प्रश्नोत्तर P9-0098 · भाग 9
क्या कोई इस धरती पर आपके समान साधना और तप कर सकता है? आपके समान कोई मिला क्या, या आगे मिलेगा?
कर सकते हैं। देखिए, तपस्या हो सकता है कोई करके बैठा हो। हमसे नहीं मिला। वह बाहर नहीं आ रहे हैं। एक-एक से तप कर रहे हैं। अब तप के पीछे भाव क्या है? लोग कुंभ के मेले में चले जाओ, वृंदावन वगैरह में कांटों पर सोए हैं। लेकिन कांटों पर सोए हैं, तो क्या चाहते हैं? नाम सहित पैसा। अगर उन्हें कांटे पर सोकर भक्ति करना होता, तो या तो बीहड़ जंगल में जाते, या किसी कमरे में होते। वह समाज को प्रभावित नहीं करते।
हो सकता है कठोर तप इसलिए, कि मैंने जितनी भी भक्ति की, गुप्त की। यहां तक मेरी बहन भी नहीं देख पाती थी। और जब एक ही रूम था, तो मैं बोलता था, तू आंख बंद कर लेना। अगर तेरी नींद खुल जाए, और मैं भक्ति कर रहा हूं, तो तू आंख बंद कर लेना। मैं नहीं चाहता कि मेरे इष्ट और मेरे बीच में कोई तीसरा आ जाए। यह मैं नहीं चाहता। तो वह नहीं देखती थी। लेकिन बाद में कभी-कभी बताती थी, थोड़ा-थोड़ा आंख खोल के देख ली। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि हमारे और उसके बीच में कोई तीसरा आए। और तीसरा तभी आता है, भक्ति तभी दिखती है, जब नाम सहित पैसा चाहिए। तब वह आदमी तप लोगों को दिखाकर करता है। जैसे धूनी जलाने वाले, कंडा जलाने वाले। अब इनको क्या चाहिए? नाम सहित पैसा। इन्हें आत्मिक कल्याण नहीं करना है, न अपना, न लोगों का। अगर अपना आत्मिक कल्याण करता होता, तो गुप्त रूप से भक्ति करता। भक्ति दिखाता ही नहीं। जितने लोग अपनी भक्ति को दिखा रहे हैं, वह भक्ति है ही नहीं। भक्ति का परिणाम दिखता है।
भक्ति का परिणाम क्या है? जिसके लिए भक्ति कर रहे थे, वह उपलब्धि हो गई। अब आप किसके लिए भक्ति कर रहे थे? नाम, शोहरत, पैसे के लिए, या अपने आत्मिक कल्याण के लिए? जैसे रामकृष्ण परमहंस अपने आत्मिक कल्याण के लिए भक्ति कर रहे थे। तो आखिर में उनका उद्धार हो गया। भक्ति किसी को दिखाते थोड़ी न थे। जिद में दरवाजा बंद करके भाग जाते थे। लोग डांटते थे, कुछ नहीं बोलते थे। कहने का मतलब यह है कि तपस्वी आदमी कभी अपनी तपस्या को दिखाता नहीं। हां, वह क्या करता है? जब उस तपस्या का उसे परिणाम मिलता है, तो वह परिणाम देने में, साधक लोग, जिज्ञासु लोग, जितने लोग बैठे रहते हैं, उन्हें प्रेरणा देता है कि भैया, जब मैं साधना कर रहा था, ऐसी-ऐसी घटनाएं हुईं। तुम डगमगाना मत। तुम विचलित न होना। ऐसी परिस्थितियां बनेंगी, तुम्हें मजबूत बनाने के लिए। अपनी घटनाएं सुनाता है, कि मैं भक्ति में चल रहा था, तो मुझे गाली मिली, बेमतलब का, लोगों ने भोजन नहीं दिया, लोगों ने भगा दिया। वह इसलिए बता रहा है कि तुम्हारे साथ भी होगा। और जब तुम सोचोगे, यार, गुरु जी के साथ भी हुआ है, तो कोई बात नहीं। कोई धक्का मार दे, तो गुरु जी ने कैसे सह लिया, तो मैं भी सह लूंगा। भक्ति करने वाला भक्ति का परिणाम दिखाता है।
