प्रश्नोत्तर P8-0095 · भाग 8
साधना को ईमानदारी से करना भी तो ईमानदारी है न? और क्या किसी पर भरोसा करके मार्ग पर चलना चाहिए, जबकि बताने वाला खुद नहीं पहुंचा?
साधना तो कर ही रहे हो। साधना तो अकेले होती है, यह तो ईमानदारी है। लेकिन जब आपके द्वारा कोई काम हो रहा है, तो उस कर्म में ईमानदारी है क्या? क्या आप किसी को उस काम के लिए भरोसा दिला रहे हो? क्या आपको प्रत्यक्ष है, या सिर्फ भरोसा ही भरोसा है? भरोसा है तो झूठ है।
अगर तुम एक व्यक्ति को पकड़ लो और बोल रहे हो कि भैया तू इस रास्ते चल, तर जाएगा, और तुझे खुद नहीं पता, तुम खुद नहीं तर पाए हो, तो बेईमान हो गए। आज लोग क्या कर रहे हैं? महापुरुषों की बानी उठा के गारंटी ले रहे हैं, लेकिन वे खुद नहीं पहुंचे। तो बेईमान हैं। अगर तुम जिस मार्ग से खुद नहीं पहुंचे, उस मार्ग का ठप्पा तुम कैसे मार सकते हो कि यह मार्ग आपको पहुंचाएगा? बताओ, तो बेईमान हो गए। आज लोग प्रचारक बन के महापुरुषों की बानी उठा के अपना ठप्पा मार रहे हैं। अगर आप दूसरे के चेक पर साइन करोगे तो चेक बजेगा क्या? अगर उस मार्ग के बारे में आप कह रहे हो कि भैया तुम इस पर चलो, पहुंच जाओगे, तो तुम क्यों नहीं पहुंचे? जवाब दो। तो कहते हैं, भरोसा रखो। यह आदमी फिर झूठा है। अगर इस मार्ग से मैं पहुंचूंगा, तुम क्यों नहीं पहुंचे? तुम चल ही रहे हो।
भाई, पढ़ाने का अधिकारी कौन है? जो पूरी डिग्री पाकर शिक्षक बन गया हो। अगर वह विद्यार्थी ही है तो पढ़ाने का अधिकारी थोड़ी है। अनुमति देगी सरकार। तो हमें खुद समझना चाहिए। आज लोग महापुरुषों की बानी उठा के अपना ठप्पा मार रहे हैं, कि हम कह रहे हैं तुम पहुंच जाओगे, लेकिन खुद नहीं पहुंचे। अब जैसे आप ही ने उस दिन कहा था कि मैं प्रवचन करता हूं। तो आप किसी किताब का करते हो। आप लोगों को आश्वासन देते हो कि यह करोगे तो पहुंच जाओगे। तुम क्यों नहीं पहुंचे? तो यह झूठ है, आप बेईमान हो फिर। आप किस आधार पर कह रहे हो कि भैया ऐसे तुम पहुंच जाओगे? तुम क्यों नहीं पहुंचे? यह प्रश्न खड़ा करो अपने ऊपर। पहुंचने के बाद आप रास्ता बता सकते हो, क्योंकि फिर वह आपका होगा, उसका नहीं। जब आप किसी के बताए मार्ग से उस लक्ष्य तक पहुंच गए, लक्ष्य पर जैसे पहुंचे, तो वह तरीका आपको मिल जाएगा। तब आप किसी को मार्ग बताने के अधिकारी हो।
जैसे आपने कहा कि आप सत्संग करते हो, प्रवचन करते हो। सत्संग तो तभी करोगे जब सत्य तक पहुंच जाओगे। प्रवचन मतलब किताबों से बोलना, किसी भी किताब से बोलना। तो यह बेईमानी है। जब उस किताब के द्वारा, उन शब्दों के द्वारा, खुद का कल्याण नहीं हुआ, तो दूसरे का कैसे होगा? कैसे गारंटी ले रहे हो? तो यह गारंटी लेना ही बेईमानी है। और समझ में भी आता है आप कहां से बोल रहे हो। तो यह बेईमानी है। अगर आप इस मार्ग में भी चल रहे हो, और कोई पूछे भी, तो बोलो, भैया अभी हम पहुंचे नहीं हैं। पहुंच जाएंगे तो आपको बताएंगे।
