्ति करने वाला भक्ति का परिणाम दिखाता है।
बहुत लोग तप कर रहे हैं, आप सोच नहीं सकते। ऐसे-ऐसे तपस्वी तप कर रहे हैं। कोई बाहर परिणाम के बाद आएगा न। अब पता नहीं उनका परिणाम कब मिलेगा। हो सकता है भक्ति करते-करते खत्म हो गए। इस जन्म में उसका परिणाम आए, जन्म-जन्मांतर लग जाता है। कुछ बोला नहीं जा सकता कि परिणाम कब आएगा। जैसे एक बीज कोई लगा दे, तो हो सकता है उसके मरने के बाद वह वृक्ष बने। परिणाम कब आया? जब वह इस दुनिया से चला गया, तब परिणाम आया।
कहने का मतलब यह है, जितने लोग हो, आप इसको नोट कर लेना। अगर आप दिखाकर भक्ति कर रहे हो, तब समझ लो, आपको नाम, शोहरत, पैसा चाहिए। भक्ति यह नहीं है। कभी भी इष्ट और भक्त के बीच में तीसरा, वह बर्दाश्त नहीं कर सकता। और आपने भक्तों की कहानी सुनी भी होगी। वह बंद कमरों में करता है, अकेले करता है।
हरिदास की बात। तानसेन गा रहे थे, तो अकबर बोले, वाह तानसेन, तुम जैसा कोई नहीं। बोले, नहीं, नहीं, नहीं। हम तो गा रहे हैं धन, वैभव, नाम, शोहरत, पैसे के लिए। हम कुछ देख रहे हैं कि इस गाने से कुछ मिलेगा। इनाम के चक्कर में गा रहे हैं, कि कुछ बख्शीश मिलेगी। लेकिन मुझसे भी कोई अच्छा है। बोले, कौन हो सकता है वह? बोले, वह मेरे गुरु हैं। तो उन्होंने कहा, उन्हें बुलाओ दरबार में। बोले, वह दरबार में आकर नहीं गाते। वह दरबार में आकर किसी राजा-रंक के लिए नहीं गाते। वह उसके लिए गाते हैं। वह कब गाते हैं, यह भी नहीं पता है। तब बोले, कैसे सुना जाएगा? बोले, वह जब गाएं, तब सुन सकते हैं। जब गाए, तब सुन सकते हैं। तो फिर वह जाते हैं। बहुत रात तक, दिन तक इंतजार करते हैं। एक दिन वह गाने लगते हैं। फिर उनकी आंखों में छरछर आंसू होते हैं। तो बोलते हैं, वह तो एकदम कुछ कहने लायक ही नहीं बचते। जहां शब्द ही खत्म हो गए। बहबाई भी नहीं किया जा सकता। आरपार हो गए। क्योंकि मैं कुछ बोल भी नहीं सकता। इतनी मेरी क्षमता ही नहीं है। इसलिए कि वह उसके लिए गाते थे।
यह है कि आप भक्तों की कहानी सुने हो। भक्त अगर कोई है, तो भक्त और इष्ट के बीच में तीसरा कोई नहीं होता। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। मैं अपनी बहन को। पहले तो मैं जिस रूम में, कभी-कभी क्या होता था, रूम लोग बदलते रहते थे। तो कभी बेडरूम मिल जाए, वह रूम मिल जाए, तो मैं अंदर हूं, तो वह जा ही नहीं सकते। इसके बाद अगर एक ही रूम रहे, और मैं बाहर भक्ति करूं, तो मैं उसे कहता था, तू एक काम कर, तू सो जा। तू देखना मत। क्योंकि तू देखेगी, तो मैं कर ही नहीं पाऊंगा। मुझे पता चला कि तू देख रही है, तब तो मैं कर ही नहीं पाऊंगा। बातचीत ही नहीं कर सकता। मैं लीन ही नहीं हो पाऊंगा, क्योंकि तू है न। तो यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। मैं कभी अपनी भक्ति किसी को देखने नहीं देता था। तीसरा जान गया, तो फिर भक्ति ही नहीं। तीसरा अगर जान गया। नाम, शोहरत, पैसा। तब तीसरा जाने। तीसरे को दिखा के भक्ति कर रहे हो, तो नाम, शोहरत, पैसा चाहिए। भक्ति का कोई परिणाम नहीं मिलेगा। परिणाम यही, पैसे मिलेंगे। लोग देखेंगे, कांटे पर सो रहे हो, तो फेंक के चले जाएंगे कुछ पैसे।
अभी लोग कुंभ का मेला, यह नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं। बहुत लोग दंडवत, मतलब शरीर से लेट कर जाते हैं। एक बाबा थे। मैं जा रहा था, मंदिर था, चला गया। अब वह मुझे मिले। मेरी उनकी बात होने लगी। जब बात होने लगी, तो बड़े खुश हुए। बोले, आप मेरे साथ रहो न। बोला, न बाबा, हम साथ नहीं रहेंगे। हम तो बस एक रात बिताएंगे, और आगे चले जाएंगे। तो अब उन्होंने कहा कि हमारे आसन को भी कोई नहीं छूता। जब वह लेटते थे न, तो एक आसन रखते थे, फिर लेट कर, फिर उसको आगे, गद्दा जैसा। तो मैं, वह कहते थे, अगर कोई इसको छू दे, तो मैं बोलता था, आप दूसरा आसन लाओ। बात यहां तक तो मुझे अच्छा लगा। फिर मैं बोला, पैसे वैसे। बोले, पैसे भी रखना है, तो दूर से रख सकते हैं। तो क्या मतलब है ऐसी भक्ति का। ऐसी भक्ति का क्या मतलब है। लेते थे, लेकिन दूर से। अरे, तो यार, फिर वह गुड़ खाए, गुलगुले से परहेज।
गुड़ खाए, हम। एक साल मोबाइल नहीं छुआ, लेकिन चलवाते रहे। लोग सोचें, छूते नहीं हैं। लेकिन किसी के द्वारा मैं ही तो छू रहा हूं उसे, अदृश्य रूप से। मैं कह रहा हूं, आप मुझे लाए। हमने कहा, कितना है भाई, इतना मैं तो नहीं लूंगा, फिर इसको दे दो। मतलब मैं ही तो ले रहा हूं रे। लेकिन पैसे बाबा नहीं छूते। पैसा छूते नहीं, तो चल कैसे रहा है? नहीं यार, बाबा तो इतने अच्छे हैं, पैसा नहीं लेते। यहां के पैसे ले आए, तो हम न लें। दो-चार, दस हजार, दो हजार ले लें। जब देखी लाख-दो लाख, बाद में हम कहीं बाहर दे दें। बाहर हम और दस-बीस हजार हैं, तो कहीं ले जा। हम चाहे क्या करेंगे दस-बीस हजार में। जब अमाउंट रहता था कि नहीं, समाज के काम लग जाएगा, तो मैं कहता था, ठीक है। अभी जैसे सामने ही प्रत्यक्ष हुआ। एक-दो लाख के ऊपर आया, तो चलो भैया, दे दो, ट्रस्ट में जाके डलवा दो। डाल दिया। मतलब का संग लग गया। हम कहा, महारानी डाल दे। प्रोफेसर जी गईं। एक जन कितना दे रहे, पच्चीस हजार। कुछ ऐसे बीस, कुछ भी पकड़ ले, तो हम कहें, यार तू एक काम कर, बैंक में लगा।
मेरा कहने का मतलब है, देखो। मैं बड़ा एकदम साफ-सुथरा व्यक्ति हूं जीवन में, यह कहना। वह किसी तरीके से ले रहा है क्या? किसी तरीके से ले रहा है। तो जब तू रे आसन पर क्यों छू ही देता है। तू, बदलाव आता है। तो पैसा भी तो छू के देता। पैसा क्यों ले रहे हो। भक्ति में पैसे की क्या जरूरत है। भोजन, कपड़ा, लोग दे ही रहे हैं। पैसे क्यों ले रहे हो। लेकिन नाम सहित पैसा चाहिए।
भक्ति कभी भी। अभी देखो न, लोग घूम रहे हैं नंगा-पुंगा, कि हम पानी नहीं पीते। अरे भाई, तुम पानी नहीं। एक कमरे में भक्ति करो न। आप एक कमरे में भक्ति करिए। भक्ति का परिणाम दिखाइए। लोगों को ज्ञान दीजिए। तप का परिणाम दिखाइए। तपस्वी व्यक्ति तप करता है, तप का परिणाम लेकर समाज में आता है। तपस्या करके किसी को आकर्षित नहीं करता।
एक बार साधना की बात बताऊं। सही, नौ दिन के पानी भी न रहे। हम नौ दिन पानी न पिए। अब भाई, दो दिन बीता, तीन दिन बीता, चौथे दिन भी लगा कि मर जाएंगे। और बोलता भी नहीं था। तो एक औरत थी। यह मेरे गांव की बात है। एक औरत थी, वह रो रही थी, महाराज, पानी पी लो, पानी पी लो। उसकी आंखों में आंसू। हम कहे, भाई, गांव की बात बता रहा हूं। मंदिर में तपस्या कर रहा था, एकदम घोर तपस्या। तो अब लगा कि यार, मर जाएंगे। पांचवां दिन हुआ। तो हमने कहा कि चलो, मुझे तो नहीं पीना है, लेकिन तुम्हारे आंसू नहीं देख पा रहा हूं। पीना तो मुझे था रे। जान जा रही है। देख, समझना इस बात को। हम बहुत शातिर हैं। पीना तो मुझे था, कि प्राण जा रहा था मेरा। प्राण रहेगा, तब न आगे बढ़ूंगा। और इतना विश्वास नहीं था। प्राण। शुरुआत की बात है, लगभग दो हजार ग्यारह की। तो धीरे-धीरे बढ़ता है न, संकल्प की ताकत। तो अब हम कहे, चल, अच्छा, पीता हूं। लेकिन तेरे कहे पीता हूं। कहीं बा, महाराज। हम लेकिन तेरे कहे न। उन्हें निमित्त बनाए, पिया। हम ऐसे ही चालाकी करते हैं। और ऐसे ही हम शातिर हैं। यह मैं अपनी घटना बता रहा हूं। कोई कहानी नहीं है। समझते हो?
यूं हम साल भर मोबाइल नहीं छुआ। लेकिन क्यों। तो छुवाता रहा। काम तो करता रहा। तो मेरा कहने का मतलब है कि आप इस बात को नोट कर लेना। क्योंकि शुरुआत में भक्ति की थी न। मेरे यहां लाइन लगती थी रविवार को। तो वह पूजा मैं दिखा के करता था। शुरुआत में मैं भी तो तेरे जैसा था रे। थोड़ी न आसमान से टपक गए। मैं भी इस दलदल से, तेरे जैसे से, निकला। तू तो कम फंसा हुआ है। क्योंकि मेरे करने का भाव बहुत ज्यादा था। मेरी इच्छाएं बहुत ज्यादा थीं। तो मैं तो बहुत ज्यादा फंसा था। जितनी इच्छा, जितनी बड़ी प्लानिंग, जितना बड़ा टारगेट, उतना फंसा हुआ व्यक्ति। खाने को ठिकाना नहीं। करोड़ों की बात है। कोई हेल्पर नहीं रखेगा, लेकिन कंपनी चलाना है। तब सामने वाला तो दहल जाता था। क्या बात करता है। तो मैं यही बताना चाहता हूं। ऐसा नहीं कि मैं वहां से नहीं गुजरा हूं। गुजरा हूं, तभी तो बता रहा हूं। कि शुरुआत में मैं भी भक्ति करता था, तो तपस्या बताता था। पानी न पी, पानी इतना दिन न पी।
एक घटना बता रहा हूं। बड़ा मजेदार है। जब मैं पहली बार फ्लाइट से गया। यह दो हजार ग्यारह की बात है। तो टिकट का, मैंने टिकट रखा था कॉपी में। और एक मेरे साथ सेवक था, उसको दे के रखा था। तो हम कहीं देखा, फ्लाइट से जा के आए हैं। अरे, वह टिकट मैं बहुत दिन लोगों को दिखाया। अरे, लोग अपने बैग का स्टीकर नहीं निकालते रे। फ्लाइट में जाने पर एक स्टीकर लगता है। वह लगाते हैं न। तो वह नहीं निकालते, कि लगे। बस ट्रेन में, मैं फ्लाइट से आया हूं। उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। गेट से निकले, निकाल के कचरे के डिब्बे में फेंक दो। लेकिन न, लोगों को कैसे पता चलेगा हम कहां से आए हैं। इसी में तो फंसे हैं। दिखावे में फंसे हैं।
तू सब नहीं बोलती हो। देखा, हमारा झुमका इतना तोले का, नथ इतना तोले का। साड़ी क्यों नहीं पूछते। यह सुनो, बुला-बुला के दिखा। यह देखा, साड़ी ले आए न। कितना। अगर साड़ी दो-चार को रहे, चौदह सौ की हो। अरे, ट्रेन में मिलती है, रगड़ती है, चेन को नहीं छोड़ती, पहन लिए। देखा, सोना पहन के आए। बीस दिन में, एक महीना में, और बीस दिन के अंदर वह भागी है शहर। तो वह लड़के लोग भी बोलते हैं, यार तू तो मालामाल है। जब सोने का सामान हो, तो चल, चौराहे पर ले के। कुल मिला-मिलके नोच न लें। तो जाते की कहे, यार, भाड़ा व्यवस्था कर। हां यार, हम भाड़ा नहीं समझे।
ऐसे हैं। कहीं गांव में, शहर से। देखा, हम। पता हो, मालिक भी अपने घर में जाता है न। तो हमसे पूछ के। हम यहां तक कि अगर टाइम लेट में, तुरंत रोक देते थे, कि आप जा नहीं सकते। क्या है भैया, मेन हेड है, लेकिन है हैंड वॉचमैन। कि हम मालिक को भी रोक दें। जिसका मकान है, फ्लैट के अंदर, बिल्डिंग के अंदर, हम उसको भी रोक देते। इतनी मेरी ताकत है। लेकिन वह ताकत क्या है। यह बात थोड़ी न बताई है, कि हकदार है वह। थोड़ी न बताएंगे। हम तो कॉन्ट्रैक्टर हैं, मेन इंचार्ज हम ही हैं। वह तो जाके बाद पता चलता है न। और ऐसे लोग बेवकूफ बन जाते हैं।
दो बच्चे गए शहर में। हम ऐसे बिल्डिंग देख रहे थे। में जहां भी गए। बिल्डिंग ठोक में। आए, वॉचमैन आया। बोला, क्या कर रहा है रे। बोला, यह गिन रहा था। कितना गिना। गिनने का कुछ है क्या। जितना गिनेगा, उतना रुपया। अच्छा, गिना तो होगा। कितना गिना, बता। नहीं, हम इतना गिने। चल, इतना पैसा निकाल, तभी आगे जाने देंगे। नहीं तो पकड़ लेंगे, और भी बंद हो जाएगा। अच्छा, ले, इतना पैसा। दोनों मिला। आगे गए। कैश का हो। एक कहता, ठगा। कहता है कि मत देख। लेकिन बाद में, अरे, ठगाए का गए। गिने रहे इतना, बताए इतना। समझे, बचा लिया। गिने रहे इतना, और बताए इतना। इतना बचा ही लिया। वह काहे हमें ठगता है। हम उन्हें ठग लिया। ऐसे-ऐसे ही हम भी लूटे जाते हैं। जो ज्यादा लगाता है न बुद्धि, कि नहीं ठग लिया जाऊं। अब देखो के ठगा। लेकिन वह खुश है। हां, कहता है कि देखा, हम बचा लिया। इतना नहीं, पूरा चला जाए। पचास के पचास चला जाए। फिर काम हो गया। तो वह ठगा। हम थोड़ा। ऐसे ही आपको लगता है कि मैंने सामने वाले का यूज किया। आप यूज हो गए। यूज किए नहीं। यही तो होता है।
