जब आप कारण में जी रहे हो, तो कारण शरीर ठीक है। अब देखो कि आपको निकलना है, या आपको शरीरों का ज्ञान चाहिए — कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर। मेरा तो यही कहना है कि निकल जाओ, और निकलकर अपना कल्याण कर लो — कैसे भी। कल्याण करना सबसे जरूरी है। शरीर के बारे में जानकर क्या करोगे? कोई शरीर की फैक्ट्री तो लगानी नहीं है — कि सूक्ष्म शरीर की फैक्ट्री लगाऊं, कारण शरीर की लगाऊं, स्थूल शरीर की लगाऊं या चक्रों की। मौका मिला है, कल्याण कर लो; नहीं तो ऐसे ही जानकारियां लेकर खत्म हो जाओगे, कुछ नहीं होगा।
अपने कर्म तो भोगने ही हैं। हां, यात्रा सरल हो जाती है — कर्म भोगने की क्षमता हमारे अंदर पैदा हो जाती है। तो प्रत्यक्ष ज्ञान से आपकी यात्रा सरल हो जाएगी।
जब साधना में ही वह नहीं मांगता, तो ज्ञान होने के बाद क्यों मांगेगा? ज्ञान होने के बाद तो याचना की बात ही खत्म हो जाती है। अगर आपने उसके काम का उपयोग किया है और वह कह रहा है "दो", तो इसे याचना नहीं कहते — वह उसका हक है, अधिकार है। आपने किसी से कुछ लिया और वह कह रहा है कि भाई, आपने लिया है तो मुझे भी दो — तो यह याचना थोड़ी हुई। याचना तो तब होती है जब आपने उपयोग नहीं किया, आप उसके लिए अनजान थे, और वह आपसे मांग रहा है कि मुझे खाने को दे दो, मुझे व्यवस्था दे दो।
कभी-कभी ऐसा होता है कि स्कूल में बहुत बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन एक बच्चा इतना तेज होता है कि उसे चौथी क्लास से सीधा सातवीं में डाल देते हैं — मेरे साथ भी ऐसा हुआ था, पांचवीं से सातवीं में डाल दिया। किसलिए डाला? क्योंकि आप उस लायक थे; सबको नहीं डाला, आपकी योग्यता के अनुसार ही किया। तो अगर आपकी क्षमता होगी, तो वह आपको सीधा दूसरी से बारहवीं भी पढ़ा देगा; अगर क्षमता नहीं है, तो वह कुछ नहीं कर सकता। वह जितना बता रहा है, उतना आपने कैच कर लिया और अपने आचरण में उतार लिया, तो वह अगले स्टेप पर ले ही जाएगा; और उससे ज्यादा कर दिया, तो सीधा एक-दो क्लास आगे कर देगा।
उसके सानिध्य में आप हो, तो कभी-कभी गुरु आप में कमी देखता है, लेकिन बता नहीं पाता। क्यों? क्योंकि अभी आप रुके हो; हो सकता है वह कमी बताए और आप भाग जाओ। तो वह लक्षण देखता है, फिर भी बताता नहीं, समय का इंतजार करता है — कम से कम रुका तो है, रुका है तो कुछ सीख रहा है; इसको कमी बता दूं तो सीधा भाग जाएगा। गुरु कभी-कभी आपकी कमी देखता है, लेकिन मजबूर है, बता नहीं सकता, क्योंकि सब चला जाएगा। उसकी यही तसल्ली रहती है कि कम से कम सही जगह तो रुका है, कभी ना कभी इसकी क्षमता हो जाएगी; लेकिन यहां से भाग गया तो इसका पतन हो जाएगा, सब कुछ खो देगा। यहां है, तो कम से कम इसकी क्षमता बढ़ ही रही है। अगर उसकी सुनने की क्षमता है और वह अपने आप को पूरा सुधार लेगा, तब तो गुरु बता ही देगा; पर गुरु 100 में 101% देखता है कि यह नहीं सुन पाएगा, और सुन लेगा तो चला जाएगा, क्योंकि इसे यह कमी लग ही नहीं रही है।
गुरु के एक-एक शब्द में, एक-एक वाक्य में जीना। जब कोई कर्म करे, तो सोचे कि गुरु जी इस काम का अंजाम किस नजरिए से देखना पसंद करते हैं — मैं उसी तरीके से करूंगा, ताकि मैं दिल खोलकर, आंख मिलाकर कह पाऊं कि आपने जैसा बोला, वैसा ही मैंने जिया, मेरा भाव शुद्ध था। भले उसका परिणाम कुछ भी आए, क्योंकि काम तो बहुत लोगों के थ्रू होकर जाएगा; मुझे परिणाम से मतलब नहीं — मैंने किस भाव से कर्म किया, वह मायने रखता है। परिणाम मेरे हाथ में नहीं है; मेरे हाथ में बस इतना है कि मैं कर्म ईमानदारी से करता हूं या बेईमानी से।
मुझे कई सालों पहले पता चल गया था, 2015 में पता चल गया था। पक्का नहीं था, लेकिन मेरी तरफ से तो पक्का था — जब मैं 2011 में निकला था, तभी से। लेकिन 2019 में नवंबर के बाद मुझे एहसास होने लगा था कि मैं बहुत करीब हूं और कुछ ही महीनों में मुझे आत्मज्ञान होना चाहिए।
भावुकता मतलब आप किसी की भावनाओं में बह जा रहे हैं। लेकिन भावनाओं में नहीं बहना चाहिए; वहां अच्छा-बुरा देखना चाहिए कि क्या घटना हुई है। सिर्फ घटना घटित होते देखकर भावनाओं में नहीं फंसना चाहिए; देखना चाहिए कि उसके पीछे उसने क्या किया है — पूरे रहस्य तक जाना चाहिए। संवेदनशीलता मतलब आप सरल हो, किसी की भावनाओं को समझ रहे हो, मासूमियत है — इसी को संवेदनशीलता बोलते हैं। और शब्दों के जाल में ना फंसकर देखो कि कल्याण कैसे होगा।
निश्चित हो गया, बस अब कुछ नहीं चाहिए — हमारा मूल स्वभाव ही है अपने आप में रहना, जहां ना कोई डर हो, ना भय हो। कभी ना कभी हम उस पूर्ण में थे जहां कोई बदलाव नहीं होता था। इसलिए हम हर बदलती हुई वस्तु को रोकना चाहते हैं, क्योंकि कभी हम उस जगह थे जहां कुछ बदलता ही नहीं था। यानी यह निश्चितता और स्थिरता हमारा मूल स्वभाव है; इसलिए हम जहां भी हैं, चाहते हैं कि सब रुक जाए।
इस धरती पर एक गुरु है जो आपकी परवाह करता है। बाकी इस पृथ्वी पर जितने लोग हैं, आपके शरीर तक की परवाह करते हैं, क्योंकि उनको आपके शरीर से कुछ चाहिए। गुरु ऐसा है जिसे कुछ नहीं चाहिए। और रही बात परमात्मा की, तो उससे हम खुद अलग हुए हैं; हमें ही वहां तक पहुंचना है। वह परवाह करके भी क्या करेगा? उससे उसे मतलब ही नहीं है।
आप कौन हैं — जब यह आप समझ पाएंगे, तो सामने वाले को भी समझ पाएंगे। आप शरीर तक हैं, तो सामने वाले को भी शरीर तक, शरीर से ही देख रहे हैं। आप आत्म तत्व में स्थिर हो जाएंगे, तो आप शरीर के पार देख पाएंगे।
ऐसा नहीं है। व्यक्ति सोएगा कितना — यह इस पर है कि शरीर को आप कितना आराम दोगे। हमने 12 साल तक भ्रमण किया; जब शरीर थक जाता था तो जाकर कुछ समय आराम कर लेते थे, वह भी अपनी बहन के यहां। आप लक्ष्य जैसा बनाए हो, सोते-जागते, उठते-बैठते उसी का चिंतन होगा; आप सो नहीं सकते। जब तक शरीर में थकान है, तभी तक सो पाते हो; उसके बाद सोकर बताओ — आप सो नहीं पाओगे।
नहीं, यहां के नियम में रहेगा तो आलसी नहीं बन पाएगा। अभी यहां सेवा का बहुत मौका मिल गया है — 200 से ऊपर वृक्ष लग गए हैं, उन्हें हर रोज पानी देना है, इसमें ही कई लोग लग जाते हैं। आप जहां भी रहो, जो कर सकते हो वह करो; करने के बाद आत्मिक चिंतन करो।
ईमानदारी-सत्कर्म के साथ करोगे तो सहायक हो सकता है, पर वह छूट जाएगा। मंत्र छूट जाएगा, क्योंकि मंत्र बाहर से मिला है, और जब तक आप बाहर हो, आत्मज्ञान नहीं होगा। माला, मंत्र, पूजा-पाठ — एक समय ऐसा आएगा कि सब छूट जाएगा। लेकिन ये सब — मूर्ति पूजा, माला — सहायक होते हैं। कब सहायक होते हैं? जब आप ईमानदारी-सत्कर्म अपनाते हो, तब।
आप किसी भी तरीके से रह सकते हो; बस आप जिज्ञासु होने चाहिए। अगर जिज्ञासु नहीं हो, तो चाहे धन दान दो, चाहे श्रमदान दो, आप यहां नहीं रह सकते। और अगर जिज्ञासु हो, तो श्रमदान दो या ना दो, धन दान दो या ना दो — यह व्यवस्था आपके लिए ही की गई है।
आप बाहरी गुलामी से मुक्त हो गए हो, लेकिन देखो, अब ज्यादा गुलामी हो गई है — लोग बेईमानी के गुलाम हो गए हैं, एक दूसरे को सता रहे हैं। वह गुलामी शरीर तक थी; अब तो लोगों का आत्मिक स्तर गिर रहा है। शिक्षक से लेकर अनेक पदों पर लोग कह रहे हैं कि बेईमानी बिना चलेगा नहीं — बड़ा दुर्भाग्य है। अभी आप अपनी बुरी आदतों के गुलाम हो, और यह गुलामी आपको आत्मिक रूप से गिरा रही है। पहले की गुलामी शरीर को तकलीफ देती थी, लेकिन लोग आत्मिक रूप से उठते थे, मुक्ति-मोक्ष तक पहुंच जाते थे। अब तुम खुद के गुलाम हो गए — मान-सम्मान के, लोगों को नीचा दिखाने के, बड़ा बनने के; जातिवाद इतना बढ़ गया है। अब कौन किसको बचाएगा?
कर्म का परिणाम तो अकेले भोगना है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के द्वारा कर्म होता है तो उसका मानसिक असर, शारीरिक असर पूरे परिवार पर पड़ता है — जितने लोग साथ में रहते हैं, सब पर।
बस ईमानदारी-सत्कर्म अपना लो और जरूरत में जीना चालू करो। दिखावा बंद कर दो, मान की इच्छा छोड़ दो, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा छोड़ दो — इसमें जीना चालू करो। छोड़ना क्या है? इस दुनिया में आप कुछ छोड़ नहीं सकते। अगर छोड़ना है तो बस बेईमानी छोड़ दो — यही आपने धारण किया है; बाकी तो जरूरतों ने धारण करवाया है। मान की इच्छा छोड़ दो, बेईमानी छोड़ दो, बात ही खत्म हो जाएगी।
माता जी को कहीं सत्संग में भेज दो, सत्संग सुनाओ। और अगर ना जाएं, तो या तो आप बदलो; अगर सामने वाला नहीं बदलता है, तो या तो उस जगह से आप हट जाओ, या उसे हटा दो — और क्या करोगे? अगर इस हाथ से पीड़ा हो रही है और पता चला कि पूरा शरीर खराब हो जाएगा, तो क्या आप अपना हाथ नहीं कटवा देते? या फिर वे सुधार करें — अगर आपके साथ रहना चाहेंगी तो आप उन्हें बोल दीजिए कि अगर आप इस तरीके के स्वभाव में रहोगे तो हम लोग नहीं रहेंगे। पर यह भी देखो कि गड़बड़ी कहां से है — ऐसा तो नहीं कि आप माता जी से वह करवाना चाहते हो जो ठीक नहीं है? वह देख लो।
ऊर्जा में तो आप जी रहे हो; और जब तक कुछ चाहिए, आप ऊर्जा दे भी रहे हो, ले भी रहे हो। मूल ऊर्जा है सात्विक। सात्विक ऊर्जा में आप तब रह पाओगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए। और कुछ चाहिए, तो आप पॉजिटिव-नेगेटिव ऊर्जा में रहते हो। जैसा आपके द्वारा कर्म होता है, वैसी ऊर्जा आपको मिलती है और वैसी ही ऊर्जा आप सामने वाले को देते हो — ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है।
उसको बोलने दो ना। मन क्यों बोलेगा? मन के पीछे आप ही हो — "सब खेल खेले राम गोसाई"। क्या अच्छा है, क्या बुरा — आपको जैसी जानकारी है, आप उसे वैसा ही अच्छा-बुरा कहते हो। कभी किसी व्यक्ति के बारे में एक जानकारी है तो उसे अच्छा कहते हो; फिर उसी के बारे में जानकारी कुछ और हो जाती है तो कहते हो बहुत बुरा है। जैसी आपकी समझ, वैसी आपको ऊर्जा मिलती है। उसी व्यक्ति से पॉजिटिव एनर्जी मिल रही थी, झगड़ा हो गया तो अब उसे देखकर नेगेटिव एनर्जी मिलती है। तो जैसी आपकी समझ, वैसा ऊर्जा का आदान-प्रदान है जीवन में।
नहीं, आपकी योग्यता अनुसार और आपकी जरूरत के हिसाब से आपको कर्म मिलता ही रहता है, और उसके बाद कर्म का परिणाम मिलता है। यह कर्म भूमि है; आप हर स्थिति-परिस्थिति में कर्म कर ही रहे हो।
आप अगर उससे उम्मीद लगाकर बैठे हो, तो कभी ना कभी वह आपको पीड़ा देगा। पहले सुख देगा, आपके तरीके से पूरा होगा; लेकिन पीड़ा के लिए भी तैयार रहिए — वह एक ना एक दिन पीड़ा देगा ही देगा।
आप अगर अपराध करते हो तो आप अशांत रहते हो — आपको खुद मालूम है। आप अशांति में रहोगे, घुटन में रहोगे, बेचैनी में रहोगे, डर के जियोगे, क्योंकि उसका परिणाम भी तो धीरे-धीरे आएगा।
नहीं, आप सुन सकते हैं। अगर आपको लग रहा है कि यह लक्ष्य तक पहुंचने में सहायक बन रहा है, तो आप संगीत का भी सहारा ले सकते हैं; संगीत के द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। पर संगीत सुन क्यों रहे हो — इस सृष्टि में कोई भी कार्य किस लिए कर रहे हो, यह आपको पता होना चाहिए। जैसे वाल्मीकि को "राम-राम" दिया गया, पर उनके अंदर से "मरा-मरा" निकला; गुरु ने कहा कि मरा-मरा से भी कल्याण हो जाएगा, और उसी से उनकी उपलब्धि हो गई — क्योंकि उनके भाव में यह बात थी कि इसे करने से हमारा कल्याण हो जाएगा। ऊर्जा आपके भाव में है।
आपकी समझ, आपका भाव — ऊर्जा उसमें है; मूल ऊर्जा सात्विक है, वह आप में भी है। लेकिन जब आपको कुछ चाहिए, तो वहां से पॉजिटिव-नेगेटिव ऊर्जा बनती है। जैसी आपकी समझ रहेगी, सामने वाले से वैसी ऊर्जा आपको मिलेगी। हीरे की पहचान नहीं है तो एक बोरा हीरा भी सामने फेंक दिया जाए, लालच जागृत नहीं होगा; बगल में सोना हो, जिसकी जानकारी है, तो उसे देखकर लालच पैदा हो जाएगा। भाव समझ से बनता है; अगर आपको पता नहीं है तो भाव बनेगा ही नहीं — बनाना चाहोगे तो भी नहीं बनेगा। जैसी जानकारी मिलेगी, वैसी ऊर्जा उसके प्रति बनने लगेगी। और आप कोई समझ तब स्वीकार करोगे जब सामने वाले को योग्य समझोगे; ऐसा नहीं कि कोई कुछ भी बता देगा और आप मान लोगे।
हिसाब भी बाकी है और छोड़ भी नहीं पा रहे। अगर किसी ने आगे अपराध करना बंद कर दिया, तो पिछला खत्म होगा और वह निकल लेगा; लेकिन आगे अपराध करता रहा तो सजा बढ़ती रहेगी, और जब तक अपराध करेगा, नहीं निकल पाएगा। अपराध बंद करने के बाद भी तुरंत नहीं निकल पाएगा, जब तक उसका हिसाब-किताब क्लियर नहीं होगा। जिस दिन हिसाब-किताब क्लियर हो गया, उस दिन आप एक दिन भी जेल में रहना चाहो तो नहीं रखा जाएगा — तारीख के अनुसार गेट खोल दिया जाएगा। वैसे ही जिस दिन आपका हिसाब-किताब हुआ, आप एक क्षण भी इस जगत में नहीं रह सकते; आपको मूल में ही जाना पड़ेगा, चाहो या ना चाहो। और सजा पूरी नहीं हुई है, तो कितनी भी विनती-प्रार्थना करो, नहीं छोड़ा जाएगा — हर जगह सिस्टम काम करता है। इसलिए गिड़गिड़ाओ मत; ईमानदारी-सत्कर्म से जीवन जियो, सत्संग सुनो, ताकि राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता का भाव आगे ना बने; पिछले से छूटने के लिए आत्मिक चिंतन करो और सिर्फ इंतजार करो।
नहीं, शिकायत करना छोड़ो; शिकायत आपको नर्वस बनाएगी, तोड़ देगी। और ऐसा ना हो कि शिकायत करने में आप कुछ नया कर बैठो — शिकायत में फिर आप निंदा करोगे, उस निंदा में किसी का अपमान ही कर दोगे। मायूस मत हो, टूटो मत; क्या कैदी के गिड़गिड़ाने से उसकी सजा कम हो जाती है? ज्यादा बड़बड़ाएगा, जेलर को गाली देगा, तो एक धारा और लग जाएगी। यह शरीर में हम कैदी ही हैं। कैदी अगर ईमानदारी-सत्कर्म के साथ, सेवा-सद्भावना से जेल में जिए तो उसकी कुछ सजा माफ होती है ना — बस इस सिद्धांत को समझ लो। खुशी से, हंसते-मुस्कुराते हुए, जैसा कर्म किया है उसके परिणाम का सामना करते हुए, ईमानदारी-सत्कर्म करते हुए, आत्मिक चिंतन करते हुए अपने निकलने के लिए काम करो।
