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प्रश्नोत्तर P6-0162 · भाग 6

कानपुर से एक साधक आए हैं। नर्मदा परिक्रमा वाले वचन से प्रभावित हुए, कि जहाँ से चले थे वहीं पहुँच जाओ, यही परिक्रमा है। सीमेंट, सरिया और मौरंग का काम है, जिसमें झूठ बोलना पड़ता है। कुछ चाहिए में निकले थे। कुछ नहीं चाहिए को जीवन में कैसे धारण करें, कैसे उतारें?

जहाँ से चले थे वहीं पहुँच जाओ, यही परिक्रमा है। कुछ होकर चले थे, और कुछ नहीं में पहुँचे, तब परिक्रमा का मतलब पूरा होता है। कुछ चाहिए में ही निकलोगे, नहीं तो निकलोगे ही नहीं। पहुँचते पहुँचते अगर कुछ नहीं चाहिए में आ गए, तो बात खत्म हो गई। ऐसा जीवन जियो कि कुछ चाहिए में तो जीवन है, और आखिर में जाते जाते कुछ नहीं चाहिए में आ जाओ। बस इतनी सी बात है। इसे कैसे धारण करो, जीवन में कैसे उतारो। जरूरत में उपयोग करने लगो। जरूरत देखो। जो करने जा रहे हो, वह तुम्हारी जरूरत है, या ऐसे ही है। ऐसे ही वाले को छोड़ दो। जरूरत में जीते हुए निकल जाओ। अगर जरूरत में जीने लगोगे, तो कुछ नहीं चाहिए अपने आप आ जाएगा। यहाँ दो दिन रहना है तो यहाँ के नियम में रहना होगा। फोन का स्विच बंद। खाना पीना अलग से नहीं। एक बार भोजन मिलेगा। किसी से एक शब्द बातचीत नहीं कर सकते। नियम मालूम होकर आए हो, तो उसी में रहो।

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