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प्रश्नोत्तर P13-0038 · भाग 13

गुरु जी, यह दुख का भवसागर है, दुखदायक है, लेकिन कहीं न कहीं यह अच्छा भी लग रहा है; इसमें रस भी आ रहा है।

जो अच्छा लग रहा है, वही बाद में बुरा लगता है; उसी से तकलीफ है। रस लेने के बाद पीड़ा कितनी? तो रस किसने लिया? अगर सुख था तो दुख क्यों आया — सुख तो बढ़ना चाहिए ना? जो मुझसे दूर था, वो मेरे पास आ रहा था तो मैं सुखी महसूस कर रहा था; जब पूरी तरह पास आ गया, तो उसके बाद फिर दुखी क्यों? क्योंकि मुझे परम सत्ता चाहिए; ये तो शरीर तक थे, यहां का खेल शरीर तक है। हम तो धोखे में फंस गए। जिससे सुख है, उसी से दुख है; अगर सुख नहीं तो दुख नहीं — जिससे सुख लिया है, वही दुख का कारण बनेगा। सुख लेने की इच्छा छोड़ दो, बस एक ही इच्छा रखो कि मैं निकल जाऊं। मैं कुछ भी कर रहा हूं तो निकलने के लिए — उसमें सुख मिल रहा है, दुख मिल रहा है, मुझे मतलब नहीं; हर स्थिति-परिस्थिति में मुझे निकल जाना है। अगर मुझे लग रहा है कि यह करने से मैं निकल जाऊंगा, तो मैं निकल जाऊंगा, कोई रोक नहीं सकता; लेकिन अगर मुझे नहीं लगा, तो फिर कोई निकाल नहीं सकता। बात सिर्फ मेरी है — मुझे समझ में आना चाहिए। जितना गहरा सुख, उतना गहरा दुख। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से मैं परे हूं; मुझे इस रूप-रंग के चक्कर में नहीं पड़ना है, नहीं तो भिन्न-भिन्न रूपों में, भिन्न-भिन्न शरीरों में ऐसे ही भटकता रहूंगा।

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