बहुत लोग तप कर रहे हैं, आप सोच नहीं सकते। ऐसे-ऐसे तपस्वी तप कर रहे हैं। कोई बाहर परिणाम के बाद आएगा न। अब पता नहीं उनका परिणाम कब मिलेगा। हो सकता है भक्ति करते-करते खत्म हो गए। इस जन्म में उसका परिणाम आए, जन्म-जन्मांतर लग जाता है। कुछ बोला नहीं जा सकता कि परिणाम कब आएगा। जैसे एक बीज कोई लगा दे, तो हो सकता है उसके मरने के बाद वह वृक्ष बने। परिणाम कब आया? जब वह इस दुनिया से चला गया, तब परिणाम आया।
कहने का मतलब यह है, जितने लोग हो, आप इसको नोट कर लेना। अगर आप दिखाकर भक्ति कर रहे हो, तब समझ लो, आपको नाम, शोहरत, पैसा चाहिए। भक्ति यह नहीं है। कभी भी इष्ट और भक्त के बीच में तीसरा, वह बर्दाश्त नहीं कर सकता। और आपने भक्तों की कहानी सुनी भी होगी। वह बंद कमरों में करता है, अकेले करता है।
हरिदास की बात। तानसेन गा रहे थे, तो अकबर बोले, वाह तानसेन, तुम जैसा कोई नहीं। बोले, नहीं, नहीं, नहीं। हम तो गा रहे हैं धन, वैभव, नाम, शोहरत, पैसे के लिए। हम कुछ देख रहे हैं कि इस गाने से कुछ मिलेगा। इनाम के चक्कर में गा रहे हैं, कि कुछ बख्शीश मिलेगी। लेकिन मुझसे भी कोई अच्छा है। बोले, कौन हो सकता है वह? बोले, वह मेरे गुरु हैं। तो उन्होंने कहा, उन्हें बुलाओ दरबार में। बोले, वह दरबार में आकर नहीं गाते। वह दरबार में आकर किसी राजा-रंक के लिए नहीं गाते। वह उसके लिए गाते हैं। वह कब गाते हैं, यह भी नहीं पता है। तब बोले, कैसे सुना जाएगा? बोले, वह जब गाएं, तब सुन सकते हैं। जब गाए, तब सुन सकते हैं। तो फिर वह जाते हैं। बहुत रात तक, दिन तक इंतजार करते हैं। एक दिन वह गाने लगते हैं। फिर उनकी आंखों में छरछर आंसू होते हैं। तो बोलते हैं, वह तो एकदम कुछ कहने लायक ही नहीं बचते। जहां शब्द ही खत्म हो गए। बहबाई भी नहीं किया जा सकता। आरपार हो गए। क्योंकि मैं कुछ बोल भी नहीं सकता। इतनी मेरी क्षमता ही नहीं है। इसलिए कि वह उसके लिए गाते थे।
यह है कि आप भक्तों की कहानी सुने हो। भक्त अगर कोई है, तो भक्त और इष्ट के बीच में तीसरा कोई नहीं होता। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। मैं अपनी बहन को। पहले तो मैं जिस रूम में, कभी-कभी क्या होता था, रूम लोग बदलते रहते थे। तो कभी बेडरूम मिल जाए, वह रूम मिल जाए, तो मैं अंदर हूं, तो वह जा ही नहीं सकते। इसके बाद अगर एक ही रूम रहे, और मैं बाहर भक्ति करूं, तो मैं उसे कहता था, तू एक काम कर, तू सो जा। तू देखना मत। क्योंकि तू देखेगी, तो मैं कर ही नहीं पाऊंगा। मुझे पता चला कि तू देख रही है, तब तो मैं कर ही नहीं पाऊंगा। बातचीत ही नहीं कर सकता। मैं लीन ही नहीं हो पाऊंगा, क्योंकि तू है न। तो यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। मैं कभी अपनी भक्ति किसी को देखने नहीं देता था। तीसरा जान गया, तो फिर भक्ति ही नहीं। तीसरा अगर जान गया। नाम, शोहरत, पैसा। तब तीसरा जाने। तीसरे को दिखा के भक्ति कर रहे हो, तो नाम, शोहरत, पैसा चाहिए। भक्ति का कोई परिणाम नहीं मिलेगा। परिणाम यही, पैसे मिलेंगे। लोग देखेंगे, कांटे पर सो रहे हो, तो फेंक के चले जाएंगे कुछ पैसे।
