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प्रश्नोत्तर P6-0105 · भाग 6

नागपुर से आई मां कहती हैं, धन, गहना और बेटा-बेटी से लगाव छूट गया लगता है। पति की जंजीर थी, उसे छोड़कर आई हूं। मौन मिल गया, काम भी छोड़ दिया। परिवार वापस बुलाता है। इक्कीस दिन का टारगेट है। क्या मैं मुक्त हो गई? जाऊं या यहीं रहूं? आखिरी इच्छा और बेड़ी का क्या संबंध है? गुरु क्यों चाहिए?

खूब देखा कर। तू आ भी गई। अब रह ले। मौन की तलाश खत्म हो गई। जाने की जरूरत क्या है, आने के लिए। जब सब छोड़ ही दिया है, तो जाना किसलिए। तेरे पास मोह-माया कुछ है ही नहीं। हकीकत यही है। पति की जो जंजीर लगती थी, उसे छोड़कर आई है। याद भी नहीं आ रहे, ना तू उन्हें याद आ रही होगी। बढ़िया है। जब मुक्त हो तो जाने की क्या जरूरत। जाकर देख। नहीं जाकर देखेगी तो पता नहीं चलेगा कि जंजीर से मुक्त हुई कि नहीं। तू तब तक रह, जब तक कोई लेने ना आए। कोई जंजीर नहीं है तो जाने की जरूरत क्या है। आराम से रह। यह भाव बना ले कि अगर कोई लेने आए तो जाऊंगी, नहीं तो जाना ही कहां। जैसी जगह चाहती थी, वैसी मिल गई। काम भी छूट गया। फाइनल बता, अब जाएगी नहीं। मैं वही कह रहा हूं। जब कोई लेने आए, तब जा। लड़की रोती है, मां तेरे सहारे हूं। मां है तो मां है। तू यहां रहे तो वह कभी भी आ सकती है। इतनी दूर अभी नहीं आ पाएंगे। हिम्मत वे भी बना लेंगे। छोटे बच्चे नहीं हैं कि दूध पिलाना हो, खिलाना-पिलाना हो। सबसे तू मुक्त है। अब नहीं जाएगी, तब समझ लेना कि मुक्त है। मुक्त है, जंजीर नहीं है, और जैसी जगह चाहिए थी वैसी मिल गई। फिर जाना क्यों। गई और वापस ना आ पाई, तो कम से कम यह जगह तो है। शरीर कहीं भी छूटता है। साधना के स्थान पर छूटे तो अच्छा है। बहन ने गुस्से में कहा, जा रही है तो दोबारा आना मत। अपनी मर्जी की मालिक है। तू अपनी मर्जी से आ गई। अब इधर ही रह। पति ने कहा, जा रही है तो जा, मैं यहां खुश रहूंगा। नाती-नातिन में, बेटे-बहू में उनकी माया पड़ी है। तुझसे ज्यादा लगाव वहां है। जगह मिल गई। आखिरी जैसी इच्छा थी, वैसी जगह मिल गई। फिर क्यों जाना। वहां तुझे कोई नहीं चाहता। तू किसी को नहीं चाहती। अंदर से तू किसी के लिए नहीं है। तो खत्म कर। आराम से रह। फिर नहीं जाएगी। तारीख फाइनल नहीं बता पा रही। आने का टारगेट नहीं बनाया, जाने का भी नहीं। इक्कीस दिन भी रुक सकती है, इक्कीस साल भी। यहां खाना-पीना मिल रहा है। आराम से रह। साधना के लिए मौन मिला। पर मौन में तू रहेगी नहीं, इसलिए बोल रहा हूं। आखिरी इच्छा यही थी कि कोई साधना का स्थान मिल जाए। बहुत दिन से तलाश थी। वहां तुझे कोई नहीं चाहता, ना तू किसी को चाहती है। कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं। जब इच्छा नहीं है, तो ऐसा ना हो कि तू गई और शरीर वहीं छूट जाए। कम से कम साधना के स्थान पर छूटे। शरीर तो कहीं भी छूटता है। वहां भी छूट सकता है। आखिरी इच्छा साधना के स्थान पर छूटे, तो जन्म भी साधना के स्थान पर हो सकता है। यह बात समझना। ऐसा नहीं कि हो ही नहीं सकता। आखिरी घड़ी में जहां छोड़ते हो, जैसी कामना रहती है, जैसी इच्छाएं रहती हैं, वैसी ही गति होती है और