प्रश्नोत्तर P12-0138 · भाग 12
आप कहते हो ईमानदारी और सत्कर्म करो, और सत्कर्म का मतलब है जरूरतमंद की सेवा। हम चाहते हैं कि जल्दी आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, पर हम जरूरतमंद को ढूंढ भी नहीं सकेंगे, पता कैसे करेंगे कि जरूरतमंद है या नहीं, और जबरदस्ती ढूंढूं तो अहंकार भी आ जाएगा। तो यह कैसे संभव है कि प्रकृति मेरे सामने ऐसे मौके दे?
सत्कर्म का मतलब होता है जरूरतमंद की सेवा। जैसे हम एक पेड़ लगा दिए, एक सुरक्षित जगह लगा दिए कि उसका भरण-पोषण उचित तरीके से हो जाएगा — तो जब वो उस लायक हो जाएगा, जरूरतमंद वहां खुद आ जाएंगे। आप कुछ करोगे तो जरूरतमंद उसे लेने आ जाएंगे। आप ये मत देखो कि चिड़िया आई तब दाना डालना है — दाना डाल दो, चिड़िया आ जाएगी। दाना लेकर बैठे रहोगे कि चिड़िया आएगी तब डालूंगी, तो हो सकता है चिड़िया आए भी ना। शक्कर डाल दोगे, चींटियां आ जाएंगी। तो कुछ करो, जरूरतमंद पहुंच जाएंगे। जरूरतमंद सामने मिल गया तो ठीक है, मैं जिस लायक हूं उसके लिए कर दूंगा; और नहीं मिला, तो समाज की जरूरत देखकर कुछ ऐसा कर जाओ कि लोग उसका उपयोग करें — वो नष्ट नहीं होगा, किसी ना किसी रूप में जरूरतमंद उसे ग्रहण करेगा। जैसे पौधा लगाया, अभी कुछ नहीं मिल रहा, देखरेख करनी पड़ेगी, समय देना पड़ेगा; जब उसका उपयोग होने लगेगा तब मिलेगा। तो देखो समाज की क्या जरूरत है, समाज की मांग क्या है, और आपकी स्थिति और योग्यता क्या है — और करते हुए निकल जाओ। यही मुक्ति-मोक्ष का रास्ता है। मेरे पास जितना भी बल है — तन का बल, धन का बल, समझ का बल — उस बल का सदुपयोग जरूरतमंद की सेवा में लगा देना है। करना ही जिंदगी है।
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वीडियो: ऐसा क्या करूं ? #योगी · 2026-09-11