अभी लोग कुंभ का मेला, यह नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं। बहुत लोग दंडवत, मतलब शरीर से लेट कर जाते हैं। एक बाबा थे। मैं जा रहा था, मंदिर था, चला गया। अब वह मुझे मिले। मेरी उनकी बात होने लगी। जब बात होने लगी, तो बड़े खुश हुए। बोले, आप मेरे साथ रहो न। बोला, न बाबा, हम साथ नहीं रहेंगे। हम तो बस एक रात बिताएंगे, और आगे चले जाएंगे। तो अब उन्होंने कहा कि हमारे आसन को भी कोई नहीं छूता। जब वह लेटते थे न, तो एक आसन रखते थे, फिर लेट कर, फिर उसको आगे, गद्दा जैसा। तो मैं, वह कहते थे, अगर कोई इसको छू दे, तो मैं बोलता था, आप दूसरा आसन लाओ। बात यहां तक तो मुझे अच्छा लगा। फिर मैं बोला, पैसे वैसे। बोले, पैसे भी रखना है, तो दूर से रख सकते हैं। तो क्या मतलब है ऐसी भक्ति का। ऐसी भक्ति का क्या मतलब है। लेते थे, लेकिन दूर से। अरे, तो यार, फिर वह गुड़ खाए, गुलगुले से परहेज।
गुड़ खाए, हम। एक साल मोबाइल नहीं छुआ, लेकिन चलवाते रहे। लोग सोचें, छूते नहीं हैं। लेकिन किसी के द्वारा मैं ही तो छू रहा हूं उसे, अदृश्य रूप से। मैं कह रहा हूं, आप मुझे लाए। हमने कहा, कितना है भाई, इतना मैं तो नहीं लूंगा, फिर इसको दे दो। मतलब मैं ही तो ले रहा हूं रे। लेकिन पैसे बाबा नहीं छूते। पैसा छूते नहीं, तो चल कैसे रहा है? नहीं यार, बाबा तो इतने अच्छे हैं, पैसा नहीं लेते। यहां के पैसे ले आए, तो हम न लें। दो-चार, दस हजार, दो हजार ले लें। जब देखी लाख-दो लाख, बाद में हम कहीं बाहर दे दें। बाहर हम और दस-बीस हजार हैं, तो कहीं ले जा। हम चाहे क्या करेंगे दस-बीस हजार में। जब अमाउंट रहता था कि नहीं, समाज के काम लग जाएगा, तो मैं कहता था, ठीक है। अभी जैसे सामने ही प्रत्यक्ष हुआ। एक-दो लाख के ऊपर आया, तो चलो भैया, दे दो, ट्रस्ट में जाके डलवा दो। डाल दिया। मतलब का संग लग गया। हम कहा, महारानी डाल दे। प्रोफेसर जी गईं। एक जन कितना दे रहे, पच्चीस हजार। कुछ ऐसे बीस, कुछ भी पकड़ ले, तो हम कहें, यार तू एक काम कर, बैंक में लगा।
मेरा कहने का मतलब है, देखो। मैं बड़ा एकदम साफ-सुथरा व्यक्ति हूं जीवन में, यह कहना। वह किसी तरीके से ले रहा है क्या? किसी तरीके से ले रहा है। तो जब तू रे आसन पर क्यों छू ही देता है। तू, बदलाव आता है। तो पैसा भी तो छू के देता। पैसा क्यों ले रहे हो। भक्ति में पैसे की क्या जरूरत है। भोजन, कपड़ा, लोग दे ही रहे हैं। पैसे क्यों ले रहे हो। लेकिन नाम सहित पैसा चाहिए।
भक्ति कभी भी। अभी देखो न, लोग घूम रहे हैं नंगा-पुंगा, कि हम पानी नहीं पीते। अरे भाई, तुम पानी नहीं। एक कमरे में भक्ति करो न। आप एक कमरे में भक्ति करिए। भक्ति का परिणाम दिखाइए। लोगों को ज्ञान दीजिए। तप का परिणाम दिखाइए। तपस्वी व्यक्ति तप करता है, तप का परिणाम लेकर समाज में आता है। तपस्या करके किसी को आकर्षित नहीं करता।