ध्यान के पूरे रहस्य को समझिए। ध्यान का मतलब है अपने कर्म के प्रति ध्यान रखें कि कोई बेईमानी ना हो। चिंतन का मतलब होता है आत्मिक चिंतन — मुझे अपने आप को इस भवसागर से निकालना है, मैं कहां-कहां फंसा हूं, इस पर चिंतन करना है; तब आपको लाभ होगा। घर में कोई मशीन बिगड़ जाए तो क्या उस पर ध्यान लगाने से वह ठीक हो जाएगी? उसे उचित तरीके से जाकर बनवाना पड़ेगा। अगर कल्याण चाहते हो तो प्रत्यक्ष में जीना चालू करो; कल्पनाओं को छोड़ो, कल्पनाएं आपको गिरा देंगी।
चिंतन अपने आप होता है। अगर आपने अपने आप को कह दिया कि मुझे बस इस भवसागर से — राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से — मुक्त होना है, तो उस पर चिंतन होने लगेगा; चिंतन करना नहीं पड़ेगा। जब आप तैयार हो जाओगे, चिंतन होने लगेगा। जैसे शाम को अपने आप को बोल दो कि कल सुबह जाना है, तो तैयारी शाम से ही होने लगती है। लेकिन अगर आपने अपने आप को बोला नहीं, या किसी ने बोला और आपने स्वीकार नहीं किया, तो तैयारी नहीं होगी।
जब कुछ नहीं चाहिए, तो आप अपने आप में होंगे। जब आपको बाहर से कुछ नहीं चाहिए, तो आप अचेतन मन में जाओगे। अचेतन मन में राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता का भाव छुपा हुआ है, क्योंकि अतीत में आपने बहुत कुछ किया है; तो उसमें चिंतन होने लगेगा। बस बाहर से देना बंद कर दो — अब इंद्रियों द्वारा भर नहीं रहे हो, तो अचेतन मन में काम होगा। जब वहां की पूरी सफाई हो जाएगी और बाहर से लेना बंद कर दोगे, जब दोनों जगह कुछ नहीं होगा, तो आप अपने आप में स्थिर हो जाओगे।
ईमानदारी तो मूल है भाई। ईमानदारी-सत्कर्म अपनाने के बाद ही कुछ होगा; ईमानदारी और सत्कर्म के बिना कल्याण नहीं है — ना कोई कर सकता है, ना तुम ही कर सकते हो। ईमानदारी-सत्कर्म को मुख्य रूप से अपनाओ, फिर जितना भी करोगे, साधना अपने आप होती चली जाएगी।
छोड़ो, आप देखो कि आप ठगाने में हो या ठगने में। आप दोनों से परे होकर अपनी यात्रा करो; जैसा कर्म कोई करेगा, वैसा उसे परिणाम मिलेगा। आप अपनी चिंता कर लो कि तुम्हारा कल्याण कैसे होगा — ऐसा ना हो कि इन लोगों को देखने में ही जिंदगी चली जाए। ठगाता कौन है? जिसे फ्री में चाहिए। ठगता कौन है? जिसे बहुत बड़ा बनना है। जब फ्री में चाहिए तो ठगे जाओगे; ठग ठग-ठगकर कभी तुम्हें खाली कर देगा तो तुम्हें समझ में आ जाएगा। गलती तुम्हारी है — पहले रोग आता है, बाद में इलाज। फ्री में पाने की इच्छा छोड़ दो, तो आपको कोई ठग ही नहीं सकता; और जब तक फ्री में पाने की इच्छा है, आप हमेशा ठगे जाओगे।
कुटिया में रहकर ऐसे सत्कर्म होगा — अब 200 के ऊपर पेड़ हैं; इन्हें कोई पानी देगा तो सत्कर्म ही होगा। कितने लोग इसका लाभ लेंगे, हजारों साल लाभ लेते रहेंगे, लाखों पशु-पक्षी इनसे भोजन करेंगे — यह सत्कर्म ही तो है। आप यह वीडियो बना रहे हो, लोग इसका लाभ ले रहे हैं — यह भी तो सत्कर्म है। सत्कर्म आप कहीं भी कर सकते हो; मौका अपने आप मिलने लगेगा।
नहीं, साक्षी भाव बनाना पड़ता है, लेकिन दृष्टा मूल है; दृष्टा से ही साक्षी भाव बनेगा। साक्षी भाव तब होता है जब आप कुछ करते हुए अपने आप को देखते हो — क्या सही है, क्या गलत, क्या ईमानदारी है, क्या बेईमानी — और मैं इसका साक्षी हूं कि मैं ईमानदारी-सत्कर्म के साथ जीवन जी रहा हूं। अभी आप कर्ता के भाव में हो, और कर्ता के भाव से मुक्त होने के लिए साक्षी भाव अपनाया है। एक समय ऐसा आएगा कि साक्षी भाव भी खत्म हो जाएगा — जब आप "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओगे, दृष्टा हो जाओगे, भाव खत्म हो जाएगा।
ना सही है, ना गलत; आप सही-गलत को छोड़ दो। कौन क्या है, उससे मुझे मतलब नहीं होना चाहिए; मुझे यह देखना है कि मेरा कल्याण किसमें होगा। कोई राम हो, चाहे कृष्ण हो — मुझे बस इतना मतलब होना चाहिए कि मैं अपना कल्याण कैसे कर पाऊं। बात खत्म।
लोग खिलाफ तब होते हैं जब आपकी योग्यता नहीं रहती और आप अपने तरीके से चाहते हो — तब सब खिलाफ ही हो जाएंगे। मैंने इस दुनिया में यह देखा कि अगर आप ईमानदारी से जीना चाहते हो, तो आपसे कोई बेईमानी करवाएगा ही नहीं। अगर आप कहीं बेईमानी में लिप्त हो, तो कहीं ना कहीं अपनी इच्छा से ही लिप्त हो — सीधी-सी बात है।
ध्यान में ध्यान यह करना है कि जब आप बैठिए तो चिंतन करिए कि मैं कहां फंसा हूं? क्या कर रहा हूं? क्या करने से क्या परिणाम है? मुझे क्या करना चाहिए? इसके बारे में विचार करना।
आप उसकी यात्रा करिए। मुझे अनुभव से परे उठना है; मुझे अपने आप को किसी अनुभव में नहीं फंसाना है, क्योंकि अनुभव मुझसे अलग है। किसी भी अनुभव के पीछे कोई आधार है, बेस है; तो मुझे अनुभव से भी मुक्त होना है।
सच और झूठ से परे जाओ; और मुक्ति पाने के लिए ईमानदारी अपना लो। एक समय आएगा जब ईमानदारी भी आपके जीवन से हट जाएगी, सत्कर्म भी हट जाएगा; तब बचोगे आप — वही सत्य है, शेष, जहां आपके अलावा कुछ नहीं है।
उस लाश में जब कोई था, तब आपने उसके साथ कैसा व्यवहार किया? पता चला कि जब वह जीवित था, तब उसके साथ दुर्व्यवहार किया; वह बीमार था तो आप देखने भी नहीं आए, घंटा भर बैठकर बात नहीं की; और अब जाने के बाद महंगे से महंगा कफ़न डाल रहे हो — अपना मान बढ़ाने के लिए, क्योंकि समाज के अनेक लोग आए हैं। उसका कोई मतलब नहीं है; कोई पुण्य नहीं मिलने वाला। जब वह जिंदा था, तब पहनने को कपड़े दे देते। कफ़न यहां से वहां डालोगे, आगे जाकर उतार दिया जाएगा और शरीर जला दिया जाएगा — उस कफ़न का क्या मतलब? मरने के पहले ही उसे कुछ कपड़े दे देते।
सत्संग सुनना पड़ेगा; सत्संग सुनते रहिए, जब तक आत्मिक कल्याण ना हो जाए। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग; और अगर गृहस्थ जीवन में हो, तो कम से कम एक महीना गुरु का सानिध्य।
अब देख लो, आपको कौन पसंद है। जैसे आपको रोटी जमती है, पूरी जमती है या पराठा — तीनों के पीछे मेन आटा है, गेहूं ही है। तो आप किसी एक को पकड़ लो; आपको जैसा रूप पसंद आ जाए — सबके पीछे एक ही है।
पैसा आप कमाते हो तो "मेरा" का भाव तो आएगा। बस उस "मेरा" का सही जगह उपयोग करो — ईमानदारी से पैसा कमाओ, और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के बाद सत्कर्म में लगाओ।
नहीं। सत्कर्म मतलब जरूरतमंद की सेवा — वहां कर्ता का भाव होता ही नहीं, इच्छा-अपेक्षा होती ही नहीं। जब आप बोलकर कर रहे हो, तो वह सेवा है; वह बीज की तरह है — या तो लगा सकते हो, या खा सकते हो। और सत्कर्म का फल फल की तरह है — उसकी गुठली डाल दोगे तो वह हजारों साल तक फल दे सकता है। सत्कर्म में बंधन नहीं है, क्योंकि सत्कर्म में कोई उम्मीद नहीं है — निष्काम कर्म को ही समझिए; सत्कर्म नया शब्द है। उसके बदले में आपको कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। जैसे यह बालक पेड़ों को पानी देता है; अगर कल नियम तोड़ दे तो उसे भगा दिया जाएगा, तब वह नहीं कह सकता कि मुझे इसमें से कुछ दो, क्योंकि आश्वासन ही नहीं दिया गया। जहां आश्वासन ना हो, वह सत्कर्म है; जहां आश्वासन हो कि आपको यह मिलेगा, वह सत्कर्म नहीं — वह तो काम के वेतन की तरह हो गया, वेतन किसी भी रूप में लो।
कुछ बोल नहीं सकते; कितना भी समय लग सकता है। जैसे कोमा में गया व्यक्ति कब होश में आएगा, कुछ पता है? एक दिन भी लग सकता है, साल भी लग सकते हैं, और हो सकता है पूरी जिंदगी ना आए। तो कुछ बोल नहीं सकते।
माता-पिता अगर बच्चे को उसका मूल उद्देश्य बताते हैं, आत्मिक कल्याण की तरफ ले जाते हैं, तो वे माता-पिता कहलाने लायक हैं, और ऐसे माता-पिता भगवान तुल्य होते हैं। और अगर माता-पिता ने जन्म दिया, खुद फंस गए और अपने बच्चों को भी फंसा दिया, तो उन्हें माता-पिता तो नहीं कहा जा सकता।
प्लान करने वाले भी आप ही हो। सब फिक्स है, इस बात को समझिएगा। आप फिक्स करके आते हो; पर जब आपने फिक्स किया था तब देश-काल-परिस्थिति कुछ और थी, और कुछ सालों बाद जब वह मिलता है तो देश-काल-परिस्थिति कुछ और हो जाती है, तो आप कहते हो — यह मुझे स्वीकार नहीं। तब आपके पास कर्ता का अधिकार है — बेईमानी करके उसे बदलने का; और फिर से फिक्स करने में फंस जाते हो। आपको कोई काम मिला, तो उसे करने के दो रास्ते हैं — ईमानदारी और बेईमानी। अगर ईमानदारी से करते हो, तो उस फिक्स से मुक्त हो गए; ईमानदारी से करने में कोई प्लानिंग नहीं करनी पड़ती, जैसा है वैसा करके चले आना है। और बेईमानी से करते हो, तो वह फिक्स तो हटा, लेकिन आगे एक नया फिक्स तैयार कर दिया — यही है कर्म का बंधन: हम एक गांठ खोलते हैं, और अगली कितनी गांठें बांध लेते हैं। इसलिए मैंने कहा — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन।
यह परसेंटेज का कैलकुलेशन आप अपने आप को बचाने के लिए लगाते हो, लेकिन बच नहीं पाओगे — नाव में छेद एक हो या निन्यानवे। या तो आप ईमानदार हो या बेईमान; दोनों नहीं हो सकते। आदमी या तो मर गया या जिंदा है — ऐसा थोड़ी कहोगे कि 80% मर गया, 20% बाकी है; बीमारी परसेंटेज में हो सकती है, मृत्यु नहीं। और हां, ईमानदारी के साथ सत्कर्म भी, क्योंकि पिछला भी तो है। "ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन" — यह कोई साधारण लाइन नहीं, चार वेद, 18 पुराण, छह शास्त्र — सबका निचोड़ यही है। हर व्यक्ति इस धरती पर दो में से एक अपनाकर जी रहा है; जो दोनों में से कुछ नहीं पकड़े, वह या तो अबोध है, या पागल, या मंदबुद्धि, या आत्मज्ञानी। पहले आपको पता होना पड़ेगा कि मैं कहां खड़ा हूं, मैं क्या हूं; जब यही नहीं पता, तो लक्ष्य तक पहुंच ही नहीं पाओगे।
आप भटक रहे हैं — यह सबसे बड़ी सजा है। सब कुछ होने के बाद भी आप अशांति में जी रहे हो, अपने आप को हर जगह छुपा रहे हो, संसाधनों से, लोगों से — यह सजा नहीं तो क्या है? सारी व्यवस्था होने के बाद भी घुटन है, बेचैनी है, पीड़ा है — इससे बड़ी सजा जीवन में क्या हो सकती है? और "यह तो कलयुग है" कहकर अपने आप को सांत्वना देने से पीड़ा नहीं हटती। एक व्यक्ति व्यवस्थाओं के लिए भाग रहा है, वे नहीं हैं इसलिए दुखी है; पर जिसके पास सारी व्यवस्था है और फिर भी दुखी है, वह सबसे दुर्भाग्यशाली है — भागने वाले को तो कम से कम आस है। और यह व्यथा आप किससे कहोगे? जिससे कहोगे, मजाक उड़ाएगा; एक ही जगह कह सकते हो — गुरु के पास, वही आपको निकालेगा।
गुरु ऐसा दर्पण है जो आपको आपसे मिलाता है — आप क्या हो। फिर आपको यह भी दिखाता है कि तुम यह बन सकते हो, यह तुम्हारा मूल अस्तित्व है; अभी आप यह हो, और यहां से वहां तक कैसे आना है, वह मैं बताऊंगा। संसार के दर्पण में एक ही चेहरा दिखता है; गुरु ऐसा दर्पण है जो एक ही दर्पण में दो चेहरे दिखाता है — एक जो आप हो, और एक जो आप थे — और वहां तक कैसे पहुंचो, उसकी झलक भी दिखाता है। इसलिए गुरु को महान कहा गया, इसलिए देवता तक गुरु को प्रणाम करते हैं। गुरु के पास रहोगे तो अपने आप को देख पाओगे।
सत्कर्म तो दोनों स्थितियों में हो रहा है — आप ईमानदार हो तो भी, बेईमान हो तो भी। बेईमान भी सत्कर्म करते हैं, भावनाओं में आकर सत्कर्म तो कर ही देते हो; ऐसा ना सोचना कि नहीं होता। इसलिए ईमानदारी पकड़ लो — कोई भी व्यक्ति यह अपना लो।
अवगुण तो उसने धारण किया है ना; जैसा कर्म, वैसा अवगुण — एक समान नहीं हैं। गुण और अवगुण दोनों अलग-अलग हैं, क्योंकि उन्हें धारण किया गया है, लेकिन धारण करने वाला एक ही है। गुण-अवगुण को छोड़ दो तो सब एक जैसे हैं। जैसे शाम को लाइटें जल जाती हैं — सबका कलर अलग, उजाला अलग; जैसा बल्ब, वैसा उजाला; लेकिन बल्ब हटा दो तो पीछे ऊर्जा एक ही है। वैसे ही सबका स्रोत एक है; जैसा गुणधर्म धारण किया, वैसा वे बन बैठे। हमें दोनों को छोड़ना है — गुण को भी, अवगुण को भी।
हां, कर सकते हैं, लेकिन बस इतनी ईमानदारी रहे — जैसे अभी कुछ देर पहले मैंने सहेलियों की कहानी बताई, तो बताने से पहले रामकृष्ण परमहंस जी का नाम ले लिया। आप कहां से बोल रहे हो, यह बता दो; अगर यह नहीं बताओगे तो तुम फंस जाओगे। जिससे भी सुना, जिसने भी सुनाया, उसका नाम बता दो — कि भैया, मुंह मेरा है लेकिन ये शब्द मेरे नहीं हैं; मैंने इसे इस तरीके से समझा और आप तक पहुंचा रहा हूं। तब उसमें आपका अहम भाव नहीं आएगा, और इतनी ईमानदारी होगी तो आपका स्तर उठेगा। कहानी को अपना ही बनाकर पेश कर दोगे तो फंस जाओगे।
मैंने कहा ना, पहली बार जब आप आए, तो कोई वादा लेकर आए थे। पहले आप, फिर कर्म; तभी तो आप यहां आए। ऐसे ही आप यहां नहीं आए, क्योंकि बिना आधार-बेस के यहां कोई रह नहीं सकता; बिना पात्र के यहां कुछ टिक नहीं सकता — एक के पीछे एक। आप यहां आए हो तो कुछ करने ही आए हो, पहले प्लान बनाकर आए हो — जैसे हम अभी यहां बैठे हैं, तो अपने-अपने घरों से पहले कोई प्लान लेकर ही शरीर को लेकर आए।
हां, आप में मानवता है; लेकिन जितना आप कर सकते हो, उतना करो। जिसका जैसा कर्म, वैसा उसका परिणाम। आप क्या कर सकते हो — अगर सुधार कर सकते हो तो सुधार करो, अगर कुछ मदद कर सकते हो तो मदद करो।
क्यों बताना चाहते हो? फूल में अगर सुगंध आ गई, तो फूल को चिल्लाने की क्या जरूरत है? सुगंध लेने वाले खुद आ जाएंगे। अगर आपको समझ में आ गया है, तो आनंद तक पहुंचने का मार्ग बताइए। कोई चौराहे पर खड़ा होकर कहे "मैं करोड़पति हूं", तो लोग उसे पागल कहेंगे; करोड़पति हो तो समाज के लिए कुछ कर दो, लोगों को खिलाओ — तब लोग मानेंगे। वैसे ही, आपके आनंद को सुनकर लोग क्या करेंगे? आपके शब्दों से जब लोगों को लगेगा कि हम भी आनंद तक पहुंच जाएंगे, तब वे आपको सुनेंगे। आनंद में होना कोई नई बात नहीं — कितने लोग आनंद में आए और गए; बड़ी बात यह है कि आपके द्वारा कितने लोग आनंद को उपलब्ध होते हैं। जहां शक्कर डाल दो, वहां चींटियां आ जाती हैं; नमक डालकर चींटियों को पकड़-पकड़कर लाओगे तो वे काटेंगी ही। बातों से बात नहीं बनती।