वैसा ही जन्म होता है। पूजा-पाठ छोड़ दिया, दिया जलाना छोड़ दिया, त्योहार नहीं मनाती। लोग कहते हैं हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में चली गई। उनकी सोच है। तुझे किस बात की तकलीफ है। तू लेगी भी नहीं, सोची भी नहीं। आराम से रह। अब पक्का हो गया, नहीं जाएगी। इक्कीस दिन तो पक्का कह रही है। जंजीर के पीछे जंजीर है। एक जंजीर है। उसे सिर्फ गुरु देखता है। तुझे दिखाई नहीं देती। गुरु दिखा देगा। इसलिए गुरु को दर्पण कहा गया है। तू जैसी है, वैसी दिखा देगा। एक जंजीर तू देख पाती है। एक जंजीर नहीं दिखती। वह जंजीर गुरु देखता है। जैसे पता है कि रोग हो गया। कौन सा रोग है, यह पता नहीं। बस इतना पता है कि रोग हो गया। सामने सारी दवाएं रख दी जाएं तो भी नहीं पता कि रोग कौन सा है, कौन सी दवा लूं। उसके लिए डॉक्टर चाहिए। डॉक्टर मशीन से, अपनी समझ से जांच करेगा, तब बताएगा यह रोग है। तुझे दर्द का पता है। कौन सा रोग है, पता नहीं। वैसे ही कुछ जंजीरें तू देख पाती है। वह जंजीर आसान है। उसके पीछे एक गहरी जंजीर है। वह गुरु के सामने दिखती है। जो जंजीर अभी दिख रही है, वह हल्की है। ऐसी बेड़ी है जो खटाखट टूट जाएगी। पर उसके पीछे जंजीर है, कसकर बंधी हुई। वह जंजीर गुरु दिखाता है। तू कहती है, समझ में कुछ नहीं आ रहा। देखती हूं तो दिखता ही नहीं कि किस चीज में फंसी हूं। इसलिए कह रहा हूं, हमेशा के लिए रुक जा। पता चल जाएगा। हां भर दे, तो जा ना मत। सारी जंजीरें, सारी बेड़ियां दिख जाएंगी। तैयार होगी तब। इक्कीस दिन पक्का रहूंगी, यह कह रही है। इक्कीस दिन में बेड़ियां दिखेंगी। इक्कीस दिन के बाद हमेशा के लिए रुकूंगी, ऐसा बोल दे, तो सारी बेड़ियों के दर्शन होंगे। अभी कैसे बोल दूं। लोगों ने आस लगा रखी है कि गई है तो आएगी। वे तुझे चाहते नहीं, तू उन्हें चाहती नहीं। बोल दे कि नहीं आओगी, कोई बात नहीं। फिर आस कहां से लगाएंगे। जिस दिन रहना हो उसी दिन रहना। जब आना हो तो फोन करके बता देना, मैं आ रही हूं। हो गया, खत्म। मैं हमेशा के लिए यहीं रुक गई। तब असली बेड़ियों के दर्शन होंगे। नहीं तो दर्शन भी नहीं कर पाएगी। एक बेड़ी फंसी है। आदमी साथ में है। पहले बोली कोई बेड़ी नहीं, फिर बोली मेरा आदमी साथ में है। साथ में है, पर बेड़ी थोड़ी ही है। गांव छोड़कर मेरे भरोसे में है। इतनी जिंदगी निकाल ली, उसे कैसे छोड़ूं। वह नहीं रहे तब पूरी तरह छूटूंगी। क्या उनके जाने का इंतजार करेगी। जाने का इंतजार नहीं होता, पर खाना-पीना, और भी बहुत कुछ रहता है। बहुत बेड़ियां हैं। कुछ दिखती हैं, कुछ नहीं दिखतीं। तुझे सिर्फ इतना पता है कि रोग है। उस रोग का इलाज तू नहीं कर सकती। उसे बढ़ा सकती है। इलाज डॉक्टर ही करेगा। कौन सा रोग है, पता नहीं। डॉक्टर तक जाना पड़ेगा। बुखार जैसा हो जाए तो पत्ते-वतते पीकर ठीक कर लेते हो। कुछ बेड़ियां ऐसी हैं कि अपनी समस्या काट देते हो। पर कुछ असाध्य रोग बिना डॉक्टर के ठीक नहीं होता। कुछ बेड़ियां इतनी गहरी हैं कि खुद पता नहीं कि बेड़ी है, पर ग्रसित हो। दुख है, अशांति है, बेचैनी है, घुटन है। समझ नहीं आता कहां फंसी हूं। पर फंसी तो है। अब तू देख नहीं पाएगी। ताकत खत्म हो