प्रश्नोत्तर P5-0070 · भाग 5
शरीर की सेवा-इलाज (धाम पर ठीक होना) आत्मिक मार्ग में कहां फिट बैठता है? तंत्र-मंत्र से इलाज?
भाई, इस शरीर का सदुपयोग हो, जहां जरूरतमंद है। आज जिस जगह की शरणागति ली हुई है, वहां सब ठीक होकर जा रहे हैं। किससे ठीक हो रहा है। क्या शरीर से। क्या शरीर की व्याधि दोबारा नहीं आएगी। क्या वह ठीक होकर जा रहा है। हां, होकर जा रहा है। वह तो अस्पताल में भी होकर जा रहा है, शरीर। कुछ केस ऐसे हैं जो अस्पताल से ठीक नहीं हुए। मैं कह रहा हूं, ठीक होने से क्या उसका जन्म मरण से, दुखों से मुक्त हो गया। नहीं। अभी नहीं। तो उस योग्य भी तो नहीं है। मैं वही कह रहा हूं कि आप इसमें मत लगो। शरीर को ठीक कर दिया तो क्या ठीक कर दिया। क्या फिर नहीं होगा। बिल्कुल होगा।
शरीर कभी भी देखो। जब लक्ष्मण को बाण लगा, तो हनुमान जी, जिन्हें शंकर का अवतार माना जाता है, पहाड़ उठा के लाए। क्या उन्हें संजीवनी बूटी की पहचान नहीं थी। बोले, हमें नहीं पता, क्योंकि यह काम वैद्य का है। तो इलाज को कभी भी तंत्र मंत्र से नहीं कराना चाहिए। शाबर मंत्र वगैरह का प्रयोग करके, क्योंकि आपको पता है, उसका बहुत ही दोष लगता है। तंत्र मंत्र से अगर आप किसी शक्ति के द्वारा करवाते हो। महाकाली ने कहा कि मैं इस कैंसर को ठीक कर सकती हूं। ठीक करने की क्षमता मेरी है। लेकिन इसे फिर भोगना पड़ेगा। आप जिस शरीर को धाम के द्वारा ठीक कर रहे हो, धाम वाले भी गिर रहे हैं, तुम भी गिर रहे हो, क्योंकि तुम भी सहयोग कर रहे हो। अलग तरीके से किया जा रहा है, प्राकृतिक तरीके से नहीं किया जा रहा। तो धाम के लोग भी गिर रहे हैं। वह गुरु भी गिर रहा है। वह भी गिर रहा है।
लक्ष्मण को बाण लगा तो क्या राम की सामर्थ्य नहीं थी। हनुमान की सामर्थ्य नहीं थी। स्वयं लक्ष्मण की सामर्थ्य नहीं थी। लेकिन वैद्य को बुलाया गया, संजीवनी बूटी दी गई, प्राकृतिक तरीके से इलाज कराया गया। तो वही तो संदेश दे के गए, कि आप लोग ये शाबर मंत्र वगैरह का प्रयोग मत करना, नहीं तो आपको बहुत पीड़ा झेलनी पड़ेगी। जैसे आज हम कोई बुरा काम करते हैं, बुरा काम करके किसी को बचा लेते हैं। लेकिन जब पकड़े जाएंगे तो बचाने वाले की भी नौकरी जाएगी, और उसको भी सजा डबल हो जाएगी।
अपने आप हो रहा है, अपने आप आया, इसमें दोष नहीं है। लेकिन हम जाकर किसी से करवा रहे हैं तो दोनों को दोष लगता है। जिनकी शरणागति ली है, जिनका धाम है, वहां कोई नहीं करता, मोर पंख वगैरह कुछ नहीं करता। अगर अपने आप हो रहा है तो कोई बात नहीं। अपने आप हो, लेकिन मैं उसमें लगा हूं, तो मैं गिर जाऊंगा। अगर अपने आप हो रहा है, लेकिन मैं करता नहीं हूं, तो मैं नहीं गिरूंगा। लेकिन अगर कोई करता है कि नहीं, मैं कर रहा हूं, तो गिरेगा। स्वयं प्रकृति से, अपने आप हो रहा होगा। अपने आप हो रहा है तो कोई बात नहीं। लेकिन अगर मैं कर रहा हूं, किसी मंत्र द्वारा, किसी तंत्र द्वारा, किसी विधि द्वारा, तो दोष है। बस एक ही इलाज है। प्राकृतिक इलाज कराओ, दवा के द्वारा। और अगर प्रार्थना से हो रहा है तो वह जाने, जिसकी प्रार्थना हो रही है। वहां बीच में कोई माध्यम नहीं है। तो बस खत्म बात।
