आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P2-0192 · भाग 2

कोई संन्यासी हो या गृहस्थ में रहकर धार्मिक जीवन जी रहा हो — वह किस बात से अपनी जांच करे कि मैं कहीं पहुंच भी पा रहा हूं या नहीं?

उसे पता है — वह जहां भी है, उसे पता है कि मैं इसीलिए (यहां) हूं। (अपनी अंतरात्मा से पूछो कि भाव कहां है, असल में कर क्या रहे हो।) बहुत लोग अध्यात्म के नाम पर ही घूमते रह जाते हैं; मुझे बहुत लोग मिले। एक व्यक्ति नर्मदा परिक्रमा कर रहे थे, बता रहे थे कि 12 साल एक पांव पर खड़े रहे, पांव सड़ गया। मैंने पूछा — उसका परिणाम क्या मिला? बोले — मेरे आश्रम बन गए। तो उनकी 12 साल की तपस्या का परिणाम एक आश्रम है; इसका मतलब वे वहीं जा रहे थे, उनको वही चाहिए था।

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वीडियो: आखिर कब तक ये याद रहेगा ? #योगी · 2026-01-16