गई। अब गुरु दिखाएगा। जहां से तेरी सोच खत्म होती है, वहां से उसकी सोच शुरू होती है। जहां से तेरा देखना बंद होता है, वहां से उसका देखना शुरू होता है। यह अपने आप को धोखा देने वाली बात है। पता नहीं होता। सबको नहीं पता। तुझे पता चल गया, क्योंकि मैं खोल-खोल कर बात कर रहा हूं। तेरी भी यही हाल है। सबकी यही हाल है। यह धोखा हम शुरू से खुद को देते आए हैं। इसलिए जीवंत गुरु का सानिध्य बहुत जरूरी है। बीमारी एक झटके में बता दी। इलाज के लिए तैयार तब हो, जब बैठ जाओ। पहले बीमारी का पता नहीं था। अब पता चल गया, एक बेड़ी मिल गई। दूसरी भी कहीं अटकी होगी, बाद में दिखेगी। मुख्य बेड़ी पति में है। पति के जाने के बाद दूसरी बेड़ी दिखेगी। शरीर में दर्द हो, पता चले सिर दर्द कर रहा है। घर में दुर्घटना हो जाए, कोई घटना हो जाए, दर्द चला जाता है, भूख चली जाती है। चिल्ला रहे थे भोजन लाओ, जल्दी पकाओ। थाली आ गई, और पता चला दुर्घटना में बेटा है, पत्नी है, जिससे लगाव है। तुरंत भूख चली गई। कई दिन भूख नहीं लगती। भूख कहां गई। क्योंकि जीवन में सबसे ज्यादा महत्व उसी का है। वैसे ही अभी इसकी बेड़ी पति में दिखी। एक ही बेड़ी नहीं है। पीछे और बेड़ियां हैं। धीरे-धीरे दिखेंगी। टारगेट नहीं है, ऐसा कहती है। पर टारगेट इतना है कि आऊंगी। कितने दिन में आऊं, यह तय नहीं। ज्यादा से ज्यादा इक्कीस दिन, यही सारा टारगेट है। इतना सूक्ष्म बना लिया है कि इक्कीस दिन के अंदर आ ही जाऊंगी। इक्कीस दिन फाइनल नहीं। यहां इक्कीस दिन बोल रही है। उन्हें ऐसा नहीं बताया था। महीने भर भी बताया था, एक दिन भी बताया था। महीने में भी आ सकती हूं, एक दिन में भी लौट सकती हूं। वही मैं कह रहा हूं। गुरु की जरूरत इसलिए पड़ती है कि कुछ बेड़ियां तुम बांधते हो और तोड़ भी देते हो। पर जो दिखती ही नहीं, उसे तोड़ोगे कैसे। तोड़ना तब होगा जब दिखे। दिखेगी नहीं, तो गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु को दर्पण कहा गया। सबका चेहरा देख सकते हो। अपना चेहरा बिना आईने के कभी देखा है। बिना गुरु के बेड़ियां नहीं दिखेंगी। इसलिए जीवंत गुरु का सानिध्य ढूंढो। तू अशांत है, दुखी है, निराश है, बेचैन है। कहता है जीवन में कोई कमी नहीं। जितना सोचा था सब हासिल कर लिया। नाम, शोहरत, पैसा, जितनी सामर्थ्य थी, जितना पद बनाया था, सब पा लिया। पर अशांत हूं। अशांति का कारण नहीं दिख रहा। कारण है। इस स्थिति में कहा गया, गुरु ढूंढो। अब तुम गुरु को समझ पाओगे, और गुरु तुम्हें समझा पाएगा। अशांति का कारण क्या है। बाहर से जो चाहिए था सब इकट्ठा कर लिया। फिर भी अशांति है, बेचैनी है, घुटन है। विवाह हो गया, बच्चे हो गए, पैसा, प्रॉपर्टी, घर, गाड़ी, सब ले लिया। एक जिंदगी का टारगेट, अपने बैकग्राउंड के हिसाब से बहुत ज्यादा कर लिया। फिर भी अशांत हूं। उदासी का, निराशा का कारण नहीं दिख रहा। इस स्थिति में गुरु चाहिए। तुम देख नहीं पा रहे। समझ काम नहीं कर रही। अब गुरु ही दिखाएगा। एक दर्पण चाहिए, जिसमें सारी बेड़ियां साफ दिखें, सारा कारण दिखे, सारी वजह दिखे। इसलिए गुरु के सानिध्य में रहो। रहना पड़ेगा। तब दिखाएगा। दिखाएगा भी, पर छुड़ाने की ताकत तुम्हारे पास नहीं रही। ताकत खत्म हो गई। सारी ताकत कहीं और लगा दी। निर्बल हो गए। अब वह ताकत देगा। सत्कर्म करवाएगा। सब दिखाएगा भी, और कुछ सेवा करवाएगा। उससे ऊर्जा आएगी। उस ऊर्जा को अपने आप को छुड़ाने में लगाओगे। तुम निर्बल हो गए, असहाय हो गए, फेल हो गए। गुरु के यहां तब जाते हैं जब एकदम फेल हों। अंदर जरा सी ताकत होती तो गुरु कौन ढूंढता। एक प्रतिशत बल भी होता, रत्ती मात्र भी, तो क्या मजाल कि गुरु खोजते। मैं ताकतवर हूं, यह भाव रहता। जब करने की सामर्थ्य नहीं रहती, तब गुरु चाहिए। उसी स्थिति में गुरु काम आता है। ताकत लिए हुए गुरु के पास पहुंचोगे तो भाग जाओगे। गुरु मारेगा, चोट लगाएगा, लताड़ेगा। जरा सी ताकत बची हो तो उसी संसार में लौट जाओगे। गुरु कभी सीधी बात नहीं करता। इतिहास गहराई से पढ़ो। गुरु हमेशा उल्टी मार देता है, जिससे शब्द बुरे लगें। घूरकर देखेगा। हर समय चोट मारेगा। देखेगा कि अभी भी आवेश और जज्बात बचा है क्या। आवेश और जज्बात संसार में ही घसीटते हैं। चोट इसलिए मारता है कि देखे, ताकत बची है क्या। बची हो तो यह भागने वाला है। अभी भाग जाए। कोई बेहोश पड़ा हो, मरने लगे, तो डॉक्टर छूकर देखता है कुछ बचा है कि नहीं। धड़कन है कि नहीं। नाड़ी चल रही है कि नहीं। दबाकर जांचता है। कुछ है तो बचाने की कोशिश करता है। कुछ नहीं रहा तो कहता है, हो गया, खत्म। ऐसे गुरु चोट मारकर देखता है कि अंदर कहीं कुछ है क्या। हमेशा विरोध में बात करेगा। अनुकूल बोल दे तो तुम वहीं के वहीं रह जाओगे। उठ ही नहीं पाओगे। किसी को उठाने के लिए उसके विपरीत करना पड़ता है। अनुकूल करो तो वह उठेगा नहीं। क्रोध नहीं आएगा, उन्नति नहीं होगी। हमेशा विपरीत परिस्थिति पैदा करनी पड़ती है। तब ऊर्जा जागती है। तब समझने की कोशिश करता है। अनुकूल परिस्थिति में आदमी रुक जाता है। अनुकूल में बढ़ना नहीं होता। लोग समझते हैं अनुकूल में बढ़त होती है। नहीं। विपरीत परिस्थिति में बढ़ना होता है। अनुकूल में रुक जाते हो। आंख की ऊर्जा तब उठती है जब विपरीत परिस्थिति आए। इसलिए गुरु हमेशा विपरीत परिस्थिति पैदा करता है। अनुकूल हो तो आराम से बैठ जाओगे। जरूरत ही नहीं रहेगी। तुम्हारे तरीके से कोई बात करे तो तुम सरल और सहज हो जाते हो। उकसाना हो तो विरोध में बात कर दो। फिर अपनी सारी सामर्थ्य लगा दोगे उसे चुप कराने में। शरीर का बल हो, धन का बल हो, लोगों का बल हो। पर अनुकूल बात हो तो कहते हो, और बोलो, मैं सुनूंगा, क्योंकि मेरे अनुकूल बोल रहा है। उसमें ऊर्जा नहीं बढ़ती, समझ नहीं बढ़ती। समझ विपरीत परिस्थिति में विकसित होती है। इसलिए जीवंत गुरु के यहां जाते हो तो तभी क्वालिफाइड होते हो। समाज में बड़ा मान-सम्मान मिला हुआ है। गुरु राजा और रंक से एक ही काम करवाता है। राजा भी आए तो कहे, झाड़ू मार। जा, स्नानघर धोकर आ। आज तक समाज में किसी ने यह नहीं कहा। हिम्मत नहीं हुई। मैं अफसर हूं, लोग सलामी मारते हैं। जहां राजा और रंक एक जगह बैठ जाएं, वही गुरु है। जहां समभाव हो, समदृष्टि हो, उसी को गुरु कहा गया है। उसके लिए कोई अलग नहीं होता।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 7 जून 2026 #योगी · 2026-06-07