एक बार साधना की बात बताऊं। सही, नौ दिन के पानी भी न रहे। हम नौ दिन पानी न पिए। अब भाई, दो दिन बीता, तीन दिन बीता, चौथे दिन भी लगा कि मर जाएंगे। और बोलता भी नहीं था। तो एक औरत थी। यह मेरे गांव की बात है। एक औरत थी, वह रो रही थी, महाराज, पानी पी लो, पानी पी लो। उसकी आंखों में आंसू। हम कहे, भाई, गांव की बात बता रहा हूं। मंदिर में तपस्या कर रहा था, एकदम घोर तपस्या। तो अब लगा कि यार, मर जाएंगे। पांचवां दिन हुआ। तो हमने कहा कि चलो, मुझे तो नहीं पीना है, लेकिन तुम्हारे आंसू नहीं देख पा रहा हूं। पीना तो मुझे था रे। जान जा रही है। देख, समझना इस बात को। हम बहुत शातिर हैं। पीना तो मुझे था, कि प्राण जा रहा था मेरा। प्राण रहेगा, तब न आगे बढ़ूंगा। और इतना विश्वास नहीं था। प्राण। शुरुआत की बात है, लगभग दो हजार ग्यारह की। तो धीरे-धीरे बढ़ता है न, संकल्प की ताकत। तो अब हम कहे, चल, अच्छा, पीता हूं। लेकिन तेरे कहे पीता हूं। कहीं बा, महाराज। हम लेकिन तेरे कहे न। उन्हें निमित्त बनाए, पिया। हम ऐसे ही चालाकी करते हैं। और ऐसे ही हम शातिर हैं। यह मैं अपनी घटना बता रहा हूं। कोई कहानी नहीं है। समझते हो?
यूं हम साल भर मोबाइल नहीं छुआ। लेकिन क्यों। तो छुवाता रहा। काम तो करता रहा। तो मेरा कहने का मतलब है कि आप इस बात को नोट कर लेना। क्योंकि शुरुआत में भक्ति की थी न। मेरे यहां लाइन लगती थी रविवार को। तो वह पूजा मैं दिखा के करता था। शुरुआत में मैं भी तो तेरे जैसा था रे। थोड़ी न आसमान से टपक गए। मैं भी इस दलदल से, तेरे जैसे से, निकला। तू तो कम फंसा हुआ है। क्योंकि मेरे करने का भाव बहुत ज्यादा था। मेरी इच्छाएं बहुत ज्यादा थीं। तो मैं तो बहुत ज्यादा फंसा था। जितनी इच्छा, जितनी बड़ी प्लानिंग, जितना बड़ा टारगेट, उतना फंसा हुआ व्यक्ति। खाने को ठिकाना नहीं। करोड़ों की बात है। कोई हेल्पर नहीं रखेगा, लेकिन कंपनी चलाना है। तब सामने वाला तो दहल जाता था। क्या बात करता है। तो मैं यही बताना चाहता हूं। ऐसा नहीं कि मैं वहां से नहीं गुजरा हूं। गुजरा हूं, तभी तो बता रहा हूं। कि शुरुआत में मैं भी भक्ति करता था, तो तपस्या बताता था। पानी न पी, पानी इतना दिन न पी।
एक घटना बता रहा हूं। बड़ा मजेदार है। जब मैं पहली बार फ्लाइट से गया। यह दो हजार ग्यारह की बात है। तो टिकट का, मैंने टिकट रखा था कॉपी में। और एक मेरे साथ सेवक था, उसको दे के रखा था। तो हम कहीं देखा, फ्लाइट से जा के आए हैं। अरे, वह टिकट मैं बहुत दिन लोगों को दिखाया। अरे, लोग अपने बैग का स्टीकर नहीं निकालते रे। फ्लाइट में जाने पर एक स्टीकर लगता है। वह लगाते हैं न। तो वह नहीं निकालते, कि लगे। बस ट्रेन में, मैं फ्लाइट से आया हूं। उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। गेट से निकले, निकाल के कचरे के डिब्बे में फेंक दो। लेकिन न, लोगों को कैसे पता चलेगा हम कहां से आए हैं। इसी में तो फंसे हैं। दिखावे में फंसे हैं।
