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प्रश्नोत्तर P7-0076 · भाग 7

राजेश की समझ को लेकर ये घटनाएं सामने हैं। एक बार रिचार्ज कहा, तो पैसे दूसरे नंबर के अकाउंट में चले गए, और कहा कि आप देख रहे थे, जबकि कर रहा खुद था। एक बार बड़वानी से आए, सामने हजार रुपये दे दिए गए, फिर भी रास्ते में पेट्रोल के पैसे नहीं हैं, ऐसा नहीं बताया। पेट्रोल खत्म हुआ, खेत की तरफ जाना पड़ा, फिर गांव से व्यवस्था करनी पड़ी। जब कोई सिखाने को मिला है, तो कब तक सिखाएं? और ईमानदार, सच्चा इंसान आवेश, जज्बात और अकड़ की वजह से बार-बार क्यों लुटता और भटकता रहता है?

एक दिन की बात बताता हूं, फिर जाना। राजेश से कहा, इस नंबर पर रिचार्ज कर दो। दूसरे नंबर के अकाउंट में पैसा चला गया, उतना ही। मैंने कहा, ये तूने क्या किया। बोला, आप तो देख रहे थे। मैंने कहा, मैं देख रहा था। कर तो तू रहा था। बोला, आप तो देख रहे थे न। मैं क्या देख रहा था। तेरा नंबर था, तूने डायल किया। बोला, मैं क्या करूं। मैंने कहा, मैं करूंगा। अकाउंट में पैसा भी मंगवाओ। तुझे जो करना है, कर। अब मुझे फिर से मंगाना पड़ेगा। एक और दिन की घटना। मैं वहीं सामने उसे हजार रुपये दे रहा हूं। बड़वानी से आया था। हजार रुपये दे रहा हूं। रास्ते में बोला, पेट्रोल का पैसा है? बोला, मेरे पास तो नहीं है। बोले, मेरे पास भी कुछ नहीं है। जब मैंने सामने दिए, तो तूने क्यों नहीं बोला? मेरा परिचय तो ऐसा है कि मैं जहां खड़ा हो जाऊं, पट से फूल हो जाए। लेकिन अब मैं खड़ा भी नहीं हो सकता, क्योंकि वो मेरे से पैसे नहीं लेता, और मैं मांग भी नहीं सकता। जहां दुकान से सामान आता है, वो सामान लिया था। मैंने कहा, इनको देकर जाता हूं। मेरे पास थे, इनको देकर जाता हूं। मुझे पैसे की क्या जरूरत। अब जा रहा हूं, इनका हिसाब खत्म करूं। आऊंगा या नहीं आऊंगा, मुझे क्या मालूम। इनके पास नहीं है, बताया भी नहीं। रास्ते में पेट्रोल खत्म हो गया। मैंने कहा, चल, खींचो। हम उतर गए। ये खेत की तरफ जाने लगे। अब क्या करें। मैंने कहा, तू कर ले तो ठीक है, नहीं तो मैं व्यवस्था कर दूंगा। इसने अपनी व्यवस्था की। फोन करके, गांव में था, तो मंगवाया। ऐसी समझ है। इसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला। हमें भी सीखने को मिलता है। आपको कोई सिखाने के लिए मिला है, तब तक सिखाइए, जब तक वो है। चला गया, कोई बात नहीं। लेकिन ऐसा नहीं कि उसे अनदेखा कर दो। वो बेचारा चला ही जाए, इस भाव से नहीं। कहीं पता चल जाए कि आप उसे सच में भगाना चाहते हो, और वैसा बर्ताव कर रहे हो। ऐसा नहीं। अच्छे इंसान, ईमानदार इंसान, सच्चे इंसान बड़े बेवकूफ होते हैं। ये बहुत बेवकूफ होते हैं। इनके पास आवेश, जज्बा, अकड़ भरा होता है। और इनका दुष्ट लोग उपयोग कर लेते हैं। बहुत बुरी तरीके से। जो लालची हैं, लोभी हैं, बनावटी बातें करते हैं, ये इनका उपयोग कर लेते हैं। ये कहीं एक महीने, कहीं दो महीने, कहीं एक साल यूज होकर ऐसे ही जीते रहते हैं। और लुटते रहते हैं। इनमें से अगर आवेश, जज्बात और अकड़ हटा दो, तो ये बहुत आगे जा सकते हैं। क्योंकि इनके अंदर ईमानदारी है। ईमानदारी तपस्या है। सच्चाई तपस्या है। उसे तब भी कभी जल नहीं सकती। लेकिन इनके अंदर सबसे बड़ा माइनस पॉइंट आवेश, जज्बात और अकड़ है। ये इसे नहीं निकाल पाते। और इसी में आकर, आवेश में, जज्बात में, कभी इधर, कभी उधर, ऐसे ही भटकते रहते हैं। इसलिए अपने अंदर से आवेश, जज्बात और अकड़ निकालो। ये बहुत जरूरी है। ये नहीं निकालोगे, तो ये आपको बर्बाद कर देगा। फिर वही, जवानी ज्यादा दिन बिकती थोड़ी है। चालीस के बाद रोने लगेंगे। क्योंकि वो तरंग, उमंग, ऊर्जा शरीर में नहीं रह जाएगी। तो फिर वही यूज होगा। पेट के लिए रोटी चाहिए। यूज तो होना ही पड़ेगा, क्योंकि पेट है, तो भेंट है। किसी न किसी के पास तो जाना ही पड़ेगा, इस पेट के लिए। पर मैं बता दूं, आश्रम में मैंने देखा। जवानी में आ गए। ठीक है, हुआ कुछ नहीं। अब कहानी सुनकर वही पड़े हैं। बात बस रोटी की है। अब जाएगा क्यों। पसीना कौन खोले। समझ रहे हो। समझकर जीवन जियो। आवेश में नहीं, जज्बात में नहीं। एकदम समझ के साथ। गलतियां तो देखो, पांचों पांडव ने भी कर दीं, कृष्ण के साथ रहने पर भी। कृष्ण ने पूछा, आपने रोका क्यों नहीं। बोले, मुझसे पूछा कहां। मेरे से चोरी-छिपे तो ये जा रहे थे। जब चोरी से जा रहे थे, तो मैं रोकूं क्यों। तो बड़ा समझकर जीवन जिए। एक झटके में पत्नी तक हार गए। इतने वीर योद्धा होते हुए भी। बहुत समझकर जीवन जियो, आवेश और जज्बात में नहीं। वो भी उनके साथ कृष्ण थे। क्या-क्या नहीं हुआ। दुर्दशा हुई, देश निकाला हुआ। बस मात्र एक जुए के लिए पत्नी तक दांव पर लग गई। काश वो उनसे पूछ लेते, कि भैया, मैं करने जा रहा हूं। ऐसी गलतियां हम करते रहे। ऐसी-ऐसी गलतियां व्यक्ति करता है।

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वीडियो: किसी को सुधारने के लिए सुधारक को कितनी मेहनत करनी पड़ती हैं ? #yogiji_ka_satsang · 2025-06-27