भक्ति मैं भी कर रहा था शुरुआत में। हम भी कहीं आठ महीना से व्रत है। इतना महीना से व्रत है। हां, और का। हां, क्यों न पूछे तब। वह क्या हो, बताओ इन्हें। तो टिकट पर डेट नहीं देखती थी। फ्लाइट से गया न। डेट तो था ही। जिसको आप दिखाते, कि देखो भैया। गांव में तो इतना समझदार होते, तो कैसे कहते, दिखावा वहां हो। हमारे लेवल के तो डेट से मतलब थोड़ी न। दो साल पहले गए, कुछ महीना पहले गए। बात यह थी कि हम फ्लाइट से घूम के आए हैं। वह देखो, यह प्रमाण है। हम कई महीना पहले गए। वह थोड़ी न। और कोई पूछेगा नहीं। गांव में हम। वह नहीं पूछा, कब गए थे। फ्लाइट के टिकट, बस टिकट दिखा दे। कब गए, उससे मतलब नहीं है। जहाज में बैठ लिया। और नाम देखिए। यह बड़ा चालाक बनता है। नाम बाकी न है। तुरंत नाम देखे। नाम बाकी न। बहुत शातिर है न। तो हम कितने महीने ले घूमे।
हम भी शुरुआत में भक्ति करते, तो ऐसे करते थे। लोगों के सामने, लोगों को आकर्षित। व्रत करता था। इतने महीने से मेरा व्रत है, उपवास है। समझा था। फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि नहीं, यह एक बंधन है। आप इससे और आगे जाओ। तो मेरे अंदर क्या था? एक नाम, सम्मान की इच्छा थी। लेकिन लालच नहीं था। उस भक्ति से कुछ पैसे-वैसे नहीं चाहिए थे। इसलिए मैं आगे बढ़ गया। अगर नाम के साथ पैसे के चक्कर में पड़ जाता। मैं इसलिए दिखाता था कि तपस्या करता हूं, और कुछ सम्मान, थोड़ी इज्जत दें। और पैसा-वैसा न। पैसा तो हम कर्ज ले के। सम्मान का इतना था कि कर्ज लेकर उसको दे दो, कि जा, तेरा भला हो। चाहे तो, हां महाराज, हम बड़ा परेशान हैं। ले ले, कितना चाहे। दिए हैं बहुत। अभी तक कर्ज। जबकि आए थे। सबके सामने करी अठारह लाख जुड़वाए थे। पंद्रह लाख। उस दिन तीन लाख भरा है। पंद्रह लाख बाकी। जब आए थे, कि देखो बाबू, तो अभी भी कर्ज है।
तो कहने का मतलब है कि ठीक है, कोई बात नहीं। अपने आप को सुधारो। चालाकी, कोई बात नहीं। अब तो आई है, क्या करोगे। कोई बात नहीं। पीढ़ियों से मिली है। हमारे कर्म से मिला है। जन्म-जन्म का है। कोई बात नहीं। चालाकी है, शातिरपन है। लेकिन हम उसको छोड़ भी तो सकते हैं रे। हम अच्छे इंसान बन भी तो सकते हैं।
अब देख, मैंने कैसे चालाकी की। चलो, हम तो पानी न पिएं। लेकिन जब तेरे आंसू न आएं। देखो, अब बताओ। और पीना हमको है। अब वह सामने वाला खुश हो गया, कि महाराज, देखो, हमारा बात मान लिया। बात तो हारी थोड़ी न। तुम्हारे सिर्फ निमित्त बना के यूज किया। क्योंकि अगर मैं पानी पीता, तो तुम्हारी सब नजरों में गिर जाता। क्योंकि तहलका मचा के बोले, कि नौ दिन। निराली। दूर-दूर, कई किलोमीटर से लोग मुझसे मिलने आ गए, कि महाराज, नौ दिन का व्रत है। लोग सुन के आने लगे, कि नौ दिन का, कोई निराली है। चलो, चलो, लूट लो। तो यह आकर्षण के लिए। कोई कांटे पर सो जाता है। क्यों। एक हाथ पर ऐसे बांधे। बारह साल। अच्छा, क्या जरूरत है। कोई पूछ देना चाहिए। मैदान में करता, तो कैसे करते होंगे। तो डांटवा ले, दौड़ गए थे। इससे अच्छा एक हाथ को सत्कर्म लगा देता। एक हाथ से किसी सेवा में। क्यों कपड़े पर भार लेकर ढूंढता।
अरे, मैं आपको बताऊं। शुरू में हम कहे, यार, लट-बट बनाएंगे। सोचता था, लट में कुछ होता है। लट। उसी को। भाई, हमारी भी तो बचपना थी रे। पच्चीस-छब्बीस साल की उम्र में निकला था। बचपना ही था। इतना वह ज्ञान नहीं था। छह-सात साल में तो नंगा ही घूमते रहे। आपके बच्चों को दो-तीन साल में मतलब, वह अपने शरीर को समझ जाते हैं। हम तो कई सालों तक मां का दूध पिया। अभी भी मुझे याद है। पांच-छह। हम पढ़ने जाते थे स्कूल, पी के। तो क्या होता था। क्या बता रहा था। यह बातों में। इसके लट। हां, तो हम कहा, यार, लट बढ़ाएंगे, जटा रखेंगे। मुझे लगता था कि उससे कुछ शक्ति आती है। जैसे-जैसे जटा बढ़ेगा। तो हम बढ़ावे लगे। यहां लट हुई, हम बड़े खुश हुए। यार, लट हो रहा है। फिर मैं ऐसे घूमते-घूमते कभी देखूं, तो भिखारियों को भी लट। कहा, यार, लग रहा है धोते नहीं। ऐसे तो भीख मांगते हैं दिन भर।
फिर मैं चला गया तारापीठ। तारा शक्तिपीठ में गया। अरे, वहां देखा। पैसा, भीख मांगते हैं। जटा ही जटा। और मक्खी भिनभिनाती है। गंदगी में रहते हैं। और भैया, उसी दिन से जटा की इच्छा खत्म हुई। हम कहे, इसको निकलवाओ का। सीधा, जटा हटा दिया। जटा बंधा जाता है अपने आप। अरे तू क्या। तू धोना बंद कर। सर को नहीं धोने से। मतलब और क्या। और हम सोचे थे न, कि जो समाधि में लीन होते हैं न, इसीलिए जटा बढ़ जाता है। क्यों, बारह धोता है। इतना कर। बारह से हमारे में जिंदगी चली जाती। यह एक आकर्षण का केंद्र है। आप संप्रदायिक कपड़ा पहन लो। आप लट-जटा बढ़ा लो। तो यह होता है कि इतने पुराने साधु हैं, तपस्वी होंगे। जब इतना लट है, तो इसका मतलब कई सालों से तपस्या कर रहे। इनके पास बहुत कुछ होगा। क्या उनके पास है? दरिद्रता।
क्या है दरिद्रता? जब तक आपको कुछ पाने की इच्छा है, नाम, शोहरत, पैसा, तब तक आप दरिद्र हो। अब तुम्हें एक दरिद्र क्या दे देगा। और जब एक दरिद्र देगा, तो दरिद्रता ही देगा। यह समझना, इस बात को। एक घुटन वाले आदमी से अगर आप कुछ बोलोगे, तो घुटन ही देगा। इसके पास जो रहेगा, वही देगा न। तो मेरा धीरे-धीरे धारणाएं टूटीं, और मैंने एकदम सही मार्ग पकड़ लिया। मैं बोल सकता हूं। मैंने कहा न, कि मान-सम्मान की इच्छा बहुत थी मुझे, कि नाम खूब हो, शोहरत हो। पैसे की इच्छा नहीं थी। पैसा तो मैं अपना लगा देता था। पैसा लगा दूंगा। तभी तो नाम होगा, कि जा, तुझे दिया। तो यह धीरे-धीरे कई घटनाएं होती गईं। कई साधना की। वाम मार्ग की साधना। जा के कामाख्या में तपस्या करना। भूतनाथ श्मशान जाना। यह भूतनाथ श्मशान की कहानी बता रहा हूं।
गए। काली मां का मंदिर है। कामाख्या में, नीचे। हम कहे, चलो यार, श्मशान में साधना करेंगे। अब काली मां का मंदिर का पुजारी गाली दे दिया। मां की। वहां दारू, मां, सब। करी यार बेचैन। लेकिन हम कहा, यार, अगर इससे झगड़ा किया, तो साधना न करे दे। क्योंकि वह रहता है पहले से। नहीं, हमको साधना करना है। इसे गाली का जवाब मत दो। लेकिन गाली, घुटन, कहीं न कहीं दे रही थी।
गए। एक बाबा थे वहां पर। वहां पर सब मुंडी रखी है। कहा, यार, बाबा तो कुछ होंगे। मुंडी। कपाल बोलते हैं। ऐसे ध्वनि में। श्मशान में ऐसे ध्वनि लगी रही। यह कालभैरव का। सब। कई प्रतिमाएं थीं। तो हम कहे, आप, जगह तो बहुत बढ़िया, साधना करे। बाबा, यार भाई, कुछ तो। हम शुरुआत थी। कुछ तो हो, दम होए। खोपड़ी-पड़ी रखा। कुल रखे हैं न। और एक जन से बतवाते रहे। तो कुछ अंग्रेजी में भी बीच में बोले। तो जब वह हटा, तो मैंने कहा, बाबा, जय माता दी। पहले जय माता दी बोल रहे हैं। अब नर्मदे हर बोलिए। तो जय माता दी, बाबा। तो हम आपसे कुछ बात करना चाहते हैं। आप बात कर रहे थे। तो हमने बोला, नहीं, आओ। बोले, हम तो बाहर की भाषा में बात करते हैं। हम कहे, हां, हम यहां रुकना चाहते हैं। हां, रुको, रुको, साधना करो। हम कहे, हां, मुझे साधना करनी है। अब मैं साधना में लग गया। वहीं बैठना, भूमि पर। और ब्रह्मपुत्र नदी है, किनारे ही। वहीं स्नान करना।
रहना। तो एक दिन क्या हुआ। एक आए। अब मैं लेटा था श्मशान में। अंदर आए, श्मशान में, आते थे मांगने पैसे। वहां पर भी। अब वह क्या गया। अब देखो। अब गाली से ही बताऊंगा। घटना बताने में गाली देनी पड़ेगी। और एक को, ए, उठ रे। एक बाबा था। उठा। ए, उठ। अरे, हम कहा, यार, हमारा नंबर है। हम यहीं में आए। अब हम उठ के कुर्सी पर बैठ गए। कि यार, अपने से गाली बर्दाश्त होगा नहीं। तो हमारा नंबर तो मेरा ही आ रही है, इधर ही। अब आए। हम एक कुर्सी पर बैठा रहे। कुर्सी रहा। हम बैठिए, बैठिए। हम इज्जत दिया, डर के नाते। कि गाली देगी बस। क्योंकि हमें साधना करना था। गाली का जवाब देते, तो वहां रह नहीं सकते। क्योंकि उनकी चलती थी। तो हमने कहा, जरा हाथ दिखाइए। देखा। बता दिया। क्या बताई, भैया। तुम बहुत अच्छे हो। तुम सबके लिए करते हो। तुम्हें कोई समझ नहीं पाया। यह तो सबके साथ हो। आप बहुत अच्छे हैं। आप सबके लिए करते हैं। आप कुछ करना चाहते हो जीवन में। आप एकदम भोले-भाले हो। आपको कोई समझ नहीं पा रहा है। आप कुछ भी, सब कुछ पाना चाहते हो। कुछ करना चाहते हो लोगों के लिए। बड़ा खुश हूं, कि वाह, कुछ आता है। हम कहे, गाली से बचिए। कहे, तो बहुत कुछ आता है। हम कहे, हां, मैं ज्योतिष, हस्तरेखा का विशेषज्ञ रहा हूं। गाली से बचा का। बस उसका हाथ देखने का मकसद सिर्फ गाली से बचना था। कि गाली न दे। क्योंकि गाली निकालने में क्या साधना होगी। एक तो गाली निकाल नहीं पा रहा हूं। गेट पर मिली है। अब यह सीधा उठा के बोलेगी, क्या रे, क्या कर रहा है। तो वह गाली निकालने में महीनों लग गया, कि साधना क्या करेंगे। अब यार, गाली से। मुंह। कैश की कोई जरूरत हो, तो बोलना। हम कहे, ठीक है।
फिर बाबा दारू पीते थे वहां। दारू, मांस, सब चलता है। कामाख्या में मंदिर में ही बलि होती है। तो बाबा बोले, तो हम तो डायरेक्ट बात करते हैं। डायरेक्ट। मुंडी वाला। हम कैसे। हम तो अभी साधना में हैं। करते होंगे। श्मशान में रहते हैं, करते होंगे। तब एकरे बाद कुछ दिन ऐसे बीता। तो बाबा कहे, दो सौ रुपये देते, हमसे। दो सौ रुपये देते। हम कहे, बाबा का। डायरेक्ट बात हो। दो सौ हमसे मांगता है। का, डायरेक्ट मंगा ले। लेकिन उनसे न कहा, नहीं। तुरंत भगा। हम तो। हम कहे, बाबा, दो सौ। यार। और वह खाते थे मक्खी, और यह मांस वगैरह, और दारू पीते थे। हम कहे, बाबा, यार, बड़ा असमंजस में फंस गए। कि भाई, पैसा तो दे सकते हैं, लेकिन मांस हमारे पैसे से खावत न चले। हम अपने अंदर सोचत हैं। तो मैंने उनसे कहा कि बाबा, एक बात बताएं। मैं हूं शाकाहारी। शास्त्री। अगर आप मेरे पैसे का, अगर शराब तक पियो, तो ठीक। क्योंकि उसे वही चाहिए। शराब तक पियोगे, ठीक है। लेकिन मांस मत खाना। तब उन्होंने कहा, ठीक है। हमने दे दिया। अब जितना दिन रह के साधना की, अपनी आराम से की। अब वह मर गए।
तो यह सब बातें हैं। साधनाओं में, हमने भ्रमण में बहुत कुछ देखा है।
भाई, कार्य से आत्मिक हो, तो क्या कर ले बे सिद्धि। सिद्धि करना है तुम्हें, तो क्या कर ले। आप जब उस मार्ग में जाना। क्योंकि पूछने में भी तो समय बर्बाद कर रहा है। मैं बताऊंगा, सिद्धियां होती हैं, तो क्या करेगा। सिद्धि करेगा? मैं कह रहा हूं, होगा नहीं। आप क्या चाहते हो, वह है या नहीं, वह पक्का करो। जब तुम चाहते ही नहीं हो, जिस मार्ग में जाना ही नहीं, तो आप उस मार्ग की बात क्यों करते हो। मैं कह दूं, सिद्धि है या नहीं, उससे क्या हो जाएगा। सिद्धि करो, तो बताओ। तो फिर बात बने। और मैं सिद्धियों वाला, मैं सिद्धि का मार्ग बताता ही नहीं।
तो जितने सिद्ध लोग हैं, चला जा कामाख्या। तो हमारी की न। माई, बहन, सुन। तब तो समझ में आए, सिद्धि है कि न। का, जा वहां। सिद्धियों की जगह जा। देखो कैसे। तो गाली दें। इतनी गंदी-गंदी गालियां देते हैं, आप सोच भी नहीं सकते। हमारे साथ। अरे, वह तो उनका परिणाम भी तो कामना वाला है न। वह तो भोगते भी हैं। सड़ के मरते हैं।
अरे, मैं आपको बताऊं। मैं कामाख्या जा रहा था, ट्रेन में। एक लड़का मिल गया मेरे साथ। मेरा एक सेवा करने वाला था, कि मतलब सामान बांध देना। हम तपस्या करते थे, तो उसको लेकर जा रहा था। अब वह मिल गया। तो रात को हम कालभैरव का मंदिर था, श्मशान था। वहीं रुके थे। कामाख्या मंदिर के थोड़ा आगे है। तो रुके थे। तो एक बाबा आया। अब एक हाथ। न पी के। एकदम रात की। मैं तो डायरेक्ट बात करता हूं। हम तो डायरेक्ट। ट्रेन में जाते हैं। हमारी सीट रिजर्व हो जाती। यह डायरेक्ट हमारा है। अब इतना हाकने लगा, कि मेरे साथ रहने वाला कहा कि नहीं, जा, आशीर्वाद ले ले। कहा। हम कहे, ले ले। हां। न लेबे, पछतावे है। अगर नहीं लोगे। मेरे साथ कोई रहता है न, कहता है कि मैं जाऊं, मैं जा। क्योंकि मुझे मालूम है, कुछ नहीं है। लेकिन तुझे यह बात नहीं मालूम है न। तू जिंदगी भर पछताएगा। गए, पांव छुए। बाबा आशीर्वाद देन। अब बाबा आशीर्वाद देन। हमको तो हंसी आ रही थी। मैं समझ गया था।