तू सब नहीं बोलती हो। देखा, हमारा झुमका इतना तोले का, नथ इतना तोले का। साड़ी क्यों नहीं पूछते। यह सुनो, बुला-बुला के दिखा। यह देखा, साड़ी ले आए न। कितना। अगर साड़ी दो-चार को रहे, चौदह सौ की हो। अरे, ट्रेन में मिलती है, रगड़ती है, चेन को नहीं छोड़ती, पहन लिए। देखा, सोना पहन के आए। बीस दिन में, एक महीना में, और बीस दिन के अंदर वह भागी है शहर। तो वह लड़के लोग भी बोलते हैं, यार तू तो मालामाल है। जब सोने का सामान हो, तो चल, चौराहे पर ले के। कुल मिला-मिलके नोच न लें। तो जाते की कहे, यार, भाड़ा व्यवस्था कर। हां यार, हम भाड़ा नहीं समझे।
ऐसे हैं। कहीं गांव में, शहर से। देखा, हम। पता हो, मालिक भी अपने घर में जाता है न। तो हमसे पूछ के। हम यहां तक कि अगर टाइम लेट में, तुरंत रोक देते थे, कि आप जा नहीं सकते। क्या है भैया, मेन हेड है, लेकिन है हैंड वॉचमैन। कि हम मालिक को भी रोक दें। जिसका मकान है, फ्लैट के अंदर, बिल्डिंग के अंदर, हम उसको भी रोक देते। इतनी मेरी ताकत है। लेकिन वह ताकत क्या है। यह बात थोड़ी न बताई है, कि हकदार है वह। थोड़ी न बताएंगे। हम तो कॉन्ट्रैक्टर हैं, मेन इंचार्ज हम ही हैं। वह तो जाके बाद पता चलता है न। और ऐसे लोग बेवकूफ बन जाते हैं।
दो बच्चे गए शहर में। हम ऐसे बिल्डिंग देख रहे थे। में जहां भी गए। बिल्डिंग ठोक में। आए, वॉचमैन आया। बोला, क्या कर रहा है रे। बोला, यह गिन रहा था। कितना गिना। गिनने का कुछ है क्या। जितना गिनेगा, उतना रुपया। अच्छा, गिना तो होगा। कितना गिना, बता। नहीं, हम इतना गिने। चल, इतना पैसा निकाल, तभी आगे जाने देंगे। नहीं तो पकड़ लेंगे, और भी बंद हो जाएगा। अच्छा, ले, इतना पैसा। दोनों मिला। आगे गए। कैश का हो। एक कहता, ठगा। कहता है कि मत देख। लेकिन बाद में, अरे, ठगाए का गए। गिने रहे इतना, बताए इतना। समझे, बचा लिया। गिने रहे इतना, और बताए इतना। इतना बचा ही लिया। वह काहे हमें ठगता है। हम उन्हें ठग लिया। ऐसे-ऐसे ही हम भी लूटे जाते हैं। जो ज्यादा लगाता है न बुद्धि, कि नहीं ठग लिया जाऊं। अब देखो के ठगा। लेकिन वह खुश है। हां, कहता है कि देखा, हम बचा लिया। इतना नहीं, पूरा चला जाए। पचास के पचास चला जाए। फिर काम हो गया। तो वह ठगा। हम थोड़ा। ऐसे ही आपको लगता है कि मैंने सामने वाले का यूज किया। आप यूज हो गए। यूज किए नहीं। यही तो होता है।
भक्ति मैं भी कर रहा था शुरुआत में। हम भी कहीं आठ महीना से व्रत है। इतना महीना से व्रत है। हां, और का। हां, क्यों न पूछे तब। वह क्या हो, बताओ इन्हें। तो टिकट पर डेट नहीं देखती थी। फ्लाइट से गया न। डेट तो था ही। जिसको आप दिखाते, कि देखो भैया। गांव में तो इतना समझदार होते, तो कैसे कहते, दिखावा वहां हो। हमारे लेवल के तो डेट से मतलब थोड़ी न। दो साल पहले गए, कुछ महीना पहले गए। बात यह थी कि हम फ्लाइट से घूम के आए हैं। वह देखो, यह प्रमाण है। हम कई महीना पहले गए। वह थोड़ी न। और कोई पूछेगा नहीं। गांव में हम। वह नहीं पूछा, कब गए थे। फ्लाइट के टिकट, बस टिकट दिखा दे। कब गए, उससे मतलब नहीं है। जहाज में बैठ लिया। और नाम देखिए। यह बड़ा चालाक बनता है। नाम बाकी न है। तुरंत नाम देखे। नाम बाकी न। बहुत शातिर है न। तो हम कितने महीने ले घूमे।