आराम से रहो, जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो वह कर लो। ना किसी को हमें छोड़ना है, ना किसी को पकड़ना है — दो में से एक करोगे तो फंस जाओगे; आत्मिक कल्याण में जो बाधा होगा, वह अपने आप छूट जाएगा। मैं भी यही कहता हूं कि अगर आप गृहस्थ हो, तो 12 महीने में एक महीना अपने आप को दो। अगर कोई रोकता है तो मत रुको; बोलो — मुझसे 11 महीने लो, लेकिन एक महीना तो मुझे दो; क्या मेरे जीवन पर इतना भी मेरा अधिकार नहीं? बताकर भी जाओगे कि आत्म कल्याण के लिए जा रहे हैं, तो कोई नहीं रोक सकता; कहीं ना कहीं आप कमजोर हो। मैं दुनिया का सौभाग्यशाली उसे समझता हूं जिसने अध्यात्म को समझा, और दुर्भाग्यशाली उसे, जो समझने के बाद भी यात्रा नहीं कर पाया। एक दिन ऐसा आएगा जब शरीर काम करने लायक नहीं रहेगा; जब तक इंजन में दम है, चाहे जिधर मोड़ दो। जवानी जहां बिताओगे, बुढ़ापे में वही चिंतन होगा। गाड़ी खरीदने से चलाना नहीं आ जाता; ज्ञान जमा करने से भी कुछ नहीं होगा — पता जानकर भी उस पते पर यात्रा नहीं की, तो वह पता एक दिन बोझ बन जाएगा, और जिंदगी भर पछतावा और घुटन रहेगी। अभी फैसला करो — गृहस्थ हो तो साल में एक महीना देना है, और अगर दायित्व-कर्तव्य से मुक्त हो गए हो तो पूरा देना है। नहीं तो प्लानिंग ही करते रहो; शरीर तो मिलता ही रहेगा।
झोला उठाकर चल ही देगा तो पत्नी क्या कर लेगी? क्या आप किसी की स्वतंत्रता छीनने आए हो? पत्नी तो तब हो जब आप उसके कार्य में सहायता करो; अगर आप आत्मिक कल्याण में ही बाधक हो, तो फिर पत्नी कहां हुई? या पति पत्नी के आत्मिक कल्याण में बाधक हुआ, तो पति कहां हुआ? जब एक दूसरे की आत्मिक कल्याण में सहायता करो, तब पति-पत्नी हैं, तब वहां प्रेम है; नहीं तो यह वासना है।
पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि ऐसा क्यों हो रहा है। जहां भी आप थे, वहां आपका अस्तित्व था और आपके अस्तित्व से सीधा काम होता था, तो लोग आपका नाम लेते थे। अब आप जहां गए हो, जिसके सानिध्य में हो, कुछ भी कर रहे हो — आपका नाम ही नहीं आ रहा। कर तो रहे हो; मंदबुद्धि हो जाती तो कर भी नहीं पाती। जो कार्य दिए गए हैं, वो आप आसानी से कर पा रहे हो। लेकिन उस कार्य में कोई आपका नाम नहीं ले रहा — अहम भाव को पोषण नहीं मिल रहा, कोई कह नहीं रहा कि आपने किया, तो छटपटाहट हो रही है। पहले लोग धन्यवाद भी देते थे; वो काम आप यहां भी कर रहे हो, लेकिन कोई धन्यवाद नहीं दे रहा। समाज उसका लाभ भी ले रहा है, लेकिन सीधा आपको पोषण नहीं मिल रहा, तो लगता है कहीं पगला तो नहीं गए। इतने समय से आपने वाहवाही ही तो बटोरी है। वाहवाही हम इसलिए चाहते हैं कि मेरा अस्तित्व बना रहे, मैं भी कुछ हूं। हमें यह देखना है कि हम किसके लिए आए हैं — हम तो अपने अस्तित्व को मिटाने आए हैं। तुम्हारा अस्तित्व किससे था? तुमसे नहीं, लोगों से था। अब यहां लोग तुमसे जुड़ ही नहीं रहे, तो लग रहा है मेरा अस्तित्व मिट रहा है। अस्तित्व मिटाने के लिए ही तो आए थे, तो मिटने दो — व्याकुलता क्यों?
जैसे आपने जीवन में शुरुआत की और अपनी समझ से कोई लक्ष्य प्राप्त किया, और कोई व्यक्ति आपसे प्रभावित होकर उस लक्ष्य तक पहुंचना चाहे, तो आपकी हर बात मानेगा तभी पहुंचेगा। आपने कहा दाएं और वो मुड़ गया बाएं, तो क्या वो पहुंचेगा? एक बार अगर गलत मुड़ा तो आगे का सारा रास्ता गलत है। तो आप जिससे प्रभावित हुए हो, जिसके पास गए हो कि मैं आपकी तरह आनंदित होना चाहता हूं, तो उसके बताए अनुसार ही करो। अपने अनुसार तो आपने कर ही लिया है; तो जितना कह रहा है उतना ही करो — ना ज्यादा, ना कम। ज्यादा में भी भटक गए। मुझे अपनी बुद्धि लगानी ही नहीं है, क्योंकि अपनी बुद्धि से मैं जहां हूं वहां परेशान ही तो हूं। इंतजार करो कि वो क्या कहेगा, क्योंकि आपकी स्थिति देखकर ही बोलेगा — आप स्वीकार कर पाते हो कि नहीं, आगे बढ़ पाओगे कि नहीं। पीछे का जितना दिया था, वो कर लिया, तब वो आगे का देगा; पीछे वाला ही नहीं किया तो आगे देगा ही नहीं। जैसे गणित में एक भी अंक इधर-उधर कर दिया तो नीचे का सारा गलत, और मायने तो आखिरी उत्तर रखता है, परिणाम रखता है। आप आनंद के लिए आए थे ना, तो जितना बता रहा है सिर्फ उतना करो — फिर अपनी बुद्धि लगाने की क्या जरूरत है?
इसे बहुत गहराई से समझना है। अपनों की कुटिया मतलब एक दरवाजा है। हमने एक दरवाजा खोला है, और उस दरवाजे पर कोई भी आए — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी — ये मेरा कर्तव्य है। लेकिन जब मैं वो दरवाजा छोड़कर समाज में कुछ काम करने गया हूं, तब तो मेरा दरवाजा ही नहीं है। मैं तो उसके दरवाजे पर गया हूं, तो उसके दरवाजे पर अपने अहंकार को पोषण क्यों दे रहा हूं कि मैं तुझसे ज्यादा हूं? मैं जिसके दरवाजे पर गया हूं, उसके पास नमक-रोटी है तो नमक-रोटी खा लो। पूछना उसका कर्तव्य है, मेरा नहीं। मेरा देना मेरे ही क्षेत्र में है। अगर मैं किसी के यहां किसी काम से गया हूं, तो वो जैसे चाहे वैसे रखे; मुझे सिर्फ अपना काम याद रखना है कि मैं किस कार्य को लेकर यहां आया था और मेरा काम हो रहा है कि नहीं। यही गलती हम कर देते हैं कि अपना काम भूल गए और उससे व्यवहार बनाने लगे — कि मैं कुछ हूं, मैं सज्जन हूं। हर व्यक्ति सबकी नजरों में सज्जन बनना चाहता है कि देखो मेरे अंदर कितनी मानवता है, मैं लोगों की भूख देख पा रहा हूं।
मुझे पहली बात यह देखनी है कि मैं किस लिए गया हूं, मेरा अधिकार सिर्फ कितना है, मैं किसके साथ हूं, और उसने मुझे कितना अधिकार दिया है — उतने में काम करना है। मैं कुछ उपलब्धि के लिए गया हूं; जितना वो बोल रहा है उतना ही करूंगा तो मेरा टारगेट पूरा होगा। ज्यादा करूंगा तो भी नहीं हो पाएगा, कम करूंगा तो भी नहीं। उसके एक-एक शब्द का ध्यान रखना है। अब जैसे मैं भोजन कर रहा हूं और लग रहा है कि अगला व्यक्ति भोजन नहीं पाएगा तो मर जाएगा — उस स्थिति में दे देना है। दूसरी स्थिति: मेरे हिस्से का जितना मुझे खाने को मिला है, और मुझे लग रहा है कि ये आदमी सच में भूखा है, तो मैं दे सकता हूं — मान के चक्कर में नहीं, भावना के चक्कर में नहीं; सिर्फ जरूरत देखनी है। सच में उसकी जरूरत हो तो अपने हिस्से का दे सकते हो, लेकिन फिर आपको भूखा रहना पड़ेगा।
नहीं। अब सुनिए — जैसे कोई बैंक में कैशियर है। सामने कोई पासबुक लेकर आया, लेकिन उसके खाते में पैसा नहीं है, और वो कह रहा है मेरा बेटा बीमार है। कैशियर ने उसे दे दिया, तो उसे भरना पड़ेगा — अपने पॉकेट से। क्योंकि उसको परमिशन सिर्फ इतनी मिली थी कि अकाउंट में जितना पैसा हो, साइन-पेपर देखकर दे देना; ₹1 भी ज्यादा दे तो उसे भरना पड़ेगा। वहां मानवता नहीं चलेगी, तो हर जगह आपकी मानवता भी नहीं चलेगी। आपका अधिकार कितना है? दूसरे के सामान पर मेरा अधिकार नहीं है। अगर लगे कि नहीं दूं तो सामने वाला मर जाएगा, और आप दोगे, तो फिर उसकी भरपाई करो। कैशियर के पास बहुत पैसा होता है, चाहे तो 10-20 लाख किसी को ऐसे दे दे, लेकिन शाम को बिना हिसाब दिए काउंटर से हट ही नहीं सकता, गेट से निकलेगा ही नहीं — एक-एक रुपए का हिसाब दो, उसके बाद आप जा सकते हो। आपकी योग्यता देखकर आपको ऐसी जगह बैठाया गया है, लेकिन शाम को हिसाब होने वाला है।
नहीं, आपका उठना होगा, क्योंकि आप कहीं नियम में जी रहे हो। अगर कोई सिस्टम चलता है तो उसके पीछे बहुत खर्च है; आपकी मानवता की वजह से वो पूरा खत्म हो सकता है, और पूरा खत्म होगा तो उसके पीछे कितने लोग खत्म हो जाएंगे। और ये खत्म हो रहा है तो अपने कर्मों से खत्म हो रहा है — आप उसमें क्या कर सकते हो? क्योंकि जिसका आप दोगे, उसको भी किसी को हिसाब देना है। आप ये ना समझो कि कोई मालिक है तो उसे हिसाब नहीं देना — यहां सबको हिसाब देना पड़ता है। तो आप देख लो कि क्या आप पर्सनल भरपाई कर पाओगे, क्योंकि आपसे लिया जाएगा।
एकदम। भरोगे कैसे? फंस जाओगे। सर्वप्रथम अपने को बचाना है। अगर एक हमारे सामने मर रहा है, तो पता नहीं उसका नेचर कैसा है, मरने वाले का कर्म कैसा है; लेकिन मुझे तो अपने कर्म का भी पता है, स्वभाव का भी पता है। तो पहले मुझे अपने आप को बचाना है, फिर मेरे से जितने लोग जुड़े हैं उनको बचाना है, और अगर उससे कुछ बचता है तो और लोगों को बचाना है। लेकिन हम क्या करते हैं? दिखावे के चक्कर में उसको बचाते हैं, और जितने लोग तुम्हारे साथ जुड़े हैं — जिन्होंने तुम्हारे लिए कुछ किया, जिन्होंने तुम्हें उठाया — उन्हीं का गला काटते हैं, उन्हीं को वैल्यू नहीं देते, उन्हें दबाते हैं। तो जीवन में याद रखना: सर्वप्रथम खुद, उसके बाद मेरे से जुड़े लोग, उसके बाद बचता है तो कोई और — और नहीं तो नहीं। क्योंकि अगर मैं कुछ हूं, तो जितने लोग मुझसे जुड़े हैं उनके द्वारा हूं; वही मेरे आधार हैं। हम सज्जन बनने के चक्कर में चाहते हैं कि लोग कहें बहुत बड़ा आदमी है, इसके अंदर कितनी मानवता है — और बाद में पता चलता है कि वो दो कौड़ी का भी नहीं समझते। गड़बड़ यहीं होती है कि जो मुझे उठाए हैं, उन्हीं को मैं छोड़ देता हूं; फिर ऐसे लोग कहीं के नहीं होते। नए-नए लोग वाहवाही करें, इसलिए पुरानों को धक्के मारकर हटा देते हैं — ये मान की भूख है। मैं उतना ही खाली हूं, जितना मैं बाहर से किसी के माध्यम से भर रहा हूं।
अभी डूब रही है, डूबी नहीं है; तो तुम तो बचा लो अपने आप को। और देखना यह है कि जिसको हमने सौंपा था, क्या सच में उसने डुबाया, कि प्राकृतिक डूब रहा है। क्या सच में उसकी ताकत खत्म हो गई? हो सकता है वो पूरी तरह तुम्हें सुरक्षित रखना चाहता था, अपनी जान की भी बाजी लगा दी, फिर भी वो भी डूब रहा है और तुम भी — तो क्या वो जानकर डुबा रहा है? ये जांचना है। अगर तुमने लंबा समय उसके साथ दिया, तो इसका मतलब कुछ तो सुरक्षा मिल रही थी, तभी तो आप उसके सानिध्य में थे। अगर नैया डूब रही है, तो देखो कि वो विवश तो नहीं, लाचार तो नहीं, उसकी ताकत तो खत्म नहीं हो गई — कहीं मेरे कर्म का हिसाब-किताब इतना तगड़ा तो नहीं था कि बेचारा वो भी मुझे बचाने में मेरे साथ डूब गया? वो निकल सकता था, लेकिन मुझे बचाने में वो भी डूब लिया — ये जांचना पड़ेगा, नहीं तो उसका भी दोष लग जाएगा।
उसको बचाने में बह जाओ तो बह जाओ — अब तुम्हारी बारी है। भागो मत। अगर उसे बचा लेते हो तो ठीक है; नहीं बचा पाते हो तो बह जाओ उसी के साथ, लेकिन छोड़कर भागो मत, नहीं तो उसकी भरपाई करने में जन्मों-जन्म लग जाएंगे। क्योंकि आपको बचाने में ही तो डूब रहा था; अब आपकी बारी है। अगर एक बार उसे छोड़कर गए, तो आप कभी अपने आप को सुरक्षित कर भी नहीं पाओगे, क्योंकि सुरक्षित करने वाले को ही आप छोड़कर चले गए। फिर पता नहीं उसकी भरपाई कितने जन्म करनी पड़ेगी। अगर कोई मुझे बचा रहा था और अब मेरी बारी आ गई कि मैं उसे बचाऊं — वो डूब रहा है तो मेरा काम है उसे बचाना। हो सकता है उसे बचाने में मैं निकल जाऊं, कोई बात नहीं; मेरी गिनती बचाने वालों में तो गिनी जाएगी, भगोड़ों में तो नहीं।
एकदम। आपके द्वारा बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन अब आपको बाहरी तौर से उसका परिणाम नहीं मिल रहा। उस कर्म का परिणाम मिल रहा है, पर उसका उपयोग कोई और कर रहा है, तो लगता है मेरे हाथ में कुछ नहीं आ रहा — कहीं हम पागल तो नहीं हो रहे। लेकिन आपके द्वारा कार्य भी तो हो रहा है; बस उसका परिणाम तुम्हें सीधा बाहरी तौर से नहीं मिल रहा। जितना मिल जाए उतना करना है, करने के बाद इंतजार करना है — इंतजार ही साधना है। इंतजार में भी आलस्य नहीं; इतनी जागरूकता के साथ इंतजार करना है कि कब मेरे पास सेवा आ जाए और मेरे हाथ से ऐसे ही ना निकल जाए। कभी आंसू भी आ जाएं कि आखिर मिल क्यों नहीं रहा, इतने दिन तक मिल रहा था, अब क्यों छीन लिया गया। कुटिया में बहुत लोगों को कहा जाता है कि तुम्हें कुछ नहीं करना, साधना करनी है — तो उन्हें अफसोस होना चाहिए कि क्या मैंने ऐसा कर दिया, क्योंकि कुछ करने से ही तो मेरा स्तर उठता; अब उसकी भरपाई कैसे करूं? भरपाई करोगे तभी वहां जाओगे; सिर्फ काम के थ्रू ही जाओगे। कोई गलती करके पश्चाताप करता है तो आप उसे दोबारा मौका देते हो; पश्चाताप ना करे, अकड़ करे, तो लाइन में बहुत लोग खड़े हैं। कुटिया से अनुभव लो — इतने पौधे लगाए गए, क्या पहले से प्लान किया गया कि पानी कौन देगा? पौधे तो लगने दो, पानी देने वाला आ जाएगा; कहां-कहां से लोग आकर उन पौधों की सेवा करते हैं और कहते हैं ये मेरी साधना है। तुमने मौका मांगा था कि मुझे भी निकालो, तो प्रकृति ने मौका दिया। लेकिन ये मत सोचो कि तुम्हारे पीछे कोई और नहीं — तुम्हें बीच में रखा गया है, तुमसे नीचे भी लोग हैं, ऊपर भी, और तुम्हें हर वक्त देखा जा रहा है। या तो आगे के स्टेप पर चले जाओगे, या फिर बाहर ही निकल जाओगे।
तो उसकी भरपाई करनी पड़ेगी ना, उसका दोष लगेगा ना, क्योंकि आपने किसी का समय बर्बाद किया। वो डिमांड पूरी करने में कितने लोग लगे — ऐसे थोड़ी ना आपकी डिमांड पूरी हो गई; कितनी बाहरी-आंतरिक शक्तियां लगीं। एक आदमी नहीं, कितने लोग लगते हैं तब जाकर आपकी एक डिमांड पूरी होती है। आप एक रोटी खा रहे हो — एक रोटी आते-आते कितने लोगों का हाथ लगा है! आप मिलने जाओ तो मिल नहीं पाओगे; किसकी जमीन होगी, कौन बोने वाला होगा, आप खोज ही नहीं सकते। रोटी वाले को खोज लोगे, फिर उसने गेहूं कहां से डाला, बीज कहां से लाया — आखिरी तक जाते-जाते खत्म। शुरुआत में भी कुछ नहीं, आखिरी में भी कुछ नहीं।
अब ये देखना है कि ये माहौल बना है — आपने जिज्ञासा रखी, कभी प्लानिंग की होगी, तो आज ये माहौल बना और आपके प्रश्नों के उत्तर मिल रहे हैं। तो उत्तर देने वाले के पास ही क्लियर कर लो कि हम इसका उपयोग अभी करेंगे या नहीं करेंगे — इतनी ईमानदारी। क्योंकि वो इसलिए मेहनत कर रहा है कि आप उपयोग करोगे; और अगर आपने नहीं किया तो उसका भी दोष लगेगा, क्योंकि उसने मेहनत की। ये उत्तर इधर से निकल रहा है, तो इस व्यक्ति ने तो जिंदगी लगा दी; आपके लिए सिर्फ इतना समय है, उसने पता नहीं इस उत्तर के लिए क्या-क्या किया, उसका पूरा जीवन लगा है। तो जब आपको उससे कुछ मिल रहा है और आपने मांगा, तो उसका उपयोग करिए, या तो बोल दीजिए हम उपयोग नहीं करेंगे। नहीं तो समय आपने बर्बाद किया, उसका दोष लगेगा — नहीं करना था तो आपने पूछा क्यों?
