प्रश्नोत्तर P7-0140 · भाग 7
चेतन और जड़ एक ही हैं, या अलग अलग हैं? जड़ में भी चेतनता है क्या? और जड़ के टुकड़े होते हैं क्या?
इस ब्रह्मांड में जड़ और चेतन कहा गया है। चेतन बोला गया है आत्मा को। आत्मा हमेशा चेतन में आती है, जड़ में नहीं। जड़ में नहीं आ सकती। चेतन, चेतन को चेतन करता है। जैसे मुर्दे से बच्चे पैदा नहीं होते। यह शरीर चेतन है। और यह कब से चेतन है? जब से पृथ्वी पर पहला नर और मादा आया है, तब से इसकी चेतनता गई नहीं है। अगर एक बार इसकी चेतनता चली जाएगी, तो इस शरीर से शरीर नहीं निकलेगा।
जड़ मतलब अपने से चल नहीं सकता, उठ नहीं सकता, बोल नहीं सकता। उसको कोई निमित्त चाहिए। और चेतन अपने से चलने लगता है। चेतन जड़ वस्तुओं का उपयोग करके अपने शरीर को बढ़ाता है। जो कुछ ग्रहण करता है, वो जड़ ही ग्रहण करता है, और वह शरीर में जड़ ही हो जाता है। अपने शरीर को बढ़ाता है। तो ये अलग अलग हैं।
चेतनता जड़ में भी है। लेकिन जड़ में क्या होता है? उसमें काम भाव नहीं होते। चेतन में पाँचों होते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह। तो चेतन और जड़ अलग अलग हैं।
अब हम चेतन में फँस चुके हैं। अब हमें चैतन्य में होना है। चेतन में हम फँस गए हैं। कैसे? शरीर को हम अपने आप समझ लिए। चेतन क्या है? शरीर है। और मैंने अपने आप को यही समझ लिया। अब इसी रूप को मैं सोच रहा हूँ, इसका नाम हो जाए, शोहरत हो जाए। फोटो कहीं लगा देता हूँ। नहीं, यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। लेकिन हम इस रूप को सिद्ध करना चाहते हैं, कि यह मैं हूँ। आप कहीं प्रतिमा बना देते हो। अपनी कहीं मूर्ति बनवा दे रहे हो। अपना फोटो लगा दे रहे हो, कि ये मैं हूँ। लेकिन ये ना पहले था, ना बाद में रहेगा। लेकिन तुम यही बताना चाहते हो। तुम यही होना चाहते हो। तुम्हें लगता है, मैं यह हूँ। तो तुम चेतन में फँस गए हो।
चेतन में कैसे फँस गए? इसे सिद्ध करना चाहते हो, कि मैं हूँ। आप सिद्ध करने में लगे हो। अब सिद्ध करने के लिए आप अनेक तरह की बेईमानियाँ करते हो। यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। लेकिन आज तक आप इस रूप को ही सिद्ध करना चाहते हो, कि ये मैं हूँ। तो आप चेतन होकर चेतन में फँस गए। अपने आप को चेतन समझ लिया। चेतन मतलब यह शरीर। अब अपने आप को इससे छुड़ाना पड़ेगा।
अब हम एक रूप में इसमें फँसे, और इस रूप को सिद्ध करने के लिए अनेक रूपों में फँस गए। बाहर के रूप से मुक्त होंगे, स्वरूप में आएँगे, तो आत्मा का बोध होगा। इसे आत्मज्ञान कहते हैं। और जब मैं इस रूप से पूरी तरह मुक्त हो जाऊँगा, तब मुझे ब्रह्म का ज्ञान होगा। तो मुझे चेतन से चैतन्य में होना है। चैतन्य ज्ञान की स्थिति है, आत्मज्ञान की स्थिति है। और यह तभी छूटेगा, जब आप इसको सिद्ध करने की लालसा छोड़ दोगे, कि ये मैं हूँ, ये मैं हूँ।
यहाँ तक ठीक है, क्योंकि व्यावहारिक जगत में बताना पड़ेगा कि मैं यह हूँ। लेकिन इसे सिद्ध करने में लग गए। इसे छोड़कर जाना चाहते हो, और साथ में यही जताना चाहते हो कि यह मैं हूँ। यह गड़बड़ हो गया। तुम इस रूप के चक्कर में, इस पिंड के चक्कर में फँस गए। और तुम इस पिंड को समझने लगे कि मैं यह पिंड हूँ। यहाँ गड़बड़ी हो गई।
तो जड़, चेतन और चैतन्य। आपको चैतन्य में आना है। आप चेतन में फँस चुके हो। अब यह तभी होगा, जब राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से, और मान की इच्छा से, अपने आप को मुक्त कराओगे। तभी संभव है। नहीं तो नहीं होगा। जब तक आप सिद्ध करने में लगे हो कि मैं यह हूँ, और आप इसे छोड़ के जाना चाहते हो इस रूप को, कि मेरे जाने के बाद भी लोग देखें कि मैं यह हूँ, और उसी को बनाने में लग गए हो, तब तक आपका कल्याण संभव नहीं। तो कुछ बनने और बनाने की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। मान की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। क्योंकि मान के चक्कर में ही तो आप सिद्ध करना चाहते हो कि मैं यह हूँ।
आपने देखा ना, वो परी की तरह फोटो निकाल रही थी। तो वो जिस रूप में थी, उसमें खुश नहीं थी। वो बता रही थी, देखो मैं यह हूँ, हवा में उड़ रही हूँ। नहीं, वो अपने आप को सिद्ध कर रही थी। रूप उसका था, कपड़े दूसरे थे। कपड़े पर कपड़ा लगा के अपने आप को सिद्ध करना चाहते हैं।
तो जड़, चेतन और चैतन्य। आपको चैतन्य में होना है। और यह तभी संभव है, जब आप पूरी तरह उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा पाएँगे।
जड़ परिवर्तनशील है। और चेतन, चेतन को पैदा करता है। उससे वैसा ही पैदा हो जाएगा। वो वैसा ही रहेगा, और उसी तरह कई पैदा हो जाएँगे। लेकिन जड़ के टुकड़े होते हैं। चेतनता उसमें भी है, सूक्ष्म रूप में। चेतनता पूरे ब्रह्मांड में है।
तो लग जाइए पूरी तरह। अपने आप को देखिए, समझिए। संयम और धैर्य से पूरी तरह लग जाओ। और हाथ उसका पकड़ो, साथ उसी का करो, जो मुक्त अवस्था में हो। क्योंकि जिसका साथ करोगे, वहीं चले जाओगे। तो सूझबूझ और समझ के साथ करो, कि मैं किसका साथ कर रहा हूँ।
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