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प्रश्नोत्तर P19-0014 · भाग 19

गुरु जी, कुटिया के निर्माण के लिए आप दान कैसे लेते हैं? साधकों से क्यों नहीं लेते और लाखों रुपये तक मना क्यों कर दिए?

साधकों से हम नहीं लेते। कोई देना चाहे तो कहते हैं — मेहनत की कमाई है, सोच-समझकर लगाना, ऐसा न हो कि लगाने के बाद पछतावा हो; यह नंबर है, उस पर बात करना। वहां वाले जानबूझकर उल्टी बात करते हैं — अहम भाव में रहोगे तो दोगे ही नहीं; जो फिर भी सीधे से बात करे, समझ आ जाता है उसका ईमानदारी का धन है। कोई धंधा सीधा नहीं लिया जाता, पहले पूछताछ होती है। 1000-2000 वालों से कहते हैं ट्रस्ट बनेगा तब देना, क्योंकि उसका उपयोग नहीं हो पाएगा; जिसका अमाउंट काम आएगा उसे हां, नहीं तो ना। सेवा करने वाले इतने ईमानदार हैं कि करोड़ों भी कोई दे तो मुझसे पूछे बिना नहीं छूएंगे, और कभी नहीं कहते "इतना लगाइए"। एक दानदाता लाखों देना चाहते थे, बस एक बार मुझसे फोन पर बात करके कंफर्म करना चाहते थे; कर्ज लेकर निर्माण हो रहा था, जरूरत भी थी — पर मैं फोन पर किसी से बात नहीं करता, तो एक से करूं तो सबसे करनी पड़ेगी; इसलिए मना कर दिया — वह भी अपनी जगह सही, मैं भी। ज्ञान के बाद भी परीक्षा देनी पड़ती है। यह परमात्मा का कार्य है — ईमानदारी से हो तो ठीक, नहीं तो मत हो। मेरा रोम-रोम ईमानदार है, मैंने अज्ञानता में भी कभी मतलब से किसी से बात नहीं की। यहां लेनदेन की बात मत करो — ज्ञान लो, सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो, यही मेरे लिए सेवा है। कुटिया बनने से पहले ही पता है एक दिन मिटेगी — मिटने वाली चीज के लिए अपने आप को नहीं गिराना।

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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29