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प्रश्नोत्तर P8-0190 · भाग 8

धारणा, ध्यान और समाधि। धारणा, ध्यान, समाधि, तुम और ब्रह्म। इसका क्या अर्थ है? आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान में क्या फर्क है?

धारणा मतलब, मुझे धारणा बनानी चाहिए, क्योंकि मुझे कुछ चाहिए तो धारणा बनानी पड़ती है कि मुझे यह चाहिए। उसे धारणा कहते हैं। तो मुझे निर्विकार की धारणा बनाना है। तो धारणा जब बनाओगे कि मुझे निर्विकार होना है, तो निर्विकार होने का काम करोगे। तो धारणा ध्यान में लग गई, कि मुझे निर्विकार होना है। तो धारणा, ध्यान, और जैसे निर्विकार होगे समाधि लग जाएगी। तो उस समाधि लगने के बाद तुम, मतलब आत्मज्ञान, और तुम्हारे बाद फिर परमात्मा। तो धारणा, ध्यान, समाधि, तुम, ब्रह्म। ऐसे। और आत्मज्ञान और ब्रह्मबोध में फर्क है। आत्मज्ञान का मतलब खुद का ज्ञान। और ब्रह्मज्ञान का मतलब जिससे आप हो, उसका ज्ञान। आप भी तो किसी से हो, क्योंकि स्वतः तो हो नहीं। स्वतः होते तो खोज की जरूरत नहीं। समझना। अगर मैं स्वतः अपने आप से होता, तो मुझे फिर किसी की खोज करने की आवश्यकता नहीं होती। अगर मैं किसी को खोज रहा हूं, मुझे कुछ चाहिए, इसका मतलब मैं कहीं और से हूं। तो आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान अलग-अलग हैं। आत्मज्ञान का मतलब खुद का ज्ञान, और इसके बाद ब्रह्मज्ञान मतलब जहां से मैं हूं उसका ज्ञान।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 26 अप्रैल 2026 #योगी · 2026-04-26