प्रश्नोत्तर P6-0054 · भाग 6
योगी जी नमन। पंजाब से एक बहन है, छह महीने पहले शादी हुई। डेढ़ साल पहले भाई को वीडियो मिली, उनकी रुचि थी, बहन का यह मार्ग नहीं था। कुटिया आने से पहले बहन कहती थी कि मैं बहुत बातें करती हूं, मैं यहां रह नहीं पाऊंगी। फिर भी नियम ऐसे सहज स्वीकार हो गए कि नियम लगे ही नहीं। बैठने का कोई काम नहीं, फिर भी पूरे समय सहज बैठी रहती है, किसी को देखती नहीं। भाई की ओवरथिंकिंग छूट गई, बहन वीडियो कम सुनती है, और दोनों निरंतर नियम में हैं। जिज्ञासा यह है कि एक जीवात्मा अपनी यात्रा के लिए इतनी उत्सुक कैसे हो जाती है? किस मोड़ से अपने आप को निकालना चाहती है? प्रत्यक्ष ज्ञान निमित्त बना, शादी हुई, और ऐसी जगह आना जैसे यह बहुत आवश्यक हो। यह संभव कैसे हो पाया? क्या वह कोरे कागज की तरह समझ रही है? और जो पहले कुछ पढ़कर या कोई प्रक्रिया करके आता है, उसका मन तुलना में लग जाता है, यहां ऐसा क्यों नहीं, वैसा क्यों नहीं, कुछ हो नहीं रहा, इतने दिन हो गए, तो क्या पिछला छोड़कर यहीं समझना चाहिए?
संभव तब होता है जब खुद को समझना हो। अगर हम आए ही हैं तो अपने समय का सदुपयोग करें। यहां क्या है, मैं समझूं। यहां आने का उद्देश्य क्या है? क्योंकि हम कुछ उद्देश्य लेकर आए हैं। क्यों ना जितने दिन रुकें, हम अपनी समझ को विकसित करें। क्या है, मैं समझूं। इसलिए कि अब तो आ ही गए हैं। तो मैं समझ लूं क्या है। और मैं तभी समझ पाऊंगा जब पूरी तरह नियम में रहूंगा।
अगर मैं खुद नियम में नहीं हूं तो मैं सामने वाले को भी कुछ बोल नहीं सकता। अगर मैं पूरी तरह नियम में हूं तभी मैं सामने वाले से भी कुछ बोल सकता हूं कि मैं पूरे नियम में रहा, और मैं कुछ समझने आया था, हुआ या नहीं। वह बात तब होगी जब आप नियम में रहोगे, तब सामने बोल सकते हो। जिसकी प्रबल जिज्ञासा होती है कि नहीं, मुझे बस समझना ही है, तो फिर वह जहां जाता है, वह समझने आया है, तो फिर वह उसी नियम में जिएगा और अपने समय का सदुपयोग करेगा।
हमें क्या समझना चाहिए कि हम जहां भी गए हैं, एक जगह से दूसरे जगह गए, दूसरे से तीसरे गए, तो हमें पिछला छोड़ना चाहिए। क्योंकि हम उस नियम में रह के जितना समझना था, समझ गए। अब यहां का नियम अलग है, तरीका अलग है। तो मुझे अब यहां समझना है। मुझे तुलना तो करनी ही नहीं है। तुलना ही तो भटकाव है। तुलना हमें करनी ही नहीं चाहिए। तुलना तो आप तब करो जब आपको प्रत्यक्ष हो गया हो। आप अप्रत्यक्ष में रहकर तुलना करना मतलब अपने आप को भटकाना है।
तुलना तो तब करो जब आप उसको और इसको दोनों को समझ लिए हो। लेकिन आप एक को समझने गए थे, उसको छोड़कर वहां समझ में नहीं आया, दूसरे जगह आ गए, तो तुलना कैसे कर सकते हो? क्योंकि अभी तो समझ ही रहे हो। अगर तुलना करोगे तो समझ नहीं पाओगे, तुलना में लग जाओगे। तुलना तो तब करोगे जब दो चीजें हों, दोनों के बारे में आपको प्रत्यक्ष मालूम हो, तब आप तुलना कर सकते हो। वो तो जब संभव होगा। तब तक मैं बिल्कुल कोरा बैठूंगा। उधर का मटेरियल उधर ही छोड़ के आऊंगा। दोनों की तुलना नहीं करूंगा।