हम भी शुरुआत में भक्ति करते, तो ऐसे करते थे। लोगों के सामने, लोगों को आकर्षित। व्रत करता था। इतने महीने से मेरा व्रत है, उपवास है। समझा था। फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि नहीं, यह एक बंधन है। आप इससे और आगे जाओ। तो मेरे अंदर क्या था? एक नाम, सम्मान की इच्छा थी। लेकिन लालच नहीं था। उस भक्ति से कुछ पैसे-वैसे नहीं चाहिए थे। इसलिए मैं आगे बढ़ गया। अगर नाम के साथ पैसे के चक्कर में पड़ जाता। मैं इसलिए दिखाता था कि तपस्या करता हूं, और कुछ सम्मान, थोड़ी इज्जत दें। और पैसा-वैसा न। पैसा तो हम कर्ज ले के। सम्मान का इतना था कि कर्ज लेकर उसको दे दो, कि जा, तेरा भला हो। चाहे तो, हां महाराज, हम बड़ा परेशान हैं। ले ले, कितना चाहे। दिए हैं बहुत। अभी तक कर्ज। जबकि आए थे। सबके सामने करी अठारह लाख जुड़वाए थे। पंद्रह लाख। उस दिन तीन लाख भरा है। पंद्रह लाख बाकी। जब आए थे, कि देखो बाबू, तो अभी भी कर्ज है।
तो कहने का मतलब है कि ठीक है, कोई बात नहीं। अपने आप को सुधारो। चालाकी, कोई बात नहीं। अब तो आई है, क्या करोगे। कोई बात नहीं। पीढ़ियों से मिली है। हमारे कर्म से मिला है। जन्म-जन्म का है। कोई बात नहीं। चालाकी है, शातिरपन है। लेकिन हम उसको छोड़ भी तो सकते हैं रे। हम अच्छे इंसान बन भी तो सकते हैं।
अब देख, मैंने कैसे चालाकी की। चलो, हम तो पानी न पिएं। लेकिन जब तेरे आंसू न आएं। देखो, अब बताओ। और पीना हमको है। अब वह सामने वाला खुश हो गया, कि महाराज, देखो, हमारा बात मान लिया। बात तो हारी थोड़ी न। तुम्हारे सिर्फ निमित्त बना के यूज किया। क्योंकि अगर मैं पानी पीता, तो तुम्हारी सब नजरों में गिर जाता। क्योंकि तहलका मचा के बोले, कि नौ दिन। निराली। दूर-दूर, कई किलोमीटर से लोग मुझसे मिलने आ गए, कि महाराज, नौ दिन का व्रत है। लोग सुन के आने लगे, कि नौ दिन का, कोई निराली है। चलो, चलो, लूट लो। तो यह आकर्षण के लिए। कोई कांटे पर सो जाता है। क्यों। एक हाथ पर ऐसे बांधे। बारह साल। अच्छा, क्या जरूरत है। कोई पूछ देना चाहिए। मैदान में करता, तो कैसे करते होंगे। तो डांटवा ले, दौड़ गए थे। इससे अच्छा एक हाथ को सत्कर्म लगा देता। एक हाथ से किसी सेवा में। क्यों कपड़े पर भार लेकर ढूंढता।
अरे, मैं आपको बताऊं। शुरू में हम कहे, यार, लट-बट बनाएंगे। सोचता था, लट में कुछ होता है। लट। उसी को। भाई, हमारी भी तो बचपना थी रे। पच्चीस-छब्बीस साल की उम्र में निकला था। बचपना ही था। इतना वह ज्ञान नहीं था। छह-सात साल में तो नंगा ही घूमते रहे। आपके बच्चों को दो-तीन साल में मतलब, वह अपने शरीर को समझ जाते हैं। हम तो कई सालों तक मां का दूध पिया। अभी भी मुझे याद है। पांच-छह। हम पढ़ने जाते थे स्कूल, पी के। तो क्या होता था। क्या बता रहा था। यह बातों में। इसके लट। हां, तो हम कहा, यार, लट बढ़ाएंगे, जटा रखेंगे। मुझे लगता था कि उससे कुछ शक्ति आती है। जैसे-जैसे जटा बढ़ेगा। तो हम बढ़ावे लगे। यहां लट हुई, हम बड़े खुश हुए। यार, लट हो रहा है। फिर मैं ऐसे घूमते-घूमते कभी देखूं, तो भिखारियों को भी लट। कहा, यार, लग रहा है धोते नहीं। ऐसे तो भीख मांगते हैं दिन भर।