अगर आप कुछ मांग कर रहे हो, तो मांग करने में देश-काल-स्थिति-परिस्थिति अलग होती है, और जब मिलता है तो देश-काल-स्थिति-परिस्थिति चेंज होती है। तो अगर आपने कुछ मांगा है, तो जब मिले तब उसे ईमानदारी से यूज करो, छोड़ो मत। इसी को समझ लो कि अगर मैं आज मांग कर रहा हूं, तो अभी तो मिलेगा नहीं — कुछ चीजें अभी मिल जाती हैं, कुछ बाद में। तो आप देख लो कि उस समय देश-काल-स्थिति-परिस्थिति अलग रहेगी, तो क्या उसका उपयोग कर पाओगे या नहीं। करना ही हो तभी मांग करो, नहीं तो वहीं नाश कर दो कि नहीं चाहिए। हो सकता है आपने जिसके लिए मांगा, उस समय आपको जरूरत ही ना हो — लेकिन मांगा तो था ना। तो उसका उपयोग करो, कहीं और उपयोग करो। जैसे आपने भोजन मंगाया, और मिलते-मिलते भूख ही खत्म हो गई, या आने से पहले कुछ और ग्रहण कर लिया; लेकिन सामने वाला तो लेकर चला आया। तो उसका सदुपयोग करो — वो जरूरत में लाया, तब जरूरतमंद तक पहुंचाओ, नहीं तो खुद ग्रहण करो। उपयोग तो करना पड़ेगा, उससे भागना नहीं, नकारना नहीं; अगर नकार दिया तो उसकी भरपाई करोगे, उसका दंड मिलेगा। सदुपयोग कर दिया तो सबको मिलेगा — आपको भी, उन लोगों को भी। और दुरुपयोग किया, यूज ही नहीं किया, फेंक दिया, तो पीछे वालों को तो मिलेगा, लेकिन उसकी भरपाई आपसे ली जाएगी। क्योंकि जब कुछ भी मिलता है तो उसमें कितने लोगों की मेहनत है; ऐसे ही आप तक नहीं पहुंच गई। तो बहुत ही सूझबूझ के साथ जीना है।
जैसी स्थिति में उन्होंने लाया होगा, वैसा दंड मिलेगा। उन्होंने किस तरीके से आपके लिए मेहनत की — हो सकता है वो भूखा सोकर आप तक लाया, कितनी रात भूखा रहा, कितना सामना करना पड़ा। उनकी मेहनत, उनकी ईमानदारी देखी जाएगी कि देने वाला किस स्थिति में लाया है। वो तो करते-करते ही उठ जाएगा; यहां तक पहुंचाते ही वो तो उठ गया। अगर वो खाकर बचा हुआ दिया है, तब उसकी भरपाई कम रहेगी; लेकिन वो भूखा रहकर आपको दे दिया और आपने फेंक दिया, तो उस हिसाब से दंड भी लगेगा। यहां कुछ नुकसान नहीं होता — आप ये मत समझो कि उसका यूज नहीं होगा। यहां जिसके लिए जो बनाया गया है, उसका उपयोग होना ही होना है; आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा, चींटी खाएगी, कुछ और खाएगा, भिन्न रूप में कोई उपयोग करेगा। लेकिन आप उसे यूज करने में या ना करने में गिरते हो, उठते हो।
जादू ये है कि जब आप मेरे साथ थे तो मेरे तरीके से जी रहे थे, और जब आप मुझसे दूर गए तो मेरा तरीका ही छोड़ दिया आपने, वहां का तरीका अपना लिया। तो उस तरीके में ऊर्जा थी — जिस तरीके में वो आपको जिला रहा था, जिस तरीके में आपको रख रहा था। अगर वह तरीका नहीं छोड़ते, तो वहां भी ऊर्जा मिलती। आप जब ऊर्जा कम महसूस कर रहे हो, तो इसका मतलब आपने तरीका छोड़ दिया, कहीं और लिप्त हो गए; क्योंकि ऊर्जा तरीके में थी। जिसके साथ हो, वो एक तरीका देता है, आपको एक तरीके में रखता है। तो बस आप जहां भी जाओ, उसी तरीके में रहो।
अब उस प्रोफेसर ने मेरे ज्ञान का उपयोग किया होगा, कुछ समझा होगा; उसे कुछ समझ में आया तो एक को और लाना चाहती है। तो अब देखना है कि योगी जी के लिए उसने क्या किया? योगी जी के काम का तो उपयोग किया — तो तूने क्या किया? वो क्यों दृष्टि डालेगा? क्या तूने उसकी भरपाई की? जिसकी दृष्टि तू डलवाना चाहती है, वो दृष्टि इस शरीर के द्वारा, आंख के द्वारा डालेगा — तो इसको भी तो कुछ लगता होगा, उसके लिए क्या सोचा? अगर आज इस शरीर से, मुखारविंद से शब्द निकल रहा है, तो इस शरीर में पोषण है तभी निकल रहा है; शरीर की ऊर्जा एकदम खत्म हो जाए तो क्या एक शब्द भी निकलेगा? तो जिस शरीर के द्वारा आप ले रहे हो, उस शरीर को क्या दिया? पहले तो यह कहना चाहिए कि योगी जी के द्वारा मुझे बहुत लाभ हुआ, और मेरी ताकत यह है — धन से, तन से, समझ से; मेरी इनकम यह है, सेविंग यह है, इतने में से आपकी जितनी जरूरत हो ले लो। क्योंकि मेरे पास यह ताकत थी तो भी मैं दुखी थी, आज खुश हुई तो उनकी ताकत से; तो मेरी ताकत उनके काम आ जाए — ये होना चाहिए। लाई-चुपड़ी मीठी-मीठी बातों से कुछ होने वाला नहीं है। देने में जितना लेट करोगे, उतना ज्यादा भरना पड़ेगा, और ऊपर से दंड अलग लगेगा कि समय पर दिया क्यों नहीं। इसलिए उपयोग करते ही पूछ लो — भैया, मैं क्या करूं?
ये भी हो सकता है कि वो पहली बार ही कर रहा हो, वो महान हो, इसलिए तुम्हारे ऊपर कर रहा हो। मैं अपने आप को ये क्यों सोच रहा हूं कि मैं पहले कर चुका? प्रत्यक्ष में जियो ना — जितना पता है, अनुमान मत लगाओ। अगर मैं किसी को यूज कर रहा हूं, तो मैं बोल दूं कि भैया मैं तुझे यूज कर रहा हूं, और मैं देख रहा हूं तुझे ये कमी है; मेरे पास 100 तो नहीं, लेकिन ₹1 है — तू 99 की व्यवस्था करना, और एक कम पड़ जाए तो मैं हूं, या एक पहले ले ले। हो सकता है मेरे जैसे 99 और खड़े हो जाएं और एक ही कमी पड़ रही हो। तो मैं पहले से बता दूं कि एक मेरे पास है, चिंता ना करना, कभी भी ले सकता है — और मैं तो कहूंगा अभी ले ले। यही तो बंधन है। मुक्ति क्या चिल्लाने से मिल जाएगी? यूज होने से मिलेगी। लेकिन आपने क्या किया? बस यूज किया, और जब यूज होने की बारी आती है तो सोचते हो कितना बचा लूं। आपको तो खुलकर यूज होना चाहिए — यही तो मुक्ति है। यूज करना बंधन है और यूज हो जाना मुक्ति।
ज्यादा महत्व आपने यूज करने को दे दिया। हेल्प तो आप ऐसे ही कर देते हो — रोड से जा रहे थे, कोई गिर गया, उठा दिया; उठाने के लिए थोड़ी गए थे, पर उठाना तो पड़ेगा। तो देखना है कि मैं क्या कर सकता हूं — करना तो जरूरी है, अगला डिमांड करे या ना करे। लेने की ताकत है, इसका मतलब देने की ताकत है, नहीं तो आप ले ही नहीं पाते। सब समेट लें, सबसे बड़ा बनना चाहते हैं, सबसे महान बनना चाहते हैं — महात्मा लोग बन पाए, लेकिन क्यों? वो यूज हो गए; उन्होंने कुछ भी बचाया नहीं। धन से, तन से, समझ से चाहे जितना यूज कर लो; रात को 2 बजे भी आवाज मारो तो बोलेंगे — बोलो। सांसारिक व्यक्ति कहेगा, 2 बजे रात को जगा रहे हो, कल सुबह पूछना। वो कहेगा मुझे यूज कर, क्योंकि यूज होने वाला ही तो महान बनता है। यूज होने में ही तो तुम खत्म होगे, और खत्म होगे तो मूल बचेगा — शेष सत्य। बचाने में तुम्हारे पास कुछ है, तो तुम उसमें ढके हुए हो। इस बकवास में ही, इस कबाड़ के ढेर में बैठकर लगता है मैं कुछ हूं; उस कबाड़ से इतना प्यार हो गया है, जबकि वही दुखों का कारण है, वहीं से बदबू आ रही है। और जब वो छूट रहा है, तो लग रहा है कहीं पगला तो नहीं रहे, मोटी बुद्धि तो नहीं हो गई।
आपने उनके लिए किया — काश जरूरत में करते! और जरूरत तो जल्दी से, बड़ी आसानी से पूरी हो जाती है। आप देखिए, आपकी जान-पहचान में समाज के जितने लोग हैं, जितने लोगों के द्वारा आप अपने आप को उठाना चाहते हो, उतनी मेहनत लगेगी। अगर आप सिर्फ अपने को देखते, तो इतनी मेहनत करने की जरूरत नहीं थी, और वो ताकत कहीं और लग जाती। जितना बड़ा सर्कल बनाओगे, उतना मेंटेनेंस, बल, ताकत लगेगी — उनका हालचाल पूछना होगा। अगर आप जरूरत में जीते और अपनी जरूरत को देखते, तो आपकी वो ऊर्जा आपके लिए लग जाती। जब तक आप किसी के द्वारा अपने आप को खड़ा करोगे, आप भटकते रहोगे; मैं हूं, और ये मुझसे है — पहले मैं, बाद में ये। तो मैं इसके द्वारा अपने आप को खड़ा क्यों करूं? मैं खुद के द्वारा खुद को खड़ा कर लूं।
किसी के द्वारा अगर आप अपनी कामनाएं पूरी करना चाहते हो, और जिसके द्वारा पूरी करना चाहते हो उसकी इच्छा कुछ और है, तो आपको बहुत तकलीफ होने वाली है — इच्छा पूरी होने के बाद भी, नहीं होने के बाद भी। बच्चों से सिर्फ इतनी इच्छा रखनी है कि तुम्हारी जिम्मेदारी मुझे मिली है, और मैं अपनी जिम्मेदारी इस तरीके से पूरी करूंगा कि तुम्हें एक अच्छा जीवन दूंगा; तुम अच्छा जीवन जियो, मैं उसमें तुम्हारा सहयोग करूंगा — कैसे जीना चाहते हो, मुझे बताओ। मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं; मुझे समाज का बहुत अनुभव है, ठोकर लगने से पहले मैं रोक दूंगा। कुछ भी करना, मुझसे बताकर करना, क्योंकि जहां तुम जीने जा रहे हो, मैं वहां जी चुका हूं। अपनी इच्छाएं उस पर ना थोपें; उसकी इच्छा देखें, उसका उचित-अनुचित देखें, क्योंकि अनुभव आपको है, उसको नहीं। उसे दोनों के बारे में बता दो — परिणाम उचित है तो करो, मैं तुम्हारे साथ हूं; उचित नहीं है तो मैं कहूंगा ना करो; करना ही चाहते हो तो करके देख लो, तुम स्वतंत्र हो, लेकिन मैं तुम्हारी बर्बादी में तुम्हारा साथ नहीं दूंगा। इतिहास के पन्ने जब पलटे जाएं, तो मेरा नाम तुम्हारी बर्बादी में नहीं, तुम्हें बचाने वालों में लिखा जाए। आखिर में नाम पुकारा जाएगा और पूरा हिसाब-किताब लिया जाएगा — जैसे क्लास में सबका रोल नंबर पुकारा जाता है और आखिर में परिणाम आता है। इसलिए सचेत होकर जियो, कि जब भी मुझे पुकारा जाए, मैं हमेशा बनाने वालों में खड़ा मिलूं, बिगाड़ने वालों में मेरा नाम ना आए।
एकदम, हमें देखना है कि मैं कहां हूं। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में मैं जहां हूं, वैसा मुझे जीना पड़ेगा, तभी तो वहां की ऊर्जा मुझ पर काम करेगी। अगर हम विपरीत में जिएंगे — जैसे गर्मी में स्वेटर पहनो और ठंड में गर्मी वाला कपड़ा पहनो — तो क्या हाल होगा? आप जहां हो, उसी नियम-संयम में जीना पड़ेगा; हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा कि आप कहां हो, किसके साथ हो, और आपका कितना अधिकार है। क्योंकि आप अपने अधिकार में अगर काम करोगे तो आपका स्तर उठेगा। सामने वाले ने मुझे कितना अधिकार दिया है — मेरी योग्यता के अनुसार ही तो अधिकार देगा। तो जितना अधिकार मिला है, उतना मेरा काम करना है। सामने वाला क्या सोच रहा है, उससे क्या मतलब? मुझे उससे व्यवहार ही नहीं बनाना है; मैं जिसके लिए जहां पर हूं, वो काम करूं। तभी वहां की पूरी ताकत आप पर काम करेगी। संसार में कोई भी वस्तु हो, अगर आप उसे ना रिपेयर करो, ना संभालो, तो धीरे-धीरे उसका नाश हो जाता है; वैसे ही अगर आप अपने आप को बाहर से ना भरो, तो जितना है ऐसे ही खत्म हो जाएगा। और भरते कब हैं? अपनी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए। जब मुझे कोई व्यवस्था जुटानी ही नहीं है, तो किसी से व्यवहार या लेनदेन करने की क्या जरूरत है? मुझे उसकी भूख दिख गई और उसे नहीं दिख रही — इसका मतलब मेरे अंदर उससे ज्यादा मान है। तो साधक को हर क्षण सचेत रहना है कि मैंने कौन सा शब्द किस देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में, क्यों और किस भाव से बोला, और क्या उस शब्द पर मेरा अधिकार है। एक शब्द भी आपको उलझा देगा; एक गांठ भी फंस गई तो आप वहीं रुक गए। गांठ मारने में टाइम नहीं लगता, लेकिन खोलने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। तो भाई, आप नया क्यों पैदा करना चाहते हो, क्यों व्यवहार बनाना चाहते हो? निकलना है तो ये निकलने वालों के लिए है; और जिसे नहीं निकलना, वो चाहे जैसे जिए।
हम कोई ना कोई रस ही लेते हैं — पांच इंद्रियों द्वारा किसी से भी हम रस ले रहे हैं। और मुझे पता है कि इस रस से मुझे तकलीफ हो रही है, तो जितना मैं दूंगा उतनी तकलीफ बढ़ती जाएगी। तो मुझे देना बंद कर दो, वो करना शरीर से बंद कर दो। याद आएगी, घुटन होगी, सताएगा, क्योंकि रस लिया है — बेचैनी होगी, घबराहट होगी, उदासी रहेगी; दुख है, लेकिन खुशियां भी तो दे रहा था, तभी तो ग्रहण किया था। अब आपने देना बंद कर दिया, तो एक समय ऐसा आएगा कि वो अपने आप खत्म हो जाएगा, वो रस की इच्छा भी खत्म हो जाएगी। आप इतना नोट करो कि आप किसी के साथ जिए, किसी कारणवश वो छूटा; छूटने में यादें थीं, लेकिन अब आप कहीं शिफ्ट हो गए तो उसकी याद आती भी है तो कोई दुख नहीं, पीड़ा नहीं, मिलने की इच्छा नहीं। ये कैसे हुआ? क्योंकि आपने अपने आप को कहीं और शिफ्ट कर लिया और वो देना बंद कर दिया। यह दो कंडीशन में हो सकता है — या तो उसने मेरे अनुसार करना बंद कर दिया, या मैंने विवेक जागृत करके बंद किया। चाहे उधर से, चाहे इधर से, मिलना बंद हुआ ना, तो धीरे-धीरे वो खत्म हो गया।