इसके बाद सुबह हुई। सुबह हुई। हम कामाख्या मंदिर का दर्शन करने जा रहे थे। रास्ते में एक दुकान थी। वहां खड़े हुए। वह निकल गया, बनारस का। बनारस का निकल गया। अपने गांव के बगल का। अब उससे हमारी बातचीत होने लगी। तो ट्रेन में मिलने वाला लड़का भी वहीं, कुछ वहीं बिजनेस करता था, और वह आ गया था। गधे-गधे पर माल बेचता था। अब मिलना हमारा हो गया। अरे महाराज जी। आप। हम कहे, हां। बोला, अरे चाय-चाय पिए, नाश्ता कर। नहीं, नहीं, नाश्ता-वास्ता नहीं करेंगे। कहे, नहीं, नाश्ता करिए। ए, इधर आ रे। अब आया, दौड़ा-दौड़ा। अब वह आदमी कौन था। वही बाबा। अब मुझे इतनी हंसी आ रही है। मेरी हंसी नहीं रुक रही। जैसे ही बाबा को दौड़ते हुए देखा। ओ। तो अब मेरी हंसी। इतनी हंसी आ रही है कि मैं दबा रहा हूं। मतलब रात को कह रहा है, मेरी सब चलती है। उसका वह। ऐसे ही बुला। ए, यहां इधर आ रे। दौड़ा-दौड़ा। एक हाथ। फटाक। अब मेरे साथ वाला भी देख के भौंचक्का। अब मेरी हंसी तो रुक नहीं रही है। वह रात का आशीर्वाद ले रहा था। अब मेरी हंसी तो रुक नहीं रही। वह बैठ के वहीं भीख मांगता था। अब मेरी। वह काला कपड़ा पहना था। बाल थोड़ा बढ़ गए थे। तो अब मेरी हंसी रुक नहीं रही है। अब बोला, ए जा, चाय-समोसा ले के आ। अब वह दौड़ा-दौड़ा ऐसे गया। उसका दौड़ना भी गजब था। आया, चाय-समोसा ले के। अच्छा, बचा हुआ तू रख ले। चल जा। अब वह चला गया। अब मुझे क्या चाहिए समोसा। मुझे तो हंसी आ रही है। आशीर्वाद दे रहा है।
तो यह स्थितियां हैं। मेरा यह कहना है कि बहुत समाज में भ्रांतियां हैं। मैं तो इतना भी कहता हूं कि आप समझे, तभी माने। मेरी भी बात मत मानना। क्योंकि हो सकता है, यह भी मेरा एजेंट हो। रख लेते हैं न लोग। हो सकता है मैं। अरे, आज के डेट में। दो। हम बताते हैं। हमारे यूपी में एक जन हैं। तो वह बाहर से जब मिलने आते हैं न, तो लड़कियों को सौ रुपये दे-दे। कहे, जब हमसे मिलवे, तो हम रास्ते से जाओ, तो लेट ही आए। तू प्रणाम। सौ रुपये दे। अब सौ रुपये मिले बिना, कोई एक बार लेटे में, तो आदमी का क्या करे। अब कोई उनसे मिलने आता था। जितनी लड़कियां हैं, सौ-पचास के लालच में लेटी हैं। तो अब सामने वाले को लग रहा है कि यार, यह तो महान व्यक्ति है। महान थोड़ी न है। उसके लिए शब्द नहीं है। क्या इतना गंदा है। लेकिन क्या करोगे।
तो मैंने अपने आपको। आप हमारे वीडियो में देखोगे। हमने बहुत कहा है कि जब आपको समझ में आए, आप तब आगे बढ़ना। मेरे बताए मार्ग पर। नहीं तो हो सकता है कि तू आकर्षण में बढ़ जाए। और जितने जन, सौ-पचास हैं, सबके रखे हुए आदमी। हमारा एजेंट ही होता है। ऐसा मैंने खुद देखा है। तो इसीलिए मैं कहता हूं कि भैया, मुझ पर विश्वास न करना। यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। अगर आपको ज्ञान समझ में आए, तो ज्ञान समझ कर आगे बढ़ना। मत, उनको देखना। आदमी तो रख लेता है न। आदमी बिकता नहीं है क्या। लोग झाड़ू, आश्रम का झाड़ू-पोछा कराए, बिना चेला बना देते हैं। कंठी पहना देते हैं। दिखता नहीं है। आदमी तो। अब सावधान कैसे होगे। कि आप जिसके लिए मेरे पास आए हो, वह बात करो। जैसे तुमने कहा, सिद्धियां होती हैं। अब आपको सिद्धि तो करना नहीं है। का करें, पूछते हो। लेकिन न। एक जानकारी और ले लो। बातचीत। आप मेरे पास जिस उपदेश को ले आए हो, उस पर बात करो। सिद्धियों के लिए थोड़ी न आए हो। लेकिन नहीं, सिद्धि होती है कि नहीं होती। तो कौन हो, बता दे। का कर। ऐसे जानकारी चाहे। तब सिद्धि हो। अब सिद्धि न हो। थोड़ी सिद्धि हो, तब तो आगे ले जा। न तो सिद्धि हो, चलो, तो सिखाई। यह सब के चक्कर में न पड़ो।
देखिए, सिद्धियों की व्याख्या महापुरुषों ने भी तो की है। कि रिद्धि-सिद्धि के चक्कर में न पड़ना। बोला है न। बहुत महापुरुष बोले हैं न। रामकृष्ण परमहंस ने बोला। बहुत लोगों ने। स्वामी विवेकानंद से पूछा था, तुझे। मेरे पास बहुत शक्तियां हैं। तुझे चाहिए क्या, रिद्धि-सिद्धि। स्वामी विवेकानंद ने क्या कहा, कि क्या उससे परमात्मा मिलेगा। तो बोले, नहीं। वह बाधा है। तो होती है, तभी न बोला। लेकिन मुझे देखना है कि मेरा आत्मिक कल्याण कैसे होगा। सिद्धियां, रिद्धियां, नर्क की द्वार हैं। क्या है नर्क। नर्क की द्वार। समझे। तो ऐसे, भैया, आराम से। अपना आत्मिक कल्याण भी न आए है। आत्मिक कल्याण कर। यह सब कहानी इसलिए तुम्हें बता रहा हूं, कि आकर्षण में मत आना। मेरे भी मत आना। तुम्हें ज्ञान समझ में आए, तो ज्ञान ले। अपना कल्याण करना। और पता चले कि न समझ में आया, तो अवतार हुआ, तो पुनः भी न हुई है।
मैं तो इसीलिए तो मैं कहता हूं कि मुझ पर कभी भरोसा मत करना। विश्वास मत करना। क्योंकि तुम जहां-जहां विश्वास किए हो, वहीं तो ठगे गए हो। तुम अगर अपनी समझ से समझोगे, तो तुम्हें कोई ठग नहीं सकता। और तुम किसी के आकर्षण में आओगे। जैसे मैं। मैं दीक्षा लिया, तो बहुत पछताया। क्योंकि दीक्षा लेने से पहले लोगों ने मुझे बता दिया, यह साक्षात शंकर है। यह। हम कहा, साक्षात शंकर। जब मिल गया, तो ले लेती। लेकिन लेने के बाद हमारी एनर्जी डाउन हो गई। क्या हुई। इसका पता मुझे चला, जब मेरा वह माला हटा, तो मेरी एनर्जी फिर हाई हो गई। क्योंकि मैं दीक्षा लेने के पहले ही आठ महीने का व्रत था। और बहुत साधना की थी। त्राटक साधना। वाममार्गी साधना। बहुत साधना की थी। रात-दिन काली मां, कालभैरव की साधना करता था।
अब उस ऊर्जा का उपयोग कहां करूं, वह मुझे नहीं मालूम था। ऊर्जा तो खूब आ गई। अब जैसे एक बालक को दो हजार का नोट मिल गया। जा, दुकान। कहे, चॉकलेट दे दे। नहीं। अब सामने वाला बेईमान है, तो कहेगा, ला, थैली में दे। ओ। अब उसको क्या पता, यह कितनी ऊर्जा है। वही हाल मेरी थी। ऊर्जाओं को मैंने ऐसे ही। ऐसे ही मेरा नाम दुर्वासा पड़ गया था। मैं कहता था, जा, तुझे कल कुत्ता काट लेगा। तो काट लेता था। तू बीमार हो जाएगा, तो बीमार हो जाता था। मेरा नाम दुर्वासा पड़ गया था। मुझे यह कहा जाता था कि तुम अब यह सब मत बोलो। मैं अब बाद में मैं पछताया, कि यार, यह क्या कर दिया। लेकिन अब ऊर्जा ही ऊर्जा मिल गई। लेकिन ऊर्जा का उपयोग कहां करना है, वह मुझे नहीं पता था। तो जैसा आचरण रहेगा, वही करेगा। तो तोड़-फोड़ करे, मजा आवे। अब कुत्ता काट ले। देखा, हमको बोले रहे न। चल, बीमार हो। कि ठीक। तो बट न।
उसको उल्टा करेंगे, तब तो नहीं। तभी तो पता चलेगा, मेरे में ताकत है। अब के बीमार हो, तो के ठीक कर। तो दोनों के बतावे के। बाकी देख, हम। ताकत हो रही। क्योंकि अगर बीमार को ठीक करूंगा, तो ठीक वाला नहीं मानेगा। तो तुझे बीमार करना है मुझे। मैं ऑफिस में जिस कुर्सी पर बैठता था, मैं कहता था, अगर इस पर कोई बैठा, न, बीमार हो जाएगा। तो झाड़ू-पोछा वाले भी पछताते रहे थे। एक-एक मैनेजर। मैं नहीं था, तो वह बैठ गई। उसने जांच-नाच। और वह बीमार हो गई। वह बीमार भी। और उसकी बीमारी के बाद हमें बड़ी खुशी मिली। और न बीमार हो, तो हम तो बड़ा ज्यादा वह हुई। हम दुखी होते हैं न। देखिए, कभी-कभी न, कभी-कभी लोगों के दुख से हमें मजा आता है। मैं अपने को सत्य दिखाना चाह रहा था। कि मैं सत्य। और रोके रहे। का करे। कामना चाहत। यह भी तो गलत है न।
तो यह, भैया, एक काम करो। जिसके लिए आए हो, वही बात करो। किसी के प्रभाव में मत आओ। भीड़ के चक्कर में मत आओ। समझा था कि नहीं। भीड़ के चक्कर में मत आओ। अब हम दीक्षा ले ली। शंकर का अवतार ले तो लिया। लेकिन जैसे ही लिया, तो मुझे लगा कि मैं डाउन चला गया। मूड चला गया। फिर जब वह मेरा कंठी उतरा, तब मेरी ऊर्जा फिर जली। टूट गया। और मैंने उसे पहना नहीं। और मुझे पता चल गया था। पता चल गया। तो फिर अब निकल भी नहीं सकते। धीरे-धीरे ही तुम फिर उठोगे। तो लोगों के आकर्षण के चक्कर में मत पड़ो। जिसके लिए गए हो, बस वही बात करो। और खुद समझो। आकर्षण में मत आओ। किसी के आकर्षण में मत आओ।
हो सकता है, अगर एक लाख की भीड़ हो, तो एक लाख के एजेंट उसके हों। आप कभी भी अपनी समझ से आगे बढ़ो। वह एक लाख को समझा पा रहा है, और सब समझ रहे हैं। कह रहे हैं, नहीं, मुझे समझ, और तुम्हें नहीं आया। तो उस एक लाख के भेड़ की भीड़ की वजह से मत टिको। तुम आगे बढ़ो। कहां बढ़ो? जहां तुम्हें समझाया जा सके। जहां तुम समझ सको। जहां तुम्हारा उद्धार हो। और उद्धार तुम्हारा वहीं होगा, जब तुम अपनी समझ से समझोगे तब। समझा था कि नहीं?
न आपको उसका आश्रम देखना है, न तो उसके यहां भीड़ देखना है, न तो उसका रहन-सहन देखना है, न तो उसकी तपस्या से मतलब है। मेरा काम सिर्फ मेरे काम से मतलब है। इतने मतलबी बन जाओ। और जब उसके द्वारा आपका उद्धार होने लगे, तो आप देखो कि यह व्यक्ति मेरे काम आ गया। क्योंकि मैं बहुत दिनों से भटक रहा था। और मुझे यह समझ में आ गया कि इसकी, इसने कुछ ताकत दी। और उस ताकत का उपयोग करके मेरा स्तर उठ रहा है। यह बात का मुझे पता है। तो आपके पास भी कोई ताकत है, तो उसके काम में हाथ बढ़ाओ। यह जरूर करो। इतने मतलबी मत जाओ, कि हम ताकत ले के चल दिए। नहीं। फिर वह ताकत का दुरुपयोग करोगे। क्योंकि एक तरह से तुमने चोरी की न। उसने तुझे ताकत दी। उस ताकत के लिए उसने तप-तपस्या की होगी, मेहनत की होगी। तो जब तुमने लिया, तो तुम्हें यह देखना है कि तुमने लिया, तो दिया क्या। तुम किस लायक थे।
इसीलिए तो कहा गया है न। मित्र के यहां, कहीं मेहमानी जाओ, गुरु के यहां कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। यहां तक कि कहा गया है कि कुछ नहीं, अगर आपके पास है, तो पत्ते ही ले लो। कुछ नहीं है। कुछ ऐसे पत्ते होते हैं, जैसे तुलसी के। बहुत ऐसे पत्ते होते हैं, स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। कुछ ऐसे पत्ते ले लो, तब जाओ। और उस पेड़ से कहो कि मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। और मैं। और देखा, अगर सूखा, गर्मी, महीना बाद पानी डाल दो। और कह दे, यह पत्ता मैं ले के जा रहा हूं। मुझे जरूरत है।
जीने का तरीका बदलो। पहले तो मानव बनो। हम दानव हो गए हैं, कि बस आओ, ले लो, ले लो। अरे भाई, तुमने दिया क्या। लो, लेकिन दो भी तो।
हमें नहीं पता, भाई। अपना कल्याण कर। तू कल से देखता हो, चाहे दो साल से देखता हो। बहुत जन तो मिले हैं। कुछ साल से। कहे, बीस साल से मिला है। तो हम। सामने वाला कहता है कि अरे, हम तो महाराज से बीस साल। हम ठीक हो। भाई, जानता है। अदृश्य रूप में जानता है। तो तू काल से देखता है, कि दो साल से देखता है। हमें ही न। मतलब हमें बस इतना मतलब है, कि तू कितना समझता है। वह तेरी समझ से। हमें उससे भी न मतलब। हमें अगर मतलब होए, तो यह पूछो, कि तू हमारे काम में कितना लगाया है। और ज्यादा, अपनी क्षमता से ज्यादा कहे, तो कह दे। हम कभी स्टेटमेंट दे। या तो नाम बताओ, जिस नाम से आए। अरुंध शाह के नाम से। अरुंध शाह। अच्छा। ऐसे लगाते रहे।
भाई, सरकार में तो सरकार नहीं है। हमको वैसा हो रहा है। सब कुछ हो रहा है। वही हमें लाभ है। तो फिर हमें पे करना चाहिए। देना चाहिए। अगर मैंने लाभ लिया। क्योंकि अगर हर आदमी मुफ्त में खा के जाएगा, एक दिन वह खाली हो जाएगा। आप सोचिए कि आपके पास कुछ है। और हर आदमी, एक, महाराज जी, तपस्या। कहो, तपस्या। महाराज जी आए। समाज के लोग आए। महाराज जी, भला करो।
जंतर पहना। सच में काम करता था। लेकिन यह तो दाढ़ी है न। तपस्या का एक-एक बाल। एक दिन उनकी डर। दाढ़ी न रही। फिर मूंछ पर गए। दाढ़ी-मूंछ दोनों खत्म हुईं। महाराज जी खाली। अब जा। फिर तपस्या कर। क्योंकि सामने वाला। अब जंतर पहने, तो थोड़ी न लौटे। जंतर लौटे का करें। लौटी है। तो एक दिन महाराज खाली हुए। तो जब आप अगर बस एक व्यक्ति से लेते रहोगे, तो वह व्यक्ति एक दिन खाली हो जाएगा। वह व्यक्ति एक दिन खाली हो जाएगा। तो जहां से मैं, जिस पेड़ का फल खा के मैं तृप्त हूं, उस पेड़ को मुझे पानी देना ही चाहिए। समझा?