फिर मैं चला गया तारापीठ। तारा शक्तिपीठ में गया। अरे, वहां देखा। पैसा, भीख मांगते हैं। जटा ही जटा। और मक्खी भिनभिनाती है। गंदगी में रहते हैं। और भैया, उसी दिन से जटा की इच्छा खत्म हुई। हम कहे, इसको निकलवाओ का। सीधा, जटा हटा दिया। जटा बंधा जाता है अपने आप। अरे तू क्या। तू धोना बंद कर। सर को नहीं धोने से। मतलब और क्या। और हम सोचे थे न, कि जो समाधि में लीन होते हैं न, इसीलिए जटा बढ़ जाता है। क्यों, बारह धोता है। इतना कर। बारह से हमारे में जिंदगी चली जाती। यह एक आकर्षण का केंद्र है। आप संप्रदायिक कपड़ा पहन लो। आप लट-जटा बढ़ा लो। तो यह होता है कि इतने पुराने साधु हैं, तपस्वी होंगे। जब इतना लट है, तो इसका मतलब कई सालों से तपस्या कर रहे। इनके पास बहुत कुछ होगा। क्या उनके पास है? दरिद्रता।
क्या है दरिद्रता? जब तक आपको कुछ पाने की इच्छा है, नाम, शोहरत, पैसा, तब तक आप दरिद्र हो। अब तुम्हें एक दरिद्र क्या दे देगा। और जब एक दरिद्र देगा, तो दरिद्रता ही देगा। यह समझना, इस बात को। एक घुटन वाले आदमी से अगर आप कुछ बोलोगे, तो घुटन ही देगा। इसके पास जो रहेगा, वही देगा न। तो मेरा धीरे-धीरे धारणाएं टूटीं, और मैंने एकदम सही मार्ग पकड़ लिया। मैं बोल सकता हूं। मैंने कहा न, कि मान-सम्मान की इच्छा बहुत थी मुझे, कि नाम खूब हो, शोहरत हो। पैसे की इच्छा नहीं थी। पैसा तो मैं अपना लगा देता था। पैसा लगा दूंगा। तभी तो नाम होगा, कि जा, तुझे दिया। तो यह धीरे-धीरे कई घटनाएं होती गईं। कई साधना की। वाम मार्ग की साधना। जा के कामाख्या में तपस्या करना। भूतनाथ श्मशान जाना। यह भूतनाथ श्मशान की कहानी बता रहा हूं।
गए। काली मां का मंदिर है। कामाख्या में, नीचे। हम कहे, चलो यार, श्मशान में साधना करेंगे। अब काली मां का मंदिर का पुजारी गाली दे दिया। मां की। वहां दारू, मां, सब। करी यार बेचैन। लेकिन हम कहा, यार, अगर इससे झगड़ा किया, तो साधना न करे दे। क्योंकि वह रहता है पहले से। नहीं, हमको साधना करना है। इसे गाली का जवाब मत दो। लेकिन गाली, घुटन, कहीं न कहीं दे रही थी।
गए। एक बाबा थे वहां पर। वहां पर सब मुंडी रखी है। कहा, यार, बाबा तो कुछ होंगे। मुंडी। कपाल बोलते हैं। ऐसे ध्वनि में। श्मशान में ऐसे ध्वनि लगी रही। यह कालभैरव का। सब। कई प्रतिमाएं थीं। तो हम कहे, आप, जगह तो बहुत बढ़िया, साधना करे। बाबा, यार भाई, कुछ तो। हम शुरुआत थी। कुछ तो हो, दम होए। खोपड़ी-पड़ी रखा। कुल रखे हैं न। और एक जन से बतवाते रहे। तो कुछ अंग्रेजी में भी बीच में बोले। तो जब वह हटा, तो मैंने कहा, बाबा, जय माता दी। पहले जय माता दी बोल रहे हैं। अब नर्मदे हर बोलिए। तो जय माता दी, बाबा। तो हम आपसे कुछ बात करना चाहते हैं। आप बात कर रहे थे। तो हमने बोला, नहीं, आओ। बोले, हम तो बाहर की भाषा में बात करते हैं। हम कहे, हां, हम यहां रुकना चाहते हैं। हां, रुको, रुको, साधना करो। हम कहे, हां, मुझे साधना करनी है। अब मैं साधना में लग गया। वहीं बैठना, भूमि पर। और ब्रह्मपुत्र नदी है, किनारे ही। वहीं स्नान करना।
