प्रश्नोत्तर P18-0199 · भाग 18
गुरु जी, सब संतों ने कहा है कि शब्द, कलमा, नाद, वाणी, नाम से ही सब कुछ पैदा हुआ और वही शब्द/नाम हमारे अंदर भी है, जिसकी धुन सुनाई देती है — इसे समझाएं।
अंदर आत्मा है, शब्द नहीं। शब्द टकराहट से निकलता है; आत्मा शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है, तो वहां शब्द कैसे प्रकट होगा? शब्द तो जगत में प्रकट होंगे। आत्मा की कोई धुन नहीं — धुन दो से होती है, एक में धुन पैदा ही नहीं हो सकती; एक उंगली से धुन पैदा करो, होगी तो हवा की टकराहट से। आत्मा का कोई रूप नहीं, वह रूप से परे है। धुन परमात्मा नहीं है; धुन पकड़ ली तो भी जगत में ही फंसे — फिर धुन अलग, मैं अलग, परमात्मा अलग — तीन हो गए। अगर एक ही है, तो सुनने वाला कौन? नाम लेकर क्या करेंगे — नाम के पीछे जो है वहां जाना है; धुन नहीं, जहां से धुन निकल रही है वहां जाना है। सीधी बात — "कुछ नहीं" में आ जाओ, तब परमानंद की यात्रा होगी।
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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29