प्रश्नोत्तर P10-0018 · भाग 10
सत्य को बाहर खोजा नहीं जा सकता। जहां शब्द खत्म हो जाता है, वहीं सत्य प्रकट हो जाता है। कैसे वहीं प्रकट होगा? वही का मतलब क्या है? अगर शब्द खत्म होने पर सत्य मिल जाता है, तो गूंगे को भी सत्य मिल जाना चाहिए, क्योंकि वह बोलता ही नहीं। भीतर कैसे?
जहां उम्मीद खत्म हो जाती है, पूरी तरह से जब हम उम्मीद से मुक्त हो जाते हैं, तब जाके हम अपने आप में हो पाते हैं। तब हमें सत्य का बोध होता है। सत्य का ज्ञान होता है।
ऐसे मुंह से बक-बक बोलने से कुछ नहीं होगा। कुछ भी पढ़ के कंठ से बोल दें। मुंह से बक-बक कम करो और साधना करो।
भीतर कहां से? मतलब तुम अलग हो और भीतर अलग है? वह तुम्हीं में से है। उसे भीतर भी नहीं बोला जा सकता। यहीं से हम कहे थे, बक-बक कम बोलो, साधना करो। अपनी स्थिति को प्राप्त करो। जिस स्थिति को तुमने खो दिया है, उसको प्राप्त करना पड़ेगा।
पहले हम बक-बक सुनते रहे, लेकिन अब न सुनें। काहे इतना समय बिताते? पहले तो यहां आए होते। लाइव में भी हम दो-दो, चार-चार, पांच-पांच घंटा, सात-सात घंटा लाइव लेकर बक-बक सुनते रहे, लेकिन एक को मतलब हो।
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