मेरे साथ ऐसी घटना घटी थी। यहीं पास में रायबेटरपुरा है, खरगोन जिले में। मैं वहां गया था। दो हजार बीस की घटना है, फरवरी की। वहां मेरी बातचीत हुई। लोगों ने खूब बातचीत की, तो सब बहुत प्रसन्न थे। बोले, आप मुझे मार्ग बताओ। एक बालक ने कहा कि अब तो जा ही रहे हो, लेकिन मुझे मार्ग बता के जाओ। तो मैंने कहा, बेटा मार्ग तो मिल गया है, लेकिन अभी ठप्पा मेरा नहीं लगा है। मार्ग मिल गया है, लेकिन अभी पक्का नहीं हुआ है कि इस मार्ग से तुम पहुंच पाओगे। अभी यह नहीं हुआ है। जिस दिन मुझे यह पक्का हो गया, मैं उस दिन तुम्हारे गांव में आकर तुम्हें मार्ग बताऊंगा। तो जब मुझे ज्ञान हुआ, तो मैं फिर उस गांव में गया और उनको मार्ग बताया।
जब मैं पहले घूमता था, तो यह समाज है। किताबों की भी बात बोलो तो कहेंगे तुम ज्ञानी हो। लोग मुझे खुद कहते थे। दो हजार दस से मैंने साधना चालू की। ग्यारह में पूरी तरह निकल गया। तो लोग खुद बोलते थे, आश्रम बना लो गुरुदेव, आप मुझे दीक्षा दे दो। मैंने कहा, भाई मैं खुद चल रहा हूं। लोग मुझे खुद कहते थे, आपको ज्ञान हो गया। मैंने कहा, मुझे ज्ञान हो गया यह आप कह रहे हो, लेकिन मुझे पता है नहीं हुआ। ये जितने भी शब्द बोल रहे हैं, किताबी हैं, लोगों के हैं, मेरे नहीं हैं। और इस बात का मुझे पता है, आपको नहीं पता, इसलिए कि आपने वह किताब नहीं पढ़ी। आपको नहीं पता चल रहा है। आपको लग रहा है मैं बोल रहा हूं, लेकिन आपने वह किताब नहीं पढ़ी है जहां से मैं बोल रहा हूं। गड़बड़ यह है। तो मुझे लोगों ने घोषित कर दिया था, लेकिन मैं नहीं माना। बोला, न तो मैं तुम्हें शिष्य बनाऊंगा, और न मैं अभी गुरु लायक हूं। गुरु ज्ञान का प्रतीक है, लेकिन मैं तो अभी जानकारी का प्रतीक हूं। मैं खुद ईमानदारी से बोलता था।
लोग मेरे पीछे पड़ जाते थे कि अब आप यहीं रुको, आप तो भगवान हो, आप एक काम करो, आश्रम बना देते हैं। मेरे घर वाले खुद मेरा फोटो लगाकर पूजा करने लगे। मैंने इस तरह की साधना की, लेकिन मुझे ज्ञान नहीं हुआ था। मैं मार्ग में चल रहा था। समाज को क्या चाहिए? सिद्धियां। सिद्धि वाली हो तो बस, उनको लगे कल्याण हो जाए। सिद्धियां हमें दो हजार दस में ही मिल गई थीं। अनेक तरह की सिद्धियां मिल गई थीं। वाक् सिद्धि मिल गई थी, स्पर्श सिद्धि मिल गई थी, देखने की सिद्धि मिल गई थी। बहुत सारी सिद्धियां मिल गई थीं। लेकिन मुझे तो अपना आत्मिक कल्याण करना था। तो मैं इन सब चीजों में नहीं उलझा। मैं खुद बोलता था, नहीं भाई, मुझे ज्ञान नहीं हुआ है, मैं उसी की खोज में हूं। तो इतनी ईमानदारी होनी चाहिए। लेकिन अपने बड़प्पन में बोल दो, हां भैया मुझे ज्ञान हो गया। समाज है। समाज तो कुत्ते की समाधि को भी पूजने लगता है, अपनी कामनाओं में। गधे की भी। किसी का भी देखो, भूत-प्रेत, पेड़-पौधे, नदी-नाले, सब पूज रहा है। ईंट-पत्थर सब पूज रहा है, किस कामना में? तो तुम्हें भी पूजने लगेगा। कोई बड़ी बात थोड़ी है।