तो बीच में फोन करने के लिए सोचे, लेकिन डर सा लगने लगा। कि डरो मत। जब तो सेवा करे कोई, तब हल्का सा कार्य उसको। नहीं गया, कि नहीं गया। बात हल्की की नहीं। जैसी आपकी सामर्थ्य है, वैसा करो। बात हल्की नहीं होती है।
अब लोग कहते हैं, शुभ कार्य मुहूर्त में करना चाहिए। अब की लड़कियां, दो बजे रात की बीमार हो जाएं, तो क्या सोचें कि साढ़े तीन का मुहूर्त हो, तो हम जाएं। अरे, जब चिंतन उठ जाए, उस समय करो। अब कहवे नहीं, तो भूत बेला चलती, प्रेत बेला चलती। और लड़कियां बीमार हो गईं, एक बजे। तो का कर। बार। रात की। मान लो, बच्चे ही तुम्हारे घर में एक बजे रात को हो जाएं, तो क्या करोगे। फेंक दोगे। मुहूर्त। यह सब देखने वाला आदमी न। ऐसे दायरे में बंधा रहता है। चोरी करे, मुहूर्त न देखता। बेईमानी करे, मुहूर्त न देखता। नहीं। मुहूर्त देखना है? चिंतन जब उठ जाए, उसी समय करो।
हां। तो भाई, अब वह कहता है न, हम ब्रह्मज्ञानी हैं। और हम आत्मज्ञानी। यहां क्या करिए। तो आत्मज्ञान के बाद ब्रह्म ज्ञान है। अगर वह जिज्ञासु होते, तो हम कहीं। अगर वह आत्मज्ञानी भी है, तो हम कहें, भाई, जा, समाज में काम कर। ब्रह्मज्ञानी है, तब तो हमारे सवाल हैं न, भाई। तो बहुत आगे निकल गए। आत्मज्ञान के बाद ब्रह्म ज्ञान होता है।
इस पर ट्रस्ट का सब ब्योरा दे दिया गया है। और बाद की पोस्ट में भी स्कैनर वगैरह लगा दिया है। आराम से हमारे काम में सहयोग करो। बस यही नियम हो। धन का जितना सहयोग दे सकते हो, उतना सहयोग दे दो। बाकी तो ज्ञान तो हमारे पास है। और शरीर का बल भी हमारे पास है। कर्म तो हमारे सारे अति थर्ड क्लास हैं। क्या करें। ठीक हो। फर्स्ट क्लास का इधर है।
दुख और सुख, दोनों तो हों, जब हमने ही आंतरिक भाव से दुख स्वीकार कर लिया। दुख स्वीकार किया, मतलब सुख की इच्छा खत्म हो गई। सुख की इच्छा खत्म हो गई, तो दुख हो ही नहीं सकता। फिर कौन गिरा सकता है। लोग सुख चुनते हैं, और गिरते रहते हैं। हां, एकदम बढ़िया बोला।
एकदम फटे कपड़े पहनते नहीं थे। जब हम कपड़े पहनते थे, तो वह धीरे-धीरे फटता था। तो फटे कपड़े तक हम इसलिए रहते थे, कि जब मैं फटे कपड़े में रहूंगा, तो समाज के लोग मुझसे खुल के बात करेंगे। इसलिए कि जब आप बाहर के आवरण से जितने मजबूत होते हो, उसी तरीके से समाज आपको भाव देता है।
मैं कह रहा हूं, एक करोड़पति आदमी हो, और एक रोडपति आदमी हो, भिखमंगा। एक को आप फोर व्हीलर गाड़ी में, अच्छे कपड़े, एकदम बढ़िया पहनाकर, और एक अनजान गांव में दोनों को भेज दो। और एक को एकदम फटे कपड़े। तो जिसके पास फटे कपड़े हैं न, समाज उनके साथ खुलकर बर्ताव करेगा। जैसा वह रहेगा। बचा हुआ भोजन देगा। बची हुई बातें करेगा। फालतू बोलेगा। अपना गुस्सा निकालेगा। भड़ास निकालेगा। लेकिन वह करोड़पति आदमी, वह गाड़ी से उतरा, उसको लोग सोचेंगे, हमारे दरवाजे पर चाय पी ले। हमारे दरवाजे पर नाश्ता कर ले। हमसे कुछ बात कर ले। समझ रहे हो। तो फटे कपड़े मैं इसलिए। वह मेरे काम का ड्रेस था। क्योंकि समाज को जब समझोगे आप, तभी समाज के लिए काम कर पाओगे। तो मैं नीचे से ले ऊपर तक लोगों को समझना चाह रहा था। तो नीचे वाले मेरे कपड़े देख के मुझसे खुल के बात करते थे। खुल के जलील करते थे। और ऊंचे लोग मेरे ज्ञान को सुनकर मुझे अच्छे से सुनते थे। तो मुझे दोनों मेरे पास आते थे। और खुल कर आते थे। खोल कर आते थे।
क्योंकि जब मैं बोलता था, तो गांव के जितने रहीस लोग हैं, उन्हें कपकपी हो जाती थी। रोने लगते थे। रहीस मतलब समझ का रहीस। रहीस मतलब यह मत समझ लेना कि धन का रहीस। हो सकता है धन का रहीस दरिद्र हो। समझ का रहीस।
तो मैं अभी मैं आपको बताता हूं। मैं फटाक पड़ा। यहीं खलघाट के पास। यह टाका खल गांव है। यहीं चिचली के बगल में। उस गांव से मैं आता-जाता था। एक ने मेरे को रोक दिया। ए, रुको। तो मैंने कहा, बोलो। तुम कौन हो? मतलब मैं कौन हूं? यह तो मैं लोगों को बताता हूं। मैं कौन हूं। इससे अच्छा है, तुम कौन हो, यह जानो। नहीं, नहीं, तुम कुछ हो। तुम क्या हो, पहले यह बताओ। और यह इधर रोज आते-जाते हो। इतने फटे कपड़े हो। कहीं जुड़े हो तुम किसी से। क्या बताऊं अब तुम्हें। अगर मैं बताऊं, तो तुम ऐसे बैठ नहीं पाओगे। तब थोड़ा और गुस्सा हुआ। हम कहे, अगर मैं बताऊं, तो तुम ऐसे बैठे हो न, बैठ भी नहीं पाओगे। बताओ, तुम कौन हो। गुस्से से बोला। बोला, अब आप इतनी जिद कर रहे हो, तो बता ही दूं मैं कौन हूं। क्योंकि अगर नहीं बताऊंगा, यह तो तुम्हारी जिद है। बोले, जाने ही नहीं दूंगा। हम कहे, अब बताना पड़ेगा। हम खड़े थे रोड पर। और हम बताने लगे। बताने लगे। तो वह सीधा हाथ ऐसे जोड़ा है। और ऐसे यह घुटना ऐसे हो गया। और उसकी आंखों में छरछर से आंसू आने लगे। रोने लगा। तुरंत रोने लगा। बोला, मैं यही हूं। अब बताओ। बोले, अब रुको। आज तो मत जाना। आज मत जाना। तो फिर मुझे उस मंदिर में मैं रुका। भोजन वगैरह किया। सत्संग सुनाया। रात को। उस समय वीडियो वगैरह नहीं बनते थे। शायद वीडियो नहीं बनते थे। तभी न वीडियो नहीं बना। सुनाया। और फिर बड़ा खुश हुआ। फिर उस गांव में मैं आने-जाने लगा। तो यह हाल है।
तो फटे कपड़े मैं इसलिए पहनता था, कि मैं समाज के लिए, मुझे काम करना था। मैं प्रत्यक्ष ज्ञान खोजा था। समाज के लिए खोजा था। तो मैंने कहा, जब इनके लिए काम करना है, तो मुझे नीचे से ले ऊपर तक लोगों को समझना पड़ेगा। अब कपड़े से कपड़े भारी हो जाएंगे, तो मेरे पास सिर्फ ऊपर वाले लोग आ जाएंगे। नीचे वाले छंट जाएंगे। तो मैं कपड़ा ऐसा पहनूं, कि मेरे नीचे वाले तो मुझे तुरंत, जैसे चाहे, वैसे बात करें। चाहे जैसा बर्ताव करें। और ऊंचे लोग थोड़ा शर्माते थे। तो ज्ञान से वह भी आने लगते थे। कपड़े से थोड़ा इतराते-कतराते थे, मेरे फटे कपड़े। लेकिन रोड पर करोड़पति भी मुझे सुनने। जब मैं आवाज, जब मैं बोलता था, तो लोग जुट जाते थे। अब उस रंक, राजा। गांव का एक झोपड़पट्टी वाला, और गांव का करोड़पति आदमी, क्या एक ही जगह खड़े रहते थे। मैंने कभी यह भी नहीं कहा कि तुम इन्हें आसन दो। क्योंकि मेरे पास कुछ था ही नहीं न। एक फटा हुआ कपड़ा। और मैं। और मेरा ज्ञान। तो मैं ज्ञान ही बांटता था। मैं उन्हें पानी भी नहीं पूछता था।
तो फटे कपड़े मैं इसलिए पहनता था। फट जाते थे। मैं फटा ले थोड़ी पहनता था। नया पहनता था। फट जाते थे। निकालता इसलिए नहीं था, कि मुझे काम करना था। तो मुझे समाज को समझना था। इसलिए मैं एकदम लो से लो क्वालिटी में समाज में कई सालों तक घूमा। कई सालों तक। क्योंकि जब आप जिसके लिए काम करोगे न, जब उसे समझोगे, तभी तो कर पाओगे। क्योंकि मुझे सबके, हर व्यक्ति तक आध्यात्म को पहुंचाना था।
अगर मेरे कपड़े ही पावरफुल होते, तो तुम यहां नहीं होते। तुम यहां नहीं बैठ पाते। मैं आपको बता रहा हूं। क्योंकि ज्ञान। अरे, जिसको बोलना नहीं आता, कचरे की तरह बोलते हैं, वह धर्म के नाम से झूठ बोलकर एयर कंडीशन में घूमते हैं। यह आपको भी पता है, मुझे भी पता है। जो झूठ बोलते हैं धर्म के नाम से। वह एयर कंडीशन में घूमते हैं। यहां तो ज्ञान है। जब मैं बोलता था, तो लोग थर्राते थे। कपकपी हो जाती थी। अगर मेरा कपड़ा मजबूत होता, अगर मैं बाहर से मजबूत कर लूं, तो तुम यहां नहीं बैठ पाओगे। लेकिन मैं चाहता था, मेरे पास हर व्यक्ति आए। तो करोड़पति मुझसे चोरी-चोरी मिलते थे। कहा, घर पर बुलवा ले। मैं जाता था। कोई बात नहीं। मुझे पता चलता था कि इन्हें शर्म आती है। क्योंकि वह। एक। सब। छोटा आदमी। उनके लिए छोटा-बड़ा तो है ही। वह निकले थोड़ी न है। तो मैं उनके घर पर बुलाया जाऊं। तो बोले, क्या-क्या सेवा करूं। मैं बोला, बस एक काम करो। यह सत्संग सुनो। इसमें चलो। फिर वीडियो खोल देता था। मैं बोला, यह देखो। बस यही सेवा है हमारी। और मुझे कुछ नहीं चाहिए। कपड़े ले लो। बोला, कपड़े की लाइन लगी है क्या।
क्योंकि क्या है। अपने-अपने कुछ पाने के लिए। लोग। कितने साल से। जितना पुराना कपड़ा, दो साल, तीन साल, उतना देने वाले। गांव का गांव, कपड़ा देने के लिए एक-एक आदमी। मैं पूछता था, कपड़े दोगे? कितने तक दोगे, बाबा? दस, बीस हजार। कितने का कपड़ा लोगे, बताओ। वह मुझे कपड़ा थोड़ी न दे रहा था। वह देख रहा था कि दो-तीन साल से एक व्यक्ति कपड़ा पहने। दो-दो, तीन-तीन, चार महीने निकालता नहीं था। तो उन्हें लगता था कि इनको अगर मैं कपड़ा पहना दिया, तो मेरा कल्याण, भौतिक जगत का, हो जाएगा। मैं आगे बढ़ जाऊंगा। मेरा वैभव हो जाएगा। मुझे थोड़ी न। उसे कपड़ा पहनाना था। उस कपड़े के द्वारा उसे कुछ बनना था। तो कपड़ा देने के लिए लाइन लगी रहती थी।
अगर मैं बाहर से मजबूत-मजबूत अगर करके काम करता न, तो तुम यहां नहीं होते। और न तो तुम्हें मैं सुनाता, कि मेरे पास पंद्रह लाख कर्ज है। तीन लाख का कर्ज है। मुझे यह सब सुनाना नहीं पड़ता। तुम्हें बताना नहीं पड़ता। तो यहां ढेरों लगे होते। मैं यहां से रात को कंपनियों के करोड़पतियों को रात को बारह बजे के बाद भगा देता था। अगर जरा सा इधर-उधर, नियम में नहीं रहते थे, तो रात को बारह के बाद। और आते ही कहते थे, मैं डोनेशन दूंगा। आप आश्रम। हम कहे, जिसके लिए आए, पहले वह करें। कि इतना जन, डोनेशन देने वाले। न। भगा ही नहीं था। उनको रात को बारह बजे भगा देता था। ऐसा नहीं कि वह करोड़पति थे। उनके आचरण गंदे। वह सोचें, हम करोड़पति हैं, तो मुझे अलग से कुछ व्यवस्था मिलेगी। अलग से कुछ चीजें मिलेंगी। तो मैं उन्हें भगा देता था।
तो मैं फटे कपड़े इसलिए पहनता था, कि वह समझ लो, मेरे काम का एक ड्रेस था।
हो सकता है। ऐसा कुछ नहीं है। कुछ न पाना, कुछ न चाहना, कुछ न होना, कुछ न पूछना। खाली-खाली। यह तो आखिरी में, जब वह जाता है न, तब पता चलता है वह क्या है। क्योंकि जब तक वह रहता है मेरे ऊपर, मैं संशय में जी रहा हूं। तो उस पर संशय ही करता रहूंगा। वह कितना भी वह बोले, कि मैं समाज के लिए कर रहा हूं, कर रहा हूं। जब वह जाता है। जब वह जाता है, क्योंकि अब वह कर नहीं सकता। और पिछला जब मैं देखता हूं, कि यार, इसने तो सब सेवा ही की। तब लगता है कि वह कुछ था। वह जब तक रहता है न, उस पर संशय ही रहता है। कि आश्रम बना रहा है। अपने लिए गाड़ी ले रहा है। ऐसे घूम रहा है। उसे। वह जब जाता है न, तब पता चलता है कि जितना उसके पास था, उसने किया क्या। क्योंकि तुम संशय में हो, तो तुम उसके ऊपर भी संशय करोगे।
मेरा तो कहना है, बस लाभ लो। संशय मत करो। आप सिर्फ लाभ लो। जिस काम के लिए आए हो, वह करो। वह तो आखिरी में पता चलेगा न। वह आखिरी में पता चलेगा। वह जाने के बाद, कि उसने क्या किया। क्योंकि बीच में कुछ भी कर सकता है न। एक व्यक्ति अगर नौकरी कर रहा है, तो बेईमानी तो आखिरी दिन भी कर सकता है न। जिस दिन वह रिटायर हुआ, उस दिन फाइनल हो गया, कि इसने अपनी नौकरी में बेईमानी नहीं की। हो सकता है वह आखिरी दिन कर दे। बाद में भी खुल जाती है। जब तक वह मरता नहीं, जब तक तो रिकॉर्ड। वह तो खुल जाता। वह तो देखो। अगर उसने किया है।
