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प्रश्नोत्तर P10-0006 · भाग 10

साधक और जिज्ञासु एक बार में साधना में नहीं बैठते। जब बैठते हैं तो शरीर खुजलाने लगता है, रीढ़ और कमर दुखने लगती है, और कहते हैं कि मैं विचलित हो रहा हूं, घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। जब प्रपंच और रसपान में रहते हैं तब कोई दिक्कत नहीं होती। यह क्या हाल है?

यही हाल है। एक बार में ही बैठ सकता था, लेकिन एक बार में नहीं बैठा। कितनी बार बोलना पड़ा, तब जाकर बैठा। यही हाल जिज्ञासु का है, यही हाल साधक की होती है, कि उसके पीछे पड़ना होता है, तब जाकर वह साधना करता है। साधना में जब साधक और जिज्ञासु बैठता है, तो खजुआ आने लगता है। कभी पीठ खुजलाता है, कभी हाथ, मुंह। लेकिन खुजवाना नहीं चाहिए। जब तक घूम रहा था, खजुली नहीं हो रही थी। जैसे बैठा, खुजाने लगे। ऐसे ही साधक की स्थिति है। जब प्रपंच करता रहे, जब रसपान करता रहे, तब खजुली नहीं होती। और जब साधना में बैठेगा, तो कब से खुजली चल रही है, पता नहीं। गर्दन नहीं मुड़ती। कब से है, बता नहीं सकता। खड़ा हो तो नहीं खजुता। बैठे तो खजू आता है। जब साधना में बैठा है, तो कब रीढ़ की हड्डी पिराए, कब कमर पिराए, कब गर्दन खुजाए। यही हाल मैं दिखाना चाहता हूं। यही हाल साधकों का है, जिज्ञासुओं का है, कि जब साधना में बैठते हैं तो कहते हैं, मैं विचलित हो रहा हूं, मुझे घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। और जब तक रसपान करते रहे, तब तक कोई दिक्कत नहीं रही। मैं आप लोगों से यही कहूंगा, साधना करो, आगे बढ़ो।

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