प्रश्नोत्तर P13-0148 · भाग 13
कुछ साल पहले मैंने एक वीडियो में एक प्रयोग देखा था कि हर चीज का उल्टा करो — हंसने वाली बात पर हंसो मत, दर्द वाली घटना में शांत रहो। मैंने ऐसा किया; मेरी मां का हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था तब भी मेरे चेहरे पर भाव नहीं आ रहा था, जबकि मन में आ रहा था। इस प्रयोग से आखिर हुआ क्या — इसका कोई लाभ था या नुकसान?
हां, नुकसान ही होता है, लाभ तो नहीं है। क्योंकि आपने नेचुरल खो दिया। आप अंदर से तो रो भी रहे हो, मुस्कुरा भी रहे हो, लेकिन शरीर ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया। अब वो भड़ास निकल नहीं रही है। तुमने एक रबड़ को किसी ताकत से खींच के रखा है; यहां से छूटेगा तो अपनी जगह ही जाएगा, और एक दिन छूटेगा। तो अंदर से तो क्रिया होती रही, प्रतिक्रिया होती रही; बाहर से आप शरीर के द्वारा निकाल नहीं पाए, तो वो आपकी घुटन का कारण बन गया। अपने दर्द को, दुख को, हंसी को निकाल नहीं पाए, तो अब वो आपको तकलीफ देगा। नेचुरल फीलिंग को आपने रोक दिया; अब वो अंदर ही अंदर हो रहा है, शरीर से निकल नहीं पा रहा है। आंसू तो अंदर से उतना निकल ही चुका है, बस आंखों से नहीं निकल पाया, तो वो सड़ेगा — आपको घुटन देगा। वो घटना थोड़ी ना भुला दोगे; यादों में रहेगी। काश अगर वहीं निकाल देते तो एक सुकून मिलता। जब-जब उस घटना की याद आएगी, तब-तब आपको दुख होगा, घुटन होगी, बेचैनी होगी, क्योंकि निकाल नहीं पाए। तो ये अब मत करना।
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वीडियो: आगे बढ़ने के लिए यह पता करना पड़ेगा #योगी · 2026-08-15