मैं कह रहा हूं कि उस व्यक्ति की बात कर रहा हूं, जो उस पद पर है। उसे ईमानदारी-बेईमानी उसके हाथ में है। तो यह तो आखिरी दिन पता चलेगा, कि वह क्या करके गया। क्योंकि आखिरी दिन तक संभावना तो बनी है। उसके हाथ में पावर है। आखिरी दिन तक भी संभावना बनी है। आखिरी दिन भी, रिटायर के पहले, कुछ कर ही सकता है न। तो आखिरी दिन पता चलता है। जब वह व्यक्ति चला जाता है, तब पता चलता है कि इसने क्या किया। क्योंकि आखिरी दिन तक भी संभावनाएं रहती हैं। इसीलिए लोगों को संशय बना रहता है।
तो मेरा तो यह कहना है कि छोड़ो यह सब बातें। आप जिस उपदेश को ले गए हो, उस पर काम करो। बस बात खत्म। क्योंकि उसका तो पता आखिरी दिन चलेगा, कि इसने क्या किया। हो कि न। उससे पहले वह जांचने वाला ही चला जाए। उसका तो टाइम वेस्ट हो जाएगा। यह भी तो हो सकता है न। कुछ भी हो सकता है। इसीलिए मैं जिस काम को ले के गया हूं, वह करूं। क्योंकि लोग मेरे भरोसे पर धन दे रहे हैं। तो मुझसे कोई हिसाब थोड़ी। वह धन कहां लगाता हूं, मुझे मालूम है न। कोई हिसाब थोड़ी नहीं ले रहा है। पूरे इंटरनेशनल पैसे आते हैं। तो वह तो मुझे पता है न, मैं कहां लगा रहा हूं। हम उन्हें थोड़ी हिसाब दे रहे हैं। वह हिसाब सिर्फ मेरे पास है। किसके पास? मेरे पास। और मेरे साथ रहने वालों के पास। क्योंकि जो आसपास रहते हैं, उन्हें तो पता ही चल जाता है न, कि यह धन का उपयोग कहां कर रहे हैं। उन्हें पता चल जाता है। है न। तो एक मुझे पता है। मेरे आसपास वाले लोगों को पता है, कि मैं पैसे का क्या करता हूं। और वह आखिरी दिन, जब वह निकलेगा, तब पता चलेगा।
सुख-शांति तो कर्मों से बनती है न। किसी के कहने से थोड़ी न। और सामने वाले की कितनी क्षमता है। सामने वाले की क्षमता के अनुसार। जैसे जो जिस पोस्ट पर है, उतनी ही पावर है न। एक हवलदार की अलग पावर है। एक दरोगा की अलग पावर है। एक ही डिपार्टमेंट में। डिपार्टमेंट तो एक, वह एक ही है न। लेकिन आईएएस, पीसीएस, उसका, प्रधानमंत्री, सबका अलग-अलग पावर है। वैसे अलग-अलग साधनाओं की अलग-अलग पावर होती है। अब वह किस लेवल पर गया है। जितने जन प्रणाम किए हैं, सब। उनके आशीर्वाद दे दे। सबके आशीर्वाद। अब का, सबका पढ़।
हम आएं, देखो। अब जब तू पढ़ाता है, नोटिफिकेशन चालू कर ले। और सब्सक्राइब कर ले। बेल आइकन दबा ले। और जब आएं, तो नोटिफिकेशन चला जाए। हम आएं, तो का कर। पढ़। पढ़ावा कर। मतलब भाई, जब आएं, देख ले। हमें खुद नहीं पता, हम आए कि नहीं आए।
देखो भाई, जितना प्रश्न ले लिया। अब धीरे-धीरे नर्मदे हर कह। फिर लाइव आएं, तो पूछ ले। अब इतना लिखता गया है। एक आदमी कितना पढ़े।
का बोर हो। तू एक जैसा खाना खाता है आज तक। भोजन। बोर। भट्टी। सब्जी घुमाए-फिराए के मिला था। तो एक जैसा प्रश्न पूछने वाला। का। स्थिति अलग है। तो बोर का हो। बताओ। मार। वह काम हो।
एक शिक्षक अगर कोई भी सब्जेक्ट पढ़ा रहा है, तो हर साल उससे वही रिपीट करके, वही लेसन वाले पूछ रहे। तो क्या बोर होता है। वह बोर थोड़ी न होगा। बच्चे चेंज होते हैं। सिलेबस थोड़ा। अभी वह पढ़ाता था न, पाठ। वह प्रश्न वही। उत्तर बस। वह शरीर रूप चेंज हुआ हो। पूछे। तरीका चेंज हुआ हो। तो का बोर हो, भैया। बोर हो, तो इतनी रात की लाइव नहीं।
यहीं पर आश्रम है। तो यह एक कमल आता है न। कमल गए, मेरे साथ था। मैं उस आश्रम में गया था। इस समय बैठा था कुर्सी पर। वह भी बैठा था। कुछ महाराज लोग आए। एकदम गाड़ी से उतरे। धड़ाम से। एकदम त्रिपुंड लगाए। गेरुआ धारण किए। कमल से कहे, जा, आशीर्वाद ले ले। हम कहे, ले ले का। हमें तो मालूम है, इनके पास कुछ न। लेकिन तू ला। तू। दूर का ढोल सुहावन, घर का मूली साग बराबर नहीं। यही बोला। गए, आशीर्वाद ले ले। आए। कहा, चलो भाई, ले तो ले। कुछ। अब आगे देख। हम उनसे न कहे। अपने से। हम कहे, अभी इतनी शुरुआत है। पूरी फिल्म अभी बाकी। बस। अब तू देख।
कुछ देर बैठे। आश्रम वाला, वहां के सेवक को बुलाए। जरा किसी बुलाओ। बुलाए। बोले कि हम आगे जा रहे हैं। कुछ खर्चा-पानी। अब हम। हम कहा, देखा। अब के तो खर्चा-पानी। तो बोले, भाई, मेन तो नहीं हैं। खर्चा-पानी हम कैसे दें। तो एक खड़ा था। तो बोले, सौ रुपये, दो सौ ही, कुछ दे दो। तो कोई सौ-दो सौ दिया, मांग के। फिर वह और एक आदमी से मांगे। वह मोटा था। तो उसने कहा, नहीं, हमारे पास कुछ नहीं। अब एक बाबा जी थे। तो वहीं थे। आए थे। वह आगे परिक्रमावासी। सेवा करते थे। तो मैं जब जाता था न, तो मुझे कंबल-वंबल लगा देते थे। खिलाते थे। तो वह मुझे वहीं आश्रम में थे।
तो जब वह लोग गए, तो बाबा। वह हमें लेना था। यह चप्पल। मौला। मुझे चप्पल लेना है। आगे जाना है। मेरा चप्पल टूट गया है। तो अब वह बोल रहे हैं। कुछ मोबाइल की भी बात हुई। तो बाबा कह रहे हैं, आप मेरा मोबाइल ले लो। और नहीं, चलो, मैं नया दिलाता हूं। और जिस आदमी ने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं, वह आदमी कह रहा है, बाबा जी, चप्पल मेरी तरफ से ले लो। क्या दे। देखिए। चप्पल। ऐसा नहीं, उसके पास पैसा नहीं था। तो उनका सारा भ्रम कमल का चला गया। कि हम भिखारी से गए। आशीर्वाद ले गए। तो ऐसे बहुत। यह भिखारी हैं क्या।
अरे यार, तुम समाज का वह कपड़ा का रंग पहने हो, जिसे सर्वश्रेष्ठ की पदवी भी दी गई है। उस भेष को कितने लोग सम्मान के दृष्टिकोण से देखते हैं। और आप जा के घर-घर भीख मांग रहे हो। दो रुपये। यह ऐसे जाकर चिमटा बजा रहे हो। कि बताइए। जिस चिमटे को, जिस ध्वनि को इतना सम्मान दिया गया है। जिस कपड़े को इतना सम्मान दिया गया है। तुम जाकर दुकान पर। यह बताइए। जिस कमंडल को इतना सम्मान दिया गया है। कमंडल में तुम पैसे ले रहे हो। क्या बताइए। यह शर्म की बात है न। कि दे दो। कोई एक दे रहा है। कोई दो दे रहा है। कोई सौ। मतलब एक तरह के तुम भिखारी हो। लेकिन असली रूप में आ जाओ न। फिर पाखंड में क्यों भीख मांग रहे हो। आपको भीख ही मांगना है, तो अपना असली भेष लो, कि मैं भिखारी हूं। अब आप साधु का भेष क्यों लिए हो। जब भीख मांगना है, तो साधु का भेष क्यों लिए। अगर आपको दुकान-दुकान जाकर पैसे मांगना है, घर जाकर पैसे मांगना है, तो फिर साधु का भेष क्यों लिए।
अरे, साधु का मतलब है, आकाशवृत्ति से जितना मिल जाए, उसको ग्रहण करते हुए, साधना में लगा रहना। स से साधु। धू से धूल। अगर निर्विकार कराने का कोई भाव बना लिया, तो वह साधु है। चाहे घर में हो, चाहे बाहर हो।
हम कहे, ले ले आशीर्वाद। बाद में पछताना। पछताने लगा। यही हालत है।
हमें अपने काम से मतलब। अपने आप से मतलब। आप लोग अपना ख्याल रखें। जहां भी हो, खुश रहें। अपने आनंद की स्थिति में होने के लिए काम करें। मेहनत करें। आगे बढ़ें। ईमानदारी से जीवन जिएं। सत्कर्म करें। जिससे आपका उद्धार हो जाए, वह करें। और आपको पता है, आपका उद्धार कैसे होगा। और अगर आपको कोई सहायता चाहिए, तो समाज में सहायता देने वाले लोग भी हैं।
जैसे आप क्या काम करते हो। मैकेनिक का काम करते। मैकेनिक ही बोलते हैं। तो वह किसी के द्वारा सीखे नहीं? किसी ने सिखाया न। और आप भी किसी को सिखा रहे हो। यही दुनिया है। सीखना और सिखाना। तुम देखो। तुम सीखने वाले हो, सिखाने वाले हो। चाहते क्या हो, यह पक्का कर लो। फिर आप वहीं चले जाओगे। बस क्या आपको चाहिए, बस वह पक्का कर लो। आपको वहां तक पहुंचाने वाले लोग मिल जाएंगे।
जैसे दो आदमी निकले। एक अपाहिज हो। और एक, अपाहिज के बाद कुछ भी न हो। वह है बस। और एक व्यक्ति एकदम। पैसे भी हैं। सब कुछ है। और दोनों कह रहे हैं कि मुझे वहां जाना है। और मैं जाके ही रहूंगा। आपको पता है, वह अपाहिज वाले को भी लोग पहुंचा देंगे। और वह भी पहुंच जाएगा। दोनों वहां पहुंच जाएंगे। जिसकी क्षमता है, वह भी पहुंच जाएगा। जिसकी क्षमता स्वयं की नहीं है, उसे कोई क्षमतावान आएगा, और उसे वहां तक पहुंचा देगा। कोई उसे वहां तक पहुंचाएगा। इतना पक्का है कि वह लक्ष्य तक पहुंच जाएगा। अगर वह लक्ष्य को याद रखा है तो।
अगर वह लक्ष्य भूल गया, तो यहां से यहां गया। यहां से आके कहां गया। कहां बैठा है। लोग आकर पूछें, कहां जाना है। जाना तो है, लेकिन याद नहीं। समझ नहीं आ रहा, कहां जाऊं। तो वह व्यक्ति आपकी हेल्प नहीं कर सकता। आपकी इतनी हेल्प कर देगा, जितने में आप जी सको। वह भी एक वक्त, दो वक्त। बस। तो जीवन में लक्ष्य याद रखो। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। सिर्फ आप लक्ष्य याद रखो। आप सामर्थ्यवान हो या नहीं हो। दोनों स्थिति में आप लक्ष्य तक पहुंचना ही पहुंचना है। आपको पहुंचाने वाले लोग आपको मिल ही जाएंगे।
लेकिन अगर कोई कहे कि मैं पैरों से विकलांग नहीं हूं। मैं स्वस्थ हूं। और हमें कंधे पर दो किलोमीटर छोड़ दे। तो के, दो-चार पड़ाका मिले। क्या मिलेगा, कि नहीं। दो-चार थप्पड़। एक स्वस्थ आदमी अगर आपसे कहे कि मुझे कंधे पर बैठाओ, और दो किलोमीटर छोड़ दो, तो मेरे समझ से आप झापड़ ही मारो। न पहले बिठा लेंगे, फिर पटकेंगे। अरे हां, भाई। तरीका अलग होगा उसका। लेकिन अपाहिज आदमी हो, विकलांग हो, और कहे, भैया, मुझे वहां जाना है। आप कोई न कोई उसके लिए जुगाड़ करोगे। कोई न कोई व्यवस्था करोगे। समझ रहे हो।
आप लक्ष्य याद रखिए। सिर्फ लक्ष्य याद रखिए। और उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पूरा भाव बनाइए। उसके लिए आपकी क्षमता के अनुसार काम करिए। आपको कोई न कोई व्यक्ति मिलेगा। और आपको वहां पहुंचा देगा। कहा गया न। जाने किस रूप में नारायण मिल जाए। तो वह लक्ष्य पर पहुंचाने वाला ही नारायण है। सामर्थ्यवान। नारायण का मतलब क्या। सामर्थ्यवान। जिसने आपको लक्ष्य तक पहुंचा दिया, वही तो सामर्थ्यवान होता है। आप तुलना में मत जाइए। आप देखिए कि मेरे लक्ष्य तक मुझे पहुंचा कौन रहा है। वही आपके लिए इस संसार में सामर्थ्यवान है। तो जाने किस भेष में नारायण मिल जाए। समझ गए हो, तो फिर ठीक हो, भैया।
अब बताओ। विस्तार से पूछते हो। अब बताओ। दो घंटा के ऊपर हो गया। अब विस्तार से बता। मतलब भुररिया हो जाए। और फिर यह। कुछ देर बाद यह कही है, कि सेवा के बारे में विस्तार से बतावत। तो दोपहरिया हो जाए। हां। तो फिर तू और पूछ ले। शाम हो जाए। और फिर एक बाद। हम कुर्सी से सीधा नीचे गिर गए। फिर यह सब। अपनी कुर्सी उठा के ले चला जाए। और हम सो पड़े रहें न। जैसे वह कुत्ता सोया है। शरीर गिर जाएगा न। क्या होगा। तो जैसे वह सब सोया है न। वही लेटा मिल। तब कहे कि यार, महाराज जी, देखो कितने त्यागी हैं। देख, लेटा है। तो महाराज जी जान, कितना त्यागी है। कांटे पर सोने वाला ही उस दर्द को समझता है।
लेकिन क्या करें। मान की इच्छा, पैसे की इच्छा इतनी प्रबल है, कि यार, कांटे पर सोने से पैसा मिलेगा। सो ही जाते हैं। जैसे देखो न। शर्त। शर्त में बचपन में कुछ भी कर देते थे। हमने उस दिन बताया न। दो सौ का शर्त लगा। और एक मुट्ठी मिर्ची खाई। अब अपनी बचपना। अभी उस दिन आपसे बताया था, कि एक मुट्ठी मिर्ची खाना। वह भी एकदम तीखी वाली। तो ऐसे थोड़ी क्यों दे। दो सौ रुपये में एक मुट्ठी मिर्ची का। हम कहा, खा ले। दो सौ की बात नहीं थी। एक बताना था। उस मिर्ची के द्वारा, कि मैं बलवान हूं। मुंह में पूरा साथ खाए। एक-एक के। पूरा खा के। और कुछ लगे। तीखा लगता। एकदम न। तीत लगता। वह तो हम ही जानते हैं। कि अगर मौका मिले, तो कपार पटक दो। मौका मिले तो। लेकिन आंखों में आंसू। लेकिन मुस्कुराहट। जबरदस्ती। अगर वह रूम से निकल जाते, तो हम माथा पटक देते। लेकिन मिर्ची खा गए। दो सौ ले लिए। और कह दिए, देख। वह तो हमें पता है, कि कितने घंटे तक हमारी हालत खराब थी। और खा के घोंटना पड़ा। सामने। आंखों से आंसू। लेकिन हमको तीखा नहीं लग रहा है। वह तो हमें ही पता है न।
