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प्रश्नोत्तर P7-0016 · भाग 7

व्यवहार में बाहर की चीजों से संबंध कैसे बनता है? श्मशान में लाश जलती देखकर नमकीन कैसे खाई जाती है? भोजन का संबंध शरीर के लिए है या अपने लिए? जरूरत में जीने पर संबंध होते हुए भी संबंध क्यों नहीं रहता?

जो व्यावहारिक जीवन जी रहा है, जैसे हम यहाँ बैठे हैं, तो हम अपने और बाहर की चीजों से अंतरसंबंध बनाए हुए हैं। आपको हम सुन रहे हैं। जैसे यह प्रकृति है, हवा चल रही है, पौधे हैं, तो हमारा अंतरसंबंध है ना उनसे। मेरा हुआ। आपको चाहिए इसलिए आप उसमें लिप्त हो। एक उसमें राग-द्वेष में देख रहा है। एक सिर्फ दिख रहा है, तटस्थ है। बस दिख रहा है। उसे कुछ नहीं चाहिए। आप देखिए, श्मशान में जाते हो, और कैसे आप नमकीन खाते हुए लाश को जलते देखते हो। बताओ। संबंध नहीं है। उसके साथ कोई अपना होता है तो बात दूसरी है। और कोई आकर बता दे कि आपके संबंधी हैं, फिर दूसरे तरह हो जाता है। वह भाव से ही संबंध बना। कर्म से संबंध नहीं है। घटना से संबंध नहीं। वह हो रहा है तो हो रहा है। हम तटस्थ हैं। हम निरपेक्ष हैं। यही कहना चाह रहा हूँ। अगर संबंध बना रखा है तो आप अपने आप में स्थिर हो ही नहीं पाएँगे। जब तक संबंध है, आपने संबंध बना के रखा है। संबंध हमेशा राग में ही बनते हैं। सहज भाव में भी तो संबंध है। जैसे हम भोजन कर रहे हैं तो भोजन से हमारा संबंध है। भोजन क्यों कर रहे हो। अब यह देखना है कि शरीर के लिए कर रहे हो कि अपने लिए कर रहे हो। शरीर के लिए। जी की वजह से नहीं। शरीर की वजह से। जी तो उसमें छिपा ही हुआ है। स्वादिष्ट होगा तो और लग जाएगा। संबंध हमारा सीधा भोजन से नहीं, लेकिन संबंध हमारा शरीर से तो है। आखिरी में शरीर से भी छूट जाना है। आप जितना भी कर रहे हो, किसके लिए कर रहे हो। छूट जाना है। शरीर से भी छूट जाना है, सारी चीज से। लेकिन शरीर के निर्वाह के लिए, जीवन निर्वाह के लिए, जो हमारा अंतरसंबंध बनता है प्रकृति से, अगर जरूरत में जी रहे हो तो संबंध होते हुए भी संबंध नहीं है। जरूरत में जी रहे हो तो संबंध होते हुए भी संबंध नहीं।

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वीडियो: आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है ? #livesatsang · 2025-03-13