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प्रश्नोत्तर P4-0159 · भाग 4

(वही साधिका) हम तो किसी को भी स्वीकार कर लेते हैं — जो मिल जाए, जैसे कोई गले-सड़े केले भी ले ले; अपनी क्षमता के अनुसार ही तो पसंद करते हैं। तो मैं क्या जांचूं, कैसे जानूं कि ये सही है या गलत?

(लंबे समय तक अगर जिज्ञासु है, तो देख लो कि सिस्टम क्या है, मेरी तासीर के अनुसार है कि नहीं — अब भक्ति मार्ग वाला आया तो उसको तो कुछ सेट नहीं बैठेगा।) पहले गुरु लोग अपने पास कोई भी आत्मिक कल्याण के लिए आता था तो 12-12 साल रखते थे — कहते थे 12 साल तक तुम्हें हम जांचेंगे, तब बोलेंगे तुम्हारा कल्याण होगा कि नहीं। तो 12 साल के बाद परीक्षा लेते थे। जैसे दो शिष्य थे, 12 साल बीते तो (गुरु ने) कहा कि जाओ, वहां से होके आओ, और रास्ते में गुरु ने कांटा बिछा दिया था। तो एक शिष्य (कांटा) लांघ गया, और एक शिष्य ने कांटा हटाया और आगे बढ़ा। दोनों वापस आए, तो जिसने कांटा हटाया था, उससे कहा — तुम अब शिष्य के लायक हो गए; और (दूसरे से) बोले — तुम 12 साल और सधो, अभी तो शिष्य के लायक नहीं हुए — शॉर्टकट मारा कि मेरे लिए हो जाए, बस, (बाकी) छोड़ो। तो कहने का मतलब — आप ये मत समझना कि आप ही जांचोगे। आपको स्वीकार करने के लिए गुरु भी जांचेगा। इसलिए कि अगर एक शिष्य को आप स्वीकार करते हैं और उसका कल्याण करने की क्षमता आप में नहीं होती, तो 100 गौ-हत्या का पाप लगता है — क्योंकि शिष्य को तो पता नहीं है ना, शिष्य तो अबोध है। अगर आपने शिष्य रूप में उसे स्वीकार कर लिया और आप में कल्याण की क्षमता नहीं थी, तो 100 गौ-हत्या का पाप गुरु को लगेगा, शिष्य को नहीं। इसलिए गुरु पहले बहुत जांचता है, पूरी तरह, इसके बाद शिष्य के रूप में स्वीकार करता है; और गुरु ने स्वीकार कर लिया, तो बात हो गई खत्म। तो कुछ ऐसा करो कि (गुरु स्वीकार कर ले)। आप तो गुरु को स्वीकार कर ही लोगे — उसको तो स्वीकार करने वाले करोड़ों हैं, क्योंकि वो योग्य है। (नहीं तो गुरु-घंटाल भी तो बैठे हैं — इसीलिए तो हमें कई साल, कई महीने रहना है।) आपने तो स्वीकार कर लिया, क्योंकि गुरु तो योग्य है; लेकिन शिष्य रूप में गुरु स्वीकार कर ले, यह बड़ी बात है। आप स्वीकार कर रहे हो, कोई बड़ी बात नहीं है — उसके पीछे तो करोड़ों लाइन लगाए हैं, क्योंकि सामर्थ्यवान है; आप तो अयोग्य हो। लेकिन गुरु भी कहीं ना कहीं शिष्य ही ढूंढ रहा है। लेकिन शिष्य कौन? जिसे आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ नहीं करना है। अब जैसे इन्होंने कह दिया कि हम आत्मिक कल्याण के बाद (वापस) आएंगे — तो जिसके द्वारा आत्मिक कल्याण होगा, हमें उससे पूछना चाहिए कि अब हम क्या करें, आगे क्या? लेकिन हमने कह दिया कि हम आत्मिक कल्याण के बाद उसी नरक में आएंगे — तो कल्याण तो होगा ही नहीं, कि तुम एकदम चालाकी से आए हो। तो भाई, मैं आप लोगों से यह कह रहा हूं कि आप पहले शिष्य बन जाओ, गुरु आपको मिल जाएगा; और गुरु ने अगर स्वीकार कर लिया, तो आपका कल्याण पक्का हो गया — उसी समय पूरी जिम्मेदारी उसकी, अब आपकी नहीं रही। आपकी जिम्मेदारी यहीं तक है कि वो स्वीकार कर ले। तुम क्या अपना कल्याण कर पाओगे? तुम्हारे में क्षमता होती तो कर नहीं लेते? तुमसे कुछ नहीं होगा। तुमसे सिर्फ इतना हो जाए कि तुम शिष्य बन जाओ — अगर इतना करो तो कर लो, बस। और शिष्य बन भी ऐसे सकते हो कि भई, जो नियम हैं वहां के, उन नियमों में रहो। (वहां के नियम) तुम्हें शिष्य (बनाने) के लिए बनाए गए हैं — शिष्य में कैसे पहुंच जाओ; अभी तुम शिष्य थोड़ी ना हो, अभी तो आवारा टाइप हो, ठोकरें खा रहे हो। उन नियमों में रहोगे, तो पात्रता आ जाएगी, योग्यता आ जाएगी; और आप उस नियम में रहोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि गुरु कहीं ना कहीं आपको