तो यह कांटे पर सोने वाले। बारह साल से जैसे करे। अरे, वह प्रभाव के चक्कर में आ गया। समाज के चक्कर में। एक प्रभाव के चक्कर में। नहीं तो वह हाथ उठाए। सड़ जाता। पांव सड़ जाता। लेकिन समाज क्या करेगा। जब आप विपरीत काम करोगे न। अपने शरीर को तकलीफ दोगे, तो लोग उस प्रभाव में आपको धन देंगे। और आपके का कहेंगे, क्या बात है तुम। क्योंकि वह नहीं कर सकते न। वह नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें करना भी नहीं है। समझे। हाथ उठावत। आ। चढ़ावत। अब देखो, तू का करत है।
और हो सकता है, हाथ आत्मिक कल्याण के लिए उठाया हो। कुछ भी हो सकता है। मतलब हम तो बातें कर रहे हैं। हम किसी के बारे में कुछ कह नहीं सकते, कि वह हाथ क्यों उठाया है, पैर क्यों सड़ा रहा है। हो सकता है कि भाई, हमारा भी सड़ रहा था। कभी हमारा भी पांव सड़ जाते थे। इतनी सूजन हो जाती थी। जंघे में इतने छेद हो जाते थे। तो अब हम अपने आत्मिक कल्याण के लिए, ज्ञान की खोज के लिए। तो वह हाथ उठाने वाला, सड़ाने वाला ही समझ सकता है। लेकिन वह अपने भक्ति का प्रदर्शन नहीं करता है। वह जब भी करता है, तो एकांत में करता है।
समझ गए। अब इसी बात के साथ नर्मदे हर। करी। कुछ विस्तार से पूछ। हां। नहीं पूछे। ठीक है। मां।
मेरा उद्देश्य है कि आप लोग आत्मिक कल्याण के लिए जब चलें तो जीवन में कोई कमी न हो। सर्वप्रथम पहले चाहिए हमारी जरूरत और ज्ञान। तो जितना हो सकता है, आप लोगों के लिए जितनी व्यवस्था हो सकती है, हमने यहां कर दिया है, और आप लोग यहां आकर बहुत आराम से साधना कर सकते हैं।
नहीं। उम्मीद वह होती है जो मुझे योग्यता से ज्यादा चाहिए। जितनी आपकी योग्यता है, अगर उतना चाहिए तो उम्मीद नहीं है। आत्मज्ञान का हर व्यक्ति अधिकारी है। आत्मज्ञान का मतलब यह नहीं कि बाहर किसी से मैंने उम्मीद की है। मैं अपनी मूल स्थिति में आना चाहता हूं। तो यह कोई उम्मीद नहीं है, न कोई इच्छा है। अपनी समझ से जी रहा हूं।
एकदम। समस्या ही नहीं रहेगी। आपको जीवन में समस्या रहेगी तो शरीर तक रहेगी, जरूरतों तक रहेगी। उसका कोई जीवन में महत्व नहीं है। तो समस्या से आप मुक्त हो जाओगे।
देखिए, हम लोग अपने तरीके से एक-दूसरे को सजा दे रहे हैं। इसके ऊपर कोई है क्या? यहां से सजा नहीं मिल पाई, वो आदमी अपने आप को बचा लिया। और मैं तो कह रहा हूं, सजा वाला काम ही मत करिए। मेरा तो यही कहना है।
एकदम। हमारे पास पहले प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। मेरे ही प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। मैं 2011 से लेकर 2020 तक भटका हूं दर-दर। तो मेरे प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। एक तो यह हो गया। मतलब आत्मज्ञान से पहले मेरे पास प्रश्न थे। और आत्मज्ञान के पहले मुझे चिंता थी, क्या होगा, कहां जाऊंगा, कहां से आया हूं। मतलब यह सब हट गया। न कोई दुख रहा, न कोई सुख की कामना रही। जरूरत में जीने लगा। जैसे-तैसे समाज के लिए काम करने लगा। सबके प्रश्नों के उत्तर देने लगा। दिन-रात मैं यह देख पा रहा हूं कि सबके प्रश्नों के मैं उत्तर दे पा रहा हूं। तो यह रहा।
आत्मज्ञान से आपको क्या मिला और आत्मज्ञान में क्या पता चला, आपके उस प्रश्न के उत्तर में हमने उत्तर दे दिया।
अब एकदम प्रश्न नहीं उठता। अगर मैं प्रश्न भी करना चाहूं, कि मैं किसी से प्रश्न करूं, तो वह प्रश्न मेरा बनावटी होगा। मुझे बनाना पड़ेगा। मेरे अंदर से प्रश्न निकलते ही नहीं। मेरे प्रश्न हैं ही नहीं।
जितना आपने सामने वाले को आश्वासन दिया है, उतना करो। जितना आपके सामर्थ्य में है, उतना करो। बिना मतलब किसी को झूठा आश्वासन मत दो। किसी को उम्मीद में मत बांधो। क्योंकि जब आप किसी को झूठा आश्वासन देते हो तो उसके अनेक विकल्प बंद कर देते हो। तो अब आप कुछ दिन के बाद बोलोगे, हम नहीं कर पाएंगे। तो उसे आपने कितना परेशान किया। उस परेशानी का भी तो भोग, जितना वह परेशान हुआ। क्योंकि उसने आपका इंतजार किया, महीनों, सालों, जितना आपने इंतजार कराया, दिनों, घंटों। बाद में आप सामर्थ्यवान भी थे और कह दिए नहीं, तो उसका परिणाम आपको भोगना पड़ेगा। कोई बचा नहीं पाएगा।
किसी को आश्वासन देने से पहले आप यह तय कर लीजिए कि आप कर पाओगे या नहीं। आश्वासन ऐसा तो नहीं कि दबाव में दे रहे हो। क्यों दे रहे हो? इसलिए कि आप जितना तेजी से ऊपर उठोगे, उतना तेजी से गिरोगे भी। जैसे एक आदमी पैदल जा रहा है, अगर गिरेगा तो कम चोट लगेगी। एक आदमी साइकिल से जा रहा है, गिरेगा तो पैदल वाले से ज्यादा लगेगी। एक आदमी साइकिल छोड़कर बाइक से जा रहा है, तो उसको चोट साइकिल वाले से थोड़ी ज्यादा लगेगी। फिर फोर व्हीलर से जा रहा है, और बस, और कोई जहाज से जा रहा है, गिरेगा तो क्या होगा। कहने का मतलब है कि जिसकी आप जरूरतमंद की सेवा कर रहे हो, कोई सामान्य व्यक्ति है, कोई गुरु है, सबका अपना-अपना अधिकार है, सबकी अपनी-अपनी ऊर्जा है, सबकी अपनी-अपनी शक्ति है। जिसके साथ जैसा करते हो, जितना ऊपर तेजी से उठोगे, अगर आप उसे धोखा दिए तो उतना तेजी से आप गिरोगे भी। याद रखना। तो किसी को अगर आप आश्वासन देते हो तो जरूर अपने आप को जांच लो, क्या मैं उसे पूरा कर पाऊंगा, हां या ना।
कोई बात नहीं। वादा आपने किस स्थिति में किया था, और जिस वादे को किया था, क्या उनसे उसके बदले कुछ लिया था, आश्वासन देकर किया था। वादा कर दिया, चलो। बचपन में आपने वादा कर दिया, यह करूंगा। क्या अभी जरूरत है क्या। वह सब देख लो। वादा आपने किस स्थिति में किया था।
देखो, मैं आपको बताऊं। नशा करके, जैसे एक बार बचपन में हमारे यहां गांव में शिवरात्रि होती है। भांग वगैरह, ठंडाई वगैरह बनती है। तो हमें पता नहीं था। हमने क्या किया, प्रसाद रखा था, और वह भांग वाला मीठा मिला के प्रसाद था। अब वह रखा था, हमने अपना खूब खाया, खूब खाया। रात को आया घर पर और मां से कहा कि मैं उड़ रहा हूं, मैं एकदम आसमान में उड़ रहा हूं। ऐसा कई बातें बोलीं। बाद में जब नींबू, अचार, ऐसे खिलाया गया तो जमीन पर आ गया।
कहने का मतलब भैया, नशे से मुक्त हो जाओ। नशा करके अगर कुछ अनुभव हो रहा है, नशा टूटेगा तो बहुत ज्यादा नीचे गिरोगे।
एकदम। आपके कर्मों का ही तो परिणाम है। आपके कर्मों का परिणाम है। उसे साक्षी भाव से देखो। कुछ ऐसा कर्म न करो कि आगे आपको भोगना पड़े। सोच-समझ कर आगे बढ़ो।
पूरा लिखो न। नहीं, नहीं। समझना, कुछ भी आप समझना चाहते हैं, वहां कर्ता का भाव नहीं है। समझना है। अब देखिए किस लिए समझना है। क्या समझ के करोगे। क्या आपके जीवन में उसका उपयोग है। वह देख लीजिए।
एकदम। एकदम। सत्संग सुनते रहना। सत्संग सुनना बहुत जरूरी है। जैसे शरीर को रोज आप भोजन देते हो, वैसे ही सत्संग सुनना भी बहुत ही जरूरी है। आप यह समझ लीजिएगा।
आसपास का तो मैं नहीं बोल सकता कि आसपास मौजूद है या नहीं है। कई तरह की कहानियां हैं। नरसिंह मेहता के यहां कृष्ण भगवान स्वयं आए। कुछ बोल नहीं सकते। मैं तो यह कहना चाहता हूं कि आप उस परम स्थिति को कैसे उपलब्ध हों, उसके लिए काम करो। यह हमारे पास है नहीं, इससे कुछ नहीं होने वाला है। क्योंकि अगर प्रत्यक्ष मिले तो कोई बात है। आपका कल्याण कैसे हो जाएगा, उसके लिए आप निरंतर काम करते रहिए और अपना कल्याण करिए।
हां, उठ सकते हो। अब आप गिरे हो तो गिरने में चोट भी लगी है। अब उठने में आपको इलाज-विलाज कराने की जरूरत पड़ेगी। आप जिसके लिए गिरे हो, उसकी भरपाई बहुत तेजी से आपको करना पड़ेगा। बहुत तेजी से आपको बहुत ज्यादा काम करना पड़ेगा।
नशा करते हो तो सीधे नशे से नहीं गिरते। नशे के बाद कुछ कार्य करते हो, उस कार्य में गिर जाते हो। कर्म में गिर जाते हो। सिर्फ नशा करने से नहीं गिरते। हां, नशे का प्रभाव आपके शरीर पर पड़ता है। तो शरीर में अनेक तरह के रोग हो जाते हैं। नशे की कोई जरूरत नहीं है। पैसे की बर्बादी है, और आपके द्वारा जब वैसा कर्म होता है। आप कमजोर को सताते हो। नशा करने के बाद बहुत लोगों के हाथ-पैर टूट जाते हैं। एक्सीडेंट हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा एक्सीडेंट नशे में होते हैं। लोग खुद तो मरते हैं, और लोग भी मर जाते हैं। दुर्घटनाएं हो जाती हैं। तो नशा करने के बाद आपके द्वारा कुछ होता है, उससे आप गिरते हो। हां, कुछ नहीं होता तो गिरने वाली बात नहीं, लेकिन शरीर पर नुकसान हो ही रहा है। पैसे का तो हो ही रहा है।
माता-पिता के प्रति बस, उनको जितनी जरूरत है भोजन, कपड़ा, मकान, जितना आप कर सकते हो करो। जरूरत में सेवा। और क्या कर्तव्य है।
जब जरूरत नहीं है तो कर क्यों रहे हो। मान लो आपने वादा किया, मैं आपको एक गिलास पानी पिलाता हूं। आपने कहा, चलो समय आएगा, हम आपको एक गिलास पानी पिलाएंगे जब आपको प्यास लगेगी। अब जब समय आया तो वह कह रहा है, नहीं, मुझे प्यास ही नहीं है। आप देख पा रहे हो, उसे प्यास ही नहीं है। या कोई वस्तु की जरूरत हो। आपने वादा कर दिया था, लेकिन आज उसे जरूरत ही नहीं है। छोड़ दो भाई, छोड़ दो। किया था तो किया था। सामने वाले को मैं देख पा रहा हूं। पहले मेरी समझ इतनी नहीं थी। आज मेरी समझ विकसित हो गई। मेरी समझ कुछ बढ़ी है।
बस सत्संग सुनते रहो। सत्संग में तो बता ही रहा हूं। हजारों वीडियो हैं। आप लोग ऐसा नहीं कि आप नए-नए वीडियो ही सुनो। मैं तो कहूंगा, पुराने वीडियो जितने हैं, जब भी समय मिले, एक वीडियो को आप जितना सुनना है सुनो। आपको लगता है, यह मेरे समझ में आ गया। मैं आपको कह रहा हूं कि आप सुनते रहो। जब भी आपको मौका मिले, नए वीडियो तो नए नहीं, पुराने वीडियो खूब सुनो।
कोई बात नहीं। आप समझिए। धीरे-धीरे समझने का प्रयास करिए।
नहीं। सामर्थ्यवान समझ से बनिए। बात कमाने से नहीं। सामर्थ्यवान, देखिए, तीन तरीके का होता है। पहले तो आप कुछ करोगे। कुछ करोगे किसके द्वारा करोगे। धन के द्वारा, तन के द्वारा, समझ के द्वारा। तो आपके पास किस-किसका सामर्थ्य है, उसके द्वारा आप सेवा करोगे जरूरतमंद की। तब जाकर आपका कल्याण होगा। आपके पास देखो क्या है।
नहीं। मैं अपने लिए नहीं देता। मेरा भाव यह रहता है कि अगर मैं कुछ देर जल ग्रहण करूंगा तो उतना समय, जितने लोग मेरे पास बैठे हैं, यह जीवन में मिले, चाहे न मिले, मुझे नहीं पता है। कभी मिलेंगे, कभी नहीं मिलेंगे। उतना समय मैं अपने शरीर को न दूं। इनके लिए दूं, क्योंकि मैं इनके लिए बैठा हूं। तो चाहे एक घंटा हो, चाहे दो घंटा। मेरा प्रयास यही रहता है कि मैं पूरी तरह समय, जिन लोगों के लिए मैं बैठा हूं, उनको मैं दूं। इसलिए मैं जल वगैरह ग्रहण नहीं करता। और अभी वह शरीर काम कर रहा है। एक दिन शरीर नहीं काम करेगा तो मैं भी क्या करूंगा। लेकिन मैं नहीं चाहता मेरे पास कोई आए और उसका समय बर्बाद हो। मेरे द्वारा मैं ऐसा कभी नहीं चाहूंगा।
