प्रश्नोत्तर P10-0004 · भाग 10
एक दर्शन का विद्यार्थी लिखता है कि बिना शब्दों के आप कुछ बोलो तो बिना शब्दों के हम समझ लेंगे। क्या आपमें यह क्षमता होनी चाहिए कि किसी का पेट देखकर पता चल जाए कि वह गर्भवती है या नहीं? लक्षण देखना आना चाहिए क्या? और वह कहता है, मेरे प्रश्न हैं, अभी उत्तर दीजिए।
लक्षण आपको देखना आना चाहिए। तो बिना शब्दों के अगर समझ लो, तो आपको पूछने की जरूरत नहीं। बिना शब्दों के कुछ कहे, आपको देखकर ही समझ में आ जाएगा। तो लक्षण भी तो देखना आना चाहिए। अब लक्षण ही देखना नहीं आएगा तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। तो बिना शब्दों के समझने की आपकी क्षमता भी होनी चाहिए।
वे क्या करते हैं, वे जानें। लेकिन वे कह रहे हैं, फिलॉसफी के स्टूडेंट हैं। देखिए, प्रश्न किसके हैं। प्रश्न आपके नहीं हैं। प्रश्न आपको समाज से मिले हैं। उत्तर आपको समाज से मिलेंगे। वे प्रश्न हट जाएंगे। आपके पास तो आपके अलावा कुछ नहीं है। अगर कुछ है तो किसी और का। चाहे प्रश्न हो, चाहे उत्तर हो। यह क्लियर हो गया।
यह पूछते हैं, गुरु जी मेरे प्रश्न हैं, अभी उत्तर दीजिए। तो जब आप बिना शब्दों के समझना चाहते हो, प्रश्न कर ही क्यों रहे हो। जब आप कह रहे हो कि बिना शब्दों के कुछ कहें, तो बिना शब्दों के हम कुछ कह रहे हैं। अब आप समझ लो। समझने की क्षमता नहीं है। या तो आपकी समझने की क्षमता नहीं है। क्योंकि कुछ न कुछ तो सामने वाले को पढ़ने के लिए उसके पास है ही है। आप कहोगे, नहीं, इनके पास कुछ नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता। यहां के हर कण में कुछ है। क्या आपकी क्षमता है वह समझने की।
आप एक कण उठाओ। आप कह नहीं सकते कि कुछ नहीं है। यह कहिए कि मैं इसे पढ़ नहीं पा रहा हूं। खाली में भी, मैंने कर दिया, तो इसमें भी कुछ है। हवा है न। कुछ तो है न इसमें भी। यहां कुछ खाली है ही नहीं। यह कहिए कि मेरी समझ नहीं काम कर रही है। बस। तो बिना शब्दों के यहां सब कह रहे हैं। पूरी प्रकृति बोल रही है तुमसे। पूरी प्रकृति कुछ कहना चाहती है, और तुम उसे कुछ कहना चाहते हो। शब्द की जरूरत ही नहीं है। अगर तुम्हारी समझने की क्षमता है तो शब्द की जरूरत नहीं है।
अगर आपको भाव समझने की क्षमता है तो आप देखते नहीं। आप किसी के साथ रहते हो। कहते हो, आज क्यों उदास हो। क्या उसने कहा आपसे? आपने उसे पढ़ लिया। और यह बड़ा आसान है। वह कहता है, नहीं, कुछ नहीं हुआ। लेकिन जब आप पीछे पड़ जाते हो तो कहता है, उदासी का कारण यह है। पढ़ लिया कि नहीं पढ़ लिया। क्या उसने आपसे शब्दों में कहा? नहीं कहा। तो आप तभी पढ़ पाओगे जब उसके करीब में जिओगे। क्या आप एक अनजान आदमी को देखकर बोलोगे, उदास हो? क्योंकि आपने उसे कभी हंसते-रोते देखा ही नहीं, तो आप उसे कैसे पढ़ोगे। अब उसको पढ़ने वाला आपसे आगे होगा, वह पढ़ लेगा। शरीर को न देखे, उसे सीधा देखे, वह पढ़ पाएगा कि इसके अंदर क्या चल रहा है।
तो बिना शब्दों के आराम से पढ़ सकते हो। तुम्हें कोई पढ़ रहा है, तुम किसी को पढ़ रहे हो। हर वक्त यही तो हो रहा है। हर वक्त आप पढ़ ही रहे हो। जरूरी नहीं कि आप स्कूल जाओ। जब से समझने लायक हुए, पढ़ ही रहे हो। क्योंकि आपका भाव ही है। आपका प्रश्न ही है, यह क्या है। और जब तक इसका जवाब पूरी तरह नहीं मिलेगा, जब तक इस क्या है से नहीं छूटोगे, तब तक आप पूछते ही रहोगे, क्या है यह। क्या है, मतलब पढ़ना तो चाह रहे हो। यही तो प्रश्न है, इसी का तो उत्तर चाहिए।
भाई, कोई कहता है बाहर क्या है। कोई कहता है आत्मज्ञान क्या है, परमात्मा क्या है। वह बाहर का छोड़ के अंदर का पढ़ना चाहता है। कोई बाहर का पढ़ना चाहता है। लेकिन आप देखेंगे तो हर व्यक्ति हर क्षण पढ़ ही रहा है। और आप तब तक पढ़ोगे जब तक आपको उस परम सत्ता से मिलना न हो जाए। जिस दिन मिलना हो गया, उस दिन खत्म। क्योंकि क्या है, उसी के द्वारा है। और इसका जवाब कौन देगा? वही देगा। क्योंकि जिसके द्वारा जिसका निर्माण हुआ है, वही जवाब देगा। क्योंकि कोई भी जवाब देगा तो एक अनुमान लगाएगा। तो जब तक उससे मिलना नहीं होगा, तब तक यह प्रश्न खत्म भी नहीं होगा। तो यही है भैया। इन्होंने कहा, मेरे प्रश्न का उत्तर अभी दीजिए। अभी उत्तर दीजिए।
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वीडियो: लाइव सत्संग अपनों की कुटिया में प्रश्न और उत्तर #योगी · 2026-07-16