प्रश्नोत्तर P14-0032 · भाग 14
गुरु जी, बुद्ध, महावीर और आपने भ्रमण करके आत्मज्ञान प्राप्त किया। हम तो यहां आपकी कुटिया में रुक गए — क्या यहां आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी?
ये आपकी कुटिया नहीं है। आपको तप करना है। पहली बात, साधक को जब तक आत्मज्ञान ना हो, कुटिया बनाना ही नहीं चाहिए। यहां आपकी व्यक्तिगत व्यवस्था नहीं है, यहां का नियम आपके कहने से नहीं चलता। एक टाइम भोजन मिल रहा है — उतना मिल रहा है जितने में आप जी सको। किसी से व्यवहारिक बातें नहीं करनी हैं। भ्रमण तो आप कर ही रहे हो — कई सालों से घूम रहे हो, बहुत जांचने के बाद, लोगों को सुनने के बाद यहां पहुंचे हो। यहां आपका पैसा, आपका बैकग्राउंड काम नहीं आ रहा, सबके साथ एक जैसा बर्ताव है, और उस व्यवस्था में मैं भी जी रहा हूं। आपको फैसला लेना पड़ेगा कि कैसे भी मेरा आत्मिक कल्याण करना है। जहां लगे कि यहां व्यवहारिक बातें हो रही हैं, यहां मेरा काम नहीं होगा, वहां से निकल जाओ — मोह में मत आओ, जाल में मत फंसो। जहां लगे कि मेरा स्तर उठ रहा है, जिस लिए निकला हूं वह कार्य हो रहा है, तभी रुको। इसलिए तप जरूरी है, कहीं भी रहो। गृहस्थ जीवन में भी हो तो छुट्टी के दिन एक-दो दिन व्रत रख के देखो, समझ में आएगा कि हमारे अंदर कितना डर है।
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वीडियो: जीवन में तप का महत्व / #योगीजी_का_सत्संग #जीवन #तप #महत्व #satsang · 2024-08-05