प्रश्नोत्तर P16-0123 · भाग 16
गुरु जी, मैंने अनेक संत-महात्माओं को यह कहते सुना है कि परमात्मा मन और बुद्धि से परे की वस्तु है — मन और बुद्धि से उसे पकड़ा या समझा नहीं जा सकता। क्या यह सच है?
देखिए, शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — पांच इंद्रियां हैं: कान, आंख, नाक, मुंह और त्वचा। इन इंद्रियों द्वारा हम बाहर से पता लगाते हैं कि क्या बोला जा रहा है, क्या दृश्य है, क्या सूंघ रहे हैं, क्या स्वाद है, क्या स्पर्श है। अब कहा गया है कि शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे सत्य है, और इसके बाद ब्रह्म। तो हम परमात्मा के बारे में इंद्रियों द्वारा समझ ही नहीं सकते। हम तो यह समझ रहे हैं कि मैं निर्विकार कैसे हो जाऊं। अगर उसके बारे में मैं बात कर रहा हूं तो हमारे लिए वह कल्पना है — इन इंद्रियों द्वारा कुछ प्रत्यक्ष तो हो नहीं रहा। यात्रा आप अपने आप तक पहुंचने के लिए कर रहे हो। इस बुद्धि से उस तक नहीं पहुंचा जा सकता, अपने तक पहुंचा जा सकता है; और जो अपने तक पहुंच गया, वह उस तक भी पहुंच जाएगा। अपने आप को समझ लिया तो वहां बुद्धि खत्म हो गई, तब आंतरिक यात्रा होने लगी। बुद्धि तो बाहर जगत के लिए है। बाहर जगत में हम बुद्धि द्वारा ही फंसे थे, और समझ आई तो बुद्धि द्वारा ही बाहर से निकले — फंसाया भी इसी ने, निकाला भी इसी ने। क्यों कहा जाता है कि वह मन और बुद्धि से परे है? मतलब आप "मेरा" में रहकर, इंद्रियों द्वारा, उसे नहीं जान सकते। "मेरा" में इसलिए नहीं जान सकते कि "मेरा" में कुछ चाहिए, और "कुछ चाहिए" में वह नहीं है। पहले अपने तक पहुंचना होगा, डायरेक्ट तो नहीं पहुंच सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि "मेरा" में उसे मत खोजो — "मेरा" में तो वह मिलेगा ही नहीं; कहने का मतलब है आप भटको मत। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे आत्मा है, और आत्मा के बाद परमात्मा।
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वीडियो: मैंने सुना है परमात्मा मन बुद्धि से परे हैं क्या यह सच है ? / #Parmatma #yogijikasatsang · 2024-08-19