प्रश्नोत्तर P17-0026 · भाग 17
गुरु जी, एक प्रश्न है — आत्मज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी में क्या अंतर है?
आत्मज्ञान मतलब खुद का ज्ञान — आत्मा खुद को बोला गया है। ब्रह्मज्ञानी मतलब ब्रह्म का ज्ञान। अब ब्रह्म को, पारब्रह्म को, परम ब्रह्म को लोग अलग-अलग मानते हैं, लेकिन कितने को भी मान लो, आखिरी में एक ही सत्ता है — सबने इस बात को स्वीकार किया है। किसी ने आखिरी शिव को माना है, किसी ने उससे ऊपर किसी को माना है, तो उसने भी आखिरी माना है। अगर यात्रा की शुरुआत करोगे तो पक्का आखिरी तक पहुंचने वाले हो — जैसे-जैसे पता चलेगा कि "नहीं, इससे आगे कुछ है", वहां पहुंचकर पता चल जाएगा, क्योंकि आप यात्रा कर रहे हो। ब्रह्म के बारे में हमने बस सुना है — वो हो भी सकता है, नहीं भी। इस भवसागर को पार करके उस तक चले गए तो ब्रह्म; पार करके गए तो पारब्रह्म; और मिलना हो गया तो परम ब्रह्म — यही ब्रह्म, पारब्रह्म, परम ब्रह्म की परिभाषा है। और आत्मज्ञान के बाद ही इसकी यात्रा हो सकती है, आत्मज्ञान के पहले हो ही नहीं सकती। जब तक आप क-का-कि नहीं सीखो, मिलावट अक्षर नहीं पढ़ सकते; अगर उसके पहले पढ़ रहे हो तो रट्टा होगा। कोई संशय हो तो निसंकोच बोलिए — हां में हां नहीं करना है, प्रश्न को पूरी तरह खत्म करना है। और जहां दबाव और संकोच में बात करनी पड़े, वहां रुकना ही मत; जहां खुलकर अपनी बात रख सको और सीधा-सादा उत्तर मिले, वहीं रुकना चाहिए। कोई कहे "आप नहीं समझ सकते, मैं समझ गया" — तो वो बेवकूफ बना रहा है; एक ही से सब है, तो आप समझ गए तो मैं क्यों नहीं समझ सकता — मेरी कमी तो बताओ।
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वीडियो: आत्मज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी में क्या भेद है | मन क्या है / #आत्मज्ञानी #ब्रह्मज्ञानी #aadhyatmik · 2024-09-04