प्रश्नोत्तर P16-0124 · भाग 16
तो आपके कहने का मतलब यह है कि मन और बुद्धि के द्वारा केवल स्वयं तक, आत्मा तक पहुंचा जा सकता है, और आत्मा से परमात्मा की यात्रा के लिए बुद्धि की आवश्यकता नहीं है? क्या वहां भी कोई आंतरिक समझ काम करती है?
हां, उसमें बुद्धि नहीं — वह खत्म हो गया, बाहर जगत से आप मुक्त हो गए, सत्य तक आ गए। पहले अपने तक पहुंचा, और अपने तक पहुंचने के लिए उसने बुद्धि का, समझ का, ज्ञान का, शब्द-दृश्य-गंध-रस-स्पर्श का उपयोग किया। जब अपने तक पहुंच गया तो आंतरिक यात्रा होने लगती है। बुद्धि बाहर जगत के लिए है; पहले वह बाह्य जगत से मुक्त हुआ, फिर आंतरिक यात्रा। बाहर जगत में फंसा भी बुद्धि द्वारा, अपनी समझ द्वारा, और अब वह अपनी स्थिति में आ रहा है — जैसा था उसमें आ रहा है। मतलब "मेरा" में परमात्मा की यात्रा नहीं होती, "मैं" में हो सकती है, स्वयं में। इन इंद्रियों द्वारा उस तक नहीं पहुंचा जा सकता; इंद्रियों से मुक्त होना पड़ेगा, अपने आत्म में स्थिर होना पड़ेगा। पहले बाहरी जगत का ज्ञान काम कर रहा था — भटकने में भी और पहुंचने में भी। आत्म तक पहुंच गए तो बाहर जगत का ज्ञान खत्म हो गया, अब आत्म का ज्ञान काम कर रहा है, और आत्म से हम उस तक पहुंच रहे हैं। समझ वहां भी काम कर रही है, लेकिन वह आत्म की समझ है — पूरी बदल जाएगी। पहले हम बुद्धि से इसलिए काम करते थे कि हमें बाहरी जानकारियों पर काम करना पड़ता था; अब आत्म को ज्ञान हो गया, बाहर से हम मुक्त हो गए, तो बाहरी जानकारी की कोई आवश्यकता नहीं। अब अंदर की जानकारी से अंदर की यात्रा हो रही है।
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वीडियो: मैंने सुना है परमात्मा मन बुद्धि से परे हैं क्या यह सच है ? / #Parmatma #yogijikasatsang · 2024-08-19