प्रश्नोत्तर P10-0127 · भाग 10
क्या अपने जीवन को एक कुटिया या आश्रम में नष्ट कर देना समझदारी है? क्या 24 वर्ष की अवस्था में संन्यासी होना चाहिए, या दुनिया को और समझना और जानना चाहिए?
यह अपना-अपना भाव है। मैं अपने जीवन का बताऊं — ना तो मुझे बाबा बनना था, ना साधु, ना संन्यासी। मुझे सिर्फ काम करना था, कि मैं इस समाज में कुछ कर सकूं, अपने आप को उस लायक बनाऊं; और वह मैं कर रहा हूं। संन्यासी का मतलब यह थोड़ी ना कि आश्रम में बैठ जाना; समाज के लिए कुछ करना। अपनों की कुटिया अदलपुरा में मैंने कई सौ पौधे लगाए, जो अब वृक्ष की तरफ बढ़ रहे हैं, और वहां साधक रह के साधना करते हैं — तो पर्यावरण को भी सहयोग दिया। मैं जीवन में ईमानदारी सिखाता हूं, ईमानदारी से जीता हूं, तो देश सेवा भी हुई। एक गृहस्थ दो-चार लोगों के लिए कुछ घंटे काम करता है; जिस संन्यासी ने समाज उद्धार के लिए काम किया, वह 24 घंटे काम करता है। संन्यासी को भगोड़ा मत समझिए। जो खाने को नहीं था, या कुभाव में पत्नी-बच्चों या मां-बाप को छोड़कर भाग गया, वह संन्यासी नहीं, वह भगोड़ा है, कायर है। संन्यासी का मतलब — सामर्थ्यवान होकर घर से निकला, पूरी समझ से; वह दो-चार लोगों में जिंदगी कीड़े-मकोड़े की तरह खत्म नहीं करना चाहता, उसमें वह क्षमता है कि वह विश्व के लिए कुछ कर सके। वह संन्यासी है।
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वीडियो: 23 रात अपनों की कुटिया हरियाणा यमुना तट #योगी · 2026-10-16