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प्रश्नोत्तर P6-0055 · भाग 6

नमन योगी जी। मैं अपनी स्थिति का जायजा कैसे लूं? अगर गहराई से जानना हो और जीवंत गुरु न मिले तो क्या करूं? महिलाएं ऐसा भ्रमण कैसे करेंगी? अगर मैं अपनी स्थिति घर पर ही जांचना चाहूं और कोई ऐसा गुरु न हो कि आज पहले अपने आप को समझूं, तो थोड़ा भी कैसे समझूं? क्या स्त्री शरीर या डर निकलने में बाधा बनता है?

अपनी स्थिति का पता ही है। जायजा लेने की जरूरत ही नहीं है भाई। अपनी स्थिति का आपको पता ही है। जायजा लेने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। और गहराई से जायजा लेना चाहते हो, कुछ भ्रम पाल के रखे हो, तो जिस स्थान पर हो उस व्यवस्था को छोड़कर कहीं दूर अकेले चले जाओ, एकांत में, और कुछ दिनों तक किसी से संपर्क मत रखो। तो आपकी असलियत का आपको पता चल जाएगा। जैसे यहां पर जया आई थी। जब आती थी यही कहती थी, मेरा बच्चों का मोह नहीं, पति का मोह नहीं। और जैसे ही उसके बच्चे का मैसेज आया, अश्रुधारा बहने लगी। यह कब? जब दूर जाने के बाद। एक दो दिन रुकती थी तो उसे समझ में नहीं आता था। जब सात दिन रुकना पड़ा, तब समझ में आया कि बच्चों में आसक्ति कितनी है, पति में आसक्ति कितनी है, परिवार में आसक्ति कितनी है। अगर वह सात दिन नहीं देती, एक एक दिन, दो दो दिन रुक के चली जाती, तो यह बात उसको पूरे जीवन में समझ में नहीं आती। उसे अंदर से लगता कि नहीं, मैंने सब छोड़ दिया है। तो यह भ्रम आपका तभी टूटेगा जब आप किसी जीवंत गुरु के सानिध्य में जाकर रहोगे। क्योंकि उसका अनुशासन होगा। आप अपनी लापरवाही कर ही नहीं पाओगे। करोगे तो भगा देगा, तुरंत भगा देगा। तो एकांत में जाइए। जीवंत गुरु की शरण मिल जाए तो सौभाग्यशाली हो। लेकिन मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मेरे पर अनुशासन करे, मैं नहीं कर पा रहा हूं। अपने आप को पूरी तरह समझना है, मैं कहां कहां उलझा हूं, मैं कहां कहां फंसा हूं, तो आपको किसी जीवंत गुरु के शरण में जाना होगा। और जब तक जीवंत गुरु ना मिले, तब तक भ्रमण करो। किसकी खोज में? गुरु की खोज में। मुझे कोई गुरु मिल जाए। फिर घर बार कैसे चलेगा? घर बार का मैंने क्या कहा है, बारह महीने में ग्यारह महीने घर को दो, एक महीना अपने आप को दो। एक महीना भ्रमण नहीं किया, तो एक महीना भ्रमण करो। अपनी उचित व्यवस्था कर लो। जैसे मान लो हम बीमार हैं, तो हम जा जा के जगह पूछते हैं कि इधर कोई अच्छा डॉक्टर है क्या, कोई क्लीनिक है क्या, कोई हॉस्पिटल है क्या। अगर हम नए जगह भी चले गए तो लोगों से पता करते हैं ना, अपने को ठीक कराने के लिए। ऐसे ही जा के पूछो तीर्थ स्थानों पर, जहां जहां ऐसे स्थान हैं, जैसे नर्मदा तट पर, जहां जहां ऐसा क्षेत्र है। वहां जाके पूछो, कोई ज्ञान देने वाला गुरु है क्या। भ्रमण करो। महिलाएं ऐसा नहीं कर पाएंगी, ऐसा कहते हो। करना तो पड़ेगा। महिलाएं भी अपना झोला बांध के निकल जाएं। निकलना पड़ेगा भाई। आत्मिक कल्याण करना है तो निकलना ही पड़ेगा। मीराबाई भी तो महिला थीं। कई ऐसी महिलाएं नहीं हुईं क्या। निकलना तो पड़ेगा। आत्मिक कल्याण चाहते हो तो निकलना पड़ेगा। अपनी स्थिति घर पर ही जांचना चाहो, और कोई ऐसा गुरु ना हो जिसके नियम में आज पहले अपने आप को समझूं, तो आप थोड़ा समझ सकते हो, पूरी तरह नहीं समझ सकते। थोड़ा भी कैसे समझूं, किसी का सत्संग मिले, तो या तो शास्त्रों का अध्ययन करो। आपके समझ में आना चाहिए। या किसी को समझ में आ गया है, उसके शरण में जाके रहो। कुछ तो शुरुआत करनी पड़ेगी। या तो खुद शास्त्रों का अध्ययन करो। अभी तो सोशल मीडिया हो गया है। जितने भी आध्यात्मिक हैं, जितना सुन सकते हो, सबकी वीडियो सुनो। यह व्यवस्था तो है ही। लेकिन आपको उसमें किसी तरीके से लगना पड़ेगा। अपने आप को लगाना पड़ेगा। ज्यादा से ज्यादा समय मैं उसी में लगाऊं, वो जानकारियां लूं। अपने काम से खाली होकर बस उसी में लग जाओ, किसी भी तरीके से। लगना पड़ेगा निकलने के लिए। जैसे हमने अपने आप को फंसने के लिए लगाया। ऐसे थोड़ी फंस गए। कहीं लगाया ना, कहीं उलझाया ना। तो निकलने के लिए भी लगना पड़ेगा। मेहनत तो करनी पड़ेगी। जाना तो आपको पड़ेगा ही। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो, निकलना तो पड़ेगा ही। और जिसको भी अपना आत्मिक कल्याण करना है, वह निकलेगा ही। चाहे कोई भी शरीर हो। अरे, कितने पुरुष डरते हैं, बाहर निकलते ही नहीं। क्या कहोगे। कल्याण करने वालों का इतिहास आप देखिए। जिस वक्त स्त्रियां एकदम नहीं निकलती थीं, डरती थीं, उस समय भी उपलब्धि हुई। तो जिसकी खोज है वह निकलेगा। और खोज नहीं है तो बहाना क्या, कि हमें तो स्त्री शरीर मिला है, हम कैसे जाएंगे। मतलब उसे एक एक बहाना चाहिए अपने आप को छुपाने का। तो स्त्री शरीर के द्वारा छुपा लिया। और पुरुष को नहीं निकलना है तो उसने कहा, भाई मेरी जिम्मेदारी है, दायित्व है, कैसे चला जाऊं। इन लोगों को निकलना ही नहीं है। नहीं तो शरीर कभी बाधा नहीं बनेगा। शरीर कभी बाधा नहीं बनता। हमें निकलना नहीं है, तो हमें एक बहाना चाहिए। क्योंकि हम सीधा नहीं रुक सकते। अगर बहाना मिल गया तो मेरा मैं भी खड़ा हो जाता है कि निकलना तो चाहता हूं, लेकिन करूं क्या, मुझे तो स्त्री शरीर मिला है, क्या करूं। और इतिहास में देखिए तो कितनी स्त्रियों ने अपना आत्मिक कल्याण किया, निकलीं ना घर से। तो फिर आज क्यों नहीं निकल सकते। इसने कहा ना कि मैं पहली बार इतनी दूर यात्रा किया। डर डर के किया। अगर समझने की इच्छा नहीं होती तो कहती, नहीं, मैं तो नहीं जा पाऊंगी। प्रबल इच्छा ही इसको लेकर आई। कभी नहीं निकली थी, अब कैसे निकल गई? समझने की प्रबल जिज्ञासा। आप एक बात बताइए। एक स्त्री हो और वो कभी ना निकली हो, अपने घर में ही हो, और परिवार में ऐसा कारण बन जाए कि उसका बालक एकदम सीरियस हो जाए। क्या आपको लगता है वो स्त्री बाहर नहीं निकलेगी? क्या वो देखेगी कि रात है? अगर दो चार किलोमीटर भी पैदल होगा तो अपने बच्चे को गोद में लेकर भाग जाएगी। उस समय ना उसे जानवर का डर होगा, ना प्रेत का डर होगा, ना मानव का डर होगा। इसलिए कि उसके बच्चे को बचाना उसके जीवन में सबसे जरूरी है। डर तभी तक है जब तक आपके लिए जरूरी नहीं है। जिस दिन आपको यह समझ में आ गया कि मेरे जीवन में सबसे जरूरी यही है, डर गया। डर काम ही नहीं करेगा। डर तभी तक काम करता है। डर हमारा एक बहाना है। हम अपने आप को बचाते हैं। डर एक बहाना है। जब जीवन में सबसे जरूरी यही कार्य हो जाएगा तो डर खत्म। डर तो तभी तक है जब तक जरूरी नहीं। जिस दिन जरूरी हो गया, वह चाहे स्त्री शरीर हो, चाहे पुरुष शरीर हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। शरीर कभी बाधा नहीं बनता। हमें अपने आप को बचाने के लिए सिर्फ एक बहाना चाहिए, और वो मिल गया, शरीर।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 10 मई 2026 #योगी · 2026-05-10