याद तो है ही। जब यहां से छोड़कर वहां जा रहे हो, तो दोनों जगह की याद है और दोनों जगह का परिणाम भी पता है, तभी तो शिफ्ट कर रहे हो। व्यक्ति जब एक जगह से दूसरी जगह जाता है, तो जब समझ लेता है कि यहां से सेफ वहां है, तभी जाता है; छोड़ने से पहले जहां जा रहा है, उसकी जानकारी भी लेता है कि कहीं माइनस में ना जाऊं। जब प्लस में रहेगा तभी जाएगा। तो मुझे सतत याद तो है, नहीं तो मैं यहां से वहां जाता भी नहीं। तो मुझे अपने आप को सेवा में लगाकर रखना है — मेरे पास ताकत है, ऊर्जा है, तो शारीरिक और अपनी समझ से जहां मैं हूं वहां किसी कार्य में लगाए रखना है। अगर कोई सेवा नहीं मिल रही, तो बैठकर बस यही चिंतन करना है कि मैं अपने आप को कैसे छुड़ा लूं। जैसे कोई चौराहे पर बैठ जाए और कहे मैं प्यासा हूं, कोई मुझे पानी पिलाए — तो कुछ देर बाद कोई ना कोई पानी लेकर पहुंच ही जाएगा। कब? जब उसने चिल्लाना शुरू किया।
वो तो आपके भोग का परिणाम है, वो तो आपको झेलना पड़ेगा। ये तब तक काम करेंगी जब तक इधर आपको कुछ नहीं मिलेगा; जैसे-जैसे इधर मिलने लगेगा, उधर की कम होने लगेगी। इधर मिल रहा है, तभी तो रुके हो — ऐसे रुक ही नहीं सकते। मैं अगर कहीं रुका हूं, तो जिसके लिए गया था वो मिल रहा है, तभी तो रुका हूं, नहीं तो रुक ही नहीं पाता। तो मुझे यह देखना चाहिए कि मैं वहीं वापस जा रहा हूं जहां से मैं दुखी था; अगर वापस वहां गया तो वही मिलेगा, वहां का तो फाइनल है। नई दुनिया बसाने की वही सोचेगा जो वहां पूरी तरह जी नहीं पाया — चाहे व्यक्ति विशेष के साथ, चाहे वैभव के साथ; जो मजबूरी में भागा हुआ है, वो फिर बसाना चाहेगा। और अगर कोई व्यक्ति समझकर निकला है, तो उसे भी याद सताएगी, लेकिन वो वापस नहीं जाएगा; बस अपनी स्थिरता बनाकर रखेगा।
आप देखोगे, कभी-कभी उनकी याद आ जाती है जिन्होंने मुझे देखा भी नहीं — मैंने उसे वीडियो, गाने या किताबों के द्वारा जाना है; तो क्या उसने मुझे याद किया? उसका कहीं ना कहीं मुझे कुछ अच्छा लगा, इसलिए वो याद आ जाता है। तो जरूरी नहीं कि वो आपको याद कर रहा है; हां, अगर वो जिंदा है तो हो सकता है वो भी आपको याद कर रहा हो। आखिर मुझे उस स्थान को, उस व्यक्ति को छोड़कर कहीं और जाना क्यों पड़ा? अगर मैंने छोड़ा, तो वहां मुझे कुछ मिला नहीं, तभी तो छोड़ा — तो फिर पीछे जाने की बात ही खत्म हो गई, क्योंकि मैंने समझकर छोड़ा। तो मैं जिसके लिए गया था, वो करूं। अगर मैं पूरी तरह समझकर आगे बढ़ा, तो वापस नहीं जाऊंगा। लेकिन अगर बिना समझे, आवेश में, जज्बात में, किसी और के प्रभाव में निकल गया, तो फिर वापस ही जाना है। तो कुछ भी करने से पहले अपने आप को पूछना पड़ेगा — ये तुझे चाहिए या नहीं, या खाली प्रभाव में आ रहा है? कदम उठाने से पहले तय करना पड़ेगा, क्योंकि पीछे आया तो फिर गिरूंगा — आगे वाला भी चला जाएगा और पीछे वालों को भी परेशान कर दूंगा। अपनी जिंदगी की बागडोर को इतनी समझदारी और सजगता के साथ संभालकर रखना है कि मैं कहीं भी जा रहा हूं, तो किस लिए जा रहा हूं।
अगर आपको नहीं हो रहा, तो आप लौटकर वहीं आओगे जहां आपका केंद्र था। लेकिन अगर आपके अनुसार हो ही रहा है — वो आप ही फील कर पाओगे — तो फिर बहुत आगे बढ़ जाओ, ताकि आपके पीछे जो लोग थे वो भी आपसे प्रभावित हों, समाज भी आपके कर्म से प्रभावित होकर आपकी तरफ बढ़ना शुरू करे। हमें जांचना है कि अगर मैं कहीं गया, तो हो क्यों नहीं रहा, इसका जिम्मेदार कौन — अगर मैं हूं, तो उससे पूछना चाहिए कि किस वजह से नहीं हो पा रहा, क्या आप मेरी योग्यता बढ़ाने में मेरी सहायता करोगे? और अगर उसकी वजह से नहीं हो रहा, तब तो उसे छोड़ देना चाहिए। अगर किसी ने बोर्ड लगाया है, तो वो हां ही बोलने वाला है; हां के बाद हो रहा है कि नहीं, ये मुझे जांचना है। पहले जांचना पड़ेगा कि मैं लेने क्या गया, उसके पास वो है भी कि नहीं, और क्या मैं वही लेने की बात कर रहा हूं — कभी-कभी हम व्यवस्था को लेकर भाग जाते हैं। मेरे पास लोग आए, जिसके लिए आए थे वो हो रहा था, लेकिन गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाए — मैंने कहा एसी तो मैं नहीं दे सकता, क्योंकि एसी के लिए तो मैंने बुलाया ही नहीं। एक शिक्षक और उसका स्टूडेंट आए, बोले सुबह भूख लग जाती है — मैंने कहा ये नियम मैं नहीं तोड़ूंगा, क्योंकि कोई बीमारी नहीं, तुम स्वस्थ हो; इसी नियम में आप समझोगे। तो वो चले गए। कभी-कभी वो मिलता है, फिर भी व्यक्ति छोड़कर चला जाता है, क्योंकि उसे बाहर की व्यवस्था अपने हिसाब से नहीं मिलती — किसी को इज्जत, किसी को कुर्सी नहीं मिलती। देने वाले का अपना स्वभाव है, उसकी मौज है; हो सकता है वो जमीन पर बैठाकर दे — तुम कहो मैं जमीन पर नहीं बैठूंगा, तो इसका मतलब तुम्हें उसकी जरूरत नहीं है। तो मुझे यह देखना है कि अगर मुझे जाना भी पड़ रहा है तो किस वजह से।
हां, एकदम नहीं देना। अगर थोड़ा भी दिया, तो फिर वो हरा हो जाएगा, वो मिटेगा नहीं; किसी भी तरीके से देना ही नहीं। अब पता चला कि बहुत लोग वहां तो छोड़कर आते हैं और यहां नए रिश्ते बना लेते हैं — गुरु भाई, गुरु बहन, गुरु चाचा, गुरु दादा — और उन रिश्तों में जीने लगते हैं; तो वहां तो नहीं दिया, यहीं देने लगे, बस देने का तरीका अलग था। बाहर से किसी भी तरह का कुछ भी मत दो। अगर तुम कुछ भी कर रहे हो, तो देखो कि ये क्यों कर रहे हो — मान है, दिखावा है? हम तो यहां भी खेल लेंगे। बस इतना हो कि मैं जरूरत में कर रहा हूं, मुझे इससे कुछ नहीं चाहिए; सामने आया, मैंने कर दिया, मैंने कोई धारणा ही नहीं बनाई। लेकिन ऐसा भी नहीं कि सामने जरूरत हो तब भी सोचूं कि नहीं करना है। और जिसके लिए आया हूं, वो जरूर करना।
यहां समझना पड़ेगा कि यहां कुछ भी स्थिर नहीं है, मेरे द्वारा कुछ ना कुछ तो हो ही रहा है। बस मुझे यह देखना है कि कोई ऐसा काम तो नहीं हो रहा कि मैं और फंस जाऊं — मेरे द्वारा बेईमानी, कुछ दुरुपयोग तो नहीं हो रहा, मैं किसी को तकलीफ या दबाव तो नहीं दे रही। मुझे यह चेक नहीं करना कि मेरे द्वारा मुक्ति वाला कार्य हो रहा है कि नहीं; मुझे यह चेक करना है कि कहीं मेरे द्वारा गलत तो नहीं हो रहा, क्योंकि बेईमानी में हम माहिर हैं। जब हम ईमानदारी और सत्कर्म अपनाते हैं, तो करते-करते लगता है कुछ हो नहीं रहा, क्योंकि वहां मैं खड़ा नहीं होता, कोई आकर वाहवाही नहीं करता, किसी पर एहसान नहीं जता सकते। मेरे अहंकार को पोषण नहीं मिल रहा — जब से समझने लायक हुए, जब भी किया, लोगों ने वाहवाही की, वो अब नहीं मिल रही। लेकिन हर वक्त, हर क्षण कुछ ना कुछ होता ही रहता है, चाहे शारीरिक, चाहे मानसिक। मुझे बस इतना देखना है कि मेरे द्वारा कोई ऐसा कार्य तो नहीं हो रहा जिससे समाज को नुकसान पहुंचे, और मैं ऐसे लोगों के साथ तो नहीं हूं। क्योंकि संगत में जितना मिलेगा, उसका बंटवारा होता है — जिसकी संगत की है, उसके द्वारा क्या काम हो रहा है, उसका परिणाम मुझे भी मिलेगा। अगर उसके द्वारा समाज-हित का कार्य हो रहा है तो आपका स्तर उठ रहा है, और समाज को तकलीफ वाला कार्य हो रहा है तो उसका भी परिणाम मिलेगा, क्योंकि मैं भी कहीं ना कहीं निमित्त हूं। तो सोते-जागते, उठते-बैठते बस इतना देखना है कि मेरे द्वारा या मैं जिसके साथ हूं उसके द्वारा समाज का नुकसान ना हो, और जब भी कर्म हो तो समाज के हित के लिए करना।
आप चाह रहे हो, तो जब उस लायक हो जाओगे तो दे दिया जाएगा; जरूरी नहीं कि आप चाह रहे हो तो उस लायक हो। एक छोटा बालक बोलता है मुझे बाइक चलानी है, परिवार समझता है वो नहीं चला सकता, फिर भी वो चोरी से चला लेता है और गिरकर हाथ-पैर तोड़ लेता है। जब हम कुछ मांग कर रहे हैं, तो मांग करने से पहले देख लो हम लायक हैं कि नहीं — कि और तेजी से सत्कर्म, और तेजी से काम कर सकते हैं। हम तो डिमांड ही कर रहे हैं कि मिल जाए तो कर देंगे। जितना मिला है, उसको आप किस चाल से, कितनी तेजी से, कितने भाव से करते हो — वही देखकर प्रकृति आगे तेज देगी। अगर करने के बाद पछता रहे हो, थक गए, तो आगे उतना तेज नहीं मिलेगा। आप किसी को काम दो और वो कहे मैं थक गया, तो आप आगे का काम रोक दोगे; और कहे नहीं, थकान कुछ नहीं लगी, बढ़िया से करके आया, तो सोचोगे इसे और आगे का काम दिया जाए। ऐसी ही प्रकृति है — वो देखती है कि कार्य करने के बाद आपका भाव क्या है, आप ऊब तो नहीं रहे, मजबूरी या लाचारी में तो नहीं कर रहे; इस हिसाब से करोगे तो वो छीन लेती है, क्योंकि हर कार्य करने वालों की लाइन है। काम मैंने ही मांगा था कि मुझे और तेजी से यात्रा करनी है, तो इसका मतलब काम बढ़ जाएगा, थकान भी होगी, तकलीफें भी होंगी, शरीर को बहुत कष्ट होगा। अब देखना है कि आप शरीर का कष्ट देखते हो या काम देखते हो। जितना काम मिला है, उसमें भाव क्या है — उसी भाव से आगे आपको दिया जाएगा। ये आपको खुद को जांचना है।
सत्कर्म का मतलब होता है जरूरतमंद की सेवा। जैसे हम एक पेड़ लगा दिए, एक सुरक्षित जगह लगा दिए कि उसका भरण-पोषण उचित तरीके से हो जाएगा — तो जब वो उस लायक हो जाएगा, जरूरतमंद वहां खुद आ जाएंगे। आप कुछ करोगे तो जरूरतमंद उसे लेने आ जाएंगे। आप ये मत देखो कि चिड़िया आई तब दाना डालना है — दाना डाल दो, चिड़िया आ जाएगी। दाना लेकर बैठे रहोगे कि चिड़िया आएगी तब डालूंगी, तो हो सकता है चिड़िया आए भी ना। शक्कर डाल दोगे, चींटियां आ जाएंगी। तो कुछ करो, जरूरतमंद पहुंच जाएंगे। जरूरतमंद सामने मिल गया तो ठीक है, मैं जिस लायक हूं उसके लिए कर दूंगा; और नहीं मिला, तो समाज की जरूरत देखकर कुछ ऐसा कर जाओ कि लोग उसका उपयोग करें — वो नष्ट नहीं होगा, किसी ना किसी रूप में जरूरतमंद उसे ग्रहण करेगा। जैसे पौधा लगाया, अभी कुछ नहीं मिल रहा, देखरेख करनी पड़ेगी, समय देना पड़ेगा; जब उसका उपयोग होने लगेगा तब मिलेगा। तो देखो समाज की क्या जरूरत है, समाज की मांग क्या है, और आपकी स्थिति और योग्यता क्या है — और करते हुए निकल जाओ। यही मुक्ति-मोक्ष का रास्ता है। मेरे पास जितना भी बल है — तन का बल, धन का बल, समझ का बल — उस बल का सदुपयोग जरूरतमंद की सेवा में लगा देना है। करना ही जिंदगी है।
अभी गुरु धारण नहीं हुआ है। क्या आप लोग समझते हो कि गुरु शरीर है? गुरु शरीर नहीं है, गुरु ज्ञान का प्रतीक है। तो क्या आप उस ज्ञान में जीते हो? अगर जीते हो, तो इसका मतलब गुरु आपने धारण किया, तब आपका कल्याण निश्चित। गुरु कोई व्यक्ति विशेष नहीं है; हम किसी गुरु के पास क्यों जाते हैं? ज्ञान के लिए ना। नल से पानी निकालते हैं तो पानी के लिए, नल के लिए थोड़ी जाते हैं; नल तो सिर्फ निमित्त है। तो गुरु के द्वारा जो ज्ञान मिला, अगर उस ज्ञान में पूरी तरह जीते हो तो आपने गुरु धारण कर लिया, और नहीं जीते हो तो अभी नहीं किया। तो गुरु धारण करने लायक तो बन जाओ — प्रयास है, तो कब तक प्रयास करोगे? शरीर का भी तो कुछ निश्चित नहीं है; ऐसा ना हो कि ज्ञान तो समझ में आ गया, लेकिन हम धारण ही नहीं कर पाए। शरीर रूपी गुरु धारण करने से कुछ होने वाला नहीं है, उसका ज्ञान धारण करना पड़ेगा। तो मेरा कहना आपके लिए यही है — कोशिश मत करो, धारण कर लो, जल्दी से जल्दी, क्योंकि अगला क्षण क्या होगा पता नहीं; हम धारण करके शरीर छोड़ें।
एकदम, आपके कर्मों का ही फल है, लेकिन बस इस भाग्य को सौभाग्य में बदलो। मिल तो गया, लेकिन आप उसका सदुपयोग कर लो, क्योंकि वो कह रहा है धारण कर लो। एक भ्रम तो टूटा कि हमने गुरु धारण कर लिया — कुछ तो आपने इसके लिए कर्म किया था कि दरवाजे पर आकर बोला जा रहा है कि गुरु धारण कर ले; गुरु कोई शरीर नहीं, गुरु ज्ञान का प्रतीक है, जब उस ज्ञान में तू जिएगा तो तूने गुरु को धारण कर लिया। कुछ भी हमें मिलता है, हमारे कर्मों से ही मिलता है; लेकिन मैं उसका उपयोग किस तरीके से करता हूं, यह मेरे ऊपर है — उसका उपयोग करके गिर भी सकता हूं, उठ भी सकता हूं। कृष्ण के द्वारा बहुत लोगों का कल्याण हुआ, बहुत लोगों का पतन भी हुआ; कृष्ण का दर्शन अर्जुन ने किया तो दुर्योधन ने भी किया — कृष्ण दुर्योधन के दरवाजे पर समझाने गए। एक ने अपना आत्म-कल्याण कर लिया, दूसरे ने पतन कर लिया। राम के बताए मार्ग पर चलकर बहुत भक्तों का कल्याण हुआ, लेकिन दर्शन तो रावण को भी दिया, रावण के दरवाजे तक गए। तो दर्शन मेरे कर्मों का परिणाम है, लेकिन दर्शन के बाद जिसका मैं दर्शन कर रहा हूं, क्या उसका सदुपयोग कर पा रहा हूं — तब दर्शन का मतलब है। गुरु धारण करने के लिए अनपढ़ या पढ़ा-लिखा होने की जरूरत नहीं; ईमानदारी और सत्कर्म के लिए कौन सी पढ़ाई की जरूरत है? अनपढ़ कहकर पीछा मत छुड़ाओ — प्रत्यक्ष में जीना सीखो; ईमानदारी अपना लो, सत्कर्म अपना लो, अपना आत्मिक कल्याण करो।
