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प्रश्नोत्तर P12-0125 · भाग 12

हमारा निजी अनुभव है कि जब हम किसी जरूरतमंद की हेल्प करते हैं तो अच्छा भी लगता है, पर उस अनुभव को हम पकड़ नहीं पाते; ज्यादातर स्वार्थी भाव में ही रहते हैं। तो इस समेटने वाले, स्वार्थ वाले नेचर का क्या करें? ये कहां से आ गया?

ज्यादा महत्व आपने यूज करने को दे दिया। हेल्प तो आप ऐसे ही कर देते हो — रोड से जा रहे थे, कोई गिर गया, उठा दिया; उठाने के लिए थोड़ी गए थे, पर उठाना तो पड़ेगा। तो देखना है कि मैं क्या कर सकता हूं — करना तो जरूरी है, अगला डिमांड करे या ना करे। लेने की ताकत है, इसका मतलब देने की ताकत है, नहीं तो आप ले ही नहीं पाते। सब समेट लें, सबसे बड़ा बनना चाहते हैं, सबसे महान बनना चाहते हैं — महात्मा लोग बन पाए, लेकिन क्यों? वो यूज हो गए; उन्होंने कुछ भी बचाया नहीं। धन से, तन से, समझ से चाहे जितना यूज कर लो; रात को 2 बजे भी आवाज मारो तो बोलेंगे — बोलो। सांसारिक व्यक्ति कहेगा, 2 बजे रात को जगा रहे हो, कल सुबह पूछना। वो कहेगा मुझे यूज कर, क्योंकि यूज होने वाला ही तो महान बनता है। यूज होने में ही तो तुम खत्म होगे, और खत्म होगे तो मूल बचेगा — शेष सत्य। बचाने में तुम्हारे पास कुछ है, तो तुम उसमें ढके हुए हो। इस बकवास में ही, इस कबाड़ के ढेर में बैठकर लगता है मैं कुछ हूं; उस कबाड़ से इतना प्यार हो गया है, जबकि वही दुखों का कारण है, वहीं से बदबू आ रही है। और जब वो छूट रहा है, तो लग रहा है कहीं पगला तो नहीं रहे, मोटी बुद्धि तो नहीं हो गई।

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17