प्रश्नोत्तर P3-0108 · भाग 3
(उसी प्रसंग में) तो रूप, स्वाद और वस्तु के पीछे वाले के प्रति इस अच्छे-बुरे के फंसाव से छूटें कैसे?
कुछ नहीं चाहिए — एक फार्मूला है, बस पकड़ लो, बात खत्म हो गई। शून्य भी कुछ है। मान लीजिए दो आदमी बैठ गए — एक ने कहा कुछ नहीं चाहिए, एक ने कहा मैं शून्य में बैठा हूं। किसी ने शून्य वाले के आगे एक लगा दिया, तो शून्य वाला पगला जाएगा — यह तो दस हो गया; दो लगाए तो बोलेगा मेरे पास तो बीस हो गए, हमें पता भी नहीं चला। और 'कुछ नहीं चाहिए' वाले के आगे एक मारे चाहे दो, वह हंस देगा — ले जा अपना एक-दो — क्योंकि जितना मार रहा है उतना ही रहता है, बढ़ नहीं रहा; वह बोलेगा यार मैं तो कुछ नहीं हूं, यह कुछ होने वाला तुम्हारा नहीं, निकल लो। वहां द्वैत नहीं आ पाता। शून्य में द्वैत आ जाता है, क्योंकि शून्य भी कुछ है; कुछ है तभी शून्य होगा। इसलिए मेरा कहना है, तुम शून्य को भी छोड़ दो।
द्वैत का मतलब — दूसरा; हम ज्यादा वह कम, या वह ज्यादा मैं कम — बस यही द्वैत है, तुलना। जब तक आपके जीवन में तुलना है, तब तक आप द्वैत में हो। तो मेरा कहना है — बस कुछ नहीं चाहिए, बात ही खत्म कर दो; कोई भी आए, कुछ नहीं चाहिए। लेकिन वह आंतरिक होना चाहिए, कहने से नहीं — नहीं तो वह बोलेगा, यह कह रहा है कुछ नहीं चाहिए, तो इसे भोजन दे दो।
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