प्रश्नोत्तर P3-0175 · भाग 3
(कुटिया में, राजस्थान बारां से आए साधक) मेरी एक आदत है — मैं स्वाद में पड़ा हुआ हूं; पेट भर जाने के बाद भी किचन में जाकर और खा लेता हूं, तृप्ति नहीं होती। छोड़ना चाहता हूं पर छोड़ नहीं पा रहा। यहां की व्यवस्था में स्वाद नहीं मिलेगा, इसलिए आया हूं कि सात दिन में यह आदत छूट जाए; पर रुकना नहीं हो रहा, मैं सुबह ही वापस जा रहा था।
स्वाद में फंसे हुए — क्या उस स्वाद को पाने के लिए सबको परेशान करते हो? क्या उस स्वाद को पाने के लिए बेईमानी करते हो? मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि आप कोई भी भोजन करते हो, स्वाद अपने आप आता है। तो अब आप कोई भी स्वाद बेईमानी से मत लो और किसी को तकलीफ मत दो उस स्वाद के लिए। जैसे मान लीजिए आपने भोजन बनवाया और भोजन आपके तरीके का ना बन पाया (तो किसी को तकलीफ मत दो)।
ऐसा नहीं कि सात दिन ही रुको। सात दिन तो पक्का मैंने रखा, क्योंकि लोग एक-एक दिन में चले जाते थे। सात दिन के ऊपर भी रहो। (सुबह जाने की) ऐसी गलती मत करना, क्योंकि एक बार गए तो दोबारा नहीं आ पाओगे।
रोको अपने आप को। आप अपने आप को रोको, अपने पर अनुशासन करो। बस जाने मत दो — बाकी काम मेरा। बस अपने आप को जाने मत दो; एकदम रोक कर रखो — नहीं जाना तो नहीं जाना। सात दिन तो अनिवार्य रहना। अगर इससे भी ज्यादा रह सकते हो आप लोग, तो आजीवन रहो; लेकिन सात दिन तो पक्का, क्योंकि लोग एक-एक, दो-दो दिन में भाग जाते थे, इसलिए हमने सात दिन रखा। एक-दो दिन में भाग जाते थे तो कोई मतलब नहीं रहता था। अगर सात दिन नहीं रखा होता तो आज आप भाग ही जाते।
जितने दिन हो सके ज्यादा से ज्यादा रुकना है, लेकिन सात दिन नहीं पूरा करोगे तो फिर आ नहीं पाओगे। आप इस नियम को पहले पढ़ो — अगर आप छह दिन में, पांच दिन में, चार दिन में, दो दिन में, एक दिन में भाग गए, तो दोबारा यहां एंट्री नहीं है। फिर आप आओगे तो आने ही नहीं दिया जाएगा, तो आप क्या करोगे? तो ऐसी गलती आप लोग मत करना। नहीं बीत रहा है तो सात दिन तो बिता ही लेना कैसे भी, ताकि जीवन में फिर ये रास्ता खुला रहे आने के लिए। सात दिन से भी ज्यादा रहना है तो रहो; सात दिन तो पक्का रहो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01