अरे भाई, तुम कहीं भी जाओ, कपड़े पहन लो। कपड़े का कोई ऐसा लाइसेंस तो है नहीं। सरकार अनुमति देती है, कोई डिग्री नहीं है। अभी गेरुआ पहनो और चले जाओ, भभूत ले लो, माला पहन लो, और दस को पकड़ो। एक-एक को दस अंक दे दो। बोलो जाओ, लॉटरी लगा दे। लग जाएगा? नहीं। अंक लगा दे। शाम तक एक तो आएगा। एक से लेकर दस तक गिनती का अंक दस को दोगे, तो शाम को एक मीठा लेकर पहुंच जाएगा। बोलेगा, आपके आशीर्वाद से लग गया। बोलोगे, हां चलो। नौ भले कहीं जाएंगे, लेकिन एक आएगा। और एक कब तक आएगा? जब तक सब बेच नहीं देगा। वह तो बहुत लोगों को पकड़ के लाएगा। यही तो चल रहा है। तो आप लोग समझो इस बात को। आप जिस मार्ग से नहीं पहुंचे हो, आप बताने के अधिकारी नहीं हो। तो कहीं न कहीं आपसे भी बेईमानियां हुईं, चाहे जैसे भी, लेकिन अब मत करो। क्योंकि समझने के बाद भी करोगे तो ज्यादा गिरोगे। अब मत करो। बाद में घुटन बचेगी। इंद्रियां भोग नहीं ले पाएंगी। देख-देख के घुटन होगी। लोग उसका दुरुपयोग करेंगे। आप गाली बकोगे।
तो भैया, मुझे दो हजार ग्यारह में लोग आश्रम बना के देने के लिए तैयार थे। लेकिन मैंने बारह साल तक आश्रम नहीं बनाया। मैंने कहा कि इस मार्ग में चले हो तो बारह साल का भ्रमण बोला गया है, कि बारह साल सिर्फ भ्रमण करते रहो, बारह साल खोज करते रहो। ज्ञान की खोज करो। ज्ञान गुरु देगा, गुरु की खोज करो। तो मेरा ऐसे बीता। मैंने बारह साल के अंदर कभी भी एक ईंट भी नहीं रखी कि यह मेरा है। कभी भी नहीं। कहीं भी रह लेता था, और हर जगह धक्के ही खाता था, क्योंकि धर्मस्थान पर भी सो जाऊं।
अभी एक घटना बता रहा हूं ओंकारेश्वर की। ओंकारेश्वर में मैं गया, तो एक जन बोले कि आप इस आश्रम में चले जाओ, वह आपको बताएंगे कुछ। मैं उस आश्रम में गया तो वे नहीं थे। भंडार चलाने वाले को कोठारी बोलते हैं। कोठारी के पास गया। बोला, खा-पी के आराम करो। अब वे नहीं मिले। मैंने कहा, आप कुछ बताओ। तो वह बोला, नहीं, खा जाओ, भोजन कर लो। आराम करना है तो आराम करो। मैंने कहा, जब जिसके लिए मैं आया हूं, जब वही नहीं हो रहा है, तो आराम क्या करें? फिर मैं तुरंत वहां से चला गया। और ओंकारेश्वर में नर्मदा तट है, वहीं पर आराम करने लगा। अब ठंड का महीना, क्या आराम होगा? जैसे-जैसे दस-ग्यारह बजे, शरीर कांपने लगा। और शरीर इतना कांपने लगा कि शरीर को संभालने की मेरी ताकत नहीं थी। हताश हो गया था, निराश हो गया था। क्या करूं? इतना कांपने लगा शरीर। आग भी नहीं थी, ओढ़ने को भी नहीं था। करूं तो क्या करूं?