स्वीकार कर लेगा। जैसे मान लीजिए, आज बाबूलाल नहीं थे, लेकिन बाबूलाल के लिए हमने कहा कि बाबूलाल अगर यहां रहते हैं, तो पूरी जिम्मेदारी मेरी है। लेकिन बाबूलाल एक बार घर जाके चले आते हैं, तो मेरी जिम्मेदारी नहीं है। बाबूलाल मेरे कहे अनुसार चलेंगे, तो मेरी; लेकिन बाबूलाल जाके मस्ती भी करके आएंगे, तो बाबूलाल की जिम्मेदारी मेरी थोड़ी ना है। जिम्मेदारी कब होती है? जब आप पूरी तरह उसके हो जाते हो। (इसी तरह) आपके बारे में भी बात हुई, आप वहां मौजूद नहीं थे — तो हमने यही कहा कि भाई, अगर इन्हें कुछ होता है, चाहे बीमार हों, चाहे कुछ हो, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी — अगर ये मेरे बताए अनुसार पूरी 100 में 101% चल रहे हैं, तो पूरी जिम्मेदारी मेरी। लेकिन अगर 1% भी इधर-उधर हो गए, तो मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई। क्योंकि अभी मैंने पूरी तरह इन्हें स्वीकार नहीं किया, अभी तो मैंने इनको नियम में रखा है। और मैंने पहले ही बोल दिया है कि अगर तुमने कुछ इधर-उधर किया, तो मैं आगे नहीं मिलूंगा। अभी तो ये चल रहे हैं, शिष्य होने की योग्यता ला रहे हैं, नियम में रह के। अगर आप एक बार शिष्य बन गए और गुरु ने स्वीकार कर लिया, तो बात खत्म हो गई। ऐसा कुछ करो कि गुरु स्वीकार कर ले। गुरु को भी तो शिष्य चाहिए — लेकिन गुरु को शिष्य ही चाहिए, (क्योंकि) शिष्य का ही कल्याण हो सकता है। शिष्यपन आप में है ही नहीं, तो कल्याण हो ही नहीं सकता। शिक्षक कितना भी अच्छा पढ़ाता हो, लेकिन मंदबुद्धि बालक उसके पास पहुंच जाए तो वो क्या करेगा? आप प्रोफेसर हो — आपको ही अगर मंदबुद्धि बालक को पढ़ाना हो, क्या आप उसे पढ़ा सकते हो? अगर आप योग्य हो, तो आपको भी योग्य चाहिए, तभी आप उसे (लक्ष्य तक) पहुंचा सकते हो। वरना कितना भी अच्छा पढ़ा के क्या करोगे — अपनी एनर्जी वेस्ट करते रहोगे, और वो प्रेशर में आ जाए, और ज्यादा मंदबुद्धि हो जाए। तो गुरु को भी शिष्य चाहिए, उसे भी शिष्य की तलाश है, क्योंकि उसके पास कुछ है, (जो) शिष्य को ही देना चाहता है — वो ले के क्या करेगा? आप प्रोफेसर बनकर अपने लिए कुछ किए क्या? किसी को पढ़ाया ना। आपकी पढ़ाई किसके काम? जैसे आपकी वकालत है, तो किसके काम? समाज के काम ना। तो वैसे ही गुरु-पद पे अगर कोई हो गया, तो उसका ज्ञान किसके काम? समाज के काम। जैसे रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को सब दे दिया, औरों को क्यों नहीं दिया? और ऐसा नहीं पहले दिन दे दिया — कितना जांचा! स्वामी विवेकानंद ने भी पूरी तरह जांचने के बाद पूरी तरह (समर्पण) कर दिया, तब उन्होंने उन्हें वो दिया। तो गुरु भी तो जांचेगा। आप ये मत समझना कि आप योग्य होके गुरु को जांच रहे हो, और गुरु योग्य होके आपको नहीं जांचेगा। आप अयोग्य होके योग्य को जांच रहे हो। (जांचना भी जरूरी है —) वो तो जांचना ही चाहिए — 'पानी पियो छान के, गुरु करो जान के।' अगर पानी गंदा पिया, तो अनेक तरह के रोग पैदा कर देगा। गुरु ऐसे ही जाके बना तो लेते हैं ना — पहले दिन गए, गुरु को साष्टांग, (फिर पछताते हैं)। तो पहले तो आप पूरी तरह शिष्य हो कि नहीं, ये जांच लो — तब आपके सामने गुरु ही टिकेगा। पहली बात तो ये आपको बता दूं — अगर आप पक्के शिष्य हो, तो गुरु के अलावा किसी की ताकत नहीं है कि तुम्हारे सामने टिक जाए; और अगर आप खुद नकली हो, तो आपके सामने नकली ही टिकेगा, असली का तो काम ही नहीं है आपसे, क्योंकि असली तो साफ-साफ बोलेगा। और जिज्ञासु तेज होगा, तो वो भी तो छान देगा ना — अगर वो (गुरु) कहीं से कॉपी-पेस्ट मार रहा है, तो वो भी हिल जाएगा। एक बार जिज्ञासु अपनी असली जिज्ञासा लेके पहुंच गया, (तो नकली नहीं टिकेगा)। तो शिष्यपन का भाव पहले अपने अंदर लाओ।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30