प्रश्नोत्तर P4-0160 · भाग 4
(वही साधिका) मेरे प्रश्न अगर पोथी के होंगे तो पोथी वाला गुरु भी पोथी से ही बोलेगा; लेकिन असल जिंदगी के प्रश्न का इलाज पोथी में नहीं है। आपको यह कहां से पता चला कि आत्मज्ञान कोई खोई हुई चीज है जिसे ढूंढना है? हमें तो यह शब्द ही समझ नहीं आता — शायद जो फीलिंग आएगी, उसी को आत्मज्ञान कहते होंगे।
मैं आपको बताऊं — आप लोगों को तो पता नहीं, प्रश्न-उत्तर के बाद भी संशय हो जाता है; मैं तो पागलों से पूछता था, भिखारियों से, बैठ जाता था; उनके ऊपर भी मुझे संशय नहीं था। मुझे आंसर सही या गलत नहीं चाहिए था — बस दे दो कुछ भी, मेरे काम का हो गया तो ठीक है, (नहीं तो) मैं चला जाता था या वो उठ के चले जाते थे। मैं पूछ लेता था — कैसे हो (आत्मज्ञान)? यही क्वेश्चन होता था। तो (कोई) मेरे से घंटों बात करते थे, फिर बोलते थे जाओ-जाओ। तो मैं बोला — मैं क्यों जाऊं, जब तुम बता ही रहे हो तो बताओ। तो वो उठ के खुद भाग जाता था।
(आत्मज्ञान क्या है —) आत्मज्ञान — खुद का ज्ञान, मेरा खुद का ज्ञान। जितनी मेरे पास जानकारियां हैं, ये जानकारियां पेट तक हैं — कहां तक? पेट तक; इससे ऊपर तो है नहीं। तो इसके आगे पहुंचना है, तो मेरा ज्ञान चाहिए। (पागल कैसे अपना ज्ञान करा सकता था —) अरे, सुना था कि जाने किस भेष में भगवान मिल जाए, कोई ना कोई सिद्ध पुरुष (हो)। तो हमने कहा, यार, समझदारों से तो पूछ लिया, तो पागलों से भी बात कर लें, भिखारियों से भी बात कर लें। तो मैं ये कहना चाहता हूं कि जब मैं उनके पास भी बैठता था, ऐसा नहीं कि उनके ऊपर संशय था। मुझे अगर कोई कहे 'बता दूंगा' — वो गांजा भी पीता था — तो मैं उसके पास बैठा रहता था, क्योंकि मुझे उसके बाहरी से क्या मतलब, वो क्या कर रहा है; उसने कहा है 'मैं बताऊंगा', ये जिम्मेदारी उसने ले ली। मेरा पहला और आखिरी क्वेश्चन यही था — आत्मज्ञान कैसे?
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30