आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P14-0117 · भाग 14

गुरु जी, मांगना बुरी बात है, फिर साधु-संत खाने के लिए क्यों मांगते हैं? इसका फायदा क्या है?

कोई जन्म से संन्यासी नहीं होता। कोई बालक या बालिका संपन्न होते हुए भी देखता है कि लोग दुखी हैं, इच्छा-अपेक्षा में घूम रहे हैं, संसार में कुछ नहीं है; तो लोगों के दुख कैसे दूर करूं, इस खोज में निकलता है — उसमें दया, करुणा, प्रेम रहता है, भाव होता है कि ज्ञान को खोजूं और लोगों को भी मुक्ति-मोक्ष का मार्ग बताऊं। तब वह समाज से भोजन लेता है, और जब ज्ञान को उपलब्ध होता है, तो समाज के भोजन की भरपाई ज्ञान देकर करता है — यह संन्यासी का भाव है। गृहस्थ का भाव है — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। जब गृहस्थ बिना इच्छा-अपेक्षा जरूरतमंद की सेवा करता रहता है, तो उसके दरवाजे पर कोई ना कोई संन्यासी पहुंच के उसे मार्ग बताता है।

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