मैं आपको एक ही बात कहूंगा। आपको क्या ऐसा लगा कि मेरा साथ नहीं रहा? मेरा तो साथ इतना रहता है कि मैं तो आप लोगों के पीछे भागता हूं। लेकिन जब आप मुड़कर कहते हो कि मेरे पीछे मत आओ, तब मैं नहीं आ सकता। जब तक आप कह रहे हो, तब तक मैं तो तुम्हारे पीछे आ रहा हूं। अगर तुम बहुत तेजी से कहीं जा रहे हो भटकने, तो मैं बहुत तेज गति से तुम्हें बुलाने का प्रयास करता हूं कि आओ, उठ जाओ। और उसके लिए मेरी आंखों में आपके लिए आंसू हो जाते हैं, जब आप गिरते हो। लेकिन जब आप मुड़ के कहते हो कि नहीं, आप मत आओ, मैं खुद उस लायक हूं, मुझे आपकी जरूरत नहीं है, तो मैं फिर पलट जाता हूं। अगर मैं एक बार पलट गया तो फिर आपको ही पीछे आना पड़ेगा।
पहली मुलाकात में मैं पीछे आता हूं। और अगर मैं एक बार मुड़ गया, तुमने मुझे मोड़ दिया। पहले तो मैं इतनी आसानी से मुड़ने वाला नहीं हूं कि आपने कहा और मैं मुड़ जाऊं। ऐसा नहीं है। मैं जल्दी मुड़ता नहीं। हर स्थिति-परिस्थिति में, आप चाहे मेरा अपमान करो, चाहे जैसे भी करो, बस भाव यही रहता है कि आप कैसे सत्मार्ग पर लग जाओ और कैसे आपका कल्याण हो। लेकिन एक बार अगर मैं मुड़ गया तो फिर मैं आपके पीछे नहीं आऊंगा। आपको मेरे पीछे आना पड़ेगा। तो अब आप देख लीजिए, आपको क्या करना है।
कोई बात नहीं। आपको इतना पता होना चाहिए कि आप सत्मार्ग पर चल रहे हो। बस यही आध्यात्म है। आपके द्वारा बेईमानी नहीं हो रही है। आपके द्वारा किसी को दबाया नहीं जा रहा है। संकोच में नहीं जी रहे हो। ईमानदारी से जीवन जी रहे हो। जीवन में सत्संग सुन रहे हो। जरूरतमंद की सेवा में लगे हो। बस इतना बहुत है।
नहीं। कुटिया में रहना बंधन इसलिए नहीं लगता कि कुटिया का निर्माण मेरे द्वारा हुआ है। इसलिए बंधन लग ही नहीं सकता, क्योंकि कहीं न कहीं मैं निमित्त हूं उसे बनाने में, और आप लोगों के लिए बनाया हूं। तो कोई बात नहीं है। अभी भी तो मैं फक्कड़ ही हूं। ऐसा नहीं है। मुझे अच्छा लगता है फक्कड़ की तरह रहना। तो अब काम कर रहे हैं तो काम को काम के तरीके से करना पड़ेगा।
अब देखो, हमारे आवरण का कितना बदलाव हो गया। पैदल चलते थे, गाड़ी से चलने लगे। बहुत सारी बातें बदल गईं जीवन में, क्योंकि समाज में काम करना है। पहले घूमते थे, न कोई आता था, न पता था। चाहे जहां रहो, चाहे जैसे रहो। किसी को सुनना है तो सुने, नहीं तो कोई बात नहीं। किसी को खड़े करके कोई वीडियो बना दो। उसको समझ में आया तो ठीक। नहीं समझ में आया तो किसी और को समझ में आ जाएगा। अब जब से अपनों की कुटिया बनाया हूं, तब से यह भाव है कि अभी की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी इसका उपयोग करें। और उसके लिए धन की व्यवस्था और सब व्यवस्था कर रहा हूं। यहां लगा हूं।
देखिए, अगर मैंने अपना हाथ खुद बांधा कहीं, तो मैं कभी भी छोड़ सकता हूं। बंधन तब होता जब मेरा हाथ कोई और बांधता, और मैं नहीं चाहता। मेरी इच्छा नहीं होती और मुझे कोई बांध देता, तो वह बंधन होता। यह तो मैंने सोच-समझकर, बहुत विचार-विमर्श अपने आप से करके, स्वयं से मैंने अपनों की कुटिया का निर्माण किया है। तो बंधन का तो सवाल ही नहीं उठता।
तो वे गए न, शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे। तभी। आप पड़े हो जब आप कुछ चाहिए में हो। एक आंतरिक कुछ चाहिए। कुछ चाहिए में आप हो, और कुछ नहीं चाहिए, यह आंतरिक भाव आना है। जब पहुंच जाओगे तो आपको हो जाएगा। कुछ नहीं चाहिए में आइए।
मुझे खुद नहीं पता। गुरु पूर्णिमा कब आएगी, अभी आपने बोला तो मुझे पता चला। कौन सी तारीख आती है, मुझे यह नहीं पता है। तारीख कौन सी रहेगी और मैं कहां रहूंगा, मुझे खुद नहीं पता है। क्योंकि मेरे लिए गुरु पूर्णिमा हो, चाहे कुछ भी हो, मैं हर वक्त, मैंने जितना समझा है, वह आप लोगों को देना चाहता हूं। उसी काम में लगा हूं। मैं नहीं बता सकता।
हां। अगर आप सलाह दे सकते हो तो देख लो कि ताकत है कि नहीं है। सामर्थ्य है कि नहीं है। क्या सलाह दे रहे हो, उचित सलाह है, वह देख लो। सलाह के बाद कुछ भी हो सकता है।
मेरी समझ से आप उसे खुद उपयोग कर लो। एक्सपायरी डेट की चीज किसी को दो ही मत। आप किसी और को नहीं दे सकते। कोई भी उपयोग करना है तो खुद पर करो। खुद एक्सपायरी माल खाओ। किसी को नहीं दे सकते। चाहे एक घंटे की एक्सपायरी क्यों न हो।
अब आपको ऐसे स्थान पर रहना पड़ेगा, जैसे अपनों की कुटिया। कुछ नहीं चाहिए में काम करना पड़ेगा, और तेजी से यात्रा होगी। क्योंकि आप कहीं भी रहोगे तो दो-चार घंटे यात्रा करोगे, और यहां आ जाओगे तो चौबीस घंटे आध्यात्मिक यात्रा होगी। हम तो यही कह रहे हैं भैया। शौचालय भी बन गए, अब आप लोग आइए आराम से। सोलर भी लगवा दिए। बहुत कार्य हो गया कुटिया का।
हमको सुन लिया करो। देखो, उत्तर से मतलब रखो। अगर किसी ने प्रश्न पूछा और हमने उत्तर दिया, और आपका अगर वही प्रश्न है, तो उत्तर तो मिल ही गया न। अगर आपके प्रश्न हैं तो हमारे उत्तर समझ में आ जाएंगे।
यह आप ही को पता होगा, और किसी को नहीं पता होगा, समझ में आ रहा है और उथल-पुथल भी है। उथल-पुथल को संभाल रहे हैं। एकदम। उथल-पुथल तो है ही। संभालते हुए चल रहे हैं।
संभालते रहो। संभालो, और उससे निकलो। क्यों उथल-पुथल है, उसको हटाइए। उसको हटा के ही चलो। उससे आप अपने आप पर बने रहिए। शरीर से प्रतिक्रिया मत दीजिए। तो आप ऊपर बढ़ते जाओगे। आपका स्तर ऊपर बढ़ता जाएगा। अभी बढ़िया। जैसे ही नजर पड़ी, वैसे ही वापस उसी स्तर में आ गए। लगे रहो। कल्याण करो।
अभी मिल चुकाना है, और जल्दी से जल्दी निकलना है। बस। तो आप पूरी तरह नियम में हो, मेरे हिसाब से।
बाबू लाल से क्यों पूछें। बाबू लाल कैसे कह सकते हैं कि आप हो या नहीं हो। यह आप ही कह सकते हो। कौन कह सकता है। हो सकता है ऊपर की चीजें आपने अपना ली हों, लेकिन अंदर की नहीं अपनाई हों। अंदर से हो सकता है कि आपने नियम को घुटन में अपनाया हो। तो आप नियम में थोड़े न हो। नियम में तो दिख रहा है, लेकिन हो नहीं, वह भी हो सकता है। बाबू लाल भी बता नहीं सकते। या तो मैं बता सकता हूं, या आप बता सकते हो। क्योंकि बाबू लाल आपको ऊपर से देख रहे हैं। ऊपर से आप पूरे नियम में हो, यहां के जितने नियम हैं कर रहे हो। लेकिन हो सकता है अंदर से घुटन हो, बेचैनी हो। उनके सामने नियम में हो, अंदर बेचैनी हो।
न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। आपके द्वारा क्या हो रहा है, उसका ध्यान रखना है। बस। क्या हो रहा है, आपके द्वारा क्या हो रहा है, उसका ध्यान करना है।
अब आपने कहा कि मैंने यह आसन सिद्ध कर लिया। लेकिन इस आसन से होगा क्या। मान लीजिए आप कहीं जाकर जंगल में गड्ढे खोद रहे हो। आप एक साल बोलो कि बाद में मुझे पेमेंट चाहिए, तो कोई देगा? आप जहां गड्ढों की जरूरत थी, वहां जाके खोदते, तो पेमेंट वहां मिलता है। एक साल के बाद आप प्रकृति को बोल रहे हो पैसा दो, किसी को बोल रहे हो कि पैसा दो। तो आपका गड्ढा खोदने का पैसा मिलेगा क्या। आपने तो और नुकसान कर दिया। वहां जरूरत ही नहीं थी। कोई जानवर जाके गिरेगा, उसका भी दोष लगेगा। तो गड्ढा कहां खोदना है, यह किसी जीवंत गुरु से जाके पूछो। कौन सा पद्मासन लगाऊं, कौन सा आसन लगाऊं, उस आसन में लगा के करूं क्या। यह बताओ।
व्यक्ति धीरे-धीरे अहंकारी हो जाता है, कि मैंने चार घंटे का आसन सिद्ध कर लिया। इससे क्या अच्छा हुआ। चार घंटे तू बैठ गया। क्या हुआ। बैठकर किया क्या। कुछ नहीं। उल्टा मन डिस्टर्ब हुआ। आप किसी कंपनी में चले जाओ और बोलो कि मैं तो महीना भर बैठा रहा आपकी कंपनी में। तो क्या पेमेंट मिलेगा। काम से मिलेगा। वह भी उसके तरीके से काम करना पड़ेगा, जिसके द्वारा पेमेंट चाहिए। तो किसी जीवंत गुरु के शरण में जाओ। वह आपको मार्ग बताएगा। उस मार्ग के द्वारा आपका कल्याण होगा।
बस आप रहिए। आप इतने वीडियो सुन रहे हो। मुझे जब-जब लगेगा आपको क्या जरूरत है, मैं खुद दूंगा। जैसे एक मां होती है, अपने बच्चे को कब क्या देना है, कौन सी दवा देना है, वह बच्चे को टेंशन नहीं रहता। मां को रहता है। अगर आप मेरे सानिध्य में आ गए हो तो मेरी जिम्मेदारी। अगर एक मां अपने बच्चे को सही से न पाले तो वह मां कहलाने लायक नहीं होगी। उसको दोष भी लगेगा। अगर आप मेरे सानिध्य में आ गए हो तो बात खत्म हो गई। आप बस आ गए। बस बात खत्म। अब कब आपको क्या देना है, वह मेरा काम है। आपका काम नहीं है। आपका काम बस आना था। और मैं समय पर नहीं दूंगा तो गुनहगार मैं हूंगा, तुम नहीं। जैसे एक मां के द्वारा बच्चों का जन्म हो जाए, अगर वह सही से न पाले तो दुनिया उसे गाली देगी। देगी न। अगर आप किसी जीवंत गुरु के शरण में चले गए हैं तो उसकी जिम्मेदारी है। वह कब क्या करवाना है, वह जाने। उसका काम जाने। क्योंकि आपको नहीं पता है कब आपको क्या चाहिए।
जैसे बच्चे जब भी मांग करते हैं तो देखो, उनको नुकसान वाली चीजें ही मांग करते हैं। चॉकलेट की मांग करते हैं। उससे उनका दांत सड़ जाता है। अनेक तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। लेकिन मां उतना ही देती है जितने में स्वस्थ रहें। अगर उनके ऊपर छोड़ दें तो क्या करेंगे, पता है? दांत एक-दो नहीं सड़ेगा, पूरा सड़ जाएगा। बच्चे हमेशा अपने नुकसान वाली चीजें मांगेंगे। तो साधक क्या सोचते हैं कि बस पहुंचे, शक्तिपात कर दो। क्या भैया, तू रह। उस गुरु की जवाबदारी है जिसके शरण में तू गया है। वह कब किसको क्या देना है, वह देखेगा।
अब लोग प्रश्न कर देते हैं, स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने तुरंत करा दिया, सबको क्यों नहीं करा दिया। और स्वामी विवेकानंद जब पहुंचे तो बोले, तेरा मैं इंतजार कर रहा था। क्या उसके पहले उनके पास शिष्य नहीं थे? थे न। स्वामी विवेकानंद की योग्यता थी। उस योग्यता को उन्होंने प्रणाम किया। वह योग्यता का पता स्वामी विवेकानंद को भी नहीं था। किसको था? रामकृष्ण परमहंस को था। इसलिए तो उन्हें प्रणाम किया। और मां से प्रार्थना करते थे, उसे भेजो। सबको क्यों नहीं करा दिया छूकर? लेकिन सबको ऐसा नहीं दिया। जितने शिष्य थे, सबको दिया, जैसी जिसकी योग्यता, जैसी जिसकी सामर्थ्य। तो आप आए हो। जब मुझे लगेगा कि अब आपको क्या देना है, मैं दूंगा, अपने आप दूंगा। क्योंकि मैं नहीं दूंगा तो जिम्मेदार मैं रहूंगा। मां बच्चे का अगर सही से लालन-पालन न करे तो उसकी क्या स्थिति होगी, भोगना पड़ेगा न उसको। तो आप अगर मेरे शरण में आ गए हो तो जिम्मेदारी मेरी है, तुम्हारी नहीं।
पहले तो बाहर देखो कि मैं क्या कर रहा हूं। फिर अंदर देखो कि उलझन तो कोई नहीं है। कोई पीड़ा तो नहीं है। कोई दुख तो नहीं है। कोई अशांति तो नहीं है। यह देखो। और बाहर देखो कि मैं क्या कर रहा हूं।
एक ही समझ इसलिए नहीं टिकती। समझ मतलब भाव। भाव इसलिए नहीं टिकता है कि आप अभी चाहिए में हो। चाहिए में हो तो देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में भाव बदलता रहता है। इसलिए टिक नहीं पाता। वह टिकेगा कब, जब आप उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे। तब आपका भाव बदलेगा नहीं। आप उस परम भाव में, आनंद में स्थिर रहोगे। कर्म में आप लोगों को भाव बदलते दिखाओगे, लेकिन बदलेगा नहीं।