तो मेरे पास पैसे थे, चिथड़े कपड़े। मैं होटल के पास गया। मैंने कहा, आज रात के लिए मुझे कमरा चाहिए। मेरी सामर्थ्य नहीं बची थी कि मैं इतनी ठंड बर्दाश्त कर पाऊं। तो सामने वाला बोला, लगेज है क्या? एक तो कपड़ा देखा। फिर बोला, लगेज है क्या? मैंने कहा, लगेज तो नहीं है। बोला, कोई कमरा नहीं मिलेगा। मैंने कहा, भाई पैसे तो दे रहा हूं, पहचान का प्रमाण भी दे रहा हूं, दे दो। लेकिन उसने नहीं दिया, क्योंकि मेरी स्थिति ऐसी थी। फिर मैं आया। नर्मदा तट की तरफ आया तो एक गणपति का मंदिर था, वह खुला था। तो मैं गया, मूर्ति के पीछे सोया। इतना कांप रहा था। लेकिन फिर एक डर था कि सुबह अगर पुजारी आ गया, और नींद आ गई। वहां टाइलें थीं, ठंड वहां भी लग रही थी, लेकिन कुछ तो आराम था। हुआ यह कि सुबह अगर कोई पुजारी आ गया तो गाली देकर भगाएगा, और चार ही पांच बजे आ भी जाएगा। तो ऐसी स्थिति में मैंने साधनाएं की हैं। जैसे एक व्यक्ति अभी पूछ रहा है, वहां गर्मी है कि नहीं। इतने लोग रहे, इतनी व्यवस्थाएं, फिर भी पूछ रहा है। मुझसे पूछो मैंने कैसी साधनाएं की हैं।
मुझे आश्रम देने के लिए, उत्तर प्रदेश में लोग भगवान घोषित कर दिए थे। बाबा बनना बड़ा सरल है। सिद्धियां आ गई थीं। लेकिन मैं उसमें नहीं फंसा। मैंने निशुल्क सेवा करके आगे बढ़ गया। मेरे घर वाले घोषित कर दिए थे। मेरी भांजी, मेरी बहन फोटो लगाकर पूजा करें। और वह सब सिर्फ कामनाओं के लिए। कोई आत्मिक कल्याण के लिए थोड़ी। उनकी कामनाएं पूरी हो जाती थीं, तो वे फोटो लगा के पूजा करने लगे। मेरी पूजा थोड़ी कर रहे हैं। कामनाओं की कर रहे हैं। निमित्त मुझे बना लिया था। ये सब बातें मुझे समझ में आ रही थीं। ये बकवास कर रहे हैं। अब इनकी कामनाएं पूरी नहीं हों तो फोटो उठा के फेंक देंगे। वह चाहे मेरी बहन हो, चाहे मेरी भांजी हो। सीधी सी बात है। तो यह बात मुझे समझ में आ गई थी। तो मैं यह सब जाल में कभी नहीं फंसा।
महापुरुषों की वाणी उठाकर भगवान बन जाना, सिद्धियां कुछ पाकर भगवान बनना, बड़ा आसान है। लेकिन आत्मिक कल्याण करना इतना आसान नहीं है। इस संसार में कुछ बनना इतना आसान है, लेकिन बनने से मुक्त हो जाना आसान नहीं है। तो भाई, अभी भी बनने से मुक्त हो जाओ। हां, ये बनाएंगे और तुम्हें नोच लेंगे। आप यह मत समझना कि तुम्हें बना रहे हैं। तुम्हें बना रहे हैं और तुम्हें नोच रहे हैं। बकरे को जब खूब खिलाता है आदमी, तो क्या बकरे को खिला रहा है? अगर बकरा सोचे कि मालिक बड़ा सेवा कर रहा है, मालिक एकदम बढ़िया मुझे काजू, बादाम, किशमिश, गेहूं, मक्का सब खिला रहा है, तो यह बकरे की भूल है। एक दिन