प्रश्नोत्तर P13-0069 · भाग 13
गुरुदेव, कुटिया में साधना के लिए रह रहे हैं, और बहुत बढ़िया लगने लगा है। लेकिन कुटिया के कार्य में अगर कुछ ऊंच-नीच हो रहा है, तो क्या मैं उसमें सजेशन देने के योग्य हूं या नहीं? क्योंकि बोलने में द्वेष पैदा हो जाता है।
हम तो मानते हैं कि अगर मेरे सामने कुछ बिगड़ रहा है, तो मेरा काम है उसे बचाना; और अगर वह व्यक्ति नहीं मान रहा, तो व्यवस्थापक तक बात पहुंचा देना। आपको द्वेष नहीं हो रहा ना? जिसको हो, वह जाने। अगर आपको लेना-देना है, तो इसका मतलब आप उस तरफ बढ़ रहे हो। मेन बात — पहले आपको अपने आप को सुधारना है; बिना कमी के तो यहां आए नहीं। जैसे पांडवों में अर्जुन के प्रति दुर्योधन का द्वेष था, अर्जुन का नहीं था; अर्जुन अपने अधिकार के लिए लड़ा, द्वेष में नहीं, और उस अधिकार के लिए लड़ने में उसे ज्ञान हुआ — युद्ध के मैदान में ही उसकी समझ विकसित हुई। तो मैं अपना काम करता रहूं; जितना मुझे अधिकार मिला है, उचित तरीके से कार्य करना है — इसलिए कि कार्य बिगड़े ना, सामने वाले को दबाने के लिए नहीं। अगर उसका राग-द्वेष बनेगा, तो वह गिरेगा; मेरा स्तर तो उठ गया। अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, तो राग-द्वेष होगा ही नहीं; राग-द्वेष तो तब होता है, जब अधिकार पार करते हैं। आप आराम से रहकर अपनी साधना करिए, जिस उद्देश्य को लेकर आए हो उस पर पूरा काम करिए — मैं भी 12 साल घूमा हूं, आश्रमों में क्या हो रहा है, सब पता है; यहां उसके लिए सब उपलब्ध है।
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वीडियो: जो रोग मुझ में नहीं जिक्र कैसा ? #योगी · 2026-05-19