पहले तो ये पक्का कर। इच्छा तो बन गई, अब देख कि क्या मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं — नहीं तो इच्छा छोड़ दो, और तब बोलो कि भैया हम इतना कर सकते हैं, इतने में क्या मिलेगा। इच्छा तो हमारी है, इच्छा से क्या होगा? इच्छा के बाद कर्म भी तो है। जितनी तेज यात्रा, उतना खर्च ज्यादा देना पड़ेगा — शरीर की ताकत, धन की ताकत, समझ की ताकत, तीनों लगानी पड़ेगी। अपने को संभावना में मत रखो कि आपकी कृपा होगी तो मैं कर दूं; पहले खुद जांच लो कि मैं कहां क्या बोल रहा हूं, कर सकता हूं कि नहीं। आराम वाली यात्रा भी है, फ्री वाली भी है, पर फ्री वाली में करोड़ों वर्ष लगते हैं। और फ्री में जाकर भी अगर किसी ने शरीर की ताकत एकदम झोंक दी, 24 घंटे उस जगह को दे दिए, एक आवाज लगी और उठ गया, कभी नहीं कहा कि मैं थक गया हूं — चलते-चलते गिर जाए पर कहे कुछ नहीं हुआ, मैं उठ रहा हूं — और कभी पलट के अपने घर की तरफ नहीं देखा, तो मेरा व्यक्तिगत कहना है कि वो इसी जन्म में पार हो जाएगा। 80 साल वाला शरीर से क्या सेवा देगा? वो अपने आप को संभाल ले, वही उसकी साधना है। यहां सब कुछ देने की बात है — तन है तो तन दे दे, धन है तो धन दे दे, समझ है तो समझ भी दे दे; कुछ बचा मत, क्योंकि कुछ बचेगा तो तू वहीं रुक जाएगा, सेटिंग करके जाएगा तो नहीं होगा। तेरे पास ₹1 है तो ₹1 ही तेरा सब कुछ है, उसे कम मत समझना। अगर इसी जन्म में उद्धार चाहते हो तो जितना है सब लेकर सत्कर्म में उतर जाओ — तन, मन और धन, मतलब अपनी समझ समेत — समाज सेवा में, जरूरतमंद की सेवा में, जहां गुरु बोले वहां लगा दो, इसी जन्म में हो जाएगा। तो देख ले तू इस लायक है कि नहीं, इच्छा तो बहुत बड़ी रख ली है। ऐसा ना हो कि हमारी इच्छा हमारी बेवकूफी बन जाए; अगर वादा पूरा नहीं हुआ तो सबसे पहले तेरे अपने ही हसेंगे। इसलिए बहुत सोच-समझकर बोलो — और बोला है तो कर।
वही देखो, एक होने के लिए बलिदान कितना देना पड़ता है। लाखों-करोड़ों में एकाध पहुंचता है — कौन पहुंचता है? जो कुछ भी कर सकता है और पीछे मुड़कर नहीं देखता, यहां तक कि अपने जीवन को भी दांव पर लगा देता है, वह पहुंचता है लक्ष्य तक। कोई एक कदम में वापस आ जाता है, कोई कुछ कदम में, कोई एक दिन, कोई एक-दो साल में; लेकिन जो पूरी तरह लगा रहा, जिसने पीछे देखा ही नहीं, वही पहुंचेगा। इस मार्ग में चलने वालों की गिनती नहीं की जा सकती, लेकिन पहुंचने वाले उंगलियों पर गिने जाते हैं। पहले जितने लोग जुड़े हैं, जितना कुछ जुड़ा है, उसका बलिदान देना है; फिर अपना बलिदान आपको देना पड़ेगा — ऐसी परीक्षा होगी कि ये जीवन तू दांव पर लगाएगा कि नहीं, उस समय तुम्हारी चालाकी काम नहीं करेगी। उसमें पास हो गए तो एक समय आएगा कि आपके पास कुछ नहीं रहेगा, और उसमें भी बड़े ऑप्शन आएंगे — जेब में फूटी कौड़ी नहीं होगी, तब लोग आएंगे कि ले आश्रम, गद्दी खाली है, पकवान लेकर खड़े होंगे कि तू गद्दी स्वीकार कर। हर तरफ घर दिखेगा पर किसी घर में मेरी एंट्री नहीं, सब आराम से सो रहे हैं पर तुम्हारे पास बिस्तर नहीं, जहां सो रहे हो वहां से हटा दिया जाएगा। आखिर में इतनी भयानक स्थिति बनती है कि लगता है इससे अच्छा मरना ठीक था — वो रोता है, चिल्लाता है, गिड़गिड़ाता है, सुनने वाला कोई नहीं; इच्छा भी नहीं रही, ना मार्ग रहा ना लक्ष्य, ना पागल हो पा रहा, ना मौत आ रही। ये स्थिति तब बनती है जब वह जीवन और मृत्यु को पार करता है। मैं उसमें जीकर आपको बता रहा हूं, मैंने उसमें जिया है। और वहां केवल तुम रहोगे और एक गुरु रहेगा। राम सीते-सीते कहकर पेड़-पौधों से पूछ रहे थे और उनके त्रिकालदर्शी गुरु वशिष्ठ सब देख रहे थे पर बता नहीं सकते थे, क्योंकि बता दें तो वो आगे नहीं बढ़ पाएगा, उसकी समझ वहीं रुक जाएगी। गुरु लाचार नहीं है — वो तुम्हें लाचारी से मुक्त करना चाहता है, तुम्हें बैसाखी नहीं देना चाहता; तुम्हें तड़पते हुए देखता है पर कुछ करेगा नहीं, क्योंकि तुम्हें पार कराना चाहता है। गुरु के पास उत्तर है पर नहीं देगा — अब तू उत्तर खोजने लायक बन, इसको मेरे सामने पार कर, तब मैं बेफिक्र हो जाऊं कि तू भवसागर पार कर लेगा। आप कोई साधारण इच्छा नहीं रख रहे कि मुझे परमानंद को उपलब्ध होना है, तो साधारण काम भी नहीं होगा — असाधारण होगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। तो तैयार रहिए, या फिर ये इच्छा छोड़ दो।
दिमाग भी अशांत होता है क्या? दिमाग तो एक मशीन है; दिमाग के पीछे वाला अशांत है, और वो अपने कर्म से अशांत है। जो आप चाह रहे हो वो नहीं मिला, या जो करना चाह रहे हो वो नहीं कर पाए — तो अपनी योग्यता जांचो, सीधी सी बात है। या मेरी योग्यता नहीं है, या सामने वाले की; ऐसी जगह मांग मत करो, अपनी भी और सामने वाले की भी स्थिति-परिस्थिति देखो। अशांति का कारण है योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा। ताला जिस चाबी से बंद होगा उसी से खुलेगा — अशांति आपके कर्म से हुई है, तो ध्यान करने से शांति कैसे मिलेगी? आप गलत ट्रैक पर जा रहे हो, जो ढूंढ रहे हो वो वहां है ही नहीं। विचार कहां से आते हैं? जब आपको कुछ चाहिए — जितनी जानकारियां हैं, जहां राग-द्वेष है, वहीं विचार आते हैं। फोकस वहीं लगता है जो हमें चाहिए; जरूरत में फोकस अपने आप लग जाता है, आपको लगाने की जरूरत नहीं — भूख लगी है तो कहीं और फोकस नहीं लगा सकते, भोजन कर लो फिर लग जाएगा। आप जबरदस्ती कर रहे हो। ध्यान के लिए दो चाहिए — एक जिस पर ध्यान किया जाएगा और एक ध्यान करने वाला; एक में ध्यान नहीं होता। ध्यान ही दुख है, ध्यान ही सुख है — ध्यान वहां गया, आपके तरीके से हुआ तो सुख, नहीं हुआ तो दुख। तो ध्यान लगाने का काम मत करिए, राग-द्वेष से छुड़ाने का काम करिए; जहां-जहां ध्यान जा रहा है, देखिए क्यों जा रहा है। ध्यान आपसे है, आप ध्यान से नहीं, तो ध्यान करने की क्या जरूरत? ध्यान पैदा कहां से हुआ? 'चाहिए' में — जहां इच्छा आई, तुरंत ध्यान वहां गया। चाहिए को छोड़ दो, ध्यान से मुक्त हो गए। जब तक चाहिए, ध्यान जाएगा; अपने तरीके में रहोगे तो राग-द्वेष में लौटेगा, जरूरत में रहोगे तो ना राग ना द्वेष, संतोष में लौटेगा; और चाहिए से मुक्त हो गए तो ध्यान जाएगा ही नहीं। जब आप अपने आप में हो जाओगे तो ध्यान की जरूरत भी नहीं, क्योंकि एक ही है — तब परम ध्यान घटित होगा, उसे कहते हैं एकाकार। ध्यान करना नहीं है, ध्यान से मुक्त होना है, और वो तभी जब चाहिए से मुक्त होगे। तो जरूरत में जीना चालू करो — योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा, मान की इच्छा, बड़ाई की इच्छा, दिखावे की इच्छा का त्याग करो, फिर अशांति ढूंढोगे तो भी नहीं मिलेगी। जब तक योग्यता से ज्यादा चाहिए, अशांति ही रहेगी — मिलेगा तो संभाल नहीं पाओगे, नहीं मिलेगा तो द्वेष होगा। अगर ध्यान कहीं है, तो इसका मतलब मैं बाहर हूं, क्योंकि कुछ चाहिए।
जब तक चाहिए, तब तक चलता रहेगा। दिमाग के पीछे तुम हो; जब तक तुम्हें चाहिए, तब तक चलता रहेगा, बात खत्म। और यह तब तक चलेगा जब तक मान की इच्छा है, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा है, दिखावा है, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा है। ये चार चीजें जब तक आपके जीवन में हैं, तब तक ये चलता रहेगा और तब तक आप अशांत रहोगे। चार छोड़ दो ना — क्यों पकड़े हो, इससे क्या लाभ है? चार के अलावा आपके पास और कुछ है क्या? यही चार आपकी अशांति के कारण हैं।
किस इच्छा से परेशान हो? योग्यता से ज्यादा चाहिए — उसको इच्छा कहते हैं। जरूरत में जियो। आपने कभी कहा कि किसी पशु की इच्छा है? इस पृथ्वी पर और कोई नहीं जी रहा क्या, तुम ही एक हो? जरूरत में जीना इच्छा में नहीं आता, अपेक्षा में नहीं आता। जब आपको योग्यता से ज्यादा चाहिए, वही है इच्छा। उस इच्छा से आप परेशान हो, पीड़ित हो, और अनेक लोगों को भी पीड़ित कर रहे हो। जब तक योग्यता से ज्यादा चाहिए, तब तक जिंदगी में परेशान रहोगे — ये लिख लो। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो, तो तुम्हें दुनिया में कोई परेशान नहीं कर पाएगा; परेशानी ढूंढोगे तो भी नहीं मिलेगी। देखो, मानव के अलावा पृथ्वी पर इतने जीव जी रहे हैं — कोई जबरदस्ती आपके खेत में आकर खा भी जाता है, पर आप कहते हो कि इसकी इच्छा है? इस बात को समझो।
अरे बाबा, उसको अपनाने की जरूरत नहीं है। जिसका नाश होगा, बस उसको छोड़ दो, खत्म बात। जो था, है और रहेगा, उसको अपनाने की क्या जरूरत है? नाशवान वस्तुओं पर ही ध्यान लगाओगे तो उसी में फंसे रहोगे; पृथ्वी पर ऐसा कुछ नहीं जहां ध्यान लगाओ और वो था, है और रहेगा। अगर वहां पहुंच गए तो बात ही खत्म — ध्यान भी खत्म, मिलना ही हो गया। महापुरुषों ने कभी नहीं कहा कि ईश्वर पर ध्यान लगाओ; उन्होंने बस इतना कहा — ईमानदारी और सत्कर्म करते हुए, जरूरतमंद की सेवा करते हुए निकल लो। एक महापुरुष कहता है पहले तेरा, बाद में मेरा; और हम कहते हैं पहले मेरा, बचेगा तो तेरा। इतने में ही ज्ञान-अज्ञान छिपा है — वो तेरा तक पहुंच जाता है और हम मेरा-मेरा में जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं।
अगर किसी के आशीर्वाद से कुछ हो जाता, तो कोई सीधा राजा बनने का आशीर्वाद दे देता — उससे नीचे क्यों बोलना? मान लीजिए कोई आपके पास आया, प्रणाम किया, आपको भूख लगी थी या प्यास, उसने आपकी सेवा की, तो जाते समय आपके अंदर से उसके लिए आशीर्वाद निकलेगा — कितना भी श्राप देना चाहो, नहीं निकलेगा; उसके कर्म की वजह से उसे आशीर्वाद मिला। और कोई बेमतलब धक्का मार दे, आपका कोई दोष नहीं था, तो कितना भी आशीर्वाद दो, श्राप ही निकलेगा। कोई ना किसी को आशीर्वाद दे सकता है, ना श्राप — जैसा आपका कर्म है, वैसा आपको आशीर्वाद या श्राप मिलता है। परोपकार करोगे तो रोम-रोम से आशीर्वाद, सेवा करोगे तो मुंह से आशीर्वाद, किसी को सताओगे तो रोम-रोम से श्राप। आपकी योग्यता के अनुसार मिलता है; मूल आपका कर्म है, और किस भाव से कौन सा कर्म कर रहे हो। कर्म के पहले और कर्म के बाद एक भाव बनता है, भाव से फल का निर्णय होता है, ना कि कर्म से — क्योंकि बुरे कर्म भी हम अच्छा दिखाकर कर देते हैं। घर में मेहमान आए, परिवार के दबाव में सेवा कर रहे हो पर चाहते नहीं कि वो रुके, तो भाव से आप बुरा बांध रहे हो; सीधी बात हां या ना में करनी चाहिए। आजकल सेवा के नाम से लोग मेवा खाने लगे हैं — दूसरों के लिए व्यवस्था मांगकर खुद उपयोग करते हैं, तो इतनों का श्राप एक आदमी कैसे झेलेगा? साधना कर रहे हो और भोजन, रहने की व्यवस्था मिल रही है, तो वह साधना करिए, नहीं तो उसका भी दोष लगेगा। कंपनी में पैसा ले रहे हो तो इतनी ईमानदारी से काम करो कि लगे मैं अपने काम का पैसा ले रहा हूं — मालिक देखे या ना देखे, स्वयं तो देख रहे हो; काम नहीं किया तो बोल दो कि इतना पैसा मुझे नहीं चाहिए। ऐसा करोगे तो भाव की शुद्धि होगी, निर्विकार होने में सहायता मिलेगी। आशीर्वाद या श्राप किसी जीव के द्वारा ही मिलता है, क्योंकि पाप-पुण्य, परोपकार अकेले नहीं हो सकते — कर्म और बंधन भी दो में होते हैं, और जिस रस्सी से गांठ लगी वही खोलने में काम आएगी; तो ज्ञान की तलवार से अपने सारे बंधनों को काटो। जो मेरे साथ हो रहा है उसका जिम्मेदार स्वयं मैं हूं। प्रकृति कई गुना लौटाती है — सेवा और पाप अन्न की तरह हैं, कई गुना मिलते हैं; परोपकार फल के पेड़ की तरह है, कई सालों तक देता है। जरूरतमंद की सेवा करो, पर पूछ लो कि इसका उपयोग क्या करोगे — जो शराब के लिए मांगे उसे मत दो, शक हो तो भोजन लाकर दे दो। यहां पाप-पुण्य का माइनस-प्लस नहीं होता, जो किया उसका परिणाम भोगना ही पड़ेगा; जो बचाने का आश्वासन दे रहे हैं, जिनके सहारे दे रहे हैं, वो खुद भोगकर गए। मजबूत आदमी को धक्का मारा तो तुरंत हिसाब, पर कमजोर को सताया और वो दबाव में बोल नहीं पाया, तो प्रकृति देगी और कई गुना देगी। परोपकार में इच्छा-अपेक्षा नहीं होती — कोई मोल भी दे तो कहते हो, भाई मैं बिकाऊ नहीं हूं।