आप जहां थे, जब आगे गए, इसका मतलब जो समझने के लिए मैं वहां गया था, वो नहीं हुआ। वो नहीं हुआ तो मुझे वहां की बात भी नहीं करनी चाहिए। वहां की बात करना मतलब है समय की बर्बादी। अगर आप सामने वाले से जाकर कह भी रहे हो कि मैंने ये ये साधनाएं कीं, तो आप समय बर्बाद कर रहे हो। आपको वहीं छोड़ देना चाहिए। क्योंकि अगर समझ में आ जाता तो आगे क्यों जाते? आगे आए हो तो इसका मतलब उसके द्वारा समझ नहीं पाए, तभी आप आगे आए। तो जिसके पास गए हो, अब उसके द्वारा समझो। पीछे की बात ही मत करो। पीछे की बात करना मतलब अपने आप को उलझाना है।
आप इतिहास में देखिए कि जितने महापुरुष हुए। आप अष्टावक्र का नाम लेते हो, राजा जनक का नाम लेते हो, कृष्ण का नाम लेते हो, अर्जुन का नाम लेते हो। लेकिन क्या उसके पहले कोई महापुरुष नहीं हुआ था? क्या किताबें नहीं थीं? क्या उन्होंने उन दो के अलावा किसी की चर्चा की? उसने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में पूछा, बस अपनी समस्या बताई, मेरा कल्याण कैसे होगा। राजा जनक ने अष्टावक्र से यह नहीं कहा कि मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं उसमें विफल रहा। अब विफलता क्या सुनाऊं। और मैं सफल होता तो आपके पास क्यों आता, वही चीज लेने। एक वस्तु जिसको मैं ढूंढ रहा था, अगर वह मिल जाए तो मैं दूसरी जगह थोड़ी जाऊंगा। अगर मैं दूसरी जगह गया तो पहले की चर्चा करना मतलब समय की बर्बादी।
तो जिज्ञासु को अपनी बात ही करनी चाहिए। तीसरे को लाया, मतलब उसने अपने आप को फंसा लिया। कभी भी हमें पीछे की चर्चा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि हम अतीत में असफल हुए हैं। असफलता को क्या ढूंढना? असफलता को क्या ढोना? और वह आपको कुछ देना चाह रहा है, तो आप उसको अपनी असफलता में उलझा दे रहे हो। उसका कोई मतलब ही नहीं होगा। लेकिन आप बता के अपने अहम भाव को पोषण कर रहे हो कि मैं बहुत सालों से प्रयास कर रहा हूं। लेकिन तुम एक साल से प्रयास करो, चाहे हजार साल से, परिणाम तो नहीं आया ना। तुम्हारे प्रयास का कोई मतलब ही नहीं है। लेकिन आप प्रयास बता के अपने आप को, मैं को, खड़ा करना चाह रहे हो कि मैं इतने सालों से साधना कर रहा हूं। उस साधना का क्या अर्थ है, क्या मतलब है, और उसे क्यों सुना रहे हो? क्या उसको यह बताने गए हो कि मैं इतने साल तक साधना किया?
अगर उसने साधना दी है तो सुना सकते हो। अगर उसके बताए हुए नियम पर, उसके बताए हुए सत्संग पर चल रहे हो, तब आप उसे सुना सकते हो। लेकिन और किसी की बात अगर सुना रहे हो तो आप समय बर्बाद कर रहे हो। तो मुझे सिर्फ अपनी बात करनी चाहिए। प्रबल जिज्ञासु का यही लक्षण है। और अगर आप और किसी की बात कर रहे हो, कभी इनकी, कभी उनकी, कभी यह कहानी, कभी वो कहानी, इसका मतलब आप जिज्ञासु बनना चाहते हो क्या? प्रबल जिज्ञासु हो नहीं। प्रबल जिज्ञासु सिर्फ अपनी बात करता है कि मेरा कल्याण कैसे होगा, मुझे पिछले लोगों से मतलब नहीं है।
और आप इतिहास में देखिए, जिसका भी संवाद आप सुनिए। चाहे मैंने उदाहरण दिया राजा जनक और अष्टावक्र का, उन्होंने अपने अलावा किसी की बात की क्या? अर्जुन और कृष्ण, क्या उसके पहले कोई महापुरुष नहीं था? उसके पहले क्या किताबें नहीं थीं? तो आप जीवंत गुरु के शरण में गए हो। अगर जीवंत गुरु का सानिध्य जीवन में मिल गया है तो अपने अलावा कोई बात ही मत करो। मेरा कल्याण कैसे होगा, इस पर पूरी तरह बात करो। जब भी आपको समय मिले, और उसके बताए हुए नियम में रहो।
