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प्रश्नोत्तर P12-0117 · भाग 12

मैं बहिर्मुखता से रोज अपने को भर रही थी, अहम या दिखावे से अपने को स्थापित करके लगता था कि मैं जिंदा हूं। आज वैसा नहीं लग रहा, कुछ होता हुआ भी नहीं दिखता, पागल जैसा लगता है — तो क्या साधना के मार्ग में यह शुभ लक्षण है? और जब ऐसा डाउट आए तब मुझे क्या देखना चाहिए?

एकदम। आपके द्वारा बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन अब आपको बाहरी तौर से उसका परिणाम नहीं मिल रहा। उस कर्म का परिणाम मिल रहा है, पर उसका उपयोग कोई और कर रहा है, तो लगता है मेरे हाथ में कुछ नहीं आ रहा — कहीं हम पागल तो नहीं हो रहे। लेकिन आपके द्वारा कार्य भी तो हो रहा है; बस उसका परिणाम तुम्हें सीधा बाहरी तौर से नहीं मिल रहा। जितना मिल जाए उतना करना है, करने के बाद इंतजार करना है — इंतजार ही साधना है। इंतजार में भी आलस्य नहीं; इतनी जागरूकता के साथ इंतजार करना है कि कब मेरे पास सेवा आ जाए और मेरे हाथ से ऐसे ही ना निकल जाए। कभी आंसू भी आ जाएं कि आखिर मिल क्यों नहीं रहा, इतने दिन तक मिल रहा था, अब क्यों छीन लिया गया। कुटिया में बहुत लोगों को कहा जाता है कि तुम्हें कुछ नहीं करना, साधना करनी है — तो उन्हें अफसोस होना चाहिए कि क्या मैंने ऐसा कर दिया, क्योंकि कुछ करने से ही तो मेरा स्तर उठता; अब उसकी भरपाई कैसे करूं? भरपाई करोगे तभी वहां जाओगे; सिर्फ काम के थ्रू ही जाओगे। कोई गलती करके पश्चाताप करता है तो आप उसे दोबारा मौका देते हो; पश्चाताप ना करे, अकड़ करे, तो लाइन में बहुत लोग खड़े हैं। कुटिया से अनुभव लो — इतने पौधे लगाए गए, क्या पहले से प्लान किया गया कि पानी कौन देगा? पौधे तो लगने दो, पानी देने वाला आ जाएगा; कहां-कहां से लोग आकर उन पौधों की सेवा करते हैं और कहते हैं ये मेरी साधना है। तुमने मौका मांगा था कि मुझे भी निकालो, तो प्रकृति ने मौका दिया। लेकिन ये मत सोचो कि तुम्हारे पीछे कोई और नहीं — तुम्हें बीच में रखा गया है, तुमसे नीचे भी लोग हैं, ऊपर भी, और तुम्हें हर वक्त देखा जा रहा है। या तो आगे के स्टेप पर चले जाओगे, या फिर बाहर ही निकल जाओगे।

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17