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प्रश्नोत्तर P13-0067 · भाग 13

(उड़ीसा से आए एक साधक) बाबा जी, हम कौन हैं, यह समझना है; और रोज अपने अस्तित्व की उस स्थिति में हमेशा कंटिन्यू रहना है और गहरे ध्यान में उतरना है। ध्यान क्या है, और किस तरह करना चाहिए?

अपने आप को साधो। उसके लिए व्याकुलता बढ़ाओ कि मैं कैसे अपने आप को समझ सकूं, कैसे अपना आत्मिक कल्याण कर सकूं — इसके लिए पूरी तरह लगना पड़ेगा, और बातों को छोड़ना पड़ेगा। मन एक ही है, दो नहीं; वो एक ही जगह काम करेगा। हमने उसे अनेक पिंडों में, अनेक वस्तुओं में बुरी तरह फंसा दिया है; वहां से अपने आप को निकालो। जब आप एकांत में जाते हो, तब पता चलता है कि मैं कहां-कहां फंसा हूं; इसलिए कहा जाता है भ्रमण करो — किसी वस्तु से दूर होने पर ही पता चलता है कि उसमें कितना मोह, कितनी आसक्ति थी। तो ध्यान में ध्यान करना है। सीधा ध्यान करने में लोग बिंदु पर, प्रतिमा पर, सांस पर ध्यान कर रहे हैं, कोई विधि अपना ले रहे हैं। ध्यान आपको यह करना है कि कैसे मैं अपने आप को छुड़ाऊं — क्योंकि जब छुड़ा लोगे, तो अपने में पहुंच ही गए। पहुंचने के लिए प्रयास नहीं करना है, छुड़ाने के लिए प्रयास करना है। रबड़ एक जगह से बंधा है और आपने खींचा, तो कितने भी वर्ष बाद छोड़ो, वहीं जाएगा; अगर वहां से छुड़ा लेते, तो वह गिर जाता। बंधन मानसिक है, शरीर का नहीं — शरीर लेकर कहीं भाग जाओगे, पर मानसिक का क्या करोगे? ध्यान मुझसे है, मैं ध्यान से नहीं हूं। जब तक मुझे कुछ चाहिए, तब तक मन काम करता रहता है — जैसे मोबाइल-कंप्यूटर में एरो; एक बार में एक ही सिस्टम खोलेगा। तो एक-एक जगह से अपने आप को छुड़ाने में लग जाओ। जबरदस्ती विचारों को रोकना, निर्विचार होने का प्रयास करना — जो कभी हो ही नहीं सकता; मन है भी और नहीं भी है, जो है भी और नहीं भी है, वो रुकेगा कैसे? उसका सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो। रस भरी बातें, रस भरा देखना, सुगंध, स्वाद, स्पर्श हमें बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन यह शरीर का स्वभाव है, क्योंकि शरीर भोग से आया है, योग से नहीं; आप योग की तरफ बढ़ना चाह रहे हो, शरीर भोग की तरफ जा रहा है। जरूरत में भोग — अब आपको देखना है कि मेरे लिए क्या उचित है, क्या अनुचित। अपना-अपना पढ़ो — जैसे स्कूल में जो दूसरे का सब्जेक्ट पढ़ने लगा, वो एग्जाम में फेल हो जाएगा; ज्यादातर हम दूसरों को पढ़ना चाहते हैं कि कौन अच्छा, कौन बुरा। कोई भी मार्ग बता सकता है, चलना आपको ही पड़ेगा। हम ऑप्शन में जिए चले जा रहे हैं — जगह बदल रहे हैं, लेकिन जगह बदलने से स्थिति नहीं बदलती; आवरण बदलने से स्थिति नहीं बदलेगी। अध्यात्म की यात्रा आवरण में नहीं होती, आवरण से मुक्त होने के लिए होती है। भौतिक जगत में सबको हराना है; यहां न जीतना है, न हारना है — अब तो मैं अपने आप को मिटाने आया हूं। जब तक आपके पास अनेक ऑप्शन हैं, तब तक भटकते रहोगे; मिलेगा आप में ही, और वो मिलेगा बस छुड़ाने से। जब बाहर कुछ रहेगा ही नहीं, तो बचेगा कौन? आप। किसी भी मार्ग से जाओ, समर्पण करना पड़ेगा; अहम भाव को गिरा दो — और जब तक तुम कुछ बनना चाहोगे, तब तक यह गिरेगा नहीं। रिश्तों में मत पड़ो, पर मानवता मत खोना — कोई गिर गया तो उठा दो, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, भटके को मार्ग, साधना छोड़कर भी। साधना ऐसी एकांत जगह करो जहां किसी को तकलीफ न हो। धीरे-धीरे फंसाए हैं, तो धीरे-धीरे निकालेंगे, लेकिन निकालने में लग जाओ। अपने बनाए अस्तित्व को मिटाओ — यह मिटेगा पक्का; आप मिटा दो तो मुक्ति से मोक्ष, और प्रकृति मिटाएगी तो वही जन्म-मरण का चक्र। ऐसा न हो कि काल आए और कहे, इतना समय मिला था, ऐसे ही गंवा दिया — तब एक सेकंड भी नहीं मिलेगा।

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वीडियो: ध्यान कैसे करें ? योगी · 2026-07-02