प्रश्नोत्तर P4-0142 · भाग 4
(लाइव) गुरुदेव नमन। रमण महर्षि जी कहते हैं कि हमें बस भ्रम है अपूर्णता का — यही माया है। कृपया क्लियर करें।
मैं कह रहा हूं, अगर भ्रम भी है — रस्सी देख के सर्प का भय हुआ — तो मतलब सर्प भी तो कहीं मौजूद है हमारे दिमाग में। भ्रम ही सही, भ्रम का भी तो आधार-बेस है; ऐसे थोड़ी भ्रम हो गया है। तो भ्रम टूटेगा तभी कुछ क्लियर होगा। जैसे भ्रम हुआ है, वैसे भ्रम टूटना भी चाहिए, क्योंकि भ्रम हो चुका है। जैसे मान लीजिए, आपने विवाह किया, अब आपने एक-दूसरे को स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) मान लिया। तब जिस रीति-रिवाज से विवाह किया है, उसी रीति-रिवाज से जब छूटेगा, तब होगा कि भाई अब मेरी पत्नी नहीं, मेरा पति नहीं। लेकिन वो रीति-रिवाज नहीं अपनाओगे, और तुम दोनों एक जगह से दूसरी जगह चले जाओ, 100 साल बाद भी बुढ़ापे में मिलना हो गया तो कहोगे यार ये तो मेरी पत्नी है, मेरा पति। और अगर आपने जिस तरीके से विवाह किया था, उस तरीके से छोड़ दिया, और 100 साल बाद मिले, तो कहोगे कि 100 साल पहले हम पति-पत्नी थे, लेकिन अब नहीं। तो जैसे आप फंसे हो, वैसे निकलोगे। जैसे भ्रम पैदा हुआ है, वैसे भ्रम टूटना भी चाहिए। भ्रम का भी आधार है, बेस है। सिर्फ इतना कह देने से कि नहीं, तुम्हें भ्रम हुआ है, छोड़ दो — अरे, भ्रम हो गया है।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25