पुजारी इतना कहता है कि कर्ता धर्ता सामने हैं, अपनी जो भी विनती है वहां अर्जी रखो। लेकिन पुजारी को पता नहीं क्या विनती रख रहे हो। मैं एक ही बात कहूं। एक ही काम करो। बस यहां से निकल लो। इसी के लिए, खुद के लिए काम करो। और अगर किसी का सहयोग करना है तो इसी के लिए करो। यह शरीर का काम है। शरीर के लिए बड़ा अस्पताल है। बहुत लोग हैं। इसमें जीवन मत लगाओ।
दाढ़ी बढ़ गई, लोग इज्जत देने लगे। मैंने कहा, यह मान सम्मान तो दाढ़ी को मिल रहा है। उसी दिन दाढ़ी कटवाई। मैंने कहा, यह नहीं चाहिए। मुझे सत्य तक जाना है। सत्य है क्या। मैं कौन हूं। और मेरा उद्देश्य क्या है, जीवन का। तो शरीर के चक्कर में रहोगे, चाहे अपने, चाहे किसी और के, तो सत्य तक नहीं पहुंचोगे। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है सत्य। और सत्य के बाद फिर वह है। भय, अभिमान पहले नष्ट होगा। तो इन सब के चक्कर से निकलो, और अपने चक्कर में पड़ो, कि मैं इस चक्कर से फिर मुक्त हो जाऊंगा।
आज आप भी शरीर के द्वारा दीपक बन के, स्वयं ही साधक को प्रज्वलित कर रहे हो। सदुपयोग ही करवा रहे हो। यह करो। सत्य। सबसे पहले आपने अपना उद्धार करा, स्वयं का। आप अपना उद्धार करोगे, तभी तो किसी और का कर सकते हो। अगर आप अपना उद्धार नहीं कर पाओगे, उद्धार करने का तरीका ही जब मालूम नहीं है, तो आप दूसरों का उद्धार कैसे करोगे। नहीं कर पाओगे। कोई शिक्षक पढ़कर शिक्षक हुआ, तब पढ़ा पाया। अगर शिक्षक नहीं बनता, और उसके अंदर पढ़ाने की जिज्ञासा जाग गई, और शिक्षक नहीं बन पाता, तो नहीं पढ़ा पाता।
अगर किसी का उद्धार करना है तो सर्वप्रथम पहले अपना करना पड़ेगा। तभी तो किसी और का कर पाएगा। अब अनपढ़ आदमी किसी को पढ़ाना भी चाहे तो पढ़ा पाएगा क्या। कहे, मैं भाव से पढ़ाना चाहता हूं। पढ़ा पाएगा क्या। अगर अनपढ़ आदमी सोच रहा है कि इस समाज से अनपढ़पन दूर हो जाए, तो उसे खुद शिक्षित होना पड़ेगा। तब वह जाकर कईयों को अनपढ़ से पढ़ा लिखा बना सकता है। लेकिन एक अनपढ़ आदमी सोचे कि नहीं, मेरा तो भाव है कि मैं पूरे संसार को पढ़ा लिखा कर दूं। हो पाएगा क्या। संभव नहीं है। तो उद्धार की इच्छा जगी, तो पहले देखा कि अपना उद्धार करना पड़ेगा। क्योंकि मैं जब अपने सारे बंधनों को काट दूंगा, तब मुझे छुड़ाना आएगा। तब मैं आपके बंधनों से आपको छुड़ा सकता हूं। एक तैरने वाला ही तैरना सिखा सकता है। बिना तैरने वाला तो डुबा देगा। एक सीखा हुआ व्यक्ति ही सिखाता है। अगर वह नहीं सीखा है तो आपको सिखा सकता है क्या। और भी गड़बड़ कर देगा। कहने का मतलब यह है कि उद्धार अगर किसी का करना है, तो आपको सर्वप्रथम पहले अपना खुद का उद्धार करना होगा। तब आप जाकर किसी का उद्धार कर सकते हो। तब वह क्षमता आप में आएगी।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09