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प्रश्नोत्तर P7-0103 · भाग 7

गृहस्थ आश्रम में जो भी मिलता है वह अपोजिट क्यों मिलता है? थोड़ा अंतर तो होना चाहिए, पर इतना अंतर क्यों मिला? मैं बचपन से गुरु के घर जाने वाली थी। इन्होंने साफ कह दिया था कि हम खाते पीते प्राणी हैं, और मैं लहसुन प्याज न खाने वालों में से थी। गुरु को छोड़ना नहीं चाहती थी, क्योंकि छोड़ती तो विवाह के लिए कहीं और जाना पड़ता। बड़ों की सहमति से, गुरु के कारण, इन्हीं से किया। अब रोती क्यों हूं?

अपोजिट नहीं मिले, तो मान लीजिए आप कहो एक गिलास पानी लाओ, और सामने वाला आप ही जैसा हो, तो वह भी तुरंत कहेगा तुम एक गिलास पानी लाओ। तब दोनों का चलेगा ही नहीं। अपोजिट में ही कुछ पैदा होता है। दोनों माइनस माइनस मिला दो तो बल्ब जलेगा क्या? सौ प्रतिशत यही है। यूनिवर्सल है। अपोजिट में ही कुछ पैदा होगा। एक ही जैसे रहेंगे तो जरूरत क्या है? नेचर भी इतना अपोजिट है। तभी तो कुछ समझ में आएगा। एक ही जैसे हो जाएं तो कुछ पैदा कैसे होगा? एक जैसे नहीं होते। ऐसा लगता है एक दूसरे को समझते होंगे। एक जैसा यहां कोई नहीं है। एक जैसे पेड़ के पत्ते भी नहीं हैं। नेचर एक जैसा कभी हो ही नहीं सकता। थोड़ा अंतर होना चाहिए, यह कहते हो। अंतर है तो समझो। अंतर क्यों है? उसके पीछे कुछ होगा। बेस होगा, आधार होगा, कुछ तो होगा। अंतर क्यों है? इन्होंने जितना था, साफ साफ बता दिया था। आपने तब छोड़ दिया। खाते पीते को पीछे छोड़ दिया था, तभी स्वीकार किया था। तो अब रो क्यों रही हो? बच्चों को बोलोगे, तब समझ में आएगा।

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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03