तो ये इतनी शांति से इसलिए रह पा रहे हैं। इन्हें कुछ समझना है कि क्या है। और क्या है का जवाब तभी मिल पाएगा जब उस नियम में रहोगे। उस नियम में नहीं रहोगे तो क्या है का जवाब मिल भी नहीं पाएगा। तो मैं चाहे एक दिन के लिए जाता हूं, चाहे सात दिन के लिए जाता हूं, चाहे महीने के लिए, मुझे पूरी तरह नियम में ही रहना चाहिए। तभी आप कह सकते हो कि मैंने पूरी तरह किया। मैं करके मुक्त हूं। उस नियम को, सौ तो आपने दिया था, मैंने एक सौ एक प्रतिशत पालन किया। क्या सौ आपकी तरफ से और एक मेरी तरफ से? लेकिन आपने कह दिया, नहीं। कोई त्रुटि हो गई तो फिर आपको समझ में ही नहीं आएगा। नियम की पालना के बाद ही इंसान कह सकता है कि यहां कुछ है या नहीं है। जब आप पूरी तरह नियम में रहोगे तभी आप कह सकते हो, या तो है या तो नहीं। और आप सामने वाले से कह सकते हो कि भाई, आप हैं या नहीं। हम कब बोल सकते हैं? जब हम पूरे नियम में रहे, तब सामने वाले से कह सकते हैं कि आप यहां फिर क्या कर रहे हो, लोगों का समय क्यों बर्बाद कर रहे हो।
नियम में रहना मतलब समाज के लिए सहायता भी है। उसका एक और सत्कर्म हो रहा है। मैं नियम करके उजागर कर दूं, यहां कुछ है या कुछ नहीं है। उजागर करते वक्त एक बात का ध्यान रखना, एजेंट बन के मत आ जाना। एजेंट बनेगा तो नियम बता रहा हूं, नहीं। एजेंट वाले के अंदर भी तो कुछ और चल रहा है। मैं आपको बता रहा हूं। क्योंकि अगर आप एजेंट बन के आ गए और बाहर से दिखा रहे हो कि मैं नियम में रह रहा हूं। रहना क्या है? मौन बैठना है, सात दिन। अब अंदर से क्या चल रहा है, वही जाने। अंदर और बाहर दोनों एक ही होना चाहिए। और अगर पता चला कि कोई समाज हित के लिए उचित कार्य कर रहा है, यह आपको पता है, लेकिन आप कहीं और से जुड़े हो, उसको तोड़ने के लिए आए हो, उसको चलाना चाहते हो, तो आपका स्तर बहुत भयानक गिरेगा। उसे आप सिद्ध भी नहीं कर सकते।
तो आप चाहे किसी की बुराई करिए, चाहे बढ़ाई करिए, समझ करिए। अगर मैं कहीं गया हूं तो मुझे पूरी तरह नियम में रह के अपने अनुभव को व्यक्त करना चाहिए। लेकिन वो अनुभव आपका हो। और अपनी समझ से ही बोलो कि मैं आपके नियम में रहा और मैं यह समझ पाया। उससे क्या होगा? समाज को भी प्रेरणा मिलेगी। क्योंकि समाज हित के लिए काम हो रहा है और समाज के लाभ के लिए काम हो रहा है। तो उसमें समाज का हिस्सा तो आप भी हो। आप कुछ बोलते हो तो आप भी लोगों से जुड़े हो। लोग आपसे जुड़े हैं, तो उन्हें भी प्रेरणा मिलती है। तो आप ईमानदारी से बोलो, लेकिन समझने के बाद बोलो। समझने के पहले नहीं। अगर आपने नहीं समझा है तो मत बोलो। समझ लिया है तो बोलो।
तो यह नियम में इसलिए रह पा रही है, क्योंकि इसे समझना है कि क्या है। जब हम उस नियम में रह के देखेंगे तभी पता चलेगा। और तभी तो हम सिर उठा के बोल भी पाएंगे कि मैं नियम में रहा। तो मेरा तो यही कहना है, प्रबल जिज्ञासु हो जाओ और सिर्फ अपनी बात करो। बस, और कुछ नहीं।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 10 मई 2026 #योगी · 2026-05-10