मान लीजिए आपने एक महीना काम किया और पगार एक महीने बाद मिली, तो आपके ही कर्म की मिली ना? दे रहा है मालिक, लेकिन आपके कर्म से; जिसने कम किया उसे कम मिला। तो ये निर्धारित किसने किया? आपने। अतीत में हमने किया, वर्तमान में मिल रहा है; और वर्तमान में करेंगे तो आगे मिलेगा। देने वाला मालिक दिखता है, पर निर्णय करने वाले तुम ही हो — जितना काम किया उसके हकदार हो, उसे देना ही पड़ेगा, चाहे वो चाहे या ना चाहे; और काम नहीं किया, तो कितना भी रोओ, गिड़गिड़ाओ, पेमेंट नहीं मिलेगा। आपके हाथ में सब कुछ है — जैसा कर्म करते हो, वैसा आपको धन, तन, ज्ञान मिलता है; आता कहीं और से है, पर मिलता आपके कर्म से है। इसलिए मूल कर्म है, कर्म पर ध्यान दो। कर्म के पहले और बाद भाव बनता है, भाव से फल का निर्णय होता है; और किस भाव से कौन सा कर्म कर रहे हो, यह आपको पता है और परम सत्ता को पता है — यह सिद्ध नहीं किया जा सकता। कर्ता भी तुम ही, धर्ता भी तुम ही; जो भी हो रहा है उसका जिम्मेदार एक ही व्यक्ति है — स्वयं तुम। जिस लायक जो है, उसे वो मिल रहा है।
कर्म आप करते हो, देती प्रकृति है। आपने फसल बोई तो जो बोओगे वही आएगा ना — प्रकृति कई गुना देगी, लेकिन बोया किसने? आपने। तो देखोगे तो निर्णय करने वाले तुम ही हो। जिसने जो फसल लगाई, प्रकृति उसे वही देगी, उसके विपरीत नहीं। तभी तो फंसे हो — अगर निर्णय करने वाला कोई और होता तो तुम फंसते कैसे? कर्म करने से पहले निर्णय तो स्वयं ही लेता है कि मुझे यह कर्म करना है या नहीं; बीज जो भी बोया, उसका फल वही आएगा, प्रकृति का काम बस उसे कई गुना करके देना है। जैसे कंपनी में कोई बहुत अच्छा और मेहनत से काम करता है तो उसे पगार से ज्यादा बख्शीश और नाम भी मिलता है — वैसे ही आप मेहनत से कर रहे हो तो और मिल सकता है, और भाव की शुद्धि से कर रहे हो तो और मिलेगा।
अगर ईमानदारी से देते हैं, लेन-देन करते हैं, तो बाधक नहीं। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — ये शरीर की जरूरत है, और इनके देने-लेने में पूरी ईमानदारी है तो बाधा नहीं। इस देन-लेन में अगर छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — एक भी है, तो बाधा है। इनसे विरक्त होकर अगर आप कर रहे हो, तब कोई बाधा नहीं, वो सहायक है। एक तरफ इच्छा बनाकर रख रहे हो और एक तरफ कह रहे हो मैं ठहर रहा हूं, दोनों कैसे होगा? ठहराव समझ से आएगा, जब आप इच्छा का त्याग करोगे।
पहले तो जो भी कर रहे हो जिससे कोई लाभ नहीं, वो बंद करो — मान की इच्छा, नीचा दिखाने की इच्छा, किसी तरह की बेईमानी, दिखावा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा। एक झलक हम पाना चाहते हैं — क्या हम में कुछ ऐसा है कि मैं एक झलक के लायक हूं? अपने आप से पूछोगे तो जवाब मिलेगा नहीं। पाने के लायक बनो ना, कि वो झलक देने के लिए मजबूर हो जाए। क्यों नहीं होगा? यही मानव तन तो परमात्मा से मिलने का शरीर है। लेकिन उसके लिए जो व्यर्थ का काम कर रहे हो, वो छोड़ना पड़ेगा; वो छोड़ दो, फिर वो होने लगेगा। वो करना नहीं है, वो होगा।
बहुत लोगों के साथ ऐसा हो रहा है। एक शिक्षिका मिली थीं, उन्होंने ध्यान का प्रयोग किया, फिर बोलीं बहुत गड़गड़ाहट की आवाज आती है। पहले उससे खुशी मिलती है कि कुछ नया है, लेकिन बाद में आदमी को बहुत घुटन होने लगती है, नींद नहीं आती, व्याकुल-बेचैन होकर बैठता-उठता है। आप ऐसी विधियों का प्रयोग क्यों कर रहे हो? इतिहास में किसी का नाम है जो ध्यान के द्वारा पहुंचा हो, या किसी ने ध्यान करवाकर किसी को पहुंचाया हो? अब जो चीज मिली है, उसे बस दृष्टा भाव से देखो — उसका आप कुछ नहीं कर सकते, वो जो करना चाहे करे; उस पर ध्यान मत दो, धीरे-धीरे उसे भूल जाओ। जितनी भी व्यर्थ की चीजें हैं, वो पहले करना बंद करो; ये स्वाभाविक होता है, इसके लिए कुछ करना नहीं है। उपलब्धि उन्हीं को हुई है जो सब करते-करते आखिर में थक गए — एक दिन में नहीं, कई सालों में — और उनके पास करने के लिए कुछ नहीं बचा; अर्जुन भी आखिर में 'मुझे कुछ नहीं चाहिए' पर आ गए। कुछ करके जो मिलेगा, वो अस्थाई होगा, क्योंकि जिस साधन से कर रहे हो वही अस्थाई है।
बस उतना करिए जितना बोला गया है, और क्यों नहीं हो रहा, ये सवाल अपने आप से पूछिए — मैं जब इतना कर रहा हूं तो मेरी उपलब्धि क्यों नहीं हो पा रही? मैं कुछ और तो नहीं मांग रहा? कहां त्रुटि होती है, कहां रुकावट है? ये आपको अपने आप से पूछना है। परिवर्तन की प्रक्रिया यही है — पहले छोड़ो; और अगर अपने आप से ये भी नहीं छोड़ पाए, तो आगे का तो छोड़िए, पहले ये करो।
दोनों को देखो — दोनों में तुम हो। दोनों को दृष्टा भाव से देखो और दोनों से सुख-दुख का त्याग करो; ना ये चाहिए, ना वो चाहिए। एक अच्छे का अनुभव है, एक बुरे का; दोनों अनुभव अलग हैं, इसलिए दोनों मुझसे अलग हैं, और मैं दोनों से परे हूं। दोनों को महसूस करने वाले को पकड़ो — जो कह रहा है कुछ है और जो कह रहा है कुछ नहीं, जो कह रहा है हो जाएगा और जो कह रहा है नहीं होगा — उस निर्णयकर्ता को पकड़ो: ये निर्णय कौन कर रहा है, किसको लग रहा है ये ठीक है और ये ठीक नहीं? जो पहले से मौजूद है, वो होने और ना होने से परे है। होगा तो भी भ्रम है, नहीं होगा तो भी भ्रम है। सामने का दृश्य ना सच है ना झूठ — ये पेड़ पहले नहीं थे और आने वाले समय में नहीं रहेंगे; परिवर्तनशील 'है' बदलता है तो तकलीफ होती है, क्योंकि जिसमें वो सुख ले रहा है उसमें परिवर्तन वो बर्दाश्त नहीं कर पाता। उसने अपने आप को अस्थाई में फंसा लिया है और उसे स्थाई करना चाहता है — यही उसकी अपूर्णता है। उसे पता है, तभी तो भटक रहा है; मंदबुद्धि या पागल कभी नहीं कहता मैं भटक रहा हूं। अगर पता चल गया कि मैं भटक रहा हूं, तो इसका मतलब आप अपने आप को भटकने से मुक्त करा सकते हो। भटकने में बहुत समय लगा है, छुड़ाने में भी समय लगेगा; किसी के कह देने से मत करो, करने से पहले उसका परिणाम पता लगाकर करो — ये प्रत्यक्ष ज्ञान है, अगर मैं भी कह दूं कि ये सब गलत है तो आप मान नहीं सकते, क्योंकि समझकर यात्रा करनी है।
गुरु शब्द है, वो आपको मिलता जाएगा — जैसे-जैसे आपकी योग्यता बढ़ेगी, वैसे-वैसे गुरु मिलता जाएगा। आप कहीं जाते हो, रास्ता भूल जाते हो, तो कोई बताने वाला मिल जाता है, वो कुछ दूर तक बताता है, आगे फिर कोई मिल जाता है; और अगर आप आगे जाओ ही ना तो आगे वाला नहीं मिलेगा। फिक्स करके यात्रा मत करिए कि मुझे कौन सा शरीर आकर बताएगा — जितनी दूर दिखाई दे रहा है उतनी दूर जाओ, आगे मिल जाएगा। व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो, क्योंकि उस पिंड का नाश हो जाएगा; ज्यादातर लोग इसी में भटक रहे हैं। गुरु एक ही है — पूरी पृथ्वी में पानी आ रहा है, निमित्त नल अनेक हैं, पर पानी एक ही जगह से आता है; गुरु ज्ञान का प्रतीक है। पूछते जाओ, आगे बढ़ते जाओ, और तब तक पूछो जब तक समझ ना आए — किसी ने दूसरी भाषा में रास्ता बताया और आपने हां में हां कर दी, तो जाओगे कहां? ईमानदारी से कहना कि मुझे समझ नहीं आया, प्रकृति आपकी भाषा में बताने वाला मिलाएगी। अर्जुन कृष्ण के परम भक्त थे, फिर भी युद्ध के मैदान में बोले मैं युद्ध नहीं करूंगा, मुझे मेरे लोग दिख रहे हैं — जब तक ज्ञान नहीं हुआ, उन्होंने बात नहीं मानी; यही ईमानदारी उन्हें ज्ञान करवाती है, इसीलिए ज्ञान अर्जुन को हुआ, सबको नहीं। हम ब्रांडेड ढूंढते हैं, आवरण देखते हैं — पर देखना पात्र के अंदर क्या है, वो है। वेदांत का आखिरी शब्द है आवरण से अपने आप को मुक्त करा लेना, और हम आवरण वाले को पकड़कर एक और परत चढ़ा लेते हैं। भीड़ देखकर मत जाओ, समझ-समझ के आगे बढ़ो।
बिना इच्छा-अपेक्षा के सत्कर्म करो, जरूरतमंदों की सेवा करो। कर्म के द्वारा हमारे अंदर विकार जमा हुए हैं — जब कर्म में बेईमानी की तो विकार आए; अभी हमने छोड़ा, लेकिन विकार तो जमा हैं, और कर्म में ईमानदारी अपनाएंगे तब वो हटेंगे। समय निकालकर उन जीवों को भोजन दो जहां आपका अहंकार काम ना करे, जैसे चींटियों को; और उन असहाय लोगों को जिनको जरूरत हो, जहां आपका मान ना खड़ा हो, जो आपको बाहर से कुछ ना दे पाएं पर अंदर से आशीर्वाद दें। ऐसे लोगों की सेवा करोगे तब आंसू आएंगे, और उनसे आपके विकार धुलेंगे — विकारों की धुलाई तभी होगी जब आपके द्वारा सत्कर्म होगा। वहां बिना मतलब का मतलब ना हो, और जहां जरूरत नहीं है वहां मत दो — देखो कि सामने वाला उसका सदुपयोग करेगा, तब दो। और धीरे-धीरे, आराम-आराम से समझकर आगे बढ़िए; आवेश में, जज्बात में आकर कुछ मत करिए।
अर्जुन ने कभी ध्यान किया? आपने देखा, ज्ञान देते-देते, प्रश्न करते-करते हो गया — उन्होंने कुछ किया ही नहीं। अर्जुन पूछते गए, वो बताते गए; अर्जुन समझते गए, और समझते-समझते आगे पूछते गए, पूछते-पूछते कुछ बचा ही नहीं, उपलब्धि हो गई। कृष्ण ने कोई विधि नहीं बताई कि जाकर ये करके आओ — सारी विधियों से मुक्त होना ही ज्ञान है। इसीलिए मैं कहता हूं, अध्यात्म समझ का मार्ग है, इसका कोई मार्ग ही नहीं है; करना तब होता जब मुझे बाहर जगत से कुछ चाहिए होता। अब तो चाहिए से मुक्त होना है, तो इसके लिए क्या करना — समझकर छोड़ना; समझोगे तो छूट जाएगा। हम उम्मीदें बनाकर रखते हैं कि आत्मज्ञान होगा तो ऐसा होगा, ब्रह्मज्ञान होगा तो ऐसा होगा — ज्यादा की उम्मीद में इधर छोड़ते जा रहे हैं, उधर आगे बढ़ते जा रहे हैं, ना इसका उपयोग कर पा रहे, ना आगे कुछ मिल रहा। कुछ होना है, कुछ करना है, कुछ पाना है, कुछ बनना है — अरे, कुछ नहीं, मैं आप हूं; पहले भी कुछ नहीं था, आखिर में भी कुछ नहीं, तो सीधा 'कुछ नहीं' में आ जाओ।
गुरु तो शब्द है ना। शब्दों को लेकर आगे बढ़ो; आखिर में गुरु भी छूट जाएगा, बचोगे आप — पानी ने प्यास बुझाई, पानी अपनी जगह चला जाएगा, प्यास बुझ गई। जो चाहिए उसके लिए काम करो, ऐसे लोग आपको मिलते जाएंगे। और एक बात पक्की कर लो — सत्कर्म करो, दया करो, ईमानदारी अपनाओ।
अलग तरीके से बैठो, कुर्सी पर बैठ जाओ। ये अनुभव, क्रिया — ये सब छोड़ना है, इन पर कुछ ध्यान नहीं देना है; जो हो रहा है, होने दो, होने दो। सत्कर्म करो, अपने आप को सेवा में लगा दो। बंधन कहां से हुआ है? कर्मों से; तो कर्मों से ही छुटकारा पा सकते हो। जो कर सकते हो वो करो — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन है। बेईमानी करके हम फंसे हैं, ईमानदारी करके मुक्त हो सकते हैं — यही आखिरी, सबसे मूल बात है।
भाव में ईश्वर का वास है। प्रह्लाद से पूछा गया — तेरा भगवान कहां है? बोले, सर्वव्यापी है; खंभे में? बोले, खंभे में — तो खंभे से निकलना पड़ा। तो भाव से कहीं भी लगा दो। अगर आप किसी प्रतिमा को मानते हो, तो प्रतिमा के सामने लगा दो — लेकिन प्रतिमा के पीछे कोई और है। अभी वो प्रत्यक्ष आपके सामने नहीं है, तो प्रतिमा के द्वारा लगा सकते हैं; वो आपके ऊपर है।
2011 में ऐसा लगा कि इस संसार में, चाहे मैं हूं चाहे कोई भी, अपने मतलब से लेन-देन में लोग प्यार जता रहे हैं, पर प्रेम है नहीं — कुछ पाने में प्रेम है, ना मिले तो गया। आखिर सच में प्रेम क्या है? कुछ तो है जो सदैव रहे; ये तो आज नहीं कल छूट जाएगा, शरीर भी छूट जाएगा। तो संन्यासी हुआ — बनना कुछ नहीं था। फिर आश्रम में देखा तो वही; मैंने कहा मुझे ये नहीं चाहिए, कुछ और चाहिए। गुरु से बात की तो उन्होंने कहा, जो तुझे चाहिए वो मैं नहीं दे सकता, जा ढूंढ। मैंने कहा मैं ढूंढ के रहूंगा — फिर 12 ज्योतिर्लिंग, चारों धाम, गंगासागर की यात्रा की, कि प्रभु ये मत कहना मैं तुम्हारे पास आया नहीं था। आखिर में स्थिति पागल जैसी हो गई — बाहर की सारी उम्मीदें खत्म, धन-रुपया, नाम-शोहरत, जमीन-प्रॉपर्टी, आश्रम, गुरु-शिष्य कुछ नहीं बचा, मैंने कभी कुछ बनाया ही नहीं, बस खोज में रहा। जीने का कोई आधार ही नहीं था — कुछ तो चाहिए तभी जी पाओगे — और इतना ज्ञान भी हो गया था कि मर भी नहीं सकता। आखिरी स्थिति बहुत भयानक थी। खोज में लोगों ने कहा जन्म-जन्म लगते हैं, मैंने कहा नहीं, इसी जन्म में करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए — तो आखिर में अपने आप हो गया। पहले भी लोग कहते थे आपके पास ज्ञान है, तो मैं कहता था ये ज्ञान मेरा नहीं, बाहर से सीखा हुआ है, इसके लिए मैं नहीं निकला; कोई मार्ग पूछता तो कहता, अभी मुझे पता नहीं, जब उपलब्धि होगी तब बताऊंगा। 2020 में, नर्मदा तट से मुंबई तक के बीच, प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। मैंने कहा था जिस दिन ज्ञान समझ आया उस दिन मैं लोगों तक जाकर दूंगा, ये नहीं कि लोग मेरे तक आएं — इसीलिए आज गांव-गांव घूमकर उन लोगों तक ज्ञान पहुंचा रहा हूं जो अध्यात्म के बारे में जानते नहीं। जिसके लिए इतना भटका, वो मिल गया तो पता चला अब ये मेरे काम का ही नहीं, लोगों के काम का है; व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक दे रहा हूं, जिसको लेना है ले सकता है।
