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प्रश्नोत्तर P12-0141 · भाग 12

गुरु जी, मैं कृपा की बात नहीं कर रहा, लेकिन इतने समय से मेरे अंदर बहुत तीव्र इच्छा हो रही है कि अब मैंने और जन्म नहीं लेना — मुझे यह यात्रा बहुत तेज करनी है। इसके लिए क्या करूं?

पहले तो ये पक्का कर। इच्छा तो बन गई, अब देख कि क्या मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं — नहीं तो इच्छा छोड़ दो, और तब बोलो कि भैया हम इतना कर सकते हैं, इतने में क्या मिलेगा। इच्छा तो हमारी है, इच्छा से क्या होगा? इच्छा के बाद कर्म भी तो है। जितनी तेज यात्रा, उतना खर्च ज्यादा देना पड़ेगा — शरीर की ताकत, धन की ताकत, समझ की ताकत, तीनों लगानी पड़ेगी। अपने को संभावना में मत रखो कि आपकी कृपा होगी तो मैं कर दूं; पहले खुद जांच लो कि मैं कहां क्या बोल रहा हूं, कर सकता हूं कि नहीं। आराम वाली यात्रा भी है, फ्री वाली भी है, पर फ्री वाली में करोड़ों वर्ष लगते हैं। और फ्री में जाकर भी अगर किसी ने शरीर की ताकत एकदम झोंक दी, 24 घंटे उस जगह को दे दिए, एक आवाज लगी और उठ गया, कभी नहीं कहा कि मैं थक गया हूं — चलते-चलते गिर जाए पर कहे कुछ नहीं हुआ, मैं उठ रहा हूं — और कभी पलट के अपने घर की तरफ नहीं देखा, तो मेरा व्यक्तिगत कहना है कि वो इसी जन्म में पार हो जाएगा। 80 साल वाला शरीर से क्या सेवा देगा? वो अपने आप को संभाल ले, वही उसकी साधना है। यहां सब कुछ देने की बात है — तन है तो तन दे दे, धन है तो धन दे दे, समझ है तो समझ भी दे दे; कुछ बचा मत, क्योंकि कुछ बचेगा तो तू वहीं रुक जाएगा, सेटिंग करके जाएगा तो नहीं होगा। तेरे पास ₹1 है तो ₹1 ही तेरा सब कुछ है, उसे कम मत समझना। अगर इसी जन्म में उद्धार चाहते हो तो जितना है सब लेकर सत्कर्म में उतर जाओ — तन, मन और धन, मतलब अपनी समझ समेत — समाज सेवा में, जरूरतमंद की सेवा में, जहां गुरु बोले वहां लगा दो, इसी जन्म में हो जाएगा। तो देख ले तू इस लायक है कि नहीं, इच्छा तो बहुत बड़ी रख ली है। ऐसा ना हो कि हमारी इच्छा हमारी बेवकूफी बन जाए; अगर वादा पूरा नहीं हुआ तो सबसे पहले तेरे अपने ही हसेंगे। इसलिए बहुत सोच-समझकर बोलो — और बोला है तो कर।

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वीडियो: लेना चाहते हो देने के लिए क्या है ? #yogi · 2026-08-16