रहना। तो एक दिन क्या हुआ। एक आए। अब मैं लेटा था श्मशान में। अंदर आए, श्मशान में, आते थे मांगने पैसे। वहां पर भी। अब वह क्या गया। अब देखो। अब गाली से ही बताऊंगा। घटना बताने में गाली देनी पड़ेगी। और एक को, ए, उठ रे। एक बाबा था। उठा। ए, उठ। अरे, हम कहा, यार, हमारा नंबर है। हम यहीं में आए। अब हम उठ के कुर्सी पर बैठ गए। कि यार, अपने से गाली बर्दाश्त होगा नहीं। तो हमारा नंबर तो मेरा ही आ रही है, इधर ही। अब आए। हम एक कुर्सी पर बैठा रहे। कुर्सी रहा। हम बैठिए, बैठिए। हम इज्जत दिया, डर के नाते। कि गाली देगी बस। क्योंकि हमें साधना करना था। गाली का जवाब देते, तो वहां रह नहीं सकते। क्योंकि उनकी चलती थी। तो हमने कहा, जरा हाथ दिखाइए। देखा। बता दिया। क्या बताई, भैया। तुम बहुत अच्छे हो। तुम सबके लिए करते हो। तुम्हें कोई समझ नहीं पाया। यह तो सबके साथ हो। आप बहुत अच्छे हैं। आप सबके लिए करते हैं। आप कुछ करना चाहते हो जीवन में। आप एकदम भोले-भाले हो। आपको कोई समझ नहीं पा रहा है। आप कुछ भी, सब कुछ पाना चाहते हो। कुछ करना चाहते हो लोगों के लिए। बड़ा खुश हूं, कि वाह, कुछ आता है। हम कहे, गाली से बचिए। कहे, तो बहुत कुछ आता है। हम कहे, हां, मैं ज्योतिष, हस्तरेखा का विशेषज्ञ रहा हूं। गाली से बचा का। बस उसका हाथ देखने का मकसद सिर्फ गाली से बचना था। कि गाली न दे। क्योंकि गाली निकालने में क्या साधना होगी। एक तो गाली निकाल नहीं पा रहा हूं। गेट पर मिली है। अब यह सीधा उठा के बोलेगी, क्या रे, क्या कर रहा है। तो वह गाली निकालने में महीनों लग गया, कि साधना क्या करेंगे। अब यार, गाली से। मुंह। कैश की कोई जरूरत हो, तो बोलना। हम कहे, ठीक है।
फिर बाबा दारू पीते थे वहां। दारू, मांस, सब चलता है। कामाख्या में मंदिर में ही बलि होती है। तो बाबा बोले, तो हम तो डायरेक्ट बात करते हैं। डायरेक्ट। मुंडी वाला। हम कैसे। हम तो अभी साधना में हैं। करते होंगे। श्मशान में रहते हैं, करते होंगे। तब एकरे बाद कुछ दिन ऐसे बीता। तो बाबा कहे, दो सौ रुपये देते, हमसे। दो सौ रुपये देते। हम कहे, बाबा का। डायरेक्ट बात हो। दो सौ हमसे मांगता है। का, डायरेक्ट मंगा ले। लेकिन उनसे न कहा, नहीं। तुरंत भगा। हम तो। हम कहे, बाबा, दो सौ। यार। और वह खाते थे मक्खी, और यह मांस वगैरह, और दारू पीते थे। हम कहे, बाबा, यार, बड़ा असमंजस में फंस गए। कि भाई, पैसा तो दे सकते हैं, लेकिन मांस हमारे पैसे से खावत न चले। हम अपने अंदर सोचत हैं। तो मैंने उनसे कहा कि बाबा, एक बात बताएं। मैं हूं शाकाहारी। शास्त्री। अगर आप मेरे पैसे का, अगर शराब तक पियो, तो ठीक। क्योंकि उसे वही चाहिए। शराब तक पियोगे, ठीक है। लेकिन मांस मत खाना। तब उन्होंने कहा, ठीक है। हमने दे दिया। अब जितना दिन रह के साधना की, अपनी आराम से की। अब वह मर गए।
तो यह सब बातें हैं। साधनाओं में, हमने भ्रमण में बहुत कुछ देखा है।
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