आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P5-0071 · भाग 5

वेदांत में कालातीत, भावातीत, गुणातीत — भावातीत का क्या अर्थ/असर है?

भाव भी आपकी स्थिति पर निर्भर करता है। आपकी जैसी समझ है, वैसा ही भाव बनेगा। समझ के ऊपर ही भाव है। अगर आपकी समझ नहीं है वहां की, तो वहां का भाव नहीं बना पाओगे। जिसकी आपको समझ नहीं है, वहां का भाव बनाना हो तो बना पाओगे क्या। नहीं। तो जब गुणातीत को धारण करते हो, तो भाव अपने आप आ ही जाता है। भाव को धारण नहीं करना पड़ता। समझ को धारण करना पड़ता है। और जैसी आपने समझ धारण की, वैसा भाव आपके अंदर आ जाएगा। सात्विक, तामसी, राजसी। तमोगुण, सतोगुण, रजोगुण। जिस गुण को धारण करते हो, वैसा भाव बनने लगेगा। तो आपको गुण को अपनाना है, न कि भाव को। भाव तो निर्भर है आपकी समझ पर। उसी के आधार पर। गुण आपने कोई और धारण किया, भाव कोई और बनाया, तो भाव नहीं टिकेगा। वह तो नाटक वाला रहेगा। तो जिस गुण को आपने धारण किया है, वैसा भाव बनता जाएगा। और एक दिन भाव से भी आप मुक्त हो जाओगे। एक समय ऐसा आएगा कि आप भाव से भी मुक्त हो जाओगे। उस वक्त आप अपने आप में स्थिर हो पाओगे। भाव किसको बोलोगे। वही भावनाएं। जब तक चाहिए, तब तक भाव है। भाव शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श में घूमता रहता है। जब तक आपको चाहिए, तभी तक भाव है। चाहिए खत्म, भाव भी खत्म। सिर्फ तुम हो। ऐसी स्थिति बनती है साधक की, हर व्यक्ति की। लेकिन लोग बोलते हैं, बोर हो रहा हूं, घुटन होने लगी, क्योंकि अब किसी भाव में जा नहीं पा रहे हैं। तो वे जाकर, जो समझते हैं, जो देखते हैं, जो सुनते हैं, उस भाव में अपने आप को रख लेते हैं, शिफ्ट कर लेते हैं। ऐसा कभी नहीं करना कि आप किसी भाव में नहीं जा पा रहे हो, तो क्या करूं, उस समय अपने में टिकना चाहिए। जब आपको लगे कि आप किसी भाव में नहीं टिक रहे हो, तो उस समय कहीं अपने आप को लगाना नहीं चाहिए। कमजोर व्यक्ति क्या करता है। एक नए भाव में लगा देता है। उस समय मौका है अपने में स्थिर होने का। जब किसी भाव में आप टिक नहीं रहे हो, तो कई बार ऐसा होता है कि न भजन सुनने का मन करे, कुछ नहीं। कुछ भी नहीं करेगा। तो उस समय कुछ करो भी मत। नया मत करो। क्योंकि पुराना जितना आपने किया है, अब उसमें टिकने का मन नहीं हो रहा है। टिकने की इच्छा नहीं हो रही है। तो अब कुछ नया धारण मत करो। रुक जाओ। तब लगता है कि मन कहीं भी नहीं लग रहा, तो बैठ जाओ। अब आप वहीं रुक जाओ। लेकिन गलती क्या होती है। नया धारण कर लेता है। जाकर कुछ नया करने लगता है। फिर उसमें लिप्त हो जाता है। उससे रस लेता है। जब ऐसी स्थिति हो, विचलित की स्थिति, कि नहीं, अब जितना मैंने ग्रहण किया है, कहीं मन नहीं लग रहा है, कहीं मैं अपने आप को नहीं लगा पा रहा हूं, तो उस समय कहीं कुछ धारण नहीं करना चाहिए। यह शुभ लक्षण है। कुछ धारण नहीं करना चाहिए। आपके पास जितना भी है, आप उसमें शिफ्ट नहीं हो पा रहे हो, रस नहीं ले पा रहे हो, तो उस समय नई जगह शिफ्ट मत करो। उस समय रुक जाओ। रुके रहो, कितनी भी देर। जब तक नया लो ही मत। नया तो धारण ही मत करो। जाओगे तो वही पुराने में ही जाओगे, और उसमें रस आ ही नहीं रहा। और तब फिर जाओगे, फिर समझने लगोगे। और जब आप नया धारण करते हो, तो नया जब तक अच्छा लगता है। लगता है, इससे पुराने ठीक थे। तो फिर पुराने में शिफ्ट हो जाते हो। तो उस समय क्या करना है। नए में नहीं जाना। उस समय रुक जाना है। कोई भी नई जानकारी, नई पहचान, नए लोग, कुछ जाना नहीं है अपने आप को लेकर। उस घुटन में, वह चाहे कुछ भी हो, उसी में रहना है। तब आप अपने आप को देख पाओगे। अपने आप को समझ पाओगे। अपने आप को महसूस कर पाओगे। लेकिन ज्यादातर क्या होता है। हम कहीं शिफ्ट कर देते हैं। घर में भी कोई बोलता है कि मन नहीं लग रहा, तो बोलते हैं जा, घूम आ। जा, टीवी देख। तो जब वह घूमने जाता है, वहां घूम के थक जाता है, तो कहता है, इससे अच्छा तो पुराना वाला ठीक था। तो फिर वह पुराने में चला जाता है।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09