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प्रश्नोत्तर P21-0114 · भाग 21

योगी जी, आपने कहा था आत्मज्ञान के लिए ईमानदारी और सत्कर्म दोनों जरूरी हैं और ये दो अलग चीजें हैं — पर सत्कर्म के अंदर तो ईमानदारी होनी ही चाहिए ना? फिर आप दोनों को अलग-अलग क्यों बताते हैं?

ईमानदारी आपके कर्म में है — आप कुछ भी करते हो उसमें ईमानदारी है। आप अपने लिए या अपने परिवार के लिए भोजन-व्यवस्था लाते हो, वो ईमानदारी से ला रहे हो कि बेईमानी से — वो कर्म है, सत्कर्म नहीं। सत्कर्म तब है जब आप जरूरतमंद की सेवा करते हो, और सत्कर्म से आपका उद्धार होगा, क्योंकि सत्कर्म "मेरा" में नहीं होता, "तेरा" में होता है — जब आप सत्कर्म करते हो तो आपको ये भी नहीं पता कि सामने वाला कौन है। तो अगर आप ईमानदारी कर रहे हो, सत्कर्म नहीं कर रहे हो, तो भी उद्धार संभव नहीं; क्योंकि ईमानदारी अपना ली तो आगे बंधन बंधना बंद हो गया, लेकिन पिछला जितना कचरा है वो कैसे जाएगा? सत्कर्म से। जैसे मशीन बिगड़ गई — बिगड़ने वाली जगह तो खोज ली, पर उसका सामान लाने के लिए मूल्य तो लगेगा ना; वैसे ही सत्कर्म में आपको धन, या तन, या अपनी समझ खर्च करनी पड़ेगी — बिना खर्च किए सत्कर्म नहीं होगा। सत्कर्म तो पापियों के द्वारा भी हो जाता है — पापी से रास्ता पूछो तो टेढ़े तरीके से बताता है, पर सत्कर्म उसके द्वारा भी हुआ; प्रकृति सत्कर्म का मौका दे ही देती है, सत्कर्म से ही तो कुछ बचे हो आप। लेकिन पूरी तरह निकलना चाहते हो, आत्मिक कल्याण चाहते हो, तो दोनों चाहिए।

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वीडियो: मुझे कहां होना है ? कलबुर्गी कर्नाटक में पुनः सत्संग 12 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-14