ऐसी तुम्हारी भी हालत है। तुम्हें कोई भगवान बना रहा है तो आप यह मत सोचना कि तुम्हें बना रहा है। तुम्हें ऐसा काटेगा कि तुम जिंदगी भर रोओगे। खिला रहा है कोई भी। आप देख लो, कोई भी अगर किसी को खिला रहा है तो उसके पीछे कोई कारण है। गृहस्थ जीवन में देख लो, कुछ भी कोई पालता है, अगर वह खिला रहा है तो उससे ज्यादा वसूलने के लिए। तो मैं इस बात को समझ गया था। चाहे वह बहन हो, चाहे भांजी हो, वे फोटो लगा के पूछते थे। तो मुझे लगा कि यह सब इसका नाटक है। बस कामनाओं में पूछ रहा है। लेकिन मुझे क्या करना है? साधना करके निकल जाना है। और इसीलिए मैं अभी भी एकदम सरल जीवन जीता हूं। मुझे पसंद ही नहीं है। मुझे पाखंड पसंद नहीं है। मुझे झूठ पसंद नहीं है। मुझे बेईमानी पसंद नहीं है। अगर मुझे प्रत्यक्ष पता है तभी आपको कहूंगा, नहीं तो नहीं कहूंगा।
आत्मज्ञान तक पहुंचा हूं, तो मैं आत्मज्ञान तक का रास्ता बता देता हूं। परमात्मा की बात जब कोई करता है तो मैं मना कर देता हूं, क्योंकि अभी मैं खुद उससे नहीं मिला हूं। अब मेरा मिलना होगा, लेकिन जब तक मिलूंगा नहीं तब तक आपको कैसे बताऊंगा। तो आत्मज्ञान तक का रास्ता बताता हूं। और आत्मज्ञान अगर आपने कर लिया, अपने आप को, फिर किसी से कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं है। जैसे कोई स्त्री गर्भ धारण कर ले तो फिर उसे किसी की जरूरत ही नहीं है। बस वह इंतजार करे, एक दिन मां बन जाएगी। तो आत्मज्ञान के बाद आपको कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं है। एक समय ऐसा आएगा कि अपने आप ब्रह्मज्ञान हो जाएगा।
तो मेरा यही कहना है कि अगर आपको पता है तो आप बताओ, नहीं तो बोल दो मुझे नहीं पता। यह भी एक ईमानदारी है, कि मुझे नहीं पता है भाई। किसी को ठगो मत। किसी की भावनाओं को ठेस मत पहुंचाओ। आप उस मार्ग से चले नहीं और बोल रहे हो कि तुम पहुंच जाओगे। तू क्यों नहीं पहुंचा? जवाब है तेरे पास। आज इतने कथावाचक हैं, कथा कर रहे हैं। क्या वे तुम्हें मुक्त लगते हैं? लेकिन वे लोगों को आश्वासन देते हैं कथा करके कि तुम मुक्त हो जाओगे। जब तू ही मुक्त नहीं हुआ, तो वह कैसे होगा? और गारंटी खूब ले रहे हैं। लेकिन वहां भी ज्यादा से ज्यादा कामनाओं वाले जाते हैं। आत्मिक कल्याण वाले थोड़ी जाते हैं। तो मेरा यही कहना है कि आप किसी को अगर मार्ग बताओ तो वह मार्ग आप चल के वहां पहुंचे हो, तब बताओ। और नहीं तो मत बताओ, क्योंकि फंसाने का भी दोष लगेगा। इस बात का विशेष ध्यान रखो आप लोग।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 26 अप्रैल 2026 #योगी · 2026-04-26