प्रश्नोत्तर P5-0066 · भाग 5
गुरु जी की डांट के पीछे क्या होता है? साधना में घास-कचरा उखाड़ने का मतलब?
सुबह निकले हैं। मैंने गुस्सा किया, जिसका आपको कारण का पता ही नहीं। ऐसा कुछ आपने किया ही नहीं कि मैं गुस्सा करूं, और मैं आपको गुस्सा करने के लिए निकला भी नहीं था। लेकिन डांट तो सबने देखी। सबने देखा। लेकिन रात को आपके लिए गाड़ी हमने भिजवाई। उसको महसूस करो। आप आए। उतनी रात को व्यक्ति सो जाता है। लेकिन आपको आते हुए देखा, उतरते हुए देखा, सीढ़ी पर चढ़ते हुए भी देखा। अपना जर्मन शेफर्ड सीढ़ी तक छोड़ने आया, तो इसने हाथ से हटाया। मैं अंदर ही था। लोकेश ने ऐसे हाथ से किया, तो फिर वह वापस आया। आप उतरने के बाद थोड़ा उसे छूना चाहे, वह भी मैं देख रहा था। जब तुम नहा धो के आए, भोजन करने लगे, तो इसने आपको खिचड़ी दी, लेकिन पापड़ नहीं दिए। तो पापड़ के लिए आवाज किसने लगाई। हमने लगाई। तब उसने पापड़ दिया।
अब बताइए, कौन सा पलड़ा भारी है। उस पलड़े की चर्चा क्यों नहीं हुई। डांट की चर्चा तो हो गई, लेकिन डांट के पीछे बहुत कुछ दिया, उसकी चर्चा तो आई ही नहीं। क्या वह मेरी जिम्मेदारी थी। क्या मेरा वह दायित्व था। कुछ नहीं। लेकिन मैं आपको देख रहा था। अभी उसकी चर्चा तो हुई ही नहीं। उसकी चर्चा मुझे करनी पड़ी, क्योंकि इस पलड़े को आप लोग भारी कर रहे थे। नहीं तो मैं उसकी भी चर्चा नहीं करता। उस दिन दो बजे के बाद तक मैं जागता रहा। जब तक ये आ नहीं गए, तब तक मैं जागता रहा, इनके लिए। लेकिन यह किसी ने थोड़ी देखा।
मैं वही तो कह रहा हूं। आवाज लगी तो मुझे समझ में आ गया। लेकिन समाज तक क्या पहुंचता है। डांटना। उस डांट के पीछे कितना प्रेम छिपा हुआ है, यह लोग नहीं देख पाते, क्योंकि तुम भी तो नहीं बताते। जैसे लाइव में भी लोग सुने होंगे कि तुम्हें डांट पड़ी, लेकिन तुम्हें उसके पहले कितना मिला, वह तो कोई नहीं देख पाया, मेरे अलावा। शायद तुम भी नहीं देख पाए। लोकेश भी देखता, तो बीच में रोक देता, कि गुरु जी ने डांटा, लेकिन गुरु जी ने पीछे कितना दिया। वह तुम नहीं देख पाए, और वह भी नहीं देख पाए। देखता तो जरूर बोलता। देने वाला ही जानता है। क्या मेरी जिम्मेदारी थी, दायित्व था, कर्तव्य था, कि मैं उतनी रात तक जागता रहा तुम्हारे लिए, और तुम्हें देखता रहा। खिचड़ी मिली तो पापड़ नहीं मिली। देने वाला नहीं दे पाया। जब मैंने उसे फोन किया, तब जाकर वह पापड़ लेकर आया। मैं बोला, तुझे पहले देना चाहिए था। फिर मीठा देने के लिए भी कहा, नहीं तो उसने मीठा दिया। यह न लाइव वालों को पहुंच रहा है, न उन लोगों को पहुंच रहा है।
और डांट की तुम्हें जरूरत ही थी, तभी तो डांट मिली। घास थोड़ी उखाड़ रहे हो। कचरा उखाड़ रहे हो। घास तो मैं कहीं भी लगा दूं, उखड़ जाए। घास नहीं उखाड़ रहे हो तुम लोग। कचरा उखाड़ रहे हो। कचरा बाहर उखाड़ रहे हो, तो तुम्हारा भी कचरा साफ हो रहा है। घास उखड़वाने के लिए बुलाया क्या। क्या मेरे पास कोई आर्थिक कमी है। ऐसी तो बात नहीं है। मैं तो वह लगा दूं, अभी कुछ ही देर में उखड़ जाएंगे। तुम घास नहीं उखाड़ रहे हो। घास उखाड़ते मैं तुम्हें उखाड़ने भी नहीं देता। तुम यहां जिस काम के लिए आए हो, वह करो। उस कचरे को साफ करने में तुम्हारा कचरा साफ हो रहा है। और तुमसे यहां क्या, घास रूप में। मैं तो एक गिलास पानी आज तक किसी से नहीं मांगा। कोई बोल दे यहां कि मैं तुमसे घास उठवाऊंगा।
व्यक्ति बहुत कुछ देख पाता है, लेकिन बहुत कुछ रहता है जो वह नहीं देख पाता। हमें क्या पड़ी है कि हम किसी को डांटें। इतना समय है मेरे पास, और मैं इसी के लिए थोड़ी ले रहा हूं। लगे रहो अपने कल्याण में।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09