हां, जब तक आपके पास ऑप्शन हैं — चलो ये करते हुए वो भी कर लेंगे — तब तक नहीं। जब ऐसा हो जाए कि मैं इसके बिना रह ही नहीं सकता, उसके बाद कुछ बचेगा नहीं, तुम बचोगे, और तुम में जो ज्ञान है वो प्रकट हो जाएगा। लेकिन वो तब होगा जब जीवन से सारे ऑप्शन खत्म हो जाएंगे। और जो भी करो, समझकर करो — जब करो तो लगे कि ये मेरे द्वारा हो रहा है, थोपा हुआ नहीं; थोपा हुआ करोगे तो भटकाव हो जाएगा, और फिर ये पीड़ा होगी कि उनके कहने से इतना किया और हुआ कुछ नहीं।
पुराने हो या नए, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क यह पड़ता है कि पुराने हो तो प्रत्यक्ष ज्ञान का कितना उपयोग किया, क्या उसमें जी रहे हो; और उसके बाद, उससे जीवन में बदलाव हुआ तो आपने मेरे काम में क्या सहयोग किया? अगर कोई नया सहयोग कर रहा है तो फिर पुराने का कोई मतलब ही नहीं। पुराने तो बहुत लोगों को मैं छोड़कर आया, जिनके साथ पला-बढ़ा, क्योंकि सब घुमा-फिराकर अपने मतलब के लिए जी रहे थे; मैं सिद्धांतवादी रहा, कर्म के सिद्धांत को माना, जितना बोला उतना किया, तो जिन्हें अपने कहते हैं, खून के रिश्ते, वो मुझसे बहुत दूर हो गए। अपनों का मतलब क्या है? आप उसे क्या सहयोग दे रहे हो, उसे जरूरत क्या है, क्या आपने उसकी देखभाल की, जरूरत पड़ने पर कभी पूछा? जब आप संपन्न होते हो तो अपने ज्यादा आने लगते हैं, और जब आपके पास कुछ नहीं था तब अपने पल्लू झाड़ लेते हैं। अपना वो है जो मेरी जरूरत पर काम आया, समय पर सहयोग किया, मुझे ताकतवर बनाया — सगा वही है। खून के रिश्तों के चक्कर में जो लोग हमसे प्रेम करते हैं, उन्हें हम छोड़ देते हैं। मैं जिसके साथ जीता हूं, पूरी तरह जीता हूं — धन से, तन से, समझ से; नहीं हूं तो बात खत्म। यहां बातों से बात बनने वाली नहीं, काम से बात बनेगी। मुझे झुंड नहीं चाहिए; एक ही साधक हो पर ईमानदार हो, सत्कर्मी हो, प्रत्यक्ष ज्ञान का उपयोग करे और उसके काम में पूरी तरह सहयोग दे — मेरे लिए मायने रखता है आपने किया क्या, वो बताओ।
कोई बात नहीं, सोच आने दो, प्रतिक्रिया मत देना। मानसिक का नहीं — शरीर से प्रतिक्रिया मत दो। अगर मानसिक के पीछे पड़ोगे तो आप बहुत ज्यादा डिस्टर्ब हो जाओगे, अपसेट हो जाओगे; मानसिक छोड़ दो। आप अपने शरीर के द्वारा क्या करते हो, वो मेन है — मानसिक के चक्कर में पड़ो ही मत, अपना काम शुद्धता से करो। पांच इंद्रियों के द्वारा बाहर किसी के साथ वैसा मत करो। और नहीं हो सके तो अपनों की कुटिया में आकर कुछ दिन रहो, समय दो।
किस लिए आ रहे हो, वह बताओ। हमारे पास आकर क्या करोगे? हमारे पास फुर्सत नहीं है कि आपसे बात करूं; मेरे लिए सबसे जरूरी मेरा काम है। दिन-रात मैं काम में लगा हूं और उसका परिणाम आप देख रहे हो। मुझे भीड़ पसंद नहीं है; मुझे वो लोग पसंद हैं जो वक्त पर काम आएं, जरूरत में जिएं, ईमानदारी-सत्कर्म अपनाकर आगे बढ़ें। बातें करने वाले मुझे पसंद नहीं, ना तो मैं करता हूं — काम क्या करते हो, वह बताओ।
श्रम सेवा की जरूरत हो तो आप देखो कि सामने वाले को जरूरत क्या है, क्या चाहिए। कोई गिर गया तो उसे उठाने के लिए तन सेवा चाहिए; कोई हॉस्पिटल में एडमिट है तो उसे पैसा चाहिए। हॉस्पिटल में मिलने वालों की भीड़ रहती है कि हम आपको बहुत चाहते हैं — काश, जितने लोग जाते हैं उतने सहयोग देते।
फोकट में खाना कोई नहीं खिलाता; यहां युवा बहुत अच्छे से काम करते हैं, आपके सामने आकर भीख नहीं मांगते, यहां सब अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं — अपनी क्षमता और योग्यता अनुसार जहां हैं, काम करके खाते हैं। आप जीवन में क्या करते हो, पहले वह देखो। बस सलाह देने से कुछ नहीं होगा — आपने फोकट में कितने लोगों को खिलाया? इस चैनल पर ज्ञान देने की जरूरत नहीं, ज्ञान लेने की जरूरत है; सलाह देने की नहीं, उसमें जीने की जरूरत है।
उसके पहले ही राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त हो जाओ, और अपना कल्याण कर लो। जब शरीर छूटता है तब पता चलता है कि किसके लिए जी रहा था, क्या करना चाह रहा था, किसके लिए दिन-रात मेहनत कर रहा था।
कुछ भेद नहीं है। हाथ और पैर में क्या भेद है? जरूरत पड़ने पर अलग-अलग काम आते हैं, लेकिन देखोगे तो हाड़-मांस, हड्डी, चमड़ा, खून, हवा — सब घुमा-फिराकर वही का वही है। बस अलग-अलग उपयोग होता है।
यही तो बात है, 'कुछ नहीं करना' आप लोग समझ नहीं पाते। कुछ नहीं करना मतलब बेईमानी नहीं करना। जीवन जीने के लिए, जितने लोग आपके पास हैं उनके लिए और अपने लिए, ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग तो अपनाना पड़ेगा ना। कुछ ना करके क्या रहा जा सकता है? करने का भाव, कर्तापन, मेरा का भाव मिटाना है। कुछ ना करना मतलब बहुत कुछ करना — छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड नहीं करना; राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा और कर्ता का भाव नहीं करना। मैं आपको कुछ नहीं करने में आने को कह रहा हूं, तो क्या मैं कुछ नहीं कर रहा? लेकिन इस करने में कोई उम्मीद नहीं, कोई लालच नहीं; बस इतना कि मैं कितना कर दूं कि लोग उसका सदुपयोग कर पाएं, अपने आप को समझ पाएं। अपने विवेक का उपयोग करके देखो कि प्रयास कब करना पड़ा — जब आपने बेईमानी की; यह करना बंद करो।
कुछ समय पहले मैंने भी किया था, लेकिन मैं कभी उसमें लिप्त नहीं हुआ — जरूरत में किया और फिर खत्म हो गया। तो आप देखिए कि आप कर क्यों रहे हो, उसका उपयोग क्यों कर रहे हो। जरूरत है तो करो, नहीं तो छोड़ दो, बात खत्म — और फिर उसका परिणाम भी भोगने के लिए तैयार रहो।
बस, बहुत हो गया। एक बनाया, उस पर 15 लाख का कर्ज है, अभी भरना है; दूसरा बना रहा हूं, उसमें भी कैसे-कैसे करके कर रहा हूं। अब आश्रम नहीं — एक वहां हो गया, एक यहां, जहां आकर साधक साधना करें, इसी को चलाना है। आज मैं यहां हूं, पर अदरपुरा की व्यवस्था भी मुझे ही देखनी पड़ रही है। आश्रम बनाना बड़ी बात नहीं, उसको जिम्मेदारी से चलाना बड़ी बात है — ऐसा ना हो कि नशे का अड्डा बन जाए, या जिस उद्देश्य से बनाया उस पर काम ना हो। मुझे आश्रम का शौक नहीं है, मुझे काम का शौक है।
सिर्फ ईमानदार नहीं — पता चला आप ईमानदार हो लेकिन सत्कर्मी नहीं हो, तो कंजूस ईमानदार का जीवन में कोई मतलब नहीं; ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे। ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा, और सत्संग — ये सबसे जरूरी है। अगर ये करते हो तब आपकी ईमानदारी का जीवन में मतलब है; ईमानदारी करते हो और सत्कर्म नहीं करते, तो ऐसी ईमानदारी का कोई मतलब नहीं। एकदम साफ-सुथरी बात बता रहा हूं।
खुश हूं, खुशियां ही खुशियां हैं। मुझे कोई तकलीफ नहीं है — मैं कह सकता हूं कि मुझे बचपन से भी तकलीफ नहीं है, क्योंकि मैं कर्म के सिद्धांत को समझा। मेरे साथ चाहे जैसा हो, उसके लिए मैंने ही कर्म किया था और ये उसका परिणाम है। मैंने स्वीकार कर लिया है कि जैसा मैंने किया, वैसा मुझे परिणाम मिला, बस बात खत्म — इसलिए मैं हमेशा खुश रहता हूं। ये खुशियां आंतरिक हैं; खुशियों के पीछे मैं हूं और मेरा कर्म है।
देखिए, अदरपुरा में बनाकर चला आया, वहां तो वो लोग संभाल रहे हैं। यह साधकों का है — ये अपनों की कुटिया सत्य के खोजियों की है, मेरी भी नहीं है; जितने लोग यहां नियम में रहेंगे, उनकी अपनों की कुटिया है, वही यहां के मालिक हैं। घर के गार्जियन की प्रॉपर्टी दिखती तो है, पर उसका उपयोग कौन करता है? वो तो बनाते-संभालते चला जाता है; प्रॉपर्टी उपयोग करने वाले की है। मेरा काम सिर्फ बनाना है, बनाते हुए निकल लेना। जैसे प्रत्यक्ष ज्ञान खोजा तो वो मेरे काम का नहीं रहा — जब मुझे जरूरत थी तब मिल नहीं रहा था, और जब मिला तो मेरा उससे कोई काम नहीं; ये सत्य के खोजियों के लिए है।
उचित का मतलब — जरूरतमंद की सेवा, और ईमानदारी के साथ जीवन जियो। जब भी आपके द्वारा कर्म हो, ईमानदारी से हो, अन्यथा ना हो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — यह बहुत जरूरी है।
कोई बात नहीं, मैं हूं, आप भी बनो। आप कम में मत जाओ, माइनस में मत जाओ, प्लस में आओ — आप हो जाओगे तो एक और बढ़ जाएगा। आप अपने आप को या तो माइनस कर सकते हो या प्लस, कम से कम प्लस तो करो। ईमानदार हो जाओ, सत्कर्मी हो जाओ, अपना कल्याण करो, एक संख्या बढ़ाओ।
ऐसा नहीं कि मैं नर्मदा से चला आया — वहां व्यवस्था करके आया हूं। यहां एक संकल्प अपने आप निकला कि यमुना तट पर आश्रम होगा, हरियाणा में होगा — उसको पूरा करने आया हूं।
मैं तो कह रहा हूं ऐसे लोग कायर हैं। अगर कोई कुछ पाने के लिए अपनी जिम्मेदारी छोड़ देता है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है — उसका यूज किया और उसे जरूरत पड़ी तो छोड़कर भाग गया — वैसा आदमी भटकता ही रहता है। तो मैं एक ही बात कहता हूं: जिम्मेदारी को निभाते हुए आगे बढ़िए; जिम्मेदारी छोड़कर कायर मत बनिए, कमजोर मत बनिए, बुजदिल मत बनिए। मुझे तो ऐसे लोगों से घिन आती है, साफ-साफ बताऊं। जितनी जिम्मेदारी आपको मिली है और आपने ली है, उसको पूरा करते हुए आगे बढ़ो — और मैं उसमें खुद जिया हूं: मैंने विवाह नहीं किया था, तो मेरी जिम्मेदारी मां तक थी, और मैंने मां तक जिम्मेदारी निभाई।
नहीं, ऐसा नहीं है। विचार — कोई बात नहीं, सोचते-सोचते एक दिन थक जाओगे। बस शरीर से उसके साथ मत करना, प्रतिक्रिया मत दो, बात खत्म; पांच इंद्रियों का उपयोग बाहर मत करना। (सोचते-सोचते संकल्प बन रहा हो, तब भी) थक जाओगे; समय हो तो अपनों की कुटिया में आ जाओ।
गालियां सुनने वाला कर्म मत करो और उन्हें रोक दो कि गाली मत दो — सीधी सी बात है; बड़े-बूढ़ों का मतलब है संस्कार सिखाएंगे, गाली देंगे? और कहने से भी ना रुकें तो छोड़ दो ऐसे लोगों को, त्याग कर दो — त्याग ही परम सुख है। प्रतिक्रिया मत दो, उनसे बातचीत करना बंद कर दो।
निकलने वाला काम करना पड़ेगा। दुनिया में आने वाला काम किए हो ना, तो निकलने वाला काम भी करना पड़ेगा — ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग। निकलने का मतलब है इस दुख के भवसागर से निकलना — राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से।
कोई बात नहीं, पागल कहें चाहे कुछ भी कहें, क्या फर्क पड़ता है? मैं जो हूं सो हूं, उनके कहने से क्या हो जाएगा? कांच को हीरा और हीरे को कांच कह दोगे तो क्या हो जाएगा? दिखने में घुमा-फिराकर एक जैसे हैं — जिरकन, अमेरिकन डायमंड और ओरिजिनल डायमंड; जिसको हीरे का ज्ञान ही नहीं वो दोनों को कांच बोलेगा, पर जिसको पहचान है वो कांच को कांच कहेगा और हीरे को हीरा। तो आपको पता होना चाहिए आप क्या हो; कौन क्या कहता है, छोड़ो।
सोच ले, कोई बात नहीं। वही तो बात है — क्रिमिनल तब बनोगे जब तुम करोगे। तुम सोचो, लेकिन पांच इंद्रियों का उपयोग मत करो; ऐसा भी नहीं कि किताबें पढ़-पढ़कर सोच रहे हो — पांच इंद्रियों द्वारा भरो मत। सोच आ रही है, आने दो; ये नहीं कि खुद (जानबूझकर) गलत सोचो। आंख, कान, नाक, जीभ-मुंह और त्वचा — इन पांच इंद्रियों का प्रयोग (गलत के लिए) नहीं करना है।
करना ही पड़ेगा ना, सीधी सी बात है। आपको दबाव-संकोच क्यों है? उस दबाव-संकोच में लगता है आपने उनसे उम्मीद बनाकर रखी है कि लोग मुझे अच्छा कहें — मान की उम्मीद है, कोई उम्मीद है, तभी तो आप दबाव-संकोच में कर रहे हो जो करना नहीं चाहतीं। इसका मतलब आपको उनसे कुछ चाहिए।
बहुत अच्छी बात है, समझ में आ ही जाना चाहिए। पूरी तरह ईमानदारी को समझो — चलने, उठने, बोलने, देखने, सुनने, खाने-पीने, हर चीज में ईमानदारी; पूरी तरह ईमानदार बन जाओ, कि आप कह सको, मेरी तो छोड़ो, मेरा रोम-रोम ईमानदार है।