हां, तब तक उथल-पुथल होते रहेंगे। उतार-चढ़ाव होता रहेगा। नए-नए समझ आते रहेंगे। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में उसका प्रभाव पड़ेगा।
नेपाल की याद नहीं आती। नेपाल के लोगों की याद आती है। कुछ जगह की, जहां आप जिए होंगे, कुछ लोगों के साथ जिए होंगे, उनकी यादें आती हैं। ऐसे ही लोगों को याद नहीं आती।
जिसमें आपका उद्धार हो, वह करो। जिसमें आपका कल्याण हो, वह करो। यहां हो रहा है तो बात खत्म। कहीं भी रहो। हो रहा है तो बात खत्म होनी चाहिए।
तुम्हें भूख लगी है। मूल आपको भूख मिटानी है। पकवान का चक्कर है तो बात अलग है। हो सकता है वहां पकवान मिल रहा हो, यहां नमक-रोटी मिल रही हो। मैं जहां हूं, अगर हो रहा है तो मैं दूसरी जगह क्यों जाऊं। पता नहीं वहां हो भी या नहीं। यह फैसला ले लो। दूर का ढोल सुहावना लगता है।
अब देख ले क्या करना है। लगे रहो। कैसे भी अपना कल्याण कर लो।
मैं यह कह रहा हूं कि जैसे बोल दिए, दो घंटे आप बोलिए। अब आपके सामने कोई बालक आ जाए। चलो, आप ही पढ़ाते हो। एक बीस साल का हो और एक छोटा सा हो, और कहा जाए दोनों को पढ़ाओ, और ये दोनों बोलेंगे नहीं। आप कहां से शुरू करेंगी, बताओ। बहुत कठिन है। इनके लिए अलग, उनके लिए अलग। अगर आपको शुरू ही करना हो, छोटे वाले को क्या पढ़ाओगे, बड़े वाले को क्या पढ़ाओगे। हो सकता है छोटे वाले को क ख आ गया हो और बड़ा वाला कभी कुछ सीखा ही नहीं, एकदम कोरा हो। कुछ भी हो सकता है। आकार देख के पढ़ाओगे तो हो सकता है कि छोटे को क ख के आगे वाला पढ़ाया जाए, क्योंकि उसने सीख लिया है, और जो बड़ा दिख रहा है उसको हो सकता है क ख से पढ़ाया जाए। इसलिए आप नहीं बोल सकते।
और आप दो घंटे बोल के उठ गए तो यह एक बेईमानी है। मतलब आपको बस अपना बोल के निकल जाना था। फिर आपको उनसे लेना-देना नहीं था। आपके पास दो बालक आए और आपने पढ़ा दिया, उनसे बात ही नहीं की, तो क्या आपको लगता है पढ़ा दिया? नहीं। बिना उनके स्तर को समझे आप पढ़ा ही नहीं सकते, और स्तर को समझने के लिए उनको बोलना पड़ेगा। आपके पास कोई मशीन नहीं है। आप कुछ पूछेंगे, उनका जवाब देना पड़ेगा। या तो सीधा प्रश्न करें, या फिर मैं कुछ पूछूं, वे जवाब दें। तब मैं उनके लिए कुछ बोल सकता हूं। तो दो घंटा बोल के उठ जाना यह बेईमानी है।
भैया, कुछ बोल दो। बुनियादी चीजें बोल दो, और फिर बोलो कि भाई आपके क्या प्रश्न हैं। क्योंकि सबकी वहां स्थिति अलग-अलग है, और पढ़ाना सबको है। तो इसलिए मैं कहता हूं कि आप कहो, कहां से शुरू करूं। आप बताइए कि मैं शुरुआत कहां से करूं, या आप कुछ बोलोगे तो मैं समझ जाऊंगा कि आपकी स्थिति यह है। मुझे अब यहां से काम करना चालू करना पड़ेगा। जैसे उसी सत्संग में मैंने एक को क्या बोला, कि भैया बस बंद कर। क्योंकि उसके प्रश्न और हमारे उत्तर का मतलब नहीं था।
तो कहने का मतलब, दो घंटे लगातार बोलो, नहीं। किसके लिए बोले। क्योंकि हम उनके लिए बोल रहे हैं। तो उनसे हमें बातचीत करनी पड़ेगी। एक-एक व्यक्ति कहां-कहां है, उन्हें बोलना पड़ेगा। पूछो। और जब पूछेंगे, तब उनके लिए मुझे बोलना पड़ेगा। और तब कुछ होगा।
आप गिरोगे नहीं। एक बात बताएं आपको। आप गिरोगे नहीं। हम आपको गिरने ही नहीं देंगे। अगर मैं साथ में हूं तो आप गिर ही नहीं सकते। और गिर गए तो इसका मतलब, या तो आपने मेरा साथ छोड़ दिया, या तो आपने ऐसा कर्म किया कि मुझे साथ छोड़ना पड़ा।
किसी के व्यक्तित्व के बारे में कोई बोल ही नहीं सकता। उसका काम बोलता है। आप कभी व्याख्या कर ही नहीं सकते। आप व्याख्या करोगे तो वह बस रत्ती मात्र होगा। क्योंकि किस देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में उसने काम किया है। आप कैसे लिखोगे। कैसे बताओगे।
ये गए और आप आए, कैसे-कैसे मुसीबत से। मैं चौबीस घंटे के ऊपर लेटा भी नहीं। चौबीस घंटे हो गए। मैं तो बैठा ही रहा, गाड़ी की पीछे वाली सीट पर। जब गए तब गए थे। क्या यह लिखा जा सकता है? नहीं। ये सारी दिक्कतें लिख के थोड़ी जाएंगी। कैसे यह लिखा जाएगा। सत्ताईस-अट्ठाईस घंटा एक ही सीट पर बैठे रहना, कहीं एक बार भी लेटा नहीं। यह थोड़ा लिखा जाएगा। अब यहां से वहां तक पहुंचा, लोगों को लगेगा कार से आए। कितनी दिक्कत हुई, यह मुझसे पूछो। तुम्हें तो लगेगा, बढ़िया से एयर कंडीशन कार है, फर्स्ट क्लास आए। लेकिन कितनी दिक्कत का सामना करना पड़ता है सफर में। कार में सौ किलोमीटर गए, दो सौ आ गए, बहुत है। इसके आगे सफर किए तो हालत खराब होने लगती है। करने वालों को ही पता है। हर चीज नहीं लिखी जा सकती। सूक्ष्म हर चीज नहीं लिखी जा सकती।
नहीं। सबकी जरूरत है। सबकी आवश्यकता है। ऐसा नहीं। सबकी जरूरत है। आज अगर किसी ने गाड़ी बनाई तो आप गाड़ी का उपयोग कर पा रहे हो। मेरा तो बस इतना कहना है कि आप जहां भी कर्म कर रहे हो, बस ईमानदार रहो। आज ये सब व्यवस्थाओं का उपयोग कर रहे हो, तो ये किसी के द्वारा ही तो बन रहा है। आज मोबाइल है, आज नेट चल रहा है। तो ऐसा नहीं है। आप जहां हो, ईमानदार रहो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग सुनो। इससे ही कल्याण हो जाएगा।
एक ईमानदार व्यक्ति के साथ रह के ही लर्निंग हो सकती है। बस ईमानदारी क्या है, उसको सीखो। कर्म में ईमानदारी रहेगी और सत्कर्म रहेगा। अपनी जरूरत की पूर्ति करते हुए, और सत्संग जीवन में रहेगा, तो आप जहां से हो, वहीं से मुक्ति, मोक्ष मिल जाएगी।
यह मिलेगा आपके साथ रह के। आप जहां से भी मिलो। मैं पहले नहीं था, तो भी लोग परम आनंद को उपलब्ध हुए। बाद में मेरा शरीर नहीं रहेगा तो लोग रहेंगे। आप कहीं से भी यह सीखो। सीधी सी बात है, एक आदमी को ऐसा मत पकड़ो कि मेरे पहले नहीं था, मेरे बाद नहीं होगा। मैं यह कह रहा हूं कि अगर जिंदगी में कोई मिल जाए, बस उसको पकड़ लो। जहां भी हो। बस आप पकड़ लो, और सीख लो, और सीख के निकल लो। बस यही बात है।
जैसे-जैसे समझ विकसित होगी तो बातें सब अलग लगेंगी। दुनिया अलग लगने लगेगी। संसार भी अलग लगने लगेगा। जैसे-जैसे आपकी समझ विकसित होगी, लोग, यह प्रकृति, सब अलग लगने लगेगा। क्योंकि आप अपनी बनाई दुनिया में थे। वहां से निकल रहे हो। आप उस अपनी बनाई दुनिया को छोड़कर इस परमात्मा की बनाई दुनिया में आ रहे हो। तो सब अलग होगा। सब अलग लगने लगेगा, जैसे-जैसे समझ विकसित होगी।
आपका लोगों पर भाव बदल जाएगा। बोलने का तरीका बदल जाएगा। देखने का तरीका बदल जाएगा। सुनने का सब बदल जाएगा। यहां तक कि आपका चलना बदल जाएगा। आप आज इसे महसूस करो कि एक साल पहले आप किस तरीके से चल रहे थे, आज किस तरीके से चल रहे हो। आप किस तरीके से बोल रहे हो। कैसे लोगों से बातचीत होती है। सब बदल जाएगा। देखने का तरीका बदल जाएगा।
और मेरा कहना है कि बेईमान होना दुनिया का सबसे कठिन काम है। ईमानदार होना, उसमें तो मेहनत करना ही नहीं है। वह स्वभाव है। अगर मैं यह करूं कि भैया, चाहे नमक-रोटी भी न मिले। अगर मुझे निकलना है, अगर मैंने तय कर लिया, क्योंकि वे तंग दिन आने ही वाले हैं। इस संसार में जिस रूप से हमने अपने आप को ढाल लिया है, जिस दौड़ में संसार चल रहा है, हमने भी उसी लय में अपने आप को जोड़ लिया है। अगर हम उस लय से अलग होंगे, तो या तो फिर सब कुछ छोड़ के इसी मार्ग में, कि भैया अब मुझे निकलना है, तो ईमानदारी हो ही जाएगी। लेकिन अगर उसी भेड़चाल में करना है तो वहां तो बहुत मुश्किल। और वहां यह तैयार रखो भैया, नमक-रोटी मिलेगी ईमानदारी से तो खा लेंगे। लेकिन सोचो कि बारिश आ रही है, पकौड़े खा लेंगे, वह नहीं खा पाओगे।
यहां सिर्फ बात यह है कि ईमानदार होना कठिन है या नहीं। तो मेरा कहना है, कठिन है ही नहीं। स्थिति-परिस्थिति तो आपके कर्म के ऊपर है। क्योंकि ईमानदार व्यक्ति भी छप्पन प्रकार का भोजन करता है। लेकिन वह तो अपनी योग्यता के अनुसार।
मेरा यह कहना है कि दुनिया का सबसे सरल कार्य अगर कुछ है इस दुनिया में, तो ईमानदार होना। और दुनिया में सबसे कठिन कार्य है तो बेईमान होना। बस यह कहना है।
बसाया तो मैंने भी नहीं गृहस्थी। संसार नहीं बसाया। तो काम तो मैंने भी किया, यह दिख रहा है। जैसे गृहस्थ में भी आपका कोई फायदा लेता है, तभी आपको पेमेंट करता है। वैसे मेरा अगर किसी ने फायदा लिया, मेरे काम का, तो उसने मुझे पेमेंट किया है। काम तो मैंने भी किया है। यह काम का ही परिणाम है। मेरे काम को देखकर, और काम का उपयोग करके, लोगों ने मुझे यह सहयोग दिया है। मुझे देखकर नहीं।
टारगेट तो मेरा भी था। मैंने बोला था, वह टारगेट पूरा हो रहा है। मेरा तो सिर्फ इतना कहना है। मेरा अनुभव कह रहा हूं। आप जहां हो, वहां से भी कह रहा हूं, क्योंकि मैं वहां से कभी आया हूं, यहां तक। तो मैं वहां से भी, यहां से भी यही कहना चाहता हूं कि दुनिया का सबसे सरल कार्य है ईमानदारी, और सबसे कठिन कार्य है बेईमानी।
वह तो कहां आ जाएगा, वह बात अलग है। लेकिन ईमानदारी सरल है। वह तो मेरा नैचुरल है। वही, सबसे कठिन अगर कुछ है तो बेईमानी।
मैं तो कहीं भी सत्संग के लिए जा सकता हूं। तो आप सत्संग करवाइए, आना हो जाएगा। फोन नंबर दिया गया है इसी चैनल पर, उस पर बात कर लो। सत्संग कराने में सीधा बता दूं, बात करने से पहले समय मत बर्बाद करना। सात-आठ लाख चला जाएगा। छह तो हमें ही देना पड़ेगा, फिर एक के बाद एक-दो लाख ऐसे ही चला जाए। तो फोन करने से पहले हम ही बता दें भाई। बिना मतलब फोन करके पूछो मत। सात-आठ लाख खर्च करे, तब सत्संग रखवाया। नहीं तो आराम से लाइव सुनो। और नहीं तो अपनों की कुटिया में एकदम निशुल्क रहो। सत्संग भी जब करें तो निशुल्क, और रहना, खाना, सब निशुल्क, जीवन भर कहो।
उन्नीस, बीस, इक्कीस वहां है। फ्लाइट का खर्च बच जाएगा। तो वही है, सत्संग करवा लेना। उन्नीस, बीस, इक्कीस वहां है। आप फोन पर तारीख ले लेना।
इसलिए कि जब आप कर्म कर रहे थे तो ईमानदारी आपका स्वभाव था, कर्म में। बेईमानी आप लालच में आकर, मान में किए। और हंसना या रोना, जब ऐसी घटना घटती है तब आप हंसते हो या रोते हो। या तो घटना नहीं है आपके सामने, तो आप उस परम आनंद में रहोगे, अगर कुछ नहीं है। और अगर हंस रहे हो या रो रहे हो तो इसका मतलब आपके सामने कोई घटना है। ऐसे आप हंस-रो नहीं सकते। अगर आप ऐसे हंसना या रोना चाहो तो नहीं। बिना कारण के न हंस सकते हो, न रो सकते हो। तो प्राकृतिक है।
जब आप कर्म करते हो, ईमानदारी प्रकृति है। आपने बेईमानी कर ली है, इसलिए आपको ईमानदारी सिखाई जा रही है। अगर आपने बेईमानी नहीं की होती तो आपको ईमानदारी सिखाने की कोई आवश्यकता थी ही नहीं। वह तो हो रहा था।
छह लाख से भैया यह करेंगे। हमारी व्यवस्था है। हमारी पर्सनल लाइफ है। हम कहां खर्च करेंगे, क्या करेंगे, वह हम तय करेंगे। मैंने कह दिया कि भैया, हमें इतना देना पड़ेगा। बात खत्म। जरूरत पड़ी तो अपनों की कुटिया में लगाएंगे। हमने अगर इतनी ये सब व्यवस्थाएं की हैं तो तुम्हारे भरोसे तो की नहीं हैं। ये सब व्यवस्थाएं अपने भरोसे की हैं। अभी तो छह लाख है। आगे और बढ़ जाएगा आने वाले समय में। क्योंकि हम आने वाले समय के लिए, यहां के साधकों के लिए कोई कमी न हो, उसके लिए काम कर रहे हैं। तो मुझे तो सबसे ज्यादा जरूरत है भैया।