प्रश्नोत्तर P13-0162 · भाग 13
जिसको ढूंढने निकले हैं, वो कहां मिलेगा, कहां नहीं मिलेगा? उसी की खोज में चल रहे हैं।
ईश्वर-ईश्वर कहते हैं — ईश्वर है क्या, कहां है? वो ईश्वर कहां नहीं है, पहले तो ये पता करना पड़ेगा। ये पता कर लेंगे कि कहां नहीं है, तो जहां है वो मिल जाएगा। पहले ये पता करो कि कहां नहीं है — यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं। जिस दिन आपने फाइनल पता कर लिया कि यहां नहीं, फिर जहां है पता चल जाएगा। और क्यों जरूरत पड़ी उसको ढूंढने की? ढूंढना क्यों पड़ा? क्या ईश्वर चाहिए, कि ईश्वर से कुछ चाहिए? कुछ के लिए ईश्वर चाहिए? और कुछ नहीं चाहिए तो ईश्वर लेके क्या करोगे? और कुछ के लिए ईश्वर चाहिए, तो फिर आप सोचो आपकी स्थिति क्या है। ईश्वर को ढूंढने की जरूरत नहीं है। जहां तक हो सकता है, आप अपने कर्म को ईमानदारी से करिए — जैसा आपको कर्म मिला है। ये देख लीजिए कि कर्म से समाज का हित होना चाहिए, बस बात खत्म। उसी में आपका कल्याण छिपा हुआ है। अगर आपके कर्म के द्वारा लोगों का कल्याण होगा तो आपका भी होगा; लोगों का अगर अहित होगा तो आपका भी अहित होगा। सीधा सिद्धांत है, इस सिद्धांत को समझ लो। आपके द्वारा क्या हो रहा है वो देख लो — उसी से आपका उद्धार होगा, उसी से बंधन होगा। आज जितने भी इस संसार में पूजनीय हैं, वो अपने कर्म से पूजनीय हैं। अगर कर्म हटा दो तो उन्हें कोई नहीं पूछेगा। तो ऐसा कर्म करो कि पूजनीय बन जाओ — पूजनीय मतलब सम्मान के योग्य, और सम्मान के योग्य तभी बनोगे जब समाज हित के लिए कार्य करोगे। और वही कार्य आपको इस भवसागर से निकाल देगा। इतनी सी बात है, सीधी-सीधी बात है।
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वीडियो: बिना सूचना के परिचितों के बीच में...! #yogijikasatsang · 2025-06-25