प्रश्नोत्तर P4-0078 · भाग 4
(कुटिया में साधक) गुरु जी, आप कुछ बोल रहे थे — वो मैं जानना चाह रहा था कि आसन में कैसे नहीं बैठते? मतलब बैठने में हम क्या गलती कर देते हैं?
बैठ गए तो बैठ गए। कोई फिक्स आसन मत लो, जिसमें आपको आराम लगे; लेकिन एक बार बैठ गए तो बैठ गए — एक-आध, दो घंटा जाने दो। अब हर समय पांव बदलते रहोगे तो आप बाहर आ गए ना। फिर जहां आत्मिक चिंतन भी हो रहा था, कुछ विचार भी आ रहा था, उससे भी तो हटना पड़ा, पैर के चक्कर में। तो मेरा कहना है — पैर दुख रहा है तो एक बार आप फैसला कर लो कि आपको क्या तकलीफ है और मैं किस आसन में बैठूं तो मैं उचित तरीके से बैठ सकता हूं। कोई फिक्स आसन नहीं लगाओ, लेकिन आप जिसमें बैठो, बैठ जाओ। ये मैं आपको बोलने वाला था, क्योंकि आपको मैं देख रहा था।
ऐसा नहीं कि आप लोग बाहर हो तो — यहां कोई लावारिस नहीं है। क्योंकि मेरे ऊपर किसी का अनुशासन नहीं था, मैंने खुद पे अपना अनुशासन किया है। तो लावारिस क्या होता है, मैंने जिया है; मैं नहीं चाहता आप लोगों को ऐसा कुछ फील हो। तो मेरी नजर हर वक्त रहती है आप लोगों पे, यहां पे रहने वालों पे, मैं कहीं भी रहूं। आत्मिकता से — यहां जितने लोग साधना करने आए हैं, उसकी एक मेरी जिम्मेदारी है। आप यहां लावारिस नहीं हो कि मैं चला गया तो आप घूमते रहोगे। मैं अंदर हूं तो आप बाहर क्या कर रहे हो, मुझे सब पता है, मैं पूरा देखता रहता हूं, कैमरा लगा है। ना यहां कोई कमी है। आप एकदम जिसके लिए आए हो, करो — बस एक पल भी बर्बाद मत करो। क्योंकि आपको कुछ सोचना ही नहीं है; शरीर की जितनी भी जरूरत है, यहां सारी व्यवस्था आपके लिए है — भोजन है, एकांत है, और क्या चाहिए जीवन में? कोई रोक नहीं है, कोई टोक नहीं — आप वो करो।
और हमारी नजर, जब तक मैं इस शरीर में हूं, तब तक रहेगी। यहां पे आने वाले हर जिज्ञासु की जिम्मेदारी मेरी है। आप यहां अगर आ गए और आप इस नियम में जी रहे हो, तो आत्मिक कल्याण पक्का है, कोई रोक नहीं सकता — यह जिम्मेदारी फिर मेरी है, आपकी नहीं। अगर आप मेरे बनाए हुए सिस्टम में पूरी तरह जी रहे हो, तो जवाब मुझे देना पड़ेगा; आपका स्तर उठने की जिम्मेदारी मेरी है। आपको सिर्फ इस नियम में (जीना है) और जिसके लिए आप लोग आए हैं, उस कार्य को करिए।
(सन्यासी महाराज जी से —) और आपको मैं इसलिए बोलता हूं कि आप सन्यासी जीवन अपनाए हो तो सन्यासी का पूरा काम करो, समय बर्बाद मत करो। मैं आपको बताऊं — मैं ऐसे नर्मदा तट पर घूम रहा था, उस समय खोज में ही था, और उस समय ऐसा हो गया था कि मेरे पास विश्व में रहने के लिए कोई जगह ही नहीं थी, हर जगह छूट चुकी थी। ओमकारेश्वर में एक ब्रह्मचारी मिले थे; मैं पेड़ के नीचे बैठा था, बात होने लगी, बोले — खाओ-पियो, घूमो, कोई यहां कमी नहीं है नर्मदा तट पे। मैंने बोला — ये तो आवारा कुत्तों को मिलता है। अगर मैं इसके लिए निकला हूं तो इस कुत्ते में और मुझ में क्या फर्क है? मुझे जीवन का कोई उद्देश्य ले के चला है। ये रोटी तो आवारा कुत्तों को मिलती है।
तो भेष वाला (भेष वाला) पूरा काम करोगे तो कल्याण पक्का है। अगर आप एक महापुरुष के बनाए हुए नियम में जी रहे हो तो पूरी जिम्मेदारी उसकी। लेकिन नहीं जिओगे तो फिर वो निकाल देगा, और उसका भी परिणाम आपको भोगना पड़ेगा, क्योंकि आप एक ऐसे महापुरुष को फिर दुख देके, पीड़ा देकर जा रहे हो — तो एक और दोष लग गया, कि आप उसके नियम को तोड़ के जा रहे हो, अहंकार में जा रहे हो। तो हमें बहुत सूझबूझ के साथ (जीना है) — हम जहां जा रहे हैं, क्या मैं जाने लायक हूं? क्या मैं वहां का पूरा काम कर सकता हूं? या बस मैं सामने वाले को परेशान करने चल दिया?
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25