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प्रश्नोत्तर P4-0155 · भाग 4

(कुटिया में साधिका) योगी जी, आप कहते हो कि सारी समस्या उम्मीद पर टिकी है, उम्मीद छोड़ दो। लेकिन मुझे तो किसी से कोई उम्मीद दिखाई ही नहीं देती, बचपन से मैंने अपने बलबूते पे किया है। मेरा भय यह है कि कभी शरीर में कोई बड़ी बीमारी आ जाए, बुद्धि काम ना करे, या प्रारब्ध इतना तगड़ा हो कि मेरी यात्रा ही ना हो पाए। तो मेरी सूक्ष्म से सूक्ष्म उम्मीद मुझे कैसे पता चले? मुझे तुरंत वाला मार्ग बता दो (वाल्मीकि की तरह बैठ जाऊं), ताकि जब तक मैं स्वस्थ हूं, समय बर्बाद ना हो।

देखो, ऐसा है — पहले उम्मीद को समझिए। एक होता है कि मुझे मिल जाए, एक होता है कि उसे मिल जाए। तो हमारी उम्मीदें ऐसी भी रहती हैं कि ये सुखी हो जाए, ये सुखी हो जाए, इनका ठीक हो जाए, इनका अच्छा हो जाए, ये बड़े दुखी हैं, ये बड़े निराश हैं — ये भी एक उम्मीद है। एक व्यक्ति दे रहा है, एक व्यक्ति ले रहा है, लेकिन है तो (उम्मीद ही)। हमें पूरी तरह कर्म के सिद्धांत को समझना होगा। हम प्रकृति के बदलाव को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते; कहीं ना कहीं हम दोष देखते हैं, ज्यादातर हम इसी में उलझे रहते हैं। तो कहीं ना कहीं हमारा अटैचमेंट है कि इसकी लाइफ सही हो जाए, या मुझे किसी में दोष दिख रहा है — कई लोगों में, कई समूह में, कई संप्रदाय में। फिर मुझे पता है कि मेरे बहुत बंधन हैं, फिर भी मैं कह रहा हूं तुरंत हो जाए, और मुझे पता है नहीं होगा, क्योंकि हम सारे बंधनों को छुड़ाएंगे, तभी होगा। जैसे उस व्यक्ति ने प्रश्न तो मुझसे कर दिया कि तुरंत हो जाए, लेकिन हमने कहा उम्मीद छोड़ दो, तो क्या छोड़ पाया? एक दिन तो बीत गया। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि आपको उम्मीदें छोड़नी हैं, आसक्ति छोड़नी है — बड़ा-बड़ा तो दिखेगा, लेकिन सूक्ष्म नहीं दिखता। जैसे आनंद को सब तो दिख गया कि हम तो सब छोड़ दिए, लेकिन तब बुद्ध ने कहा — तुम मेरे शरीर में फंस गए हो। यह आनंद नहीं देख पा रहे थे। आनंद का सब छूट गया था, हर जगह, लेकिन बुद्ध के शरीर में लिप्त हो गए थे, आसक्ति हो गई थी; तो जब बुद्ध का शरीर गया, तब जाके उन्हें उपलब्धि हुई। तो वैसे ही कहीं ना कहीं हम लिप्त हैं, कहीं ना कहीं हम आसक्ति में फंसे हुए हैं, और इसे हमें बहुत समझदारी से (छोड़ना) पड़ेगा। हमें पता है हम तुरंत के लायक हैं ही नहीं — क्या ये बात हमें नहीं पता है? (तुरंत वाला — वाल्मीकि की तरह बैठ जाओ —) जब पता है तो किसी से पूछने की भी जरूरत नहीं है। जब हमें ये बात पता है कि वाल्मीकि की तरह बैठ जाओ, तो हम किसी से पूछ क्यों रहे हैं? पूछ रहे हैं, इसका मतलब बैठना-वैठना नहीं है। जैसे उस बालक को हमने बता दिया उम्मीद छोड़ दो — क्या छोड़ दिया उसने उम्मीद? पूछ तो लिया तुरंत का मार्ग बताओ — क्या वो कर पाया? हमें खुद पता है कि तुरंत के लायक हम नहीं हैं। बस हमें पूछना है, तो हमारी जितनी क्षमता हो, जितना मैं कर सकूं — काश मैं उतना पूछता। जैसे एक व्यक्ति गया व्यापार करने, पैसा कमाना है, वो बस व्यापार का पता लगा रहा है कि कौन सा व्यापार करके मैं करोड़पति-अरबपति बन जाऊं। अब एक व्यापार तो है नहीं; अगर एक आदमी व्यापार ही पता करता रहे तो व्यापार पता करने में जिंदगी चली जाएगी, काम नहीं कर पाएगा। काश, वो अपनी स्थिति अनुसार व्यापार ही शुरू कर देता, सामने वाले से जाके कहता कि हमारी क्षमता के अनुसार आप मुझे मार्ग बताओ। तो सामने वाला अगर योग्य है तो फिर आपकी क्षमता (के अनुसार बताएगा)। बहुत लोग ऐसे आवेश में आकर जीभ काट लिए, कोई हाथ काट लिया — लेकिन हुआ क्या? ऐसे थोड़ी ना होता है। तुरंत (के) लायक स्थिति तो होनी चाहिए। वाल्मीकि के सामने गुरु ने उन्हें बोध कराया कि तुम्हारा कोई नहीं है — उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें बोध कराया। वो गुरु को बांधते हैं, परिवार के पास जाते हैं — पत्नी से पूछते हैं, बाप से, बच्चों से, मां से पूछते हैं — तब जाके वहां से उनका भ्रम टूटता है, तब जाके आके समर्पण करते हैं, तब जाके बैठ पाते हैं। ऐसे अगर कोई बैठ जाए तो (वो) संकल्प ले के बैठा, वो (खुद) जिम्मेदार है। क्योंकि वहां तो गुरु ने बोला था — जा, ये नाम लेके बैठ जा — तो गुरु जिम्मेदार होगा। तो गुरु आपकी स्थिति के अनुसार बताएगा; गुरु को बताने दो ना। आप बोलो ना कि मेरी स्थिति के अनुसार बताओ मुझे; क्योंकि वहां फिर अगर गुरु ने कह दिया 'जा बैठ', आदेश दे दिया, फिर गुरु जिम्मेदार हो जाएगा। लेकिन आप जबरदस्ती कह रहे हो — नहीं, मुझे तुरंत का बताओ — और तुरंत लायक तुम हो नहीं। अब ये बालक ने पूछ लिया, क्या कर लिया एक दिन में? समय बर्बाद होता है ना। ये मेरा समय (कितना कीमती है), आपको अभी नहीं समझ में आ रहा, क्योंकि आप प्रबल जिज्ञासु नहीं हो, आपको बस कुछ पूछना है, जितने दिन यहां रहना है। काश, अपनी स्थिति के अनुसार प्रश्न करते — वो ज्यादा आपको ऊपर लेके जाता। जेब में ₹100 है और करोड़ों की बात — मुझे करोड़ों का व्यापार बताओ! अरे बोलो भाई, जेब में ₹100 है। हमें अपनी क्षमता खूब पता है। वाल्मीकि ने थोड़ी ना कहा कि मुझे तुरंत बताओ, मैं तुरंत उपलब्ध होऊंगा। वो तो गुरु ने उसकी स्थिति देख के, जब देखा कि उसकी परिवार से आसक्ति तुरंत हट गई, तब कहा — जाओ, ये लेके बैठ जाओ, अब तुम्हारा कल्याण (होगा)। तो जिद में आके, बातों में आके 'तुरंत का मार्ग बताओ, तुरंत का मार्ग बताओ' — आदत हो गई है। हमें कभी भी अपनी स्थिति के अनुसार ही बात करनी चाहिए, और हर व्यक्ति को अपनी स्थिति का पता है। जब आप अपनी स्थिति के अनुसार चलोगे, तो आप लक्ष